Monday, 18 July 2016

चलो फिर से लाशे गिनते है!!

आज पूरी दुनिया में आतंक के धर्म को लेकर एक बड़ी बहस मुखर है कि आतंक किस पंथ की देन है? हालाँकि मजहब विशेष की आड़ में हमलावर आतंकी हर बार हमले के बाद नैतिक तौर जिम्मेदारी लेते है| किन्तु उदारवादी मुस्लिम जगत इसे नकार देता है| यदि एक पल को मान भी लिया जाये कि चलो इन्होने जिम्मेदारी ले भी ली तो तभी क्या हो जायेगा? क्या हिंसा से भरी खोपड़ियाँ अपना हिंसक खेल खेलना बंद कर देगी? हिंसक मनोवृति के लोग तब भी हिंसा का खेल जारी रखेंगे| आतंक के स्थान और उनको अंजाम देने के तरीके बदलते रहेंगे| ओरलेंडो में गोली मारकर हत्या ढाका में गर्दन रेतकर तो अब  फ्रांस के एक शहर नीस में 80 से ज्यादा लोगों की ट्रक द्वारा रोंदकर हत्या कर दी गयी जिसकी जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने ली है| अपना देश सबको प्यारा होता है| मुझे भी है, फ्रांसिसियों को भी होगा लेकिन भारत में रहते हुए भी मैं सोच सकता हूं कि फ्रांस के लिए यह कितना दुखद दिन होगा। मृतको के परिजनों की गीली पलके दुःख में फरकते होट खुद से प्रश्न कर रहे होंगे कि आखिर हमने उन हत्यारों क्या बिगाड़ा था? मैं यहां से सोच सकता हूं कि फ्रांस के लोग दुख के इस माहौल में भी समझदारी से काम लेंगे| तुर्की, बगदाद, काबुल, ढाका में हुए हमले के बाद एक बार फिर विश्व समुदाय की लिए यह घटना निंदा से भरी रहेगी हो सकता है मोबाइल में ट्वीट पहले से सेव हो बस ट्वीट करने से पहले देश का नाम बदला हो! मीडिया को न्यूज़ मिल गयी, लेखको को टॉपिक किन्तु मरने वाले को क्या मिला? अब एक बार फिर विश्व समुदाय आतंक से लड़ने के लिए एक जुट होने का ढोंग रचता दिखाई देगा| आतंक से साथ मिलकर लड़ने के बयान सुनाई देंगे| किन्तु सवाल यह है कि लड़ाई किससे होगी और कहाँ होगी? एक आतंकवादी संगठन का ढांचा गिरता है तो दूसरा खड़ा हो जाता है| आतंक के संगठनो के नाम बदलते रहते है कृत्य सामान ही रहते है| आखिर कब तक एक हत्यारी सोच से बारूद की लड़ाई होगी?
आतंक के मजहब को लेकर बहस बेकार और आधारहीन है, इसे साबित कर कुछ सिद्ध नहीं होगा| आतंकवाद का कोई एक निश्चित ठिकाना नहीं है वो हर बार किसी भी एक नाम से निकलकर आता और मासूमों को मार देता है| इसे एक हिंसक सोच का उदार सोच पर प्रहार भी कह सकते है| अब समय आ गया है ऐसी हिंसक सोच के वो अड्डे तलाशने होंगे, जहाँ से ये निकलकर आता है! और जहाँ ये फिर से छिप जाता है| आखिर क्यों बार बार एक ही मत के लोग यह अमानवीय कृत्य करते है और उस मत के ठेकेदार हमेशा उसकी निंदा, आलोचना कर बस पल्ला झाड़ लेते है? एक जाकिर नायक को गिरफ्तार करने, या सेन्य असैन्य कारवाही कर मुल्ला मंसूर या लादेन को मारने से क्या यह सोच मर जाएगी? यदि कोई हाँ कहे तो उसे अतीत के पन्नो में झांककर देख लेना होगा कि कहीं मत की आड़ में हिंसा का खेल पुराना तो नहीं| पुराना है तो क्यों है? मेरा मानना है अभी विश्व समुदाय के मन में आतंक के लिए उतनी नफरत नहीं पनपी जितना आतंकवादी के मन में मासूम लोगों की बेदर्दी से हत्या के लिए पनप रही है| क्योंकि अभी दस लाख के इनामी आतंकी बुरहान वानी के मामले में मैंने देखा भारत के अन्दर ही किस तरह एक आतंकी को अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर समर्थन मिल रहा है| वामपंथी नेता कविता कृष्णन ने बुरहान वानी के एनकाउंटर पर सवाल ही नहीं उठाए बल्कि बुरहान के मौत को देश के लिए शर्मनाक बताया| यहाँ से शुरू होता है एक खेल| जहाँ आतंक के प्रति संवेदना हो वहीं पर उसके लिए प्रेरणा भी छिपी होती है| वरना मान लीजिये किसी का द्रष्टिकोण मानवीय है और वो किसी की भी हत्या को गलत मान रहा है तो उसकी नजरों में सैनिक और आतंकी में भेदभाव क्यों? शायद ही मैंने कविता कृष्णन का कभी कोई ऐसा विचार सुना हो जिसमें उन्होंने आतंकवादियों द्वारा किये गये किसी हमले को शर्मनाक बताया हो? या आतंकी हमले शहीद हुए किसी जवान के प्रति सवेंदना या शोक व्यक्त किया हो!
कई बार लगता कि एक तो आतंक को कहीं ना कहीं राजनीतक संरक्षण प्राप्त होता है और दूसरा मीडिया की भी अंतर्राष्ट्रीय आतंक में भूमिका संदिग्ध नजर आती है जिसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता | चाहे उसमें माध्यम इलेक्ट्रोनिक मीडिया हो या प्रिन्ट मीडिया| सोशल मीडिया की तो बात छोड़ दीजिये यहाँ तो हर किसी का अपना स्टेंड है| स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है किन्तु जब पूरा विश्व आतंकवाद से त्रस्त हो उस समय किसी आतंकवादी को इस प्रकार नायक बनाना या अपनी प्रेरणा का उदगम मान लेना अपने विनाश को न्यौता देना है| यह एक खतरनाक शुरुआत है माना की आप सरकार के किसी कार्य से सहमत नहीं है या यह कहो इतना बड़ा देश है इतनी विविधता है तो स्वाभाविक रूप से असहमतियां भी होंगी किन्तु क्या इसका हल क्या किसी को मकबूल भट्ट, अफजल या बुरहान बना दे? सब जानते है जब पत्रकारिता बाजार में है तो बिकाऊ जरुर होगी| चाहे उसका रुझान सत्ता पक्ष हो या विपक्ष| आज पत्रकारिता आदर्शो में बंधी नही रही| जगह-जगह पत्रकारिता के नाम पर कभी अभिवयक्ति की आजादी के नाम पर बुद्दिखोर लोगों का जमघट है| हर एक आतंकी घटना के पहले दिन मीडिया एक सुर बोलती दिखाई देगी दो दिन बाद सबके मत विभाजित हो जाते है| कभी आतंकी की माँ को दिखाकर तो कभी उसके परिवार को दिखाकर न्यूज़ रूम से मातमी धुन चलाई जाती है| कई बार तो सेना के शहीद जवानों पर 2 मिनट में खट्टी डकारे लेने वाले संवाददाता पूरा दिन आतंकी के परिवारों के गुजर बसर पर चिंतित दिखाई देते है| ये किसी एक देश की कहानी नहीं है हर दुसरे देश में यही हाल है कुछ दिन पहले एक अमेरिकी ब्लोगर  पामेला जेलर ने कहा था आज अमेरिकी जमीन खून से सनी है किन्तु यहाँ के वामपंथी उसे से धूल ढकने की कोशिस कर रहे है| ठीक यही हाल भारत के अन्दर दिखाई दे रहा है| दिन पर दिन आतंकी सोच और समर्थन मजबूत होता जा रहा है| राष्ट्रों के प्रमुख बदल जाते है वैश्विक मंचो पर आतंक पर प्रहार करने की कसमे खाई जाती है| नतीजा फिर एक आतंकी घटना फिर चीखते घायल रोते बिलखते परिवारजन आज फ्रांस में हो गया कल कही और होगा अगले दिनों हम अपने काम में लगे होंगे सभी राष्ट्रों के प्रमुख अपनी सरकारे बचा रहे होंगे लेकिन प्रश्न यह है कि मासूम लोगों के खून से हर रोज अपने हाथ रंगने वाली इस सोच को खत्म कैसे किया जा सकता है इसका दमन कर या इसका समर्थन कर?.....लेख राजीव चौधरी 

Thursday, 14 July 2016

पंजाब की तरह ही आजाद हो कश्मीर?

क्या कश्मीर गुलाम है, गुलाम है तो किसका है? यह प्रश्न मैदानी धरा से लेकर पहाड़ की चोटियों तक गूंज रहा है| किन्तु इसका सही उत्तर कोई नहीं बता रहा कि कश्मीर तो आजाद है किन्तु मानसिकता गुलाम है, मजहबी मानसिकता की, गुलाम है अलगाववादी नेताओं की जिद का| गुलाम है हर रोज की हिंसक प्रदर्शनों का, गुलाम है इस्लाम के निजाम की तकरीरो का| गुलाम है आतंकियों के जनाजे में जमा होकर हिंसा करती भीड़ का वरना तो मिलिए, सीखिए कुपवाड़ा के निवासी शाह फैसल से जिसने साल 2010 में आईएएस की परीक्षा में टॉपर बने थे| या फिर पहले एमबीबीएस फिर IPS और अब IAS पास करने वाली लड़की रूवैदा सलाम से क्या कश्मीरी युवा बुरहान के बजाय इन नौजवानों से प्रेरणा नहीं ले सकता? लेकिन नहीं युवाओं के हाथ में जेहादी नेताओ द्वारा दीन का नारा थमा दिया झूठी आजादी का सपना दे दिया| कोई बताये तो सही कश्मीर में क्या नहीं है? लोकतंत्र है, समानता का अधिकार है, समाजवाद है, स्थानीय लोगों द्वारा चुनी हुई सरकार है| क्या नहीं है? यदि इन सबके बावजूद भी कश्मीर गुलाम है तो फिर मेरा मानना है कि पाकिस्तान की कलुषित मानसिकता का गुलाम है 
अब यदि कुछ लोगों के बहकावे में कश्मीरी सेना को हटाने के बात करे तो स्मरण रहे सेना वहां सीमओं की रक्षा के लिए भी है| यदि भारतीय सेना ना होती तो आज कश्मीर का अवाम पाकिस्तान या चीन के कब्जे में होता| भले ही उनके हाथ में इस्लाम का भुला भटका निजाम होता किन्तु कश्मीरी के पास कश्मीर का कुछ ना होता| गर्दन पर सर तो होता किन्तु वो सर पाक अधिकृत कश्मीर के अवाम की तरह पाकिस्तान या चीन की ठोकरों में होता है| लगता है कश्मीरी नौजवान आज मात्र कुछ पाक परस्त लोगो की जिद को हजारों अपनी अस्मिता का प्रश्न बना बैठा है| लेकिन वो सीख सकता है पंजाब से वरिष्ट इतिहासकार रामचन्द्र गुहा ने बहुत पहले लिखा था कि अस्सी के दशक में पंजाब से आने वाली खबरें भी इतनी मनहूसियत से भरी होती थी कि ऐसा लगता था कि सरकार और लोगों के बीच की ये जंग कभी खत्म नहीं होगी या फिर सिखों के अलग देश खालिस्तान के बनने के बाद ही इसका अंत होगा। लेकिन आखिरकार ये हिंसा की आग मंद पड़ी और वक्त के साथ बुझ भी गई।
सत्तर और अस्सी के दशक में इसी मानसिकता का गुलाम पंजाब था कुछेक सिखों द्वारा अलग देश खालिस्तान बनाने की मांग चरम पर थी जिसकी वजह से कई नौजवान आतंकवाद के रास्ते पर चल पड़े थे। कुछ सिख समुदाय इस कुंठा से भर आया था कि आजादी के बाद हिन्दू को हिंदुस्तान मिला मुस्लिम को पाकिस्तान पर हमे क्या मिला! पंजाब की सड़के दिन दहाड़े हिंसा का सबब बनने लगी थी| पंजाब की मिटटी से सोंधी खुसबू की जगह बारूद की गंद आने लगी थी| कुछ ही वर्ष पहले 1971 में जब पाकिस्तान से बांग्लादेश अलग हो कर नया राष्ट्र बना था तो पाकिस्तानी सियासत का विचार था की यदि पाकिस्तान से बांग्लादेश अलग हुआ है तो भारत से भी कुछ अलग होना ज़रूरी है नतीज़न साजिश रची गयी की खालसा पंथ वालों को समर्थन दिया जाये और भारत से पंजाब को अलग कर एक राष्ट्र खालिस्तान खड़ा किया जाये| जिसके लिए अलगाववादी नेता जरनेल सिंह भिंडरावाला को चुना गया इसी विचार से बड़ी संख्या में धन जुटाया गया और पंजाब की सड़कों पर रक्तपात शुरू करा दिया| बिलकुल ऐसे जैसे आज कश्मीर का हाल है| लेकिन तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सोच प्रबल थी कि जैसे भी आतंक का सफाया करना है| सरकार के कंधे ने सेना की बन्दुक का मजबूती से साथ दिया नतीजा भिंडरावाला और उसके मारे गये| पंजाबियों ने सांप्रदायिक मतभेदों को अलग करके अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर करने पर जो़र दिया। जिसका परिणाम जल्द ही पंजाब एक समर्द्ध राज्यों में खड़ा हो गया|
आज कश्मीर की समस्या भी बिलकुल ऐसी है, यानि के धर्म के नाम पर अलग देश किन्तु कश्मीरी यह क्यों भूल जाते है कि खुनी संघर्ष हमेशा लहुलुहान सवालों की बरसात करता है| जैसे प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है बुरहान वानी एक आतंकवादी था, उसे बड़ा नेता न बनाया जाए उसे आतंकी के तौर पर ही देखा जाए| लेकिन अलगावादी नेता और पाकिस्तान के आतंकवादी से लेकर हुक्मरान तक बुरहान को शहीद बताकर नायक के रूप में पेश कर रहे है, ताकि आतंक के नाम पर युवाओं को आतंक से जोड़ा जा सके| इससे साफ जाहिर है कश्मीर में भी हिंसा बिलकुल पंजाब की तरह पाक प्रयोजित है| अब इससे निपटने के लिए क्यों ना पंजाब की तरह रास्ता निकाला जाये| इतिहास गवाह है महाभारत में विदुर ने कहा था बेशक कुछ चीखें सुनकर यदि शांति की स्थापना के होती हो तो वो चींख सुन लीजिये| जब पंजाब के अलगाववादी नेता जरनेल सिंह व् उसके साथियों को पंजाब की अशांति के दोषी मानकर सेना उन्हें मार गिरा सकती है तो कश्मीर की शांत फिजा में जहर घोलकर हर रोज घाटी को अशांत करने वाले नेताओं के साथ ऐसा व्यवहार क्यों नहीं?
हर एक आतंकी के जनाजे का तमाशा अपने राजनितिक हित के लिए उठाने वाले नेता सेना की कारवाही पर धर्मिक पक्षपात का आरोप लगाने वाली कुछ मीडिया कभी यह क्यों नहीं सोचती कि सेना के संस्कारो में धर्म के बजाय राष्ट्रधर्म होता है| कश्मीर का एक स्थानीय अख़बार ग्रेटर कश्मीर' ने अपने संपादकीय में लिखता है, “ये आश्चर्य की बात है कि अगर इसी तरह के प्रदर्शन भारत के दूसरे हिस्सों में होते हैं तो उनसे पेशेवर तरीके से निपटा जाता है और किसी की मौत नहीं होती जैसी (कश्मीर) घाटी में होती है|” बिलकुल गलत और तथ्यहीन आरोप है कुछ माह पहले की मीडिया रिपोर्ट उठा लीजिये मांग के बहाने हिंसा को रोकने के लिए हरियाणा में भी हिंसक भीड़ में 28 लोग मारे गये थे| तो फिर कश्मीर में सेना की कारवाही पर बवाल क्यों?..दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा लेख राजीव चौधरी  

Tuesday, 12 July 2016

आजादी के नाम पर आतंक

2010 के बाद एक बार फिर घाटी में हालात खराब है| कश्मीरी युवा भले ही इसके लिए प्रशासन को दोषी मानकर पुलिस व् सेना के जवानों पर हमला कर रहे हो| किन्तु अपने अंतर्मन में झांक कर देखे तो इसके लिए खुद कश्मीरी ही जिम्मेदार है| जब  हर एक मुद्दे पर कश्मीर के लोगों द्वारा थानों, चोकियों समेत सेना के जवानों को निशाना बनाया जा रहा हो तो कश्मीरी किस आधार पर यह अपेक्षा कर रहे है कि प्रशासन बुत बनकर संयम का परिचय दे? पिछले कुछ अरसे से सोशल मीडिया पर छाए हुए हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के मुठभेड़ में मारे जाने के खिलाफ आयोजित विरोध प्रदर्शन के हिंसक मोड़ लेने की वजह से अभी तक पुलिसकर्मियों समेत 20 से ज्यादा लोग मर चुके है अब हो सकता है इस हिंसक स्थिति से निकलने के लिए खुद आम कश्मीरी सोच रहा हो कि या तो बारिश आ जाये या किसी तरह अल्लाह ही इन लोगों के दिमाग से यह मजहबी जूनून निकाल दे| परन्तु इतना सब कुछ होने के बाद भी अलगाववादियों के लगातार बंद के आहवान और विपक्ष के नेता उमर अब्दुल्ला हिज्बुल कमांडर बुरहान वानी की मौत पर अपनी रोटियां सेकने से बाज नहीं आ रहे है|
बुरहान वानी मारा गया लेकिन राजनीति के साथ प्रश्न जिन्दा हो गये| आखिर घाटी के लोगों को आजादी किससे चाहिए? अपने देश से या फिर घाटी को रक्त रंजित करने के लिए आजादी चाहिए ? सबने सुना किस तरह कश्मीर का कंधार कहे जाने वाले वानी के पैतृक स्थल त्राल में मस्जिदों के स्पीकर्स पर आजादी के गीत गाए जा रहे है ‘खुदा के दीन के लिए, ये सरफरोश चल पड़े, ये दुश्मनों की गर्दनें उड़ाने आज चल पड़े किसी में इतना दम कहां कि इनके आगे डट सके’ जिन्हें सुनाकर लोगों को भावनाओं में बांधकर एक दुसरे के साथ जोड़ा जा रहा था| जो लोग अभी तक यह कह रहे थे कि आतंकवादी किसी धर्म का नहीं होता सबने देखा किस तरह एक दस लाख के इनामी आतंकी के जनाजे में हजारों मुस्लिम जमा हो रहे थे| जहाँ अभी तक यही समझा जा रहा था कि कश्मीरी समुदाय कश्मीर की आजादी के लिए लड़ रहा है किन्तु जिस तरह बुरहान की माँ ने रोते हुए कहा कि ‘मेरा दूसरा बेटा भी इस्लाम की राह पर शहीद हुआ है, मुझसे ज्यादा खुशनसीब कौन सी मां होगी.’‘वो कश्मीर में इस्लामी निजाम कायम करने के लिए लड़ रहा था, और वो काफिरों से लड़ते हुए मारा गया| इससे स्पष्ट होता है कि कश्मीरी समुदाय को ना अपने लिए शिक्षा की जरूरत ना विकास और मौलिक सुख सुविधाओं की उसे तो बस जरूरत है तो सिर्फ कश्मीर को इस्लामिक गणराज्य बनाने की| पर क्या कभी इन युवाओं ने शांति के साथ सोचा है कि मजहब के नाम पर अलग होने वाला देश पाकिस्तान आज कितना खुशहाल है? एक बार जाकर खुद देख ले हद से अधिक दीन की राह पर चलकर आज पाकिस्तान समेत सीरिया, अफगानिस्तान, ट्युनिसिया, सोमालिया आदि देश तबाही के खंडहरों में बैठे है| इस प्रश्न के प्रकाश में आज कश्मीरी अपनी समस्या देख ले और सोचे यदि कश्मीर में बड़ी संख्या में धर्मपरिवर्तन ना हुआ होता और आज वहां बड़ी संख्या में बोद्ध, सिख और हिन्दू हुए होते तो क्या यह हाल हुआ होता? हाँ ऐसा तो हो सकता था कि देश के अन्य राज्यों की तरह कुछ जगह गरीबी, बेरोजगारी तो हुई होती किन्तु रक्त से सना कश्मीर ना होता| देशी विदेशी पर्यटन भी खूब होता जिससे बड़ी संख्या कश्मीरी लोगों को रोजगार के अवसर मिलते|
अस्सी के दशक में चरमपन्थी मानसिकता रखने वाले लोगों ने 87 के चुनाव के बाद धांधली का आरोप लगाकर हथियार उठाकर आजादी की मांग कर डाली इस अभूतपूर्व गुस्से की लहर को पाकिस्तान से भरपूर मदद मिली किन्तु इस आजादी की मांग के पत्ते 1990 में उस समय खुल गये जब कश्मीरी मुस्लिम कश्मीरी पंडितों पर आजादी का नारा लेकर हमला कर बैठा था| यदि यह लड़ाई कश्मीर की आजादी के लिए होती या भारत वहां कुछ अत्याचार कर रहा होता तो इस जंग में हिन्दू, मुस्लिम, सिख बोद्ध मिलकर हिस्सा लेते जैसे भारत की स्वतन्त्रता संग्राम में सबने मिलकर लिया था| यधपि आजादी के नाम पर कश्मीर को मजहब की भट्टी में झोकने वाले इन जेहादियों के फन उसी समय की तत्कालीन सरकारों को ने कुचल दिए होते तो आज यह स्थिति जन्म ना लेती| कहते है जब राजनीति में धर्म घुस जाता है तो उसके पास किसी समस्या का समाधान नहीं रहता| असल में हमारी समस्या कश्मीर नहीं है हमारी समस्या वो लोग है जो धर्म के नाम पर इन लोगों के हाथ में बंदूके थमा रहे है| एक बार हुर्रियत के नेता बिलाल गनी लोन ने स्वीकार किया था कि यहाँ की कायर जमाते पाकिस्तान के हाथों बिक चुकी है| जब पाकिस्तान कश्मीर में पैसा फेंकना बंद कर देगा कश्मीरी पत्थर फेंकना बंद कर देगा|


कश्मीर के अलगाववादियों के आन्दोलन को भी सब जानते है किस तरह वो पाक प्रायोजित है| अब राज्य और केंद्र की सरकार को समझना होगा पाकिस्तान के कहो या इन अलगाववादियों के रहते जब तक ये लोग इनका समर्थन करेंगे वहां धार्मिक संकट बरकरार रहेगा| आखिर कब तक प्रशासन वहां के आतंक की मूल जड़ को ना पकड़कर कुछ चेहरे पकड़ते रहेंगे? सब जानते है मनोविज्ञानिक बिमारियों का इलाज शरीर की चीर फाड़ से नहीं होता| अब भारत को एक सशक्त राष्ट्र की तरह व्यवहार पेश करना होगा| हमेशा नरमी के रुख को भी सामने वाला कायरता समझता है| हर रोज कश्मीरी कट्टरपंथी कानून व्यवस्था को चुनोती देते है सेना कारवाही करती है तो मुल्ला मौलवी और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इस बात का रोना रोता है कि कश्मीर में हालात खराब है| आखिर किसने पैदा किये यह खराब हालात? उमर अब्दुल्ला ने जिस तरह कहा कि बुरहान वानी बन्दुक उठाने वाला ना पहला कश्मीरी है ना अंतिम| तो उसे समझना चाहिए सेना के पास भी आतंकियों से निपटने के लिए कोई पहली या अंतिम गोली नहीं है| यदि राष्ट्र रक्षा के लिए युद्ध जरूरी है तो युद्ध जरुर होगा| आज भारत को आतंक से निपटने के लिए कहीं चीन से तो कहीं इजराइल से सीखना होगा| हमेशा कमजोरी के व्यवहार से भी किसी समस्या का समाधान नहीं होता| अब सरकार को इसका हल सोचना होगा किस तरह इन्हें जबाब दिया जाये क्योकि इस समय कश्मीरी युवाओं के पास ना तर्क ना इस स्थिति के लिए उपयुक्त प्रश्न उनके पास यदि कुछ है तो अलगाववादियों का समर्थन पाकिस्तान के हथियार, हिंसा, तोड़फोड़ और दहशत| लेख राजीव चौधरी 
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Monday, 11 July 2016

लिव इन का सच एक खतरनाक संकेत

नोएडा सेक्टर-27 में रविवार को डॉक्टर कपिल भाटी ने पिस्टल से खुद की कनपटी पर गोली मार ली डॉक्टर कपिल ने अपने सात पेज के सुइसाइड नोट में लिखा है कि उन्होंने सुइसाइड का कदम बड़ा हताश होने के बाद उठाया| हम दोनों लिव इन रिलेशनशिप में रहते थे| किन्तु युवती ने कभी पिता की आर्थिक हालत खराब बताई तो कभी पढ़ाई के बहाने से तो कभी किसी अन्य बहाने से रुपये लेती रही। करीब दो साल में युवती ने करीब 24 लाख रुपये मुझसे ऐंठ लिए। जब कपिल ने युवती और उसके भाई के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो दोनों ने इंकार कर दिया। कपिल ने जब रुपये वापस मांगे तो प्रेमिका आगबबूला हो गई और रेप में फंसाकर जीवन बर्बाद करने की धमकी देने लगी। इस प्रकार की खबर पढ़कर लगता है जितना बदलाव हमारे समाज में पिछले 100 वर्षो में आया उतना ही बदलाव अभी पिछले लगभग 15 सालों में आ गया| लगता है हमने अगले सौ वर्षो का सफ़र पिछले 15 सालों में तय कर लिया| चिंता यह नहीं है कि क्यों कर लिया बल्कि चिंता का विषय यह कि अगले 15 वर्षो में हमारी संस्कृति और समाज कहाँ होगा? जबाब टालकर या भविष्य के सहारे छोड़कर भी काम नहीं चलेगा क्योंकि आज की नींव ही कल के निर्माण का भविष्य तय करेगी|
अब थोड़ी समझदारी जिम्मेदारी से काम करना होगा आज खुद भी समझना होगा और भेड़-चाल चल रही कुछ नई पीढ़ी को बताना होगा कि यदि आप एक नई परम्परा जन्म दे रहे हो तो इसकी गरिमा को भी बनाये रखना होगा! डॉ कपिल से लेकर पिछले दिनों प्रत्युषा बनर्जी के मामले में भी सामने आया और हाल में ही हुआ 2 मई को पत्रकार पूजा तिवारी आत्महत्या प्रकरण भी इसी बिना बंधन के रिश्ते लिव इन रिलेशनशिप का एक भयावह परिणाम है| कहने का तात्पर्य यही है कि हाल के दिनों में लिव इन के साथ यौन शोषण, धोखाधड़ी और घरेलू हिंसा के मामलों में काफी इजाफा हुआ है ऐसे में आज़ादी की चाह रखने वाले युवाओं को लिव इन रिश्ता थोड़े समय के लिए भले ही मौज मस्ती और खुलेपन का एहसास देता हो लेकिन पूजा हो या प्रत्यूषा,  या अब डॉक्टर कपिल भाटी इनकी डेथ मिस्ट्री से जुड़ा लिव-इन का सच खतरनाक संकेत दे रहा है जिस से युवाओं को सबक लेने की ज़रुरत है| आज युवाओं को सोचना होगा हर एक रिश्ते की गरिमा के साथ उसका भविष्य भी होता है और जिस रिश्तें का भविष्य ना हो तो वो रिश्ता क्या होता है ??
बीते सालों पर नजर डालें तो साफ हो जाता है कि लिव इन रिलेशनशिप में न केवल हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है बल्कि लिव इन में रहने वालों के खिलाफ दुष्कर्म के मामले में भी कई गुना बढ़ोतरी हुई है। यह चिंता का विषय है। आज के दौर में लिव इन रिलेशनशिप के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। साथ ही इनमें हिंसा के मामलों में भी तेजी आई है। इस प्रसंग में मीडिया भी लड़कियों की आजादी का एक झूठा स्वांग सा रचता दिखाई देता है कई बार अनजाने में हम पाते हैं कि आज कुछ पत्रकारिता अपने पूरे चरित्र में भयानक संस्कृति विरोधी हो उठी है| आगे निकलने के लिए ख़बरों को चटपटा बनाने का खेल धीरे-धीरे इनकी संपादकीय नीति का हिस्सा सा बनता जा रहा है| जिसके पीछे यह नज़रिया काम कर रहा है कि अगर आप किसी विषय को गंभीरता से लेंगे तो पाठक भाग जाएगा तो क्यों गंभीर विषयों का भी तमाशा ही बनाया जाये  
भले ही आज का युवा कुछ वर्ग इस तरह के संबंधों को कानून के बाद सामाजिक स्वीकारोक्ति मिलने की मांग करते हुए नैतिकता पूर्ण रिश्तों पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए नैतिकता को व्यक्तिगत मामला बताकर कहता हो कि जरूरी नहीं सभी के लिए नैतिकता के मायने समान हों हर किसी का भिन्न द्रष्टिकोण होता है। लिव इन रिलेशनशिप की वकालत करने वाले कहते है कि इसमें जिम्मेदारियों के अभाव में लाइफ टेंशन फ्री होती है, ज़िन्दगी भर किसी एक के साथ बंधे रहने की मजबूरी नहीं होती जब आपको लगे कि आप एक दुसरे के साथ खुश नहीं है आप एक दुसरे को छोड़ सकते हैं यानी आप बिना किसी झंझट के साथी बदल सकते हैं| मतलब साफ है कि आज यह लिव इन रिश्ता उन लोगों को खासा आकर्षित करता है जो वैवाहिक जीवन तो पसंद करते हैं लेकिन उससे जुड़ी जिम्मेदारियों से मुक्त रहना चाहते हैं| यह तो हुआ इस रिश्ते का एक अच्छा पहलू लेकिन बिना बंधन के इस रिश्ते का एक दर्दनाक पहलू भी है जिससे अधिकांश युवा अनजान हैं जो पत्रकार पूजा तिवारी, प्रत्यूषा बनर्जी और डॉक्टर कपिल भाटी के मौत के मामले में साफतौर पर सामने आया है|
माना कि इस रिश्ते में कोई दायित्व नहीं होता| आप बिना किसी बंधन के एक दुसरे के साथ रहते हैं लेकिन जब दो लोग एक दुसरे के साथ रहने लगते है तो वे एक दुसरे के साथ भावनात्मक रूप से भी जुड़ते है और इस जुड़ाव में वे एक दुसरे से अपेक्षाएं भी रखने लगते है लेकिन जब दोनों साथी में से कोई भी एक सामने वाली भावों की अनदेखी करता है तो भावनात्मक रूप से कमजोर साथी इसे धोखा समझता है और कुछ न कर पाने की स्थिति में तनाव का शिकार हो जाता है और बिना बंधन का यह रिश्ता  दर्दनाक बन जाता है| शायद इसी वजह से दिल्ली हाईकोर्ट ने खासकर लड़कियों को सुझाव दिया है कि वह किसी भी रिश्ते-चाहे शादी का हो या फिर लिव इन-में-जाने से पहले सोच-समझकर कदम उठायें। असल में विवाह न केवल भारत में बल्कि बाकि संस्कृतियों में भी पवित्र माना गया है और इसे धार्मिक भावना से भी जोड़कर देखते है जिसमे दोनों अपने जीवनसाथी के साथ जीवनभर के लिए वफादार रहने का प्रण लेते है और इसे इतना पवित्र और खास समझे जाने के पीछे महिला की सुरक्षा भी निहित है| जिसमे एक स्त्री के अस्तित्व के लिए शादी के बाद कानूनी तौर पर उसे अपने पति की जायदाद में आधा हिस्सेदार माना गया है| अब सवाल यह है कि अगर हम आधुनिकता के नाम पर इस रिश्तों को अमली जामा पहनाते भी हैं तो युगों से सहेजी गई भारतीय संस्कृति और संस्कारों का क्या होगा......Rajeev choudhary

 http://www1.readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/Arya-Pratinidhi-Sabha-Delhi

Saturday, 9 July 2016

आतंक का एक और मसीहा!!

श्रीनगर में हिजबुल आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद स्थानीय लोग प्रदर्शन कर रहे हैं| बाईस वर्षीय बुरहान हिजबुल का पोस्टर बॉय था| यानि के वहां स्थानीय युवा जो कट्टर इस्लामिक सोच रखते है वो बुरहान को अपना आदर्श मानते थे| युवा ही क्या सेना द्वारा बुरहान के मार गिराए जाने के बाद जिस तरह जम्मूकश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट किये वो भी यह दर्शाते है कि इस कट्टर सोच को राजनैतिक दल वोट के लिए किस तरह भुनाना चाहते है| उमर अब्दुल्ला ने बुरहान वानी की मौत पर ट्वीट किया है कि बन्दुक उठाने वालों में बुरहान वानी न पहला कश्मीरी नौजवान है और न अंतिम| इससे पता चलता है कि आतंकवाद नीचे से ऊपर की ओर नहीं पनपता बल्कि ऊपर से नीचे नौजवानों के हाथ में थमाया जाता है| चाहे इसमें पाकिस्तान के हाफिज सईद, मसूद अजहर का नाम आता हो या अपने जेहरीले भाषण के लिए हाल ही में उभर कर आये जाकिर नायक का नाम ही क्यों ना हो| ढाका में हमले करने वाले आतंकी जाकिर नायक के भाषणों से प्रेरित पाए गये| हालाँकि विश्व के कई देशो में जाकिर को प्रतिबंधित किया गया है| या हो सकता है जैसे कुशल किसान अपनी फसलों को कीटों से बचाते है उसी तरह यह देश अपनी नश्लो को बचा रहे हो?

अभी थोड़ी देर पहले कहीं पढ़ा था कि जून माह के अंत में पश्चिम बंगाल में किसी स्कूल में कुछ मुसलमान छात्रों ने अचानक दोपहर को अपनी कक्षाएँ छोड़कर स्कूल के लॉन में एकत्रित होकर नमाज पढ़ना शुरू कर दिया था, जबकि उधर हिन्दू छात्रों की कक्षाएँ चल रही थीं. चूँकि उस समय यह अचानक हुआ और नमाजियों की संख्या कम थी इसलिए स्कूल प्रशासन ने इसे यह सोचकर नज़रंदाज़ कर दिया कि रमजान माह चल रहा है तो अपवाद स्वरूप ऐसा हुआ होगा. लेकिन नहीं... अगले दिन पुनः मुस्लिम छात्रों का हुजूम उमड़ पड़ा, प्रिंसिपल के दफ्तर के सामने एकत्रित होकर “नारा-ए-तकबीर, अल्ला-हो-अकबर” के नारे लगाए जाने लगे. कुछ छात्र प्रिंसिपल के कमरे में घुसे और उन्होंने माँग की, कि उन्हें जल्दी से जल्दी स्कूल परिसर के अंदर पूरे वर्ष भर नमाज पढ़ने के लिए एक विशेष कमरा आवंटित किया जाए. इन्हीं में से कुछ छात्रों के माँग थी कि प्रातःकालीन सरस्वती पूजा पर भी रोक लगाई जाए| आखिर कहाँ से पनपी यह सोच क्यों अपनी पूजा पद्धति को ही महान मान लिया किसने सिखाया इन बच्चों को कि दूसरों की संस्कृति, पूजा और उपासना हमारे लिए कोई मायने नहीं रखती?
यहीं सोच लेकर एक बच्चा जब बड़ा होता है, फिर वो इस्लामिक परिधान की मांग करता वो मुसलमान बनना बाद में चाहता है पहले वो मुसलमान दिखना चाहता है| फिर वो जाकिर नायक जैसे लोगों की कट्टर हिंसक सोच से प्रभावित होकर कब मरने मारने निकलकर बुरहान वानी बन जाता है पता ही नहीं चलता| कब एक के दो और फिर दो के सौ हो जाते  है पता ही नहीं चलता| पता जब चलता है जब एक हँसता खेलता मुल्क सीरिया, यमन, मिस्र, ट्युनिसिया या पाकिस्तान, अफगानिस्तान इराक बन जाता है| सोचिये जब एक बच्चा जाकिर नायक जैसे पढ़े लिखे मुस्लिम के यह बयान सुनता है कि यदि ओसामा बिन लादेन दुश्मनों के साथ लड़ रहा है तो मैं उसके साथ हूँ इस्लाम उसके साथ है, हर मुसलमान को आतंकी होना चाहिए यदि वो आतंकी अमेरिका को डरा रहा है तो समझो वो इस्लाम को फोलो कर रहा है| पाकिस्तानी मूल के विचारक पत्रकार तारेक फतेह कहते है कि आज मदरसों में सिर्फ बच्चों के दिमाग में एक बात डालते है कि सारी दुनिया हिन्दू, सिख, इसाई, बोद्ध यहूदी हमारे खिलाफ साजिश रच रहे है हमें बचाने वाला सऊदी अरब और मदरसे है इस्लाम के दुश्मनों के खिलाफ लड़ते हुए जान देना शहादत है तो सोचिये ऐसी तकरीरे सुनने वाला बच्चा क्या बनेगा?
  

सोचकर देखिये यदि किसी बच्चे का निर्माण प्रेम, शांति और अहिंसा की छाव की बजाय घ्रणा, हिंसा और कट्टरता में होगा तो वो बच्चा समाज को क्या देगा! आतंक या सामाजिक समरसता? तसलीमा नसरीन ने मुस्लिम माता-पिता को आगाह करते हुए लिखा था कि यदि आपका बच्चा हद से ज्यादा कुरान, इस्लामिक परिधान के करीब जा रहा है तो कृपया उसका ध्यान रखे कहीं उसका झुकाव आतंक की ओर तो नहीं हो रहा है| समाचार चैनलों के अनुसार करीब 12 अरब रूपये प्रति माह जाकिर नायक को विदेशो से इस्लाम के नाम पर फंड मिलता है| क्या कोई इस्लाम से जुड़ा व्यक्ति बता सकता है कि कितना पैसा गरीब मुस्लिम के विकास के लिए उसकी शिक्षा के लिए खर्च किया जा रहा है? या फिर उस पैसे से इन्टरनेट और टेलीविजन व् अन्य माध्यम से उनके दिमाग में सिर्फ हिंसा के बीज रोपे जा रहे है ? जाकिर जैसे लोग धर्म विशेष की महिमा का गान करते है अपनी प्राचीन सभ्यता का अपने मौलानाओं का गुणगान कुछ इस तरह करते है कि ना चाहते हुए भी कई बार कुछ युवा इस्लामिक प्राचीनता से इतना अधिक प्यार करता है, कि उसके लिए आत्महत्या तक कर लेता है। वह फिदायीन तक बन जाता है|

 वह प्राचीन कत्लेआम को भी  स्वर्णयुग समझकर उसे वापिस लाना चाहता है उसके लिए हर चीज की हत्या कर देता है। उसकी अमानवीयता बढ़ती जाती है। तो व्यक्ति आत्मघात करता है। धार्मिक उन्माद यह शिक्षा देता है कि यदि जीत गये तो गाजी कहलाओगे और यदि मारे गये तो शहीद। स्वर्ग में तुम्हें हूरें मिलेंगी। इस हत्याकांड को कट्टरवाद क्रूसेड, जिहाद और धर्मयुद्ध नाम देता है। दूसरे संप्रदायों के धर्मों को हेय समझना, उनसे घृणा करना, अपनी श्रेष्ठता को मनवाने की कोशिश करना सारे फसादों की जड़ है। अन्य किसी के मुकाबले इस्लाम का पूरा इतिहास ऐसे ही नरसंहारों से भरा पड़ा है। आज कुछ लोग जाकिर नायक को धर्मगुरु कह रहे है इतिहास उठाकर देखिये। सच्चे और महान संत का जीवन हमेशा निर्बल रहा है। धर्मगुरु कभी किसी फौज का कमांडर या किसी गिरोह से जुड़ा आतंकवादी नहीं होता। वह अकेला होता हैं, फिर भी सबके साथ होता हैं|उसका सन्देश सबका कल्याण होता है| अत: भारत सरकार को इस मामले में जाँच कर कड़ी कार्रवाही करनी चाहिए मुस्लिम समुदाय को भी धर्म के नाम पर जहर बेच रहे इस इन्सान से अपने बच्चों को सचेत करना चाहिए, और मीडिया को भी सरकारी तंत्र में हस्तक्षेप करने के बजाय सोचना चाहिए कि जब संत आसाराम को जेल हो सकती है तो जाकिर नायक को क्यों नहीं? लेख राजीव चौधरी 

Thursday, 7 July 2016

मासूम बचपन को बचा लो!!

अभी परसों टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक खबर पढ़ी कि मध्य प्रदेश के दामोह में 3 सरकारी कर्मचारियों को राज्य में लागू दो बच्चों के नियम का उल्लंघन करने का दोषी पाए जाने पर बर्खास्त कर दिया गया है। ये तीनों सरकारी कर्मचारी दामोह जिला अदालत में चपरासी पद पर नियुक्त थे। पहली बात क्या उस राज्य के वो मंत्री, विधायक, सांसद भी बर्खास्त होंगे जिनके बच्चे की संख्या 2 से ज्यादा है? दूसरा सब सोच रहे होंगे आखिर इस खबर से बचपन और रिश्तों का क्या तुक| किन्तु रिश्ता है और समझने वालों के लिए बहुत गहरा रिश्ता है|
अभी कई रोज पहले की बात मैं अपने एक परिचित के घर गया था| वहां उनका बेटा भी बैठा था जिसकी आयु 7 साल है मैंने उससे पूछ लिया बेटा इस बार गर्मियों की छुट्टियों में कहाँ गये थे? उसने जो जबाब दिया वो चौकाने वाला था कि हमारा कोई नहीं है| तो हम कहाँ जाये? पापा भी दादा दादी की इकलोती संतान है और मम्मी भी नाना-नानी की अकेली बेटी है| ना कोई मौसी ना मामा ना बुआ ना चाचा तो कहाँ जाये? |बच्चें के इस  जबाब ने मेरे मन पर एक भावुक सी चोटकर प्रश्न खड़ा किया कि बच्चा एक तो रिश्तें अनेक कैसे? कहीं हम अपने हाथों से ही रिश्ते नातों और बच्चे के बचपन की खुशियों गला तो नहीं घोट रहे है? आने वाले समय मे बच्चें तो होंगे किन्तु रिश्ते नहीं होंगे|वो चपरासी भले ही पद से हटा दिए गये हो किन्तु उनके बच्चे अपना बचपन तो जी रहे है|
बहुत समय पहले किसी राजा ने बच्चों के लिए कहा था,  “अन्धेरा सहनेवालों के आंसू बह रहे हैं, और उनको शान्ति देनेवाला कोई नहीं!” एक समय जब  सब बच्चे गर्मियों की छुट्टियाँ मनाने अपने गाँव, बुआ या मामा-नाना के घर जाया करते थे| वहां पहुंचकर शरारत करना मामा मौसी के बच्चों के साथ खेलना कूदना उनके बचपन में रोमांच भर देता था| लेकिन अब एक बड़ा बदलाव आया कि एक बच्चें की चाह ने आज बचपन अकेला कर दिया| मेट्रो शहरों में हर महीने कम से कम चार बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं। इनका प्रमुख कारण है तनाव और डिप्रेशन यानी अवसाद, सबसे ज्यादा इस बीमारी का कारण पाया अकेलापन| मान लिया जाये सरकार और समाज शास्त्री कहते है बच्चा एक ही अच्छा और साथ में यह भी दलील दी जाती है कि बचपन ही बच्चे के जीवन को दिशा देता है| एक बच्चा एक फ्लैट में पैदा होता है लिफ्ट से स्कूल, स्कुल से लिफ्ट फिर उसी फ्लेट में माता-पिता दोनों कामकाजी है, उन्हें इस बच्चे का मन पढने की फुरसत नहीं तो वो अकेला बच्चा जीवन को क्या दिशा देगा? अवसाद या इसके बाद आत्महत्या!!
बचपन का मतलब है कई बच्चों द्वारा इकट्ठा होकर शरारत करना स्वतंत्र घूमना और बिना किसी जिम्मेदारी के उन्मुक्त उडान भरना किन्तु बदले समय में अब सब कुछ बदलता सा दिखाई दे रहा है| बचपन शब्द तो ज्यों का त्यों रहा पर आज बचपन के मायने बदल गये| लगातार सिकुड़ते रिश्तें ने इस बचपन को एकांकी और नीरस बना दिया| इसके अलावा, बचपन के साथ समाज में और भी कई तरह की नाइंसाफियाँ हो रही हैं जो बच्चों के जज़्बातों को कुचल रही हैं और उनके दिल को गहरी चोट पहुँचा रही  हैं सुविधावादी संस्कृति हमारी परंपराओं और संस्कारों को निगलती जा रही है। प्रतियोगिता और स्पर्धा जीवन के हर निर्णय पर हावी होती जा रही है। यही अकेलापन बच्चों को मानसिक बीमारियों की चपेट में ले जाता है। संयुक्त परिवार और समाज के बीच रहने वाले बच्चे संबंधों के बारे में सीखते-जानते हैं, लेकिन एकल परिवार में रहने वाले बच्चे ये सब नहीं सीख पाते।
अगर एक बच्चे की परवरिश ऐसे माहौल में होती है, जहाँ माँ-बाप है दादा- दादी है, चाचा-चाची आदि रिश्तें है तो वो बच्चा तनाव से कोशो दूर होता है| किन्तु बदलते परिवेश ने रिश्तें तो दूर की बात पडोस से भी किनारा कर लिया| अब दादा-दादी बिरले ही किसी परिवार में देखने को मिलते हैं। पहले बच्चा अपने मनोभाव उनसे व्यक्त कर दिया करता था और दादा-दादी भी उसे अपने प्यार की डोर में बांधे रखते थे। अब परिवार में किसी भी बड़े का सानिध्य न मिल पाने के कारण बच्चे प्राय: भटक जाते हैं। माता-पिता की व्यस्तता ने बच्चों के संवाद के अवसर पहले ही लील लिए हैं। न तो बच्चे मन की बात माता-पिता को बता पाते हैं और न ही माता-पिता बच्चों के मन को पढ़ पाते हैं। इस कारण बच्चों में अकेलापन घर कर गया है। जो शायद आने वाले भविष्य में देश और समाज के लिए दुखदायी होगा|...दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा .....lekh rajeev choudhary  

Monday, 4 July 2016

इस्लाम की शांति पर सवाल?

29 जून इस्तांबुल एयरपोर्ट पर हुए धमाके में 41 लोगों की मौत हो गयी मरने वाले 41  लोगों में 13 विदेशी नागरिक हैं| 30 जून को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के बाहर आत्मघाती हमलावरों ने 40 लोग मार डाले| 2 जुलाई को ढाका में  आतंकियों द्वारा 21 लोगों की गला रेतकर हत्या कर दी जाती है और 3 जुलाई को बगदाद में एक विस्फोट कर 119 लोगों की| 4 जुलाई सऊदी अरब जेद्दाह में अमरीकी वाणिज्य दूतावास के पास एक आत्मघाती हमलावर ने खुद को उड़ा दिया है| ज्ञात हो सभी घटना इस्लामिक मुल्कों में हुई किन्तु इन सबके बाद भी इस्लाम को शांति का मजहब बताकर पवित्र रमजान माह का हवाला देकर बचाव पक्ष सामने खड़ा दिखाई दे रहा है| जबकि बचाव पक्ष हर बार यह भूल जाता है कि ऐसे बयानों से आप अनजाने में मजहब की बजाय आतंक का बचाव कर जाते है| 
चलो एक बार फिर पुरे विश्व समुदाय को निंदा करने का अवसर मिला, एक बार फिर आतंक की पहचान पर प्रश्न उठ रहा है कि आतंक को किसी धर्म से जोड़े या नही जोड़ें! ढाका के रेस्टोरेंट में आतंकवादी ‘अल्लाह-ओ-अकबर’ के नारे लगाते हुए घुसे और रेस्टोरेंट में अधिकतर विदेशी समुदाय के लोगों की हत्या को अंजाम दिया यानी आतंकियों ने अपना लक्ष्य बड़े ध्यान से चुना था| विदेशी नागरिकों की हत्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व सुर्खियां दिलवाती है| पश्चिमी विदेशी मीडिया ने इस आतंकी हमले को व्यापक कवरेज दी और कईयों ने तो इन आतंकियों को मात्र ‘‘बन्दूकधारी’’ ही कहा| जबकि आतंकी कुरान की आयतें ना पढने वालों की चाकुओं से गर्दन रेत रहे थे| आतंकियों ने अपने धार्मिक जुड़ाव और जिहाद के प्रति प्रतिबद्धता को लेकर किसी के भी मन-मस्तिष्क में तनिक भी संदेह नहीं छोड़ा कि वो धर्म विशेष के लिए ही मारने मिटने आये थे|
हालाँकि बांग्लादेश से निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन ने हमलावरों को बंदूकधारी कहें जाने के संबोधन के मुद्दे पर पूछा है कि उन्‍हें इस्लामिक आतंकी क्‍यों नहीं कहा जा रहा है? “मीडिया उन्‍हें गनमैन लिख रहा है, लेकिन उन्‍होंने लोगों को मारने और उनमें दहशत फैलाने से पहले अल्‍लाहू अकबर का नारा लगाया|” क्‍या अब भी उन्‍हें इस्‍लामी आतंकी नहीं कहा जाना चाहिए? तस्लीमा ने कहा कि इस्लाम को शांति का धर्म कहना बंद करें। अब यह मत कहिए की गरीबी और निरक्षरता लोगों को इस्लामिक आतंकवादी बनाती है, इस्लामिक आतंकवादी बनने के लिए गरीबी निरक्षरता, तनाव , अमेरिकी विदेश नीति और इस्त्राइल की साजिश की जरूरत नहीं है। आपको इस्लाम की जरुरत है। इसके साथ ही उन्होंने इस तर्क को भी खारिज किया कि गरीबी किसी को आतंकवादी बना देती है। ढाका हमले के सभी आतंकी अमीर परिवार से थे और सभी ने अच्छे स्कूलों में पढ़ाई की थी।
ऐसा नहीं है तसलीमा ने ऐसा पहली बार कहा इससे पहले भी उसने विश्व समुदाय को कई बार चेताया है, 2015 में तसलीमा ने कहा था| आज ISIS बांग्लादेश में है कल पाकिस्तान में होगा परसों भारत में होगा| उसने आगे कहा था कि सिर कलम करना कैसे सीखते है ये लोग? पहले बैलो का सिर काटते है उसके बाद मनुष्यों का| अकेले तसलीमा ही नहीं फिल्म अभिनेता इरफ़ान खान ने भी इस्लामिक आतंक पर खुलकर खुलकर सवाल खड़े करते हुए कहा क़ुरान की आयतें न जानने की वजह से रमज़ान के महीने में लोगों को क़त्ल कर दिया गया| हादसा एक जगह होता है और बदनाम इस्लाम और पूरी दुनिया का मुसलमान होता है ऐसे में क्या मुसलमान चुप बैठा रहे और मज़हब को बदनाम होने दे? या वो ख़ुद इस्लाम के सही मायने को समझे और दूसरों को बताए कि ज़ुल्म और नरसंहार करना इस्लाम नहीं है |”
हमेशा इस्लाम के जानकार और चिंतक कहते हैं कि आतंकवाद और इस्लाम का कोई संबंध हो ही नहीं सकता| जो मुसलमान इस्लाम का नाम लेकर कभी और कहीं आतंकवादी घटना में लिप्त होते हैं, दरअसल वे मुसलमान नहीं हैं| उनका इस्लाम से हरगिज कोई संबंध नहीं हो सकता| मुस्लिम नेता हमेशा लोगों के दिमागों में यही बात ठूंसने की कोशिश करते रहते हैं कि इस्लाम एक शांति का धर्म है और उसका आतंकवाद से कोई सम्बन्ध नहीं है| लेकिन  जब भी कोई मुस्लिम आतंकवादी पकड़ा जाता है, तो यह मौलवी और नेता चुप्पी साध लेते| या कहने लगते हैं कि आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता है किन्तु इस प्रश्न का जबाब किसी चिन्तक के पास नहीं होता कि हर एक आतंकी हमला कुरान, जिहाद अल्लाह हु अकबर के नारे से ही जुड़ा क्यों होता है? पिछले दिनों अमेरिकी लेखिका पामेला जेलर ने पूछा था| 9/11 को हमला करने वाले आतंकियों ने 90 बार अल्लाह हूँ अकबर कहा था कोई मुझे बताये कि इसे इस्लामिक आतंकवाद क्यों ना कहें? आखिर यह सच मुसलमानों को चुभता क्यों है? ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी एबट ने कहा था जिसकी भरपूर आलोचना भी हुई थी| कि इस्लाम धर्म में 'बहुत समस्याएं' आ खड़ी हुई है और इसीलिए सुधारों की ज़रूरत है ऑस्ट्रेलियाई मीडिया में छपे एबट के ख़त के मुताबिक सभी संस्कृतियां बराबर नहीं हैं और पश्चिम को अपने मूल्यों का बचाव करते हुए माफ़ी मांगना बंद कर आतंक से निपटना चाहिए| हर एक हमला कट्टरपंथी इस्लामी हिंसा के स्तर को और आगे ले जाने के मकसद से किया जाता है| कट्टरपंथी समुदाय इस बात को क्यों नहीं समझते कि हर एक संस्कृति मूल्यवान है| आखिर 1400 साल पहले आपके द्वारा बनाये गये नियम विश्व समुदाय क्यों माने? और यही सोच क्यों निर्धारित कर ली है कि हमारी संस्कृति उत्कृष्ट एवं अन्य संक्रतियाँ निचली दोयम दर्जे की है? 
हालाँकि आतंक के परिपेक्ष में भारतीय मुस्लिम की बात की जाये तो इसकी भूमिका अभी तक सराहनीय रही है| वो नाउम्मीदी का शिकार नहीं है| वो मजहब के उसूलों से बड़ा भारत का संविधान मानता है| किन्तु ढाका में हमले के गहरे संदेश भारत के लिए जरुर छिपे हैं| अपने पाले हुए आतंक से जो दुःख आज भारत के पड़ोसी झेल रहे है जल्द ही भारत भी इसकी चपेट में घिरता दिखाई दे रहा है| इसके लिए आज बांग्लादेश जैसे कमजोर देशों की मदद करने के अलावा भारत समेत वैश्विक समुदाय को उन देशों को भी चिन्हित करना होगा जो अपने भू-राजनीतिक लक्ष्यों को पाने के लिये एक उपकरण के रूप में आतंकवाद का सहारा लेते हैं और यह सुनिश्चित करना होगा के वे सभ्य समाज और विश्व के नियमों के या लोकनियमो अनुसार व्यवहार करें| बांग्लादेश के मजहबी जूनून में पागल जो लोग आज कुरान की आयत ना पढ़ पाने पर हत्या कर रहे है उन लोगों को सोचना होगा 1971 में जब पाकिस्तान की आर्मी अल्लाह को महान बताकर ढाका की सड़कों पर निर्दोषों का खून बहा रही थी तब हमारी मुक्ति वाहिनी सेना ने बिना किसी भेदभाव के किसी मुस्लिम की जान उससे गीता के श्लोक पढ़वाकर नहीं बचाई थी!!....लेख राजीव चौधरी