Friday, 26 February 2016

कहीं ये हाफिज का अड्डा तो नहीं?

हमारी कलम लिखे भी तो क्या लिखे? आखिर इस से पहले भी बहुत से लोगों ने बहुत कुछ इस सन्दर्भ में लिखा होगा। और अगर लिखने से ही कुछ होता तो पिछले कुछ दिनों से भारत की राजनीति कब्रों, लाशों में लिपट कर न रह जाती| जिन्दा लोग, उनकी मूलभूत सुविधाओं, उनकी जरूरतों को नजरअंदाज कर मुर्दों को मुद्दा बनाया जा रहा है| दादरी, हैदराबाद के बाद अब 10 फरवरी को जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में मंगलवार को उस वक्त भारी हंगामा हो गया जब वामपंथी छात्रों के समूह ने संसद हमले के दोषी अफजल गुरू और जम्मू-कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के को-फाउंडर मकबूल भट की याद में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। इस आयोजन के बाद यहां हालात इतने बिगड़ गए कि प्रशासन को पुलिस बुलाने की नौबत आ गई। विवाद की वजह यह रही कि इस कार्यक्रम को अफजल गुरु को शहीद का दर्जा दिया गया नारे लगाये जा रहे थे लड़कर लेंगे आजादी, कश्मीर में लेगे आजादी, तुम कितने अफजल मारोंगे हर घर से अफजल निकलेगा और खुले आम पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाये जा रहे थे| जैसे पाकिस्तान में हाफिज के अड्डों पर लगते है| जिसका एबीवीपी के छात्रों ने भारी विरोध किया।
  गौर हो कि अफजल गुरू को 9 फरवरी 2013 को फांसी दी गई थी। वहीं मकबूल भट को 11 फरवरी 1984 को फांसी दी गई थी। आखिर कौन है यह लोग? जो आतंक को सर्वोपरी बताकर राजनीति कर रहे है| कभी मस्जिद को शहीद कहते है, तो कभी आतंकियों को शहीद बताते है | जब इनकी नजर में मानवता के हत्यारे शहीद होते है तो फिर इनकी नजर में वो कौन होते है जो देश की सीमा रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर देते है? मुस्लिम देशों में रोजाना मस्जिदों में धमाके होते है उन मस्जिदों के लिए शाहदत के क्या मापदंड है? या शाहदत की यह अजान सिर्फ भारत में ही गुंजायमान रहती है?
आखिर राजनीति ऐसी कौनसी मज़बूरी है जो इन देश द्रोहियों को पकड़ नहीं सकती इन राष्ट्र के विभाजन करने वालो पर कानून को अपना काम क्यों नहीं करने दिया जाता? क्या भारत में आतंक को मान्यता मिल गयी जो इस तरह के आतंक के अड्डे खुले आम चल रहे है| हाफिज सईद के जेहादी ठिकानों और इन कॉलिजो के केम्पस में अंतर क्या रह गया? आखिर ऐसा क्या लिख दू की ये सब ख़त्म हो जाये? कुछ लोग इतनी छोटी सी बात भी क्यों नहीं समझ पाते की आज आस्तीन में पल रहे सांप कल के सुनहरे भविष्य की मासूम किलकारियों को जरुर ड्सेंगे
आज वोट बेंक की राजनीति को देखकर लगता है देश के अन्दर आतंकवाद लाइलाज समस्या के रूप में नजर आ रहा है। हर बार आतंकवादी आते हैं और अपने नापाक इरादों को बेहद सफाई और चालाकी से अंजाम देकर भाग खड़े होते हैं। या मारे जाते है, जो मारे जाते है नेता लोग उनकी लाश लेकर उन्हें शहीद बता मजहब के नाम वोट बटोरते है| क्या हमारी खुफिया एजेंसियां और सुरक्षातंत्र का बार-बार माखौल सिर्फ इसलिए उड़ता हैं, की आतंक को मदद देश के अन्दर  से ही मिल रही है? हर बार आतंकी हमले  देश की आम जनता के मन मस्तिष्क को वे झिंझोड़ कर रख देते हैं। मासूमों को अपनी जान गवानी पड़ती है|
पठानकोट हमले को लेकर एनआईए की जांच-पड़ताल जारी है। एनआईए को छानबीन में कई ऐसी चीज़ें मिली हैं जिनके हमले से संबंध की जांच की जा रही है। कठुआ और सांबा में हुए आतंकी हमलों में भी अफजल गुरु शहीद लिखे ऐसे परचे मिले थे। मजारे शरीफ़ की जांच में भी आतंकियों के पास ऐसी चिट मिली थीं। बताया जा रहा है कि अफजल की मौत के बाद जैश ने 'अफजल गुरु स्क्वाड' बनाया है। अफजल के नाम पर नौजवानों को बहकाया जा रहा है। कम से कम 60 लड़कों को फिदाईन ट्रेनिंग दी गई है। संकट यह है कि आतंक का यह खेल सीमा पार से जारी है, और विडम्बना यह है कि इसको मदद अन्दर से मिल रही है अभी पिछले दिनों राष्ट्रपति जी ने अपने एक भाषण में राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था हमें हिंसा, असहिष्णुता और अविवेकपूर्ण ताकतों से स्वयं की रक्षा करनी होगी। आतंकवाद उन्मादी उद्देश्यों से प्रेरित है, नफरत की अथाह गहराइयों से संचालित है, यह उन कठपुतलीबाजों द्वारा भड़काया जाता है जो निर्दोष लोगों के सामूहिक संहार के जरिए विध्वंस में लगे हुए हैं। यह बिना किसी सिद्धांत की लड़ाई है, यह एक कैंसर है जिसका इलाज तीखी छुरी से करना होगा। आखिर वो तीखी छुरी कब चलेगी जब तक तो यह लोग इस देश में हजारो अजमल कसाब, अफजल गुरु तैयार कर देंगे? राजीव चौधरी 




क्या जेएनयू में भी हो सेना की कारवाही ?


अलग खालिस्तान के लिए हुए विद्रोह से पवित्र स्वर्ण मंदिर पर हमला हुआ था, कारण भारतीय संविधान के अनुच्छेद (1) को चुनौती दी गई थी क्योंकि अनुच्छेद (1) कहता है कि भारत राज्यों का एक संघ होगा. किसी भी राज्य को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है. जिस तरह की व्यवस्था अमेरिका में है, वैसी ही भारत ने अपनाई है. मतलब साफ है कि खालिस्तान रुपी स्वतंत्र राज्य की मांग नाजायज थी, जैसे आज कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की है| किन्तु खालिस्तान की मांग करने वाले चरमपंथी किसी भी सूरत में देश के सविंधान को मानने से इंकार कर रहे थे देश में पहली बार किसी मंदिर को आतंकियों के चंगुल से छुड़ाने के लिए सेना हथियारबंद होकर पहुंची और इतिहास ने हमेशा- हमेशा  के लिए करवट बदल ली। मंदिर तो आजाद हो गया, लेकिन साथ ही गहरे जख्म देकर आज एक प्रश्न खड़ा कर गया कि जब देश  के सविंधान की रक्षा के लिए आस्था पर हमला हो सकता है! क्या जेएनयू में लकर आजादी, भारत की बर्बादी तक जंग जारी रखने वालों की गिरफ्तारी भी नहीं हो सकती? खालिस्तानी तो सिर्फ अलग देश मांग रहे थे,यह लोग तो भारत की बर्बादी तक जंग जारी रखने की बात कर रहे है|

स्वर्ण मंदिर में भीषण खून-खराबा हुआ था। अकाल तख्त पूरी तरह तबाह हो गया। स्वर्ण मंदिर पर भी गोलियाँ चलीं। कई सदियों में पहली बार वहाँ से पाठ छह, सात और आठ जून को नहीं हो पाया। ऐतिहासिक द्रष्टि से महत्वपूर्ण सिख पुस्तकालय जल गया| भारत सरकार के श्वेतपत्र के अनुसार 83 सैनिक मारे गए और 249 घायल हुए। 493 चरमपंथी या आम नागरिक मारे गए, 86 घायल हुए और 1592  को गिरफ्तार किया गया। लेकिन ये आंकड़े विवादित माने जाते हैं। मगर सवाल यह है कि क्या धार्मिक और शिक्षण संस्थान, स्थलों की आड़ में उग्रवाद जैसी गतिविथियों को सहन किया जा सकता है? निश्चित रुप से नहीं? क्योंकि अगर ऐसा किया गया तो धार्मिक और शैक्षिक स्थल उग्रवादियों के गढ़ बन जाएंगे और देश  भर में अराजकता व अशांति का माहौल पैदा हो जाएगा| आज पाकिस्तान में उग्रवाद चरम स्थिति पर है| कारण मदरसों में उग्रवाद का प्रवेश शिक्षण संस्थान राजनीति उग्रवाद के अड्डे बन गये| क्या भारत के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल भारत में अराजक तत्वों को स्वीकार करेंगे? यदि नहीं तो कांगेस व् विपक्षी दलों को सरकार की कारवाही का विरोध नहीं करना चाहिए| सब जानते है आज वहां परहे सभी छात्र आतंकी नहीं है किन्तु उस सोर्स का तो पता चलना चाहिए जहाँ से उन्हें यह देश विरोधी नारे और मानसिकता मिल रही है| राहुल गाँधी का मोदी विरोध राजनैतिक द्रष्टिकोण से जायज माना जा सकता है किन्तु विरोधी तत्वों का खुलेआम समर्थन करना हर किस्म से नाजायज है| कांगेस और राहुल गाँधी को समझना होगा जब राहुल की दादी देश विरोधी तत्वों पर टेंक लेकर आतंकवाद के साथ किसी की आस्था पर भी हमला कर सकती है तो क्या आज भारत सरकार देश विरोधी तत्वों को गिरफ्तार भी नहीं कर सकती? कहीं आप राजनैतिक लालसा में आतंक और राष्ट्र विरोधी मानसिकता का पक्ष तो नहीं ले रहे है? जरूरत उन लोगों की गिरफ्तारी के विरोध की नहीं थी जरुरत इस बात की है कि धार्मिक स्थलों, शिक्षण संस्थानों, और राजनीति की कड़ी से कड़ी सुरक्षा की जाए ताकि कोई उग्रवादी उनमें प्रवेश  कर इनकी पवित्रता का हनन न कर पाए, सकारात्मक द्रष्टिकोण, अच्छी शिक्षा और अनुभव के फलस्वरूप तैयार किए जाने वाले शिक्षण संस्थानों की बेहतर सुविधाएं मिलने से विद्यार्थियों के भविष्य की नींव मजबूत होती है जिससे कि वे अपने जीवन में सफलता की बुलन्दियों को छूने में कामयाब तो होते ही हैं, साथ में देश और समाज को भी उन्नत बनाने में सहयोग करते है| यदि सत्ता की लालसा में आज इन लोगों को बचाया गया तो कल देश  के हालात मीडिल ईस्ट जैसे होने में देर नहीं लगेगी| जिस तरह कल गृहमंत्री जी ने आतंकी हाफिज सईद का नाम लिया इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिए की खालिस्तान की तरह जेएनयू में हुआ बवाल पाक प्रायोजित ना हो! क्योंकि इनकी गिरफ्तारी का विरोध पाकिस्तान, हाफिज समेत अलगाववादी नेता भी कर रहे है, साथ में राहुल गाँधी भी कर रहा है| तो इसमें राहुल को अपनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए कि वे कांग्रेस के नेता है या अलगाववादी विचार धारा के समर्थक है? आज सरकार को जेएनयू में कड़े कदम उठाने चाहिए और विपक्ष को इन छात्रों द्वारा किये गये कृत्य की कडी आलोचना करनी चाहिए| आज हमे ध्यान इस बात का भी रखना होगा कहीं केंद्र सरकार को कमजोर करने के चक्कर में हम देश की एकता अखंडता को कमजोर तो नहीं कर रहे है?

Friday, 12 February 2016

धर्म से चलता कारोबार

डेरा सच्चा सौदा कॉम्प्लेक्स के पास बाजेकन रोड पर स्थित MSG बिल्डिंग में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बाबा गुरमीत ने 151 प्रोडक्ट्स को लॉन्च किया. ये प्रोडक्ट घरेलू तथा इंटरनेशनल मार्केट में एक साथ लॉन्च किए गए हैं. इनमें 14  प्रकार की दालें, 41 प्रकार के ग्रॉसरी आइटम, सात तरह के चावल और खिचड़ी, तीन तरह की चाय, पांच प्रकार की चीनी, तीन तरह का नमक, आटा, देशी घी, मसाले, अचार, जैम, शहद, मिनरल वॉटर और नूडल्स शामिल हैं, इससे पहले योग गुरु बाबा रामदेव भी अपने प्रोडक्ट लेकर बाजार में एक छत्र राज कर रहे है योगगुरु के रूप में बाबा रामदेव की पहचान पूरी दुनिया में है। करीब 15 पहले साल पहले तक हरिद्वार की सड़कों पर संघर्ष करने वाले बाबा रामदेव ने करीब 2,000... करोड़ का बिजनेस एम्पायर खड़ा कर लिया है। आज धर्म के साथ बाबा की व्यापारिक प्रतिष्ठा भी किसी से छिपी नहीं है| यदि धर्म की दुनिया और बड़े धार्मिक चेहरों की और रुख करे तो  सुधामणि इदमन्नेल, जिन्हें आज दुनिया माता अमृतानंदमयी देवी और अम्मा के नाम से जानती है। माता को पूरी दुनिया दूसरे के दुख दूर करने वाली और प्रेम से गले लगाने वाली अपनी मानवीय गतिविधियों के लिए जानी जाने वाली माता अमृतानंदमयी देवी के ट्रस्ट के पास करीब 1,500 करोड़ रुपए की संपत्ति का स्वामित्वहै।
इनके बाद इस बड़े चेहरे को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता श्री श्री रविशंकर को पूरी दुनिया में आध्यात्मिक गुरू के रूप में जाना जाता है। तमिलनाडु में पैदा हुए एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब 1,000 करोड़ की संपत्ति वाले श्री श्री रविशंकर की आय मुख्य जरिया ऑर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन है। इसके अलावा श्री श्री शंकर विद्या मंदिर ट्रस्ट,... के अलावा श्री श्री शंकर विद्या मंदिर ट्रस्ट, पी यू कॉलेज बेंगलुरु, श्री श्री मीडिया सेंटर बेंगलुरु, श्री श्री यूनिवर्सिटी भी है, जहां से इनका कारोबार चलता है। ... अमीर धार्मिक गुरुओं की लिस्ट में अगले पायदान पर हैं बापू के नाम से मशहूर आसाराम बापू है। बीते एक अरसे से जेल में बंद आसाराम बापू पर गुजरात में जबरन जमीन हड़पने समेत कई तरह के आरोप हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक आसाराम बापू करीब 10,000 करोड़ रुपए की... संपत्ति के मालिक हैं। बापू के भी तमाम प्रोडक्ट उनके भक्त इस्तेमाल करते रहे हैं।
भारत देश को देवभूमि कहा जाता रहा, पुरे विश्व में यदि किसी ने धर्म को जानना चाहा तो बिना भारत का रुख किये उससे धर्म का ज्ञान अछूता रहा किन्तु आज की बदलती सदी ने आत्मिक चेतना के इस विषय को बाजार की एक दुकान बना दिया आध्यात्मिक विषय को व्यावयासिक रूप दिया और अध्यात्म को बाजारों के उत्पाद में पैक कर दिया| आखिर इन सब के क्या निहितार्थ हैं। क्या इससे हमारा देश पूरी तरह से धार्मिक देश बन गया है? और यहां के लोग अत्यंत धार्मिक जीवन जीने लगे हैं| क्या मात्र एक प्रोडक्ट खरीदने से लोग धार्मिक हो जाते है? आत्मिक चिंतन मनन मनुष्य के लिए कोई मायने नहीं रखता?

आप कहीं भी-कभी भी नजर उठाकर देख लें कोई न कोई धार्मिक आयोजन-अनुष्ठान होते अवश्य मिल जायेंगे। साईं अगरबत्ती बिक रही कहीं भगवती जागरण तो कहीं सत्संग हो रहे हैं। कभी नये धार्मिक टेलीविजन चैनल खुल रहे हैं। खबरिया चैनलों पर धन लक्ष्मी यन्त्र, हनुमान यन्त्र टी आर पी बढ़ाने के नाम पर अंधविवास को बढ़ावा देने की साजिश चल रही है। इस साजिश में कई धुरंधर पत्रकार बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। आज देश भर में जो पूरा तामझाम चल रहा है वह दरअसल धर्म को राजनीति का हिस्सा बनाने का नहीं, बल्कि धर्म को व्यवसाय बनाने के दीघZकालिक अभियान का हिस्सा है। जिस तरह से सौंदर्य प्रसाधन बनाने और बेचने वाली कंपनियां अपने उत्पादों के बाजार के विस्तार के लिये सौंदर्य प्रतियोगिता और फैशन परेड जैसे आयोजनों तथा प्रचार एवं विज्ञापन के तरह-तरह के हथकंडों के जरिये गरीब से गरीब देशों की अभाव में जीने वाली भोली-भाली लड़कियों के मन में भी सौंदर्य कामना एवं सौंदर्य प्रसाधनों के प्रति ललक पैदा करती है उसी तरह से विभिन्न धार्मिक उत्पादों के व्यवसाय को बढ़ाने के लिये धार्मिक आयोजन अंधविश्वास, अफवाह और चमत्कार जैसे तरह-तरह के उपायों के जरिये लोगों के मन में धार्मिक आस्था कायम किया जा रहा है ताकि धर्म के नाम पर व्यवसाय और भांति-भांति के धंधे किये जा सकें। वैसे देखे तो हमारी इन बाबाओं से कोई व्यक्तिगत ईर्ष्या नहीं है बस प्रसंग धर्म का है, तो आत्मा प्रश्न करती है क्या धर्म विभिन्न धार्मिक संस्थाओं की दुकानदारी बेरोकटोक चलती रहेगी? कहीं धार्मिकता के इस अभूतपूर्व विस्फोट के पीछे धर्म को बाजार और व्यवसाय में तब्दील करने की साजिश तो नहीं है? राजीव चौधरी 

Thursday, 4 February 2016

नारी नही, सोच अपित्र है!!

संसार की किसी भी धर्म पुस्तक में नारी की महिमा का इतना सुंदर गुण गान नहीं मिलता जितना वेदों में मिलता हैं किन्तु अभी भी कुछ समाज और धर्म में नारी को अपना स्थान बनाने के लिए आन्दोलन करना पड़ रहा है, कुल की रक्षक कुल देवी, को अपने अधिकारों अपनी धार्मिक,सामाजिक स्वतंत्रता तो दूर की बात अपनी आस्था के लिए प्रदर्शन करना पड़ रहा है| आखिर क्यों? क्या भगवान सिर्फ चंद गिने चुने तथाकथित धार्मिक बाबाओं, मौलानाओं, पादरियों की जागीर है?
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।। यह मनुस्मृति का श्लोक है अर्थात जिस कुल में नारियो कि पूजा, अर्थात सत्कार होता हैं, उस कुल में दिव्यगुण, दिव्य भोग और उत्तम संतान होती हैं और जिस कुल में स्त्रियो कि पूजा नहीं होती, वहां उनकी सब क्रिया निष्फल हैं। किन्तु इन से दूर यह नकली धर्म गुरु वेद व् अन्य ग्रन्थों का नाम लेकर अपना सिक्का व्यवसाय चला रहे है|
कभी-कभी तो लगता है कि जैसे अभी तक धर्म इनका गुलाम हो? क्या धार्मिक आस्था निज मनोरंजन, निज स्वार्थ, और निज उपासना के लिए बनाई गयी व्यवस्था है? इस हफ्ते दो समाचार सामने आये एक तो महाराष्ट्र में शनि शिंगणापुर के चबूतरे में पूजा करने के अधिकार के लिए महिला श्रद्धालुओं को अभियान चलाना पड़ रहा है| दूसरा मुंबई में हाजी अली दरगाह के महिला प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश की मांग कर रही मुस्लिम महिलाओं ने गुरुवार को प्रदर्शन किया। दोनों जगह कारण कुछ इस प्रकार बताये जिसकी वजह से इन महिलाओं को प्रतिबंधित किया गया| मौलाना अंसार रजा के अनुसार इस्लाम के अन्दर मजार पर जाना पाबंदी है, शरियत के अनुसार यह गुनाह है, इसका कारण भी उन्होंने कुछ अजीब बताया कि यदि इस्लाम में महिलाएं मस्जिद या मजार पर जायेगी तो वहां उपस्थित पुरुष समाज की नियत खराब होती है जिस कारण महिलाएं पर पाबंदी है| दूसरा तरफ शनि महाराज के चबूतरे को लेकर मंदिर प्रशासन का कहना है कि शनि चबूतरा पवित्र है जो महिलाओं के प्रवेश से अपवित्र हो जायेगा| आखिर क्यों? क्या नारी माँ के रूप में अपवित्र है? या नारी बहन के रूप में अपवित्र है? पत्नि के या बेटी के रूप में अपित्र है? यदि इनमे से कोई नहीं तो धर्म के ठेकेदारों को कोई हक नहीं है नारी को अपवित्र समझने का! कोई हक नहीं है उन्हें धार्मिक स्थानों पर जाने से रोकने का नारी ही तो सभ्यता की जननी है|

कोई मुझे बताये ये आस्था पर कैसा कब्ज़ा है? जैन धर्म के अनुसार तो नारी मोक्ष की अधिकारी ही नहीं है। उसे पुरूष की तरह जन्‍म लेना पड़ेगा। जैनियों के चौबीस तीर्थंकर में एक तीर्थक स्‍त्री है। नाम था मल्ली बाईउन्‍होंने उस का नाम बदल कर मल्ली नाथ कर दिया, क्‍योंकि वे कहते है कि नारी मोक्ष की उत्‍तराधिकारी नहीं है। क्या मोक्ष पर भी पुरुष वर्ग का कब्ज़ा है? इसे अजीब द्रष्टिकोण कहे, या विकलांग मानसिकता? किन्तु एक बात तो तय है कि समाज की तरह ही मजहब पर भी पुरुष वर्ग का कब्ज़ा है! दुनियां में वैदिक धर्म को अलग रखे तो विरले ही कोई पंथ होगा जिसने नारी को इज्‍जत दी हो। जहाँ पूरब में आज भी पुरुष समाज नारी को दासी समझता है, वहीं पश्चिम देशों की  हालत तो और भी बदतर है। वहां नारी को दिल बहलाने की वस्‍तु समझा जाता रहा है| हमेशा पुरे विश्व में नारी को लेकर हालात इतने बदतर रहे या कहो सोच इतनी निरर्थक रही कि यदि किसी पुरुष को नारी जैसे नाम से भी पुकार दिया तो अपमान समझा जाता रहा है| तथाकथित बाबाओं ने, मौलानाओं ने नारी का उपहास उड़ाया, समाज ने नारी का उपहास उड़ाया, कुछ धर्म गुरु नारी से बचने की सलाह देते रहे उसे हर एक रिश्ते में आदर चाहिए जब वो बेटी बनकर बहन अपना स्नेह लुटा सकती है, जब वो पत्नि बनकर प्रेम और माँ बनकर ममता का खजाना लुटी सकती है तो फिर उसके प्रति ये दोगली भावना क्यों? ईश्वर सबका है एक माँ की तरह वो भेदभाव नहीं करता तो फिर यह लोग कौन है? जो धर्म और परम्पराओं पर कब्ज़ा कर बैठ गये?
बहुत पहले एक कथन सुना था कि परम्पराएँ फल की तरह होती है जब जन्मते है खट्टे और कडवे होते है| बडे होने पर पकने पर स्वादिष्ट और मीठी लगते है किन्तु जो बच जाते है वो सड जाते है आज बहुत सारी धार्मिक परम्पराएँ सड गयी है उन्हें बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए और हमारा मानना है यह काम धार्मिक गुरु करे तो ही अच्छा है वरना कभी जनता संस्कृति के पेड़ से छेड़छाड़ न कर बैठे? क्योंकि जिस प्रकार गुरुवार को मुस्लिम महिला समूहों से जुड़े कई कार्यकर्ताओं ने हाथों में तख्तियां लेकर ऐतिहासिक दरगाह के मुख्य स्थल में महिलाओं को प्रवेश देने की मांग की। उसे देखकर लगता है आने वाले समय में नारी को समाज से पहले धर्म के ठेकेदारों से धार्मिक समानता की जंग जीतनी पड़ेगी?......Rajeev choudhary 




राम पर नही पाखंडियों पर मुकदमा हो!!

बिहार के सीतामढ़ी जिले के एक वकील ने भगवान राम के खिलाफ केस दर्ज कराया है। वकील का कहना है कि माता सीता का कोई कसूर नहीं था। इसके बाद भी भगवान राम ने उन्हें जंगल में क्यों भेजा? कोई पुरुष अपनी पत्नी को कैसे इतनी बड़ी सजा दे सकता है? माता सीता ने पति के सुख-दुख में पूरी निष्ठा के साथ पत्नी होने का कर्तव्य निभाया, फिर भी उन्हें घर से निकाल दिया गया। भगवान राम ने यह सोचा भी नहीं कि घनघोर जंगल में अकेली महिला कैसे रहेगी? केस दर्ज करवाने वाले की मानसिक स्थिति क्या है? यह तो कहा नहीं जा सकता, किन्तु भगवान राम और लक्ष्मण के खिलाफ मुकदमा दर्ज यह मुकदमा तो केवल समाज में लोक प्रसिद्धि पाने का तरीका मात्र है। कल कोई दलित समाज से सम्बंधित व्यक्ति शम्बूक वध को लेकर आपत्ति करेगा। तो कोई केवट से चरण पादुका उठवाने को लेकर कूद पड़ेगा इसके शंका के मूल कारण की जड़ में जाना आवश्यक है।
सीता कि अग्निपरीक्षा एवं वन निर्वासन कि घटना का वर्णन रामायण के सातवें उत्तर कांड में मिलता हैं। अगर समग्र रूप से सम्पूर्ण रामायण को देखे तो हमें यही सन्देश मिलता हैं कि श्री रामचंद्र जी ने अपनी पत्नी सीता का अपहरण करने वाले दुष्ट रावण को खोजकर उसे यथोचित दंड दिया। उस काल कि सामाजिक मर्यादा भी देखिये कि सीता का अपहरण करने के बाद भी रावण में इतना शिष्टाचार था कि बिना सीता कि अनुमति के रावण कि सीता को स्पर्श करने का साहस न हुआ। फिर यह कैसे सम्भव हैं कि मर्यादापुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी महाराज जो उस काल में आर्य शिरोमणि कहे जाते थे, सीता पर एक अज्ञानी के समान शक करते, अग्निपरीक्षा करवाते, प्रतिज्ञा करवाते, धोबी के कहने पर वन में जाने का आदेश देते हैं। रामायण में पहले से लेकर छठे कांड तक नारी जाति के सामाजिक अधिकारों का वर्णन प्रभावशाली रूप में मिलता हैं जैसे कौशलया का महलों में रहकर वेद पढ़ना एवं अग्निहोत्र करना, कैकई का दशरथ के साथ सारथि बनकर युद्ध में भाग लेना, सीता द्वारा शिक्षा ग्रहण कर स्वयंवर द्वारा अपने वर को चुनना आदि।
नारी के इस सम्मानजनक स्थान के ठीक विपरीत सातवें कांड में पुरुष द्वारा नारी जाति पर संदेह करना, उसकी परीक्षा करना, उसे घर से निष्काशित करना यही दर्शाता हैं कि मध्य काल में जब नारी को हेय कि वस्तु समझा जाता था| यह उसी काल का प्रक्षेप किया गया हैं। इससे भी यही सिद्ध होता हैं कि रामायण का उत्तर कांड प्रक्षिप्त हैं। छठे कांड को समाप्त करते समय कवि वाल्मीकि ने फलश्रुति रावणवध के साथ रामायण का अंत कर दिया हैं फिर सातवें कांड के अंत में दोबारा से फलश्रुति का होने संदेहजनक हैं क्यूंकि एक ही ग्रन्थ में दो फलश्रुति नहीं होती। ( श्री रामचंद्र जी को आरंम्भ के ६ कांडों में (कुछ एक प्रक्षिप्त श्लोकों को छोड़कर) वीर महापुरुष दर्शित किया गया हैं, केवल सातवें में उन्हें विष्णु का अवतार दर्शाया गया हैं जोकि विषयांतर होने के कारण प्रक्षिप्त सिद्ध होता हैं।
सातवें कांड में ऐसे अनेक उपाख्यान हैं जिनका रामायण कि मूल कथा से किसी भी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं हैं जैसे ययाति नहुष कि कथा, वृत्र वध, उर्वशी-पुरुरवा कि कथा आदि। रावण और अन्य राक्षसों का वध पहले ही हो चूका था फिर सातवें कांड में रावण का इंद्र से युद्ध, राक्षसों कि उत्पत्ति का वर्णन हैं। हनुमान राम मिलन पहले ही हो चूका था फिर सातवें कांड में हनुमान के यौवन काल का उल्लेख अप्रासंगिक प्रतीत होता हैं। . विदेशी विद्वान हरमन जैकोबी अपनी पुस्तक दास रामायण (Das Ramayan) में लिखते हैं कि "जैसे हमारे अनेक पूजनीय पुराने गिरिजाघरों में एक नई पीढ़ी ने कुछ न कुछ नया भाग बढ़ा दिया हैं और कुछ पुराने भाग कि मरम्मत करवा दी हैं और फिर भी असली गिरिजाघर कि रचना को नष्ट नहीं होने दिया हैं इसी प्रकार भाटों के अनेक पीढ़ियों ने असली रामायण में बहुत कुछ बढ़ा दिया हैं, जिसका एक एक अवयव अन्वेषण के आँख से छुपा हुआ नहीं हैं। " जैकोबी साहिब भी स्पष्ट रूप से रामायण में प्रक्षिप्त भाग को मान रहे हैं। एक और रामायण में श्री राम का केवट, निषाद राज, भीलनी शबरी के साथ बिना किसी भेद भाव के साथ सद व्यवहार हैं वही दूसरी और सातवें कांड में शम्बूक पर शुद्र होने के कारण अत्याचार का वर्णन हैं। दोनों बातें आपस में मेल नहीं खाती इसलिए इससे यही सिद्ध होता हैं कि शम्बूक वध वाली उत्तर कांड कि कथा प्रक्षिप्त हैं| अत: इस प्रकार के मुकदमो की बजाय वकील चंदन कुमार सिंह को आज उन गरीब महिलाओं की आवाज़ बनना चाहिए जो गरीबी के कारण अपने शोषण की आवाज़ नहीं उठा पा रही है|