Friday, 29 June 2018

कश्मीर: समस्या आखिर समाधान क्या है


एक बार फिर जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री रह चुके सैफुद्दीन सोज के एक बयान से विवाद खड़ा हो गया है। उन्होंने पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के उस बयान पर सहमति जताई है जिसमें उन्होंने कहा था कि आजादी कश्मीरियों की पहली पसंद है। ऐसे बयानों से भले ही मीडिया को मसाला मिलता रहा हो लेकिन इस बात से कौन इन्कार कर सकता है कि घाटी को सुलगाने में अरसे से ऐसे ही बयान चिंगारी बनते रहे हैं। ऐसे बयानों से ही आतंकी संगठन उनके आर्थिक और मानसिक पेरोकारों को खुराक मिलती रही है। इस सबसे आम कश्मीरी के लिए यह धारणा आसानी से पहुंच जाती है।


अचानक 19 जून को भाजपा द्वारा गठबंधन सरकार से समर्थन वापस लिए जाने के बाद वहां उपजे राजनितिक संकट को देखते हुए कई महत्त्वाकांक्षी नेता मैदान में इस तरह के बयान देकर एक विशेष धारणा के लोगों को खुश करते दिख रहे हैं। जिसकी वाहवाही पड़ोसी देश से भी उन्हें बराबर मिल रही है। लेकिन इस सबके बीच यह कोई नहीं समझ पा रहा है कि जो कश्मीर कभी दो देशों भारत और पाकिस्तान का विवाद हुआ करता था, आज एक इंडस्ट्री बनकर रह गया है। आतंकियों का अपना अलग फार्मूला है उन्हें इस्लाम चाहिए, उनकी मांग को पुख्ता करने वाले अलगाववादियों को पडोसी देश पाकिस्तान तथा विदेशों से फंड मिल रहा है। जिससे उनकी जिन्दगी मजे से कट रही है। कश्मीरी राजनितिक घरानों को सत्ता और युवा बेरोजगार लोगों को पत्थरबाजी से रोजाना दिहाड़ी मिल रही है। इन युवाओं को मस्जिदों से उकसाने वाले मुल्ला-मोलवियों को मोटी पगार मिल रही है कहा जा रहा कि इंडस्ट्री का हिस्सा बने इन मुल्ला-मौलवियों ने खुदा की बंदगी छोड़कर अलगाववादियों की बंदगी शुरू कर दी है। धर्म स्थलों में खुदा की खिदमत में बजने वाली नज्म के बजाय अब वहां आजादी के तराने आसानी से सुन सकते हैं।

इस नये उद्योग का अगर अध्यन करें पता चलता है कि इसका फायदा पत्थरबाजों, कथित धर्मगुरुओं, कश्मीरी नेताओं और अलगाववादियों तक ही सीमित नहीं है शायद इसका लाभ देश के बाहर भी संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकारों के उच्चायुक्त जायद बिन राड अल हुसैन तक भी पहुँच रहा है तभी तो यूएन की रिपोर्ट में अंतर्राष्ट्रीय रूप से चिह्नित और खुद यूएन ने जिन आतंकी समूहों को प्रतिबंधित किया है उसे ‘‘हथियारबंद समूह’’ और चरमपंथियों को चीयरलीडर्स  कहा गया है। सैनिकों पर हमला करने वाले पत्थरबाजों को मासूम और इन दोनों के बीच पिसती भारतीय सेना की कार्यवाही पर सवाल उठाये गये हैं।

इस समय देश के विपक्ष को देखें तो लगता है जैसे कश्मीर के सारे समाधान उनकी जेब में हैं बस ये सरकार हटें और वे चुटकी बजाकर समाधान कर दें। पर क्या ऐसा वास्तव में है या हो सकता है? यदि है ऐसा है तो फिर वो चुटकी आजादी के करीब 60 वर्ष राज करने के दौरान क्यों नहीं बजाई गयी? मुख्यधारा की राजनीति से दूर अलगाववादी कोई नवजात शिशु तो है नहीं, कि कल परसों पैदा हुए हां! उन्हें पैदा करने वाले भी जरूर कोई रहे ही होंगे और उनका पालन पोषण किसकी सरकार के दौरान हुआ है। जहाँ आज ये सवाल उठाये जाने थे आज वहां सैफुद्दीन सोज जैसे लोग कश्मीरी अलगाववादियों और सीमा पार बैठे उनके आकाओं की धारणा को पुष्ठ करने में लगे हैं।

हालाँकि कश्मीर में हर एक घटना के बाद सबके अपने-अपने समाधान होते हैं। राजनेताओं के अपने समाधान होते है, मीडिया में बैठे लोगों को देखें तो मुँहतोड़ जवाब देने की बात होती ही रहती है। पर जवाब क्या हो, कैसे दिया जाये? समस्या बस इतनी-सी है। खबरों की सबसे तेज आधुनिक मंडी सोशल मीडिया पर हर किसी के अपने समाधान है और न जाने कितने समाधान लोग अपनी-अपनी सोशल मिडिया वाल पर हर रोज चिपकाते हैं। लेकिन! कोई तो वजह होगी जो इतना पुराना मामला अधर में लटका पड़ा है।

वजह यही है कि सरकार जानती है कि कहना अलग बात, लेकिन ऐसे समाधान चुटकियाँ बजाते होते तो कब के हो गये होते। हमारी समस्या यह है कि अलगावादियों के पास तो उसकी खास पाक प्रायोजित आजाद कश्मीर नीति है, जिससे वह आज तक कभी टस से मस नहीं हुए। सत्ता चाहे जिसके पास रही हो, लेकिन हमारे पास अलगावादियों के लिए कोई स्पष्ट सन्देष नहीं है सिवाय इसके कि दो दिन किसी अलगावादी नेता को नजरबन्द कर दे या एक हफ्ते के लिए गिरफ्तार करले इससे ज्यादा हमने अभी तक क्या किया?

सिर्फ बयानबाजी, निन्दा या करारे जवाब शायद इससे आगे अभी तक हम नहीं बढ़ पाए। हमारा तो एक भी जवान शहीद होता है, तो हमें बहुत दर्द होता है, लेकिन आतंकियों या अलगावादियों के पास ऐसी दर्द भरी संवेदना नहीं है। उनके 100 भी मर जाएं, तो उन्हें परवाह नहीं होती। वे मजहब के नाम पर 500 और खड़े कर लेंगे हम 500 मार देंगे, तब भी उन्हें फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि वे अपने भाड़े के हत्यारों की कद्र नहीं करते। वे अपने द्वारा तैयार किये गये आतंकियों को सेना की बन्दूक की भूख मिटाने का चारा समझते हैं। वे चाहते हैं सेना इन पत्थरबाजों की भीड़ पर गोली चलाये, दो मरे या सौ उससे उनका मकसद सफल होता है ताकि जायद बिन राड अल हुसैन जैसे बिके हुए लोग उनकी लाशें संयुक्त राष्ट्र को दिखाते रहें कि देखिये साहब भारतीय सेना का जुल्म। 

शायद इससे जो मकसद हम चाहते हैं, वह हासिल नहीं होगा। हमारा मकसद तो यही है न कि अलगावादी पत्थर परोसना बंद कर दे। तो हमें पहले कड़ी कारवाही अलगावादी नेताओं पर करनी होगी। हमें कश्मीर आबाद रखना है, वे हमारे नागरिक हैं उन्हें अलगावादियों का मोहरा क्यों बनने दे? कहा जाता है सिर्फ पांच प्रतिशत या इससे भी कम कश्मीरी होंगे, जो पाकिस्तान समर्थक हैं या जिनमें भारत विरोधी भावना है। बाकी 95 फीसदी भारत के साथ रहना चाहते हैं, लेकिन अलगावादियों द्वारा गली के नुक्कड़ पर खड़ें किये मजहबी गुंडों और आतंकियों की गोली के डर से वे उनकी ही बात सुन रहे हैं। जिस दिन सरकार उनका यह डर खत्म कर देगी उसी दिन वे देश के गीत गाना शुरू कर देंगे। वरना जिस तरीके वे अपने मकसद में सफल हो रहे हैं ज्यादा समय नहीं लेंगे कश्मीर को सीरिया बनाने में।..लेखक-राजीव चौधरी 


इन पादरियों के गुनाह कौन माफ करेगा?


अपने किये गुनाह की माफी के लिए धार्मिक समुदाओं में अलग-अलग रिवाज हैं। ईसाई कहते हैं कि अपने पाप प्रत्येक रविवार को चर्च में जाकर कन्फेन्श करके खत्म कर दो। इसके लिए बाकायदा चर्च में एक किनारे पर एक बंद सा केबिन होता है। जिसे कन्फेशन रूम या केबिन कहा जाता है। केरल के कोट्टयम के चर्च में एक ईसाई महिला भी अपने गुनाह की माफी मांगने इसी केबिन में गयी थी। पता नहीं जीसस ने उसकी फरियाद सुनी या नहीं सुनी! लेकिन एक पादरी ने केबिन के अंदर बैठकर उसका कबूलनामा सुना था, वह उल्टा उस औरत को ब्लैकमेल करने लगा। उसने महिला का यौन शोषण किया फिर अन्य पादरी भी इसमें शामिल हो गए। ये सब पिछले कुछ सालों से चल रहा था। अब जाकर महिला के पति को ये बात मालूम चली। उसने चर्च को शिकायती चिट्ठी भेजी। जब चर्च के अधिकारियों के लिए इस सच से मुंह मोड़ना मुश्किल हो गया, तो अधिकारियों के पास अपने पंथ की इज्जत बचाने के लिए इसे स्वीकार करने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा ताकि चर्च के अनुयायियों को दूसरे लोगों से मुंह छिपाते न फिरना पड़े इस कारण पांचों आरोपी पादरियों को छुट्टी पर भेज दिया है। 

पिछले कुछ सालों में कई कथित बाबाओं की सैक्स लीलाएं आए दिन सुर्खियों में रहीं। जहाँ तक इन बाबाओं का प्रश्न है, वे अपने अलग-अलग साम्राज्य चलाते हैं। वे किसी धार्मिक संस्थागत व्यवस्था के हिस्से नहीं होते। इस कारण, दोनों की तुलना अनुचित होगी परन्तु दोनों मामलों में जो समानता है, वह यह है कि जिन लोगों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करेंगे, वे स्वयं की वासनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाते।
अपनी आध्यात्मिक उपलब्धियों का दुरुपयोग, शारीरिक सुख प्राप्त करने की वजह से दुनिया भर के कैथोलिक चर्च आज सैक्स स्कैंडलों की बड़ी बदनामी झेल रहे हैं। समूचे यूरोप और अमेरिका सहित अनेक देशों में पादरियों के सैक्स किस्से लोगों की जुबान पर हैं। अगर केवल कल तक में झांक कर देखें तो चर्च के नाम पर भोगविलास में लिप्त इन तथाकथित ईश्वर पुत्रों की सूची आसमान की दूरी तरह लंबी होती चली जाएगी। फरवरी 2017 में बीबीसी की रिपोर्ट में दिया गया था कि आस्ट्रेलिया में एक जांच के दौरान पता चला है कि देश के करीब 40 फीसदी चर्च पर बच्चों के यौन शोषण के आरोप है। बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों पर नजर रखने वाली रॉयल कमीशन के पास 1980 से 2015 के बीच करीब 4,500 लोगों ने यौन शोषण होने की शिकायत दर्ज कराई थी।
इसके बाद वेटिकन के तमाम प्रयासों के बावजूद पादरियों के कुकर्मों की पोल खुलने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। पादरियों के यौन दुराचार की बातें उजागर होते देख चर्च को अपनी चूलें हिलती दिख रही हैं इसी वजह से कुछ साल पहले 16 वें पोप बेनेडिक्ट जगह-जगह जाकर प्रार्थना करने के बजाय अपने लंपट पादरियों के कुकर्मों के लिए माफी मांगते नजर आये थे। पीड़ित लोगों से मिल रहे थे और बेहद शर्मिंदगी व दुःख जता रहे हैं कारण सदियों तक जो बात ढ़की रहती थी, अब छिपाए छिप नहीं पा रही और चर्च का यौनसुख अब संकट में है। क्योंकि अब आम जनता के नैतिकता के पैमाने बदल गए हैं। 
हालाँकि चर्चों का ये यौनसुख नया नहीं है काफी समय से चर्च अपने पादरियों की नाजायज संतानों की समस्या को भी झेल रहा है। अमेरिका, यूरोप और आस्ट्रेलिया में कई औरतें पादरियों से गर्भवती होकर उनके अवैध बच्चों को पालने पर मजबूर हैं। कई चर्चों से इन औरतों से समझौते पर साइन करवा कर मुआवजे दे दिए गए हैं। पिछले दिनों चिली में कैथलिक चर्च ने कथित रूप से बाल यौन शोषण में संलिप्त होने पर 14 पादरियों को निलंबित कर दिया था। चर्च के सैक्स स्कैंडलों की बदनामी से वैटिकन सिटी बार-बार मीडिया की आलोचना भी करता रहा है लेकिन वैटिकन इन मामलों को रोक नहीं पा रहा है। चर्चों के सैक्स किस्से घटने के बजाय बढ़ते जा रहे हैं। मार्च 2010 में न्यूयार्क टाइम्स की सैक्स स्कैंडलों पर कवरेज के लिए आलोचना की गई थी कारण अखबार ने 200 बहरे बच्चों के साथ एक पादरी की दुराचार की खबरें प्रकाशित की थीं।
अपने देश में ही देखें तो 2017 में केरल के कन्नूर जिले में एक कैथलिक पादरी पर एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार करने का इल्जाम लगा था। आरोप था कि पादरी ने उस लड़की का कन्फेशन सुनकर उसे ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया था। इसी वर्ष पटना में एक पादरी चंद्र कुमार कथित तौर पर कई महिलाओं का धर्म परिवर्तन करा कर उनका यौन शोषण करता था। जिन्हें पिछले 6 महीनों से वह अपनी हवस का शिकार बना रहा था। इसी दौरान त्रिसूर में एक कैथोलिक पादरी को नौ वर्ष की एक लड़की द्वारा लैंगिक शोषण का आरोप लगाए जाने के बाद उसे गिरफ्तार किया गया था।
ये तमाम रिपोर्ट किसी को भी शर्मसार करने के लिए काफी है। लेकिन इसके बावजूद देश के पादरी चर्चो और पादरियों के कारनामों पर चिंता करने के बजाय देश की राजनीति को लेकर चिंतित दिखाई दे रहे हैं। अपने पादरियों को चिट्ठी लिखकर केंद्र के सत्तारूढ़ दल को 2019 के चुनाव में हराने की प्रार्थना करने की अपील कर रहे हैं। अपनी आंतरिक शुद्दी की प्रार्थना छोड़कर सत्ता परिवर्तन की प्रार्थना पर जोर दे रहे हैं। हो सकता कल ये पांचो आरोपी पादरी फादर जॉब मैथ्यू, फादर अब्राहम वर्गीज, फादर जेस के जॉर्ज, फादर जॉनसन वी मैथ्यू और फादर जीजो जे अब्राहम भी कन्फेशन रूम में अपने किये कृत्यों की माफी मांग लें और चर्च की तरफ से मामला रफा-दफा हो जाये पर लोगों के मन में उफन रहे सवाल कैसे रफा-दफा होंगे कि इन पादरियों के गुनाह कौन माफ करेगा?......लेखक-राजीव चौधरी 


ईद का चाँद और योगिराज श्री कृष्ण


हिन्दी भाषा के शब्द संस्कार को उर्दू भाषा में तहजीब कहा जाता है और अक्सर देश में गंगा जमुनी तहजीब के बहुत गीत गाये जाते हैं। इनके अनुसार ये तहजीब मिसाल है हिन्दू-मुस्लिम एकता की, ये तहजीब उदहारण है आपसी समरसता का। इस तहजीब के अनुसार कोई सनातन वैदिक धर्म पर कितने भी आघात करे तो तहजीब मुस्कुराती है किन्तु यदि आप किसी वर्ग विशेष के कार्यों पर सवाल उठाते हैं तो ये तहजीब भड़क उठती है इसे खतरा महसूस होने लगता है। ये देश को बाँटने तोड़ने और हिंसा तक करने की बात भी करने लगती है।


इसी तहजीब के गर्भ से ईद के एक दिन पहले एक पेंटिंग सोशल मीडिया पर पेश हुई। एक पेंटिंग, जिसमें योगीराज भगवान श्रीकृष्ण एक चांद की तरफ उंगली से इशारा कर रहे हैं। उनके आस-पास बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्गों की एक टोली खड़ी है। कृष्ण एक शख्स पर हाथ रखे हुए हैं सोशल मीडिया के दावे के मुताबिक, हुलिए से मुसलमान लग रहे उस शख्स को कृष्ण ‘‘ईद का चांद’’ दिखा रहे हैं। तो इसे गंगा-जमुनी तहजीब, भारतीय संस्कार और सामुदायिक सद्भावना के प्रतीक की तरह पेश किया गया। 16 जून को स्वराज इंडिया के योगेंद्र यादव, कांग्रेस नेता शशि थरूर ने इस तस्वीर को ट्वीट किया और ईद की शुभकामनाएं भी दी थीं।

लेकिन इस तस्वीर पर विवाद भी शुरू हुआ। लोगों को गुस्सा आया उन्होंने इस तस्वीर पर सवाल भी उठाये और इसे झूठी चाल बताया। दरअसल श्री कृष्ण जी की ये पेंटिंग पिछले तीन-चार वर्षों से शेयर की जा रही है। बताया जा रहा है कि 17वीं-18वीं सदी में बनी इस पेंटिंग में कृष्ण अपने साथियों को ईद का चांद दिखा रहे हैं और टोली में कुछ मुसलमान भी नजर आ रहे हैं। कृष्ण की इस लीला को हिन्दू-मुस्लिम एकता के चश्मे से देखा जा रहा है। साथ ही ये भी कहा जा रहा है कि डॉ दीपांकर देब की पुस्तक ‘‘मुस्लिम डिवोटिज ऑफ कृकृष्णा’’ में इस पेंटिंग को ईद से जोड़ते हुए उ(ृत किया था। जोकि 2015 में प्रकाशित हुई थी। किताब के प्रकाशित होने के बाद, शबाना आजमी जैसे कुछ और तथाकथित सेकुलर लोगों ने भी इस तस्वीर को उठाया और ईद के साथ उसे जोड़ा। इसे हिन्दू मुस्लिम से जोड़ते हुए यह दिखाने की कोशिश की जैसे इस्लाम पुरातन धर्मो से एक है जिसका इतिहास द्वापर युग से मिलता है जबकि डॉ दीपांकर देब एक स्वघोषित वैष्णवी हैं। इतिहास में उनकी नगण्य पृष्ठभूमि है। लेकिन कथित स्वयंभू सेकुलर लोग इसे कृष्ण की लीला में जोड़ने से जरा भी बाज नहीं आये।

एक प्रसिद्ध कहावत है कि किसी का भरोसा जीतकर उसे मूर्ख बनाना सबसे आसान होता है,  आँखों में धूल झोंककर किसी के साथ भी धोखा किया जा सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए इन लोगों ने इस पेंटिंग को परोस दिया क्योंकि ये लोग जानते है कि जब तक पेंटिंग का सच लोगों के सामने आएगा तब तक ये अपना काम कर चुके होंगे। 

हमेशा सवालों के गर्भ से जवाब पैदा होते आये हैं इस पेंटिंग में भी यही हुआ। कला-इतिहासकारों में जाने माने नाम और पद्मश्री से सम्मानित बी एन गोस्वामी ने कहा है कि इस पेंटिंग का ईद से कुछ लेना-देना नहीं है। इस तरह की अन्य पेंटिंग टिहरी-गढ़वाल कलेक्शन की हैं, जिन्हें नैनसुख पहाड़ी और मानकु के खानदान में बनाया गया था। पेंटिंग में श्री कृष्ण के जीवन की एक कम चर्चित छोटी सी घटना को दर्शाया गया है। इसके मुताबिक, श्रीकृष्ण बलराम के साथ मिलकर अपने मामा कंस का वध करने के बाद कुरुक्षेत्र में घूमे तभी वह एक नदी के किनारे आए। यहां अपने गोद लिए परिवार के साथ उन्होंने सूर्यग्रहण देखा, पेंटिंग में जो चोगा पहने बुजुर्ग दिख रहे हैं वे कृष्ण के पालक पिता नंद हैं। इस पोशाक की सबसे खास बात है कि ये बाईं बगल में बंधी है जो इसके हिन्दू पोशाक होने की बानगी है। वहीं मुगल काल में मुस्लिम पोशाक को हमेंशा दाईं बगल के नीचे बांधते थे। लेकिन जब तक इस पेंटिंग के तथ्यों पर से पर्दा उठा तब तक तो नया विवाद शुरू हो चुका था। जिसमें कई लोगों ने ये सवाल किया कि कृष्ण को ईद मनाते हुए दिखाने वाले क्या इस्लाम के पैगम्बर को दीपावली मनाते दिखा सकते हैं? वह तो कृष्ण के हजारों वर्ष बाद आये न कि पहले।

भले ही एक चित्र से कथित गंगा-जमुनी तहजीब को गाढ़ा किये जाने का प्रयास किया जा रहा हो लेकिन इतिहास में कुछ चित्र अमिट है, जबकि ये चित्र तो महज कल्पना है लेकिन यथार्थ में तो बामियान में टूटी हुई बुद्ध प्रतिमा है, तक्षशिला, नालंदा या साँची के स्तूप का विनाश है। तारीख के स्याह पन्नों पर बख्तियार खिलजी और ओरंगजेब की ज्यादतियों की कहानी कभी मिटाई नहीं जा सकेगी कृष्ण जन्मस्थान मथुरा में उनके मंदिर के आधे हिस्से को गिराकर मस्जिद का निर्माण होना हो या सोमनाथ के मंदिर को ध्वस्त कराना भला अपने मंदिरों, प्राचीन शिक्षा के केन्दों उनके बिखरे अवशेषों को आजादी के बाद तक समेटने वाले लोग एक चित्र से कैसे प्रभावित हो सकते हैं?
-राजीव चौधरी


Saturday, 23 June 2018

योग जीवन जीने का एक समग्र तरीका है…


दैनिक जीवन में शक्ति प्राप्त करने में योग विश्व इतिहास का सबसे पुराना शारीरिक विज्ञान है, जिसने व्यक्ति के अध्यात्मिक और शारीरिक क्रियाकलापों के लिए नए द्वार खोले। योग का जन्म कब हुआ?  प्राचीन पुस्तकों में योग का वर्णन मिलता है लेकिन फिर भी योग इससे पहले भी विद्यमान था, क्योंकि ऋषि परम्परा के कारण योग का ज्ञान मौखिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहा होगा। असल में योग शब्द का शाब्दिक अर्थ-जुड़ना या मिलना होता है लेकिन यह बहुत विस्तृत विज्ञान है क्योंकि इसके सभी कर्म और क्रियाएँ मनुष्य को शारीरिक और आत्मिक रूप से पूर्ण योगी बनाती हैं। आत्मा का परमात्मा से पूर्ण रूप से मिलन होना ही योग कहलाता है।

किन्तु आज की तेज रफ्तार भरी जिंदगी में लोगों ने अपना ख्याल रखना तो जैसे छोड़ ही दिया है ना ही किसी के पास व्यायाम के लिए समय है और ना ही लोग अपने खान-पान का सही से ख्याल रखते हैं। इस तरह से भागदौड़ वाली जिंदगी में हम दूसरे काम तो कर लेते हैं लेकिन हम अपना ख्याल सही नहीं रख पाते। स्वास्थ्य का ठीक तरह से ख्याल न रखने के कारण कई तरह की चीजें जन्म लेती हैं जैसे तनाव, थकान, चिड़चिड़ाहट, कई तरह की शारारिक बीमारिया आदि। इन सभी कारणों से हमारी जिंदगी अस्त-व्यस्त हो जाती है। ऐसे में जिंदगी को स्वस्थ तथा ऊर्जावान बनाये रखने के लिये व्यायाम की जरूरत होती है। लेकिन कठिन और थका देने वाली दो-ढाई घंटे लम्बी कसरत करना न किसी के पास समय है न हर किसी के बस की बात।

ऐसे में केवल नियमित 20-30 मिनट किया जाने वाला योगाभ्यास फायदेमंद होता है। योग की खासियत यह है इससे न केवल हम शारारिक तौर पर स्वस्थ रहते हैं बल्कि यह हमारे शरीर से कई तरह की बीमारियों को भी दूर करता है। हमारे शरीर में बहुत से रोग जन्म लेते हैं जिनके बारे में वक्त पर हमें पता भी नहीं होता है। इसलिए योग करना हमारे शरीर के लिए किसी रामबाण औषधि से कम नहीं है। यह हमारे दिमाग को तनाव रहित तथा शरीर को फिट रखता है। हम कह सकते हैं कि योग करने से जीवन को एक सेहतमंद रफ्तार मिल जाती है।
असल में पिछले 4 वर्षों से मनाया जाने वाला अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस एक दिन का कोई उपवास, उत्सव, त्योहार नहीं है। बल्कि एक शुभ दिन की शुरूआत है। योग को जीवन में नित्य उतारने की प्रक्रिया का शुभ संदेश है कि आओ हम सब मिलकर संकल्प लेकर प्रतिदिन योग को जीवन में उतारें। जैसे हम अपने बच्चों को कम्प्यूटर चलाना सिखाते हैं, कार, मोटरसाईकल, चलना, पढ़ना खेलना, कूदना सिखाते हैं। ठीक उसी तरह यदि हम उन्हें योग करना स्वाध्याय करना भी सिखायें तो कहीं न कहीं बच्चा स्वस्थ भी बनेगा और संस्कारी भी बनेगा। आज आधुनिक शिक्षा प्रणाली से बच्चे को जो शिक्षा मिलती है इससे वह अपनी आजविका तो चला सकता है, वह पढ़-लिख भी जाता है किन्तु इस शिक्षा से उसकी समझ विकसित नहीं हो पाती पर रोजाना एक घंटा अच्छे ग्रन्थां का स्वाध्याय और योग उसकी समझ भी विकसित करेगा उसके तन-मन को स्वस्थ रखेगा और उसे वह संस्कार भी मिलेगें जो उससे आप बुढापे में चाह रहे हैं।

इसमें जहां कुछ लोग समय का अभाव दर्शाते हैं तो वहीं कुछ कहते है हम तो ठीक है हम क्यूं योग करें! तो कुछ लोग योग को धर्म और राजनीति से प्रेरित समझते हैं। परन्तु मानवता का सच ये है कि जहां स्वस्थ शरीर यानि निरोगी काया मन में शान्ति और सब जीवों के प्रति स्नेह की धारा बहती हो वहीं धर्म है।

योग से केवल शरीर ही स्वस्थ नहीं रहता बल्कि पिछले दिनों एक चौंकाने वाला ताजा अध्ययन था कि भारत में पिछले कुछ वर्षो में मानसिक रोगियां की संख्या में बढोत्तरी हुई है। लोग खुद को अकेला महसूस करते हैं, पारिवारिक दायित्वां की पूर्ति नहीं कर पा रहे हैं,  पारिवारिक कलह और झगड़े बढ़ रहे हैं जिनका फायदा कुछ ढ़ोंगी बाबा, पाखंडी ज्योतिष के रूप में उठा रहे हैं इस सबका कारण हम लोगां की अपनी मूल परम्पराओं से भटकना बताया गया। किन्तु हमारे योग में इन सब समस्याओं का समाधान है जिसे हम यौगिक लाभ भी कह सकते हैं।
योग से इन्सान पर्वत के समान कष्ट आने पर भी नहीं डरता, सबको सहन कर जाता है, उसे ऐसा सामर्थ्य प्राप्त होता है कि सदा सत्य ही बोलता है, अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहता है सदा घर-परिवार, समाज के संगठन की स्थापना चाहता है, विघटन को दूर करता है। माता-पिता और बडे़ बुर्जुर्गा की सेवा करता है। ऐसी पवित्रता प्राप्त होती है कि वह मद्यमांसादि का सेवन नहीं करता। सदा सात्विक भोजन ही स्वीकार करता है। मान-अपमान से विचलित नहीं होता है। सदा निष्काम कर्म करता है। मन और इन्द्रियों को वश में करने की शक्ति प्राप्त होती है। इसलिए तन-मन और आत्मा में तालमेल बनाए रखने की हमारी प्राचीन विद्या योग का हमारी संस्कृति में एक विशेष स्थान है। योग से ही हमारे ऋषि मुनियां ने तन के सुक्ष्म अध्ययन के साथ-साथ मन और आत्मा का भी गहनता के साथ अध्ययन किया है तो आओ मिलकर संकल्प करें और योग को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाये।
-धर्मपाल आर्य, प्रधान


ईश्वर कहाँ रहता हैं..?


आमतौर पर एक ऐसी धारणा बना ली गयी है कि ईश्वर कहीं आकाश में रहता होगा और वही से बैठकर संचालन करता रहा होगा. वो कोई सफेद सी दाढ़ी वाला बुजुर्ग सा दिखने वाला होगा. एक आम हिन्दू सोचता है वह स्वर्ग में रहता होगा, उसका महल दिव्य रौशनी से नहाया हुआ होता होगा. एक मुस्लिम सोचता है नहीं खुदा का घर तो जन्नत में है वह वहीं बैठकर उनकी नमाज अजान का शबाब लिख रहा होगा.

इन्ही कल्पनाओं के जंजाल में वर्षो से इन्सान भ्रमित है, उसे धर्म के नाम पर सिर्फ भ्रम बेचा जा रहा है उसे स्वर्ग-नरक की कल्पना बेचीं जा रही है, उसे ईश्वर के ठिकानों के चित्र बेचें जा रहे है उन चित्रों से लगता है जैसे बादलों के बीच उसका घर होगा. हालाँकि यह एक अनसुलझा रहस्य है जिसे लोग अपनी कल्पना अनुसार सुलझा लेते है. पर ये रहस्य इतना अनसुलझा क्यों है क्या वास्तव में ईश्वर का घर इन्हीं इंसानी कल्पनाओं के आस-पास होगा? मसलन जैसी इन्सान की कल्पना वैसा ईश्वर का घर.?
क्या ऐसा नहीं लगता संसार की करीब-करीब समस्त जातियों ने ईश्वर के रहने के ठिकाने अपनी-अपनी कल्पना से पैदा किये.? असल में यह सब ढंग पिछले 3 हजार सालों के दौरान पैदा हुए इससे पहले ईश्वर था पर चित्र नहीं थे. मस्जिद नहीं थी, मूर्तियाँ नहीं थी. ईश्वर की स्तुति थी लेकिन घंटे घडियाल न थे. अजान न थी. अराधानाओं का शोर नहीं था तब इन्सान मौन अवस्था में ध्यान में जाकर अन्तस् में गहरे उतरता, ध्यान में जाकर उससे मिलन के आनंद का अनुभव करता...
इस रहस्य को सुलझाने के लिए हमें सबसे पहले ईश्वर को समझना होगा कि कैसे यह विशाल ब्रह्मांड अपने आप, चल रहा है-बिना किसी एक्सीडेंट के, कोई पुलिस वाला तक नहीं है, अरबों-खरबों चमकते तारे हैं सब चलायमान है. पृथ्वी अपनी धुरी पर करोड़ों वर्ष से एक ही चाल पर घूम रही हैं. मौसम अपने समय पर बदल रहे है. विशाल सागर अपनी लहरों से लगातार किनारें छुं रहे है. क्या आपको लगता है इतना बड़ा ब्रह्मांड कैसे बिना किसी नियंता के चल रहा है?
सभी चीजें अच्छे ढंग से चल रही हैं.. यह सब अनादि काल से चला आ रहा है. न कोई हिसाब-किताब रखता है, न कोई सूरज से कहता है कि समय हो गया. कोई अलार्म घड़ी नहीं है, जो सूर्य से कहे कि चलो बाहर निकलो अब उदय हो जाओ. किन्तु सब बिलकुल ठीक-ठाक चल रहा है. करोड़ों आकाशगंगाएं और ग्रह-नक्षत्र घूम रहे हैं, कौन जाने अँधेरे उजाले में कहां वे आपस में टकरा जाएं! कोई उनकी देखभाल नहीं कर रहा, न लाल-हरी बत्ती, न ट्रेफिक सिग्नल है, न कोई अदालत है और न कानून की धारा न कोई पचड़ा लेकिन सब कुछ व्यवस्थित रूप से चल रहा है.
इसलिए जब तक कोई एक जीवंत देह की तरह स्वसंचालित न हो. तो कैसे कोई बाहरी नियंता अनादि काल से अनंतकाल तक इसकी व्यवस्था आसमान में बैठकर सम्भाल सकता हैं? वह बोर हो जाएगा, आखिर इस सारे झमेले का मतलब क्या है? कोई उसे सेलरी तो देता नहीं है. सोचता होगा मुझे क्या मिलता है?
इसमें वास्तविकता क्या है कि कोई ब्रह्माण्ड से बाहर कोई दूसरी शक्ति इसे चला रही है. जरा सोचिये क्या इंजन गाड़ी से अलग हो सकता है? कि इंजन कहीं ओर रखा है और गाड़ी चल रही है.? शायद नहीं गाड़ी तभी चलेगी जब इंजन उसके अन्दर हो. तो क्या इतने बड़े ब्रह्माण्ड की रचना कही बाहर बैठकर हो सकती है.या इसको चलाने के लिए बाहर से इसकी व्यवस्था हो सकती हैं.? जैसे देह के अन्दर रहकर आत्मा शरीर को संचालित करती है तो जरुर वो नीति नियंता इसी ब्रह्माण्ड के अन्दर ही होगा इसलिए यजुर्वेद में कहा गया है कि जो कण-कण में विद्यमान है, जो निराकार है, जो सर्वव्यापक है, जो अनादि है, जो अनंत, अजन्मा है वही परमात्मा है. यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय के अन्त में मंत्र का सार है कि हे मनुष्यों! जो में यहां हूँ, वहीं सूर्य आदि लोकों में हूँ, सर्वत्र परिपूर्ण आकाश के तुल्य व्यापक मुझ से भिन्न कोई बडा नहीं है’ मैं ही सबसे बडा हूँ, मैं ही सबसे सूक्षम, मैं यहाँ भी हूँ वहां भी हूँ, अत: इससे साफ समझा जा सकता है कि ईश्वर का कोई निर्धारित ठिकाना नहीं है वह आलौकिक दिव्य शक्ति सर्वत्र विधमान है....राजीव चौधरी 

आसमान में भी चलेगा शरियत कानून


ब्रिटेन में जल्द ही विमान सेवा शरिया एयरलाइन्स फिरनास एयरवेज शुरू होने वाली है. यानि एयरलाइन्स फिरनास एयरवेज हवाई यात्रा के दौरान सातवीं शताब्दी के इस्लामी दिशानिर्देशों का पालन करेगी. खुद को ब्रिटेन का हलाल रिचर्ड ब्रेन्सन बुलाने वाले काजी शफीकुर रहमान इस सेवा को शुरू करने जा रहे है. अपनी पहली उड़ान के साथ फिरनास एयरवेज ब्रिटेन की पहली शरिया इस्लामिक कानून पर चलने वाली एयरलाइंस बन जाएगी.

शरीयत के अनुसार न्याय करने वाले पारम्परिक न्यायाधीशों को काजी कहा जाता है और ब्रिटेन में काजी रहमान की एयरलाइंस का नाम फिरनास एयरवेज है. हर एयरलाइन्स की पहचान उसकी एयर होस्टेस होती हैं इसलिए इस इस्लामिक एयरलाइन्स में काम करने वाली एयर होस्टेस आपको हिजाब पहने इस्लामिक वेशभूषा में नजर आएँगी. चूँकि एयरलाइन्स इस्लाम से जुडी होने के नाते उड़ान से पहले हर फ्लाइट में नमाज भी पढ़ी जाएगी. क्रू मेंबर्स की ड्रेस भी शरिया की गाइडलाइंस के मुताबिक होंगी, गैरमुस्लिम क्रू को भी शरिया के अनुसार कपड़े पहनने होंगे.

शरिया एक अरबी शब्द है जिसका मतलब है - अल्लाह का दिखाया रास्ता और उसके बनाए हुए नियम. कुरान के मुताबिक शरिया सिर्फ एक क़ानून व्यवस्था ही नहीं बल्कि मुसलमानों की पूरी जीवन शैली के लिए नियम निर्धारित करता है.. इस्लामिक समाज में रहने के तौर-तरीकों, नियमों और कायदों के रूप में कानून की भूमिका निभाता है.

पर सवाल उठता है कि क्या शरिया कानून मुस्लिमों की ही जीवन शैली निर्धारित करता है या अन्य धार्मिक विचारधाराओं को भी इसके अंतर्ग्रत ढालने की कोशिश करते रहते है? सातवीं सदी में सउदी अरब के मदीना में इस्लाम की स्थापना के साथ ही जब इस्लाम का प्रसार तेजी से आसपास के इलाकों में होने लगा. तब शरिया कानून बनाया गया था. दरअसल पहले अरब में कबीलाई समाज था, जिसमें रहने वाले लोगों के अपने रीति रिवाज थे, लेकिन इस्लाम के राजनीतिक और धार्मिक विचार के प्रसार के साथ ही कुरान के नियम इन कबिलाई समाज को संचालित करने लगे यह रहस्य किसी से छिपा नहीं है कि इन तरीकों को थोपने या अपनाने के लिए हिंसा का भी इस्तेमाल किया जैसे कि वर्तमान में तालिबान, अल-शबाब, बोको हरम, इस्लामिक स्टेट समेत अन्य कट्टर आतंकी इस्लामिक संगठन इसी सातवीं शताब्दी के इस्लाम को आधुनिक दुनिया के ऊपर थोपने में हिंसा का रास्ता अपनाने से नहीं चूक रहे है.

अब जो सबसे बड़ा सवाल उठता है वो यही है कि यदि शरिया कानून को तालिबान, अल-शबाब, बोको हरम आदि संगठन आधुनिक समाज के लिए उपयुक्त माने तो उन्हें आतंकी या कट्टरपंथी कहा जाता लेकिन जब यही काम कोई काजी शफीकुर रहमान करें तो उसे व्यापार से जोड़ा जाता है. जबकि इस विषय की गंभीरता को देखें तो बगदादी और काजी रहमान का लक्ष्य सामान है. बस रास्ते अलग-अलग है. मसलन कट्टरपंथी संगठनों को जमींन पर शरियत चाहिए तो इन विमानन कम्पनीयों को आसमान में. दोनों ही आधुनिकता से संघर्ष करते नजर आ रहे है. आईएस भी अपनी खिलाफत स्थापित करने का उद्देश्य रखता है, एक ऐसी जगह बनाना चाहता है जहां इस्लाम की उसकी बनाई परिभाषा चलेगी और शरिया कानून लागू होगा. दूसरी ओर ये एयरलाइंस भी यही चाहती है

अधिकांश के लिए ये एयरलाइन्स एक गैर स्टार्टर की तरह हो सकता है, कुछ दिन बाद ऐसा भी हो सकता है आप इसमें सवार हो और नियमों के मुताबिक आपको नमाज पढने को कहा जाये! आप अपनी पत्नी के साथ हो उसे बुर्का या हिजाब पहनने का दिशा निर्देश दिया जाये? भले ही आप इंकार करें किन्तु एक रुढ़िवादी उद्यमी काजी रहमान यह उम्मीद कर रहा है कि उसकी यह कोशिश रंग जरुर लाएगी. यहाँ दो रास्ते बचते है या तो नकाब या बुर्का पहना जाये या फिर किसी दूसरी एयरलाइंस की सेवा ली जाये. जो सार्वजनिक कल्याण और सभी लोगों के मतो, पूजा उपासना के तौर तरीकों का सम्मान करती हो.
एयरलाइन्स में शरिया लागू होने के बाद इसके नतीजे क्या होंगे, मलेशिया की ‘रयानी एयर की तरह बंद होगी ये अभी कुछ कहा नही जा सकता, लेकिन जमीन पर देखें तो सोमालिया और अफगानिस्तान में ये लागू हुआ और हम देख सकते हैं कि इसका क्या नतीजा हुआ, अफ्रीकी देश नाईजीरिया शरिया क़ानून की वजह से पिछले कुछ वर्षों में काफी विवाद चर्चा में रहा है. सीरिया तबाह, लेबनान तबाह या इराक की तबाही शरिया कानून के चाहने वालों ने ही की है. नाईजीरिया के 36 में से 12 प्रांतों में शरिया लागू हो चुका है. वहां के हिंसात्मक हालात किसी से छिपे नहीं है. लेकिन इसमें जो मूल प्रश्न उभरता है वो यह कि शरिया कानून को धार्मिक दर्शन की भाषा में देखे या राजनितिक दर्शन की नजर से?
यदि यह धार्मिक दर्शन है तो इसमें दया, संवेदना, सहनशीलता, उदारता सामान व्यवहार, अपने पड़ोसी के मत-पंथ-धर्म का सम्मान होना चाहिए, और यदि यह राजनितिक दर्शन है तो इसकी व्याख्या धर्म से जोड़कर क्यों? कई लोगों ने अलग-अलग देशों में शरिया की भिन्न-भिन्न व्याख्या पर भी सवाल उठाया. मुसलमानों के लिए शरिया का एक मतलब है, वहाबियों के लिए एक, सलाफियों के लिए दूसरा, आईएस, बोको हराम और अल-कायदा के लिए तीसरा. मुसलमान यह तो मानते हैं कि शरीयत अल्लाह का कानून है लेकिन उनमें इस बात को लेकर बहुत अंतर है कि यह क़ानून कैसे परिभाषित और लागू होना चाहिए. सुन्नी समुदाय में चार भिन्न नजरिए हैं और शिया समुदाय में दो. अलग देशों, समुदायों और संस्कृतियों में भी शरीयत को अलग-अलग ढंगों से समझा जाता है. शायद इसी कारण काइरो विश्वविद्यालय के हसन हनाफी ने एक बार इसे इस प्रकार कहा था कि शरिया कानून के नजर में कुरान एक सुपरमार्केट है जहाँ से जिसे जो चाहिये वह उठा लेता है और जो नहीं चाहिये वह छोड देता है. हो सकता हैं काजी रहमान ने भी अपने किसी धार्मिक लक्ष्य की पूर्ति या सातवीं सदी के इस्लामिक गौरव को पुन:पाने के लिए यही से कुछ उठाया हो..?
राजीव चौधरी