Wednesday, 20 February 2019

गांडीव उठाओं राजन अब शांति का समय नहीं है


धरो कवच आभूषण तजकर, नयनों में अब क्रोध भरों, किस उलझन में पड़े हो राजन, तत्काल कटी कृपाण धरो बजने दो अब रणभेरी तुम रणचंडी का आहवान करो।
दुःख की इस असहनीय घड़ी में प्रश्न भी है कि कब तक हमारे सैनिक इस लाक्षाग्रह में जलते रहेंगे, उठो राजन! अब सहन मत करो, बन अर्जुन इतिहास को पुन: गांडीव की टंकार सुना दो देश को हिला देने वाले पुलवामा हमले में जिस माँ ने बेटा खोया है उस माँ की छाती जरुर फटी होगी, दुनिया उस बाप की भी उजड़ी होगी, जिसने अपना सहारा खोया है दर्द के चाबुक पत्नी और उस संतान के तन मन में पड़े होंगे, जिनकी मांग का सिंदूर और जिसके सर से बाप का साया छिना है, आज इनका दर्द देखकर देश के अन्तस् से अथाह पीड़ा और आक्रोश की लहर उठ रही है आखिर कैसे मजहबी भेडियों ने कश्मीर को कब्रिस्तान बना डाला वो किस तरह दुश्मन देश से मिलकर देश की संप्रभुता, अखंडता पर चोट कर रहे है एक कथित मजहबी आजादी का सपना पाले वो लोग बार-बार ललकार रहे है और हम सहिष्णुता और अहिंसा के सिद्दांतों का पालन करते-करते कायरता का आवरण ओढ़कर कश्मीरियत और जमुहुरियत का गाना गा रहे है

एक तरफ हम लोग विश्व शक्तियों के भारत की साथ तुलना करते नहीं थकते, दूसरी और देखे तो हम इतने कमजोर राष्ट्र बन चुके है कि अपने हितों पर होती चोट पर निंदा से ज्यादा कभी कुछ नहीं कर पाते बेशक किसी की धार्मिक आस्था पर चोट नहीं करनी चाहिए किन्तु जहाँ धर्म ही न हो अधर्म ही अधर्म दिख रहा हो तो आतंक में आस्था रखने वाले इन जहरीले सांपो के फन क्यों न कुचले जाये? शायद ऐसा न करना तो हमारे किसी धर्म शास्त्र में नहीं लिखा हैं
पठानकोट के बाद उरी इसके बाद अब पुलवामा देश के सैनिक एक-एक कर भेडियों के चोरी छिपे हमलों का निवाला बन रहे है और हम सर्वशक्ति संपन्न होते हुए भी सिवाय आंसू पोछने, पीड़ा की कविता गाने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे है कम से कम हमें राष्ट्र रक्षा में तो अपने ग्रंथो का ध्यान करना चाहिए कि जब दुश्मन बार-बार अट्टहास करता है जैसे अभिमन्यु वध के उपरांत अर्जुन को आत्मदाह करते देखने के लिए जयद्रथ कौरव सेना के आगे आकर अट्टहास करने लगा था तब जयद्रथ को देखकर श्रीकृष्ण बोले थे पार्थ! तुम्हारा शत्रु तुम्हारे सामने खड़ा है उठाओ अपना गांडीव और वध कर दो इसका आज भी समय वही मांग दोहरा रहा है गांडीव उठाओं कलयुग के राजन कर दो दुश्मन का विनाश
आखिर हम कब तक अपनी भारत माता के वीर सपूतों के शवों पर आंसू बहाते रहेंगे जबकि दुश्मन हर बार हमें घाव देकर चला जाता है इन 40 जवानों बलिदान से देश के किस नौजवान का खून नहीं खोला होगा किस माँ की आँखे नम नहीं हुई होगी, 40 घरों के चिराग बुझ गये, आखिर हम कब तक श्रद्धांजलि देते रहेंगे? हर दिन, हर सप्ताह, हर महीना, हर साल हमारे जवान मरते रहते है और राजनेता आरोप प्रत्यारोप लगाकर इस खून सनी जमीन पर मिटटी डालते रहते है जो लोग आज इन मजहबी भेडियों का साथ दे रहे शुरू उनसे करना चाहिए क्योंकि महाभारत में युद्ध के दौरान कई बार कृष्ण ने अर्जुन से परंपरागत नियमों को तोड़ने के लिए कहा था जिससे धर्म की रक्षा हो सके जो अधर्म के रास्ते पर चलेगा उसका सर्वनाश निश्चित है, फिर चाहे वह कोई भी व्यक्ति क्यों ना हो कर्ण गलत नहीं थे सिर्फ उन्होंने गलत का साथ दिया था इस कारण उन्हें मौत मिली समझने के लिए यही काफी है अब केवल अकर्मण्य बने रहने का खतरा देश कब तक उठाता रहेगा
हमे श्रीलंका जैसे छोटे देश से भी सीखना चाहिए कि किस तरह उन्होंने लिट्ठे जैसे मजबूत आतंकी नेटवर्क के ढांचे को नेस्तनाबूद किया, हमें इजराइल से सीखना चाहिए कि अपने दुश्मनों के बीच रहकर अपना स्वाभिमान कैसे बचाया जाता है म्यूनिख ओलिंपिक खेलों के दौरान 11 इजराइली एथलीटों को बंधक बनाया और बाद में सबकी हत्या कर दी बंधकों को छुड़ाने की कोशिश में वेस्ट जर्मनी द्वारा की गई कार्रवाई में 5 आतंकी मारे गए थे लेकिन इसके बाद बाकी बचे तीन आतंकियों, जिनमें इस साजिश का मास्टरमाइंड भी शामिल था, को वहां की खुफिया एजेंसी मोसाद ने सिर्फ एक महीने के अंदर ही ऑपरेशन रैथ ऑफ गॉडचलाकर न सिर्फ खोजा बल्कि मार भी गिराया इजराइल ने हमले की निंदा नही की थी बस प्रतिकार किया था। जिसकी जरुरत आज हमें भी हैं।
अभी तक जो चल रहा था वह एक राजनितिक गलती हो सकती हैअगर आगे भी यही होगा तो इतिहास इसे सर्वदलीय गलती कहने से गुरेज नहीं करेगा आज राजनेताओं को समझना होगा धर्मनिरपेक्षता सामाजिक समरसता का विषय हो सकता है किन्तु यदि शत्रु धर्म के सहारे ही हमला करता रहेगा तो कैसी धर्मनिरपेक्षता यह बात सभी को समझनी चाहिए कि कोई भी देश वीरता के साथ जन्म लेता है और कायरता के साथ मर जाता है, अत्यधिक शांति भी कायरता का रूप होती है अंत में सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि आत्मा ही नहीं दिल भी रोता है जब सरहद पर कोई जवान शहीद होता है सभी वीर बलिदानी सैनिकों को आर्य समाज शत-शत नमन  
rajeev choudhary

Wednesday, 30 January 2019

आबादी तो बढ़ रही है लेकिन किसकी?


आज दुनिया की जनसँख्या सात अरब से ज्यादा है। विश्व भर के सामाजिक चिन्तक इस बढ़ती जनसँख्या पर अपनी गहरी चिंता भी प्रकट कर रहे हैं। जनसंख्या विस्फोट के खतरों की चर्चा हो रही है। तमाम देश, बढ़ती आबादी पर लगाम लगाने की बातें कर रहे हैं और प्रकृति के सीमित संसाधनों का हवाला दिया जा रहा है।

यह तो तय है कि पृथ्वी का आकार नहीं बढाया जा सकता और यहां मौजूद प्राकृतिक संसाधन भी अब बढ़ने वाले नहीं, जैसे पानी, खेती के लायक जमीन। इस कारण सामाजिक चिन्तक चेतावनी दे रहे हैं कि बढ़ती आबादी, इंसानों के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि धरती, कितने इंसानों का बोझ उठा सकती है?

जहाँ ये सवाल पूरी गंभीरता से उठाया जा रहा है वहीं अमेरिकी लेखिका कैथरीन रामपाल ठीक इसके उलट एक दूसरा सवाल लेकर पूरी दुनिया के सामने हाजिर है कि आबादी बढ़ रही है लेकिन किसकी? वे अमेरिका समेत अनेकों देशों में कम हो रही आबादी पर चिंता व्यक्त कर रही है। उसने जापान का उदाहरण देते हुए कहा है कि जापान में मौतें लगभग एक सदी में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं हैं। जन्म दर गिर रही है। इन आंकड़ों को एक साथ रखें तो इसका मतलब है कि जापान की आबादी तेजी से कम हो रही है। आगे चीजें बदतर हो सकती हैं। इस जनसांख्यिकीय संकट के कारण आगे चलकर अमेरिका और यूरोप को कुछ सबक मिल सकते हैं।

इस लिहाज से कैथरीन की यह चिंता दिलचस्प है और यदि इसका गहराई से विश्लेषण करें और साथ ही एक छोटा सा उदाहरण रूस से भी अगर ले लिया जाये तो केथरीन की इस चिंता को आसानी से समझा जा सकता है। सन् 2025 तक रूस की आबादी 14 करोड़, 37 लाख से घटकर 12 करोड़, 50 लाख और सन् 2050 तक केवल 10 करोड़ रह जाएगी। विशेषज्ञों की माने तो रूस में हर दिन दो गांव खत्म हो रहे हैं। पिछले आठ महीनों में ही रूस की आबादी 5 लाख, 40 हजार कम हो चुकी है और पूरे साल में यह कमी 7-8 लाख तक पहुंच जाएगी।

शायद आगे चलकर भारत भी इस समस्या का सामना करने जा रहा हैं। क्योंकि अमेरिका से लेकर जापान और यूरोप की तरह यहाँ भी समस्या समान है। एक तो शादी की दरें गिर रही हंै। आज अधिकांश युवा और युवतियां शादी को एक फालतू का झमेला समझकर प्रेम या लिव इन रिलेशनशिप जैसे रिश्तों को प्राथमिकता प्रदान कर रहें हैं। कुछ अनियमित नौकरियों में फंसे होने के कारण शादी नहीं कर पा रहे है तो कुछ शादी से पहले अधिक आर्थिक सुरक्षा चाहते हैं।
इसके विपरीत यदि सामाजिक और पारिवारिक दबाव में जो शादियाँ की जा रही है उनमें फेमिली प्लानिंग के साथ एक बच्चे पर ही जोर दिया जा रहा हैं। इससे साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि निकट भविष्य में भारत में भी बुजुर्गों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि होने वाली है यानि इसके बाद मृत्यु दर बढ़ेगी और जन्मदर गिरेगी।

अब सवाल यह है कि यदि यह सब है तो फिर आबादी किसकी बढ़ रही है? इसे हम धार्मिक आधार पर सही ढंग से समझ सकते है। इस समय पूरे विश्व में ईसाई धर्म को मानने वाले करीब तैतीस फीसदी लोग है, इस्लाम को पच्चीस फीसदी, हिन्दू सोलह फीसदी और बौद्ध मत को मानने वाले सात फीसदी के अलावा अन्य मतो को मानने न मानने वाले करीब अठारह फीसदी लोग भी हैं।

किन्तु वह अभी इस मोटे अनुमान से बाहर है यदि बढती और घटती आबादी को भारत के ही लिहाज से देखें तो वर्ष 2011 में हुई जनगणना के अनुसार हिन्दू जनसंख्या वृद्धि दर 16.76 प्रतिशत में रहा, किन्तु इसके विपरीत भारत में मुस्लिमों का जनसंख्या वृद्धि दर 24.6 है जो और कही नहीं है।

मुसलमान कम उम्र में शादियाँ करते हुए जनसख्या वृद्धि के अपने धार्मिक आदेश का पालन कर रहे है तथा एक साथ कई-कई पत्नियाँ उनसे उत्पन्न बच्चें विश्व में बढती जनसँख्या में अपनी भागेदारी दर्शा रहे हैं। इस कारण प्यू रिसर्च सेंटर और जॉन टेंपलटन फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार विश्व के 60 प्रतिशत मुसलमान वर्ष 2030 तक एशिया प्रशांत क्षेत्र में रहेंगे। 20 प्रतिशत मुसलमान मध्य पूर्व में, 17.6 प्रतिशत अफ्रीका में, 2.7 प्रतिशत यूरोप में और 0.5 प्रतिशत अमेरिका में रहेंगे। अगर मौजूदा चलन जारी रहा तो एशिया के अलावा अमेरिका और यूरोप में भी मुस्लिम आबादी में काफी बढ़ोतरी होगी। दुनिया के हर 10 में से 6 मुसलमान एशिया प्रशांत क्षेत्र में होंगे। भारत अभी मुसलमानों की आबादी के मामले में दुनिया का तीसरा देश है। अध्ययन के मुताबिक, 20 साल बाद भी भारत मुस्लिम आबादी के मामले में इसी स्थिति में होगा।

अमेरिकी अध्ययन के मुताबिक यूरोप में अगले 20 सालों में मुसलमान आबादी 4.41 करोड़ हो जाएगी जो यूरोप की आबादी का 6 प्रतिशत होगा। यूरोप के कुछ हिस्सों में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत दोहरे अंकों में हो जाएगा। फ्रांस और बेल्जियम में 2030 तक 10.3 फीसदी मुस्लिम होंगे अमेरिका में भी मुसलमानों की जनसंख्या दोगुनी से अधिक हो जाएगी। सन 2010 में अमेरिका में 26 लाख मुसलमान थे, जो सन 2030 में बढ़कर 62 लाख हो जाएंगे।
इस सब आंकड़ों की माने तो जब जनसंख्या का यह विशाल बिंदु पूरे विश्व में फैलेगा और जब यह परिस्थिति पैदा होगी तब विज्ञान को चुनौती के साथ-साथ अन्य मतो पर भी सांस्कृतिक और धार्मिक हमलों में तेजी आने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता। इस कारण आज भले ही यह मुद्दा राजनीति और धर्मनिरपेक्षता की आग में फेंक दिया जाये पर वास्तव में यह भविष्य का राजनैतिक और धार्मिक रेखाचित्र खींचता दिखाई दे रहा हैं।


जीवन और मृत्यु का अनुभव


जीवित हुए अथवा मृत्यु को प्राप्त हुए व्यक्तिओं को हम कैसे पहचान सकते हैं ? सामान्य रूप से जो व्यक्ति प्राण धारण किया हुआ है अर्थात् जब तक श्वास-प्रश्वास की क्रिया से युक्त है तब तक उसे हम यह कह देते हैं कि यह व्यक्ति जीवित है। ठीक इसी प्रकार जब श्वास-प्रश्वास की गति रुक जाती है, प्राण छूट जाते हैं, तब हम यह कह देते हैं कि यह व्यक्ति मृत हो गया । यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विचारणीय बिंदु है । यदि हम जीवित रहना चाहते हैं तो इसके ऊपर अवश्य चिन्तन करना चाहिये ।
किसी नीतिकार ने कहा है कि – “स जीवति गुणा यस्य धर्मो यस्य स जीवति। गुणधर्मविहीनो यो निष्फलं तस्य जीवितम् जिसके पास सद्गुण हैं, तथा जिसके पास धर्म है, वही वास्तव में जीवित है। गुण और धर्म- दोनों जिसके पास नहीं है, उसका जीवन निरर्थक है, वह व्यक्ति मरा हुआ है । हमें स्वयं निरीक्षण करके देखना चाहिए कि क्या मैं अच्छे अच्छे गुणों से युक्त हूँ अथवा अपने व्यवहार में धर्माचरण करता हूँ या नहीं ? यदि मेरे अन्दर धैर्य, क्षमा, आदि धर्म के दस लक्षण विद्यमान नहीं हैं, और यदि मैंने अच्छे गुणों का संग्रह भी नहीं किया तो फिर मेरा जीवन व्यर्थ ही है । जब हम इस प्रकार स्वावलोकन करने लग जायेंगे तो निश्चित रूप से हमें विदित हो जायेगा कि हम जीवित हैं अथवा मरे हुए हैं ।

और भी कहा गया है कि – “आत्मार्थं जीवलोकेSस्मिन्को न जीवति मानवः | परं परोपकारार्थं यो जीवति सः जीवति |” अर्थात् इस संसार में अपने स्वार्थ के लिए अपना ही कल्याण करने के लिए कौन व्यक्ति प्रवृत्त नहीं होता ? अर्थात् सभी मनुष्य अपने ही प्रयोजन सिद्ध करने हेतु जीवित रहते हैं, इस प्रकार के जीवन का कोई महत्व नहीं है, उसको जीवित रहना नहीं कहा जा सकता, परन्तु जो व्यक्ति अपना स्वार्थ छोड़कर दूसरे के कल्याण हेतु, परोपकार के लिए, प्रयत्नशील रहता है वास्तव में उसी का जीवन ही सार्थक है उसी को कहा जा सकता है कि यह व्यक्ति जीवित है । जो व्यक्ति न अपने समाज के लिए और न ही राष्ट्र की उन्नति के लिए अपना तन-मन-धन समर्पित करता है, ऐसे व्यक्ति को कभी भी जीवित नहीं कहा जा सकता ।
अब आइये देखते हैं कि वेद क्या कहता है इस विषय में – “यस्य छायामृतं यस्य मृत्यु: कस्मै देवाय हविषा विधेमअर्थात् जो ईश्वर हमें आत्मबल का देने वाला है, समस्त संसार जिसकी उपासना करता है, और विद्वान् लोग जिसके अनुशासन का पालन करते हैं, जिसने समग्र सृष्टि की रचना की, पालन कर रहा और समयानुसार विनाश भी करता है, उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करना, उसी ईश्वर के सान्निध्य में रहना, शरण में जाना ही अमृतत्व है अर्थात् जो व्यक्ति सदा ईश्वर के सानिध्य में रहता, उसी का ध्यान उपासना करता, उसी की छाया में उसके आज्ञाओं का पालन करता, वास्तव में वही व्यक्ति जीवित है और जो व्यक्ति इसके विपरीत ईश्वर की छाया में नहीं रहता, उसके आज्ञाओं का परिपालन नहीं करता, ईश्वर की भक्ति या उपासना नहीं करता, ईश्वर का यह निर्देश है कि वास्तव में वह व्यक्ति जीवित है ही नहीं बल्कि वह मरा हुआ है, उसकी मृत्यु हो गयी है, ऐसा समझना चाहिए ।
हम प्रायः प्रातःकाल उठते हैं और सबसे पहले यह अनुभव करते हैं कि मैं जीवित हूँ क्योंकि मैं देख पा रहा हूँ, सुन रहा हूँ, बोल पा रहा हूँ, खाना खा रहा हूँ, पानी पी रहा हूँ, समस्त क्रियाओं को करने में समर्थ हो पा रहा हूँ और मुख्यतः मैं श्वास-प्रश्वास ले रहा हूँ और छोड़ रहा हूँ, प्राणधारण किया हुआ हूँ, अतः जीवित हूँ । परन्तु यह भूल जाते हैं कि मैं वास्तव में जीवित हूँ या मरा हुआ हूँ । केवल खाते-पीते रहने मात्र से, प्राण-धारण किये हुए होने मात्र से ही यह सिद्ध नहीं होता कि मैं सही अर्थ में जीवन व्यतीत कर रहा हूँ ।
मेरे जीवन में यदि प्रतिदिन सत्य, न्याय, परोपकार, सरलता, विनम्रता, दया, आदि कुछ उत्तम गुणों का संग्रह कर पा रहा हूँ और झूठ, छल-कपट, इर्ष्या, द्वेष, क्रोध, आदि कुछ दुर्गुणों का या दोषों का परित्याग भी कर पा रहा हूँ तो मैं वास्तव में जीवित हूँ । इसके विपरीत यदि मैं दोषों को ग्रहण करता जाता हूँ किन्तु गुणों को अपनाने में समर्थ नहीं हो पाता हूँ तो मैं जीवित नहीं हूँ, मरा हुआ हूँ । इस जीवन का मुख्य लक्ष्य है जीवन में ज्ञान, वैराग्य तथा आध्यात्मिकता हो और उससे फिर सुख-शान्ति, आनन्द, उत्साह, दया, परोपकार आदि गुणों का विकास हो। समाधि की प्राप्ति हो, आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार हो, सभी क्लेशों का विनाश हो और हम मोक्ष के अधिकारी बन जायें । यदि हमारी प्रत्येक क्रिया हमारे जीवन के उद्देश्य की पूर्ति में सहायक नहीं हो रही है और हम अपने लक्ष्य की और आगे नहीं बढ़ रहे हैं, तो हमारा जीवन व्यर्थ ही है, हमारा जीना जीना नहीं किन्तु मृत्यु के समान ही है । इस विषय में स्वयं निर्णय कर सकते हैं कि हमारी क्या स्थिति है ?

यदि आतंकी धरती के बेटे है तो देश सैनिक क्या हैं?


कई रोज पहले वर्ष 2010 सिविल सेवा परीक्षा में देशभर में अव्वल रहने वाले पहले कश्मीरी आईएएस अधिकारी शाह फैसल ने कश्मीर में कथित रूप से लगातार हो रही हत्याओं और भारतीय मुसलमानों के हाशिये पर होने का आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया। इसके बाद जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा ने बयान देते हुए कहा कि आतंकी धरती के बेटे हैं और इन्हें बचाने की कोशिश करनी चाहिए, वह हमारी धरोहर हैं। इसके बाद भी यदि कोई यह जानना चाहता हो कि आतंक का कोई धर्म होता हैं? तो जवाब होगा नहीं। आतंकवादी आतंकवादी होता है। आतंकवादी का कोई धर्म, जाति नहीं होती और वह पूरी तरह मानवता का दुश्मन होता है। और ये मीडिया के सामने दिया जाना वाला वह बयान है जिसे एक नेता राजनीति में प्रवेश करने से पहले रट लेता है।

हालाँकि अपनी राजनीति चमकाने के लिए इस तरह का यह कोई पहला बयान नहीं है। सत्ता की कुर्सी पाने को लालायित जीभ अक्सर ऐसे बयान देती रही हैं। सितंबर 2008 को दिल्ली के जामिया नगर इलाके में इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादियों के खिलाफ की गयी मुठभेड़ जिसमें दो संदिग्ध आतंकवादी आतिफ अमीन और मोहम्मद साजिद मारे गए, इस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस निरीक्षक मोहन चंद शर्मा भी शहीद हुए किन्तु देश में व्यापक रूप से विरोध प्रदर्शन किया गया। सपा, बसपा जैसे कई राजनीतिक दलों ने संसद में मुठभेड़ की न्यायिक जांच करने की मांग उठाई। यहाँ तक भी सुनने को मिला था कि तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी आतंकियों की मौत की खबर सुनकर रोने लगी थी।

मोहन चंद शर्मा के बलिदान को भुला दिया गया और देश की राजनीति से स्वर फूटते रहे कि आतंक का कोई मजहब नहीं। आतंकवादी सिर्फ आतंकवादी होता है, उसकी कोई भाषा नहीं होती। किन्तु फिर बारी आई लोकतंत्र के मंदिर संसद भवन पर हमले के आरोपी आतंकी अफजल गुरु को फांसी देने की तो अचानक फिर राजनीति ने करवट ली और कम्युनिष्ट दलों को अफजल में वोट बेंक दिखाई दिया। वामपंथी लेखिका अरुंधती राय ने तो अफजल गुरु को मासूम बताने में पूरी पुस्तक लिख दी, जिसमें कहा कि अफजल को जेल में तरह-तरह की यातनाएं दी गयी। उन्हें पीटा गया, बिजली के झटके दिए गये, ब्लैकमेल किया गया और अंत में अफजल गुरू को अति-गोपनीय तरीके से फांसी पर लटका दिया गया। यही नहीं यह तक कहा गया कि उनका नश्वर शरीर भारत सरकार की हिरासत में है और अपने वतन वापसी का इंतजार कर रहा है।

इस घटना के बाद कुछ समय शांति रही फिर बारी आई जून 2004 को अहमदाबाद में एक मुठभेड़ होती हैं जिसमें लश्कर ए तैयबा के आतंकी इशरत जहां और उसके तीन साथी जावेद शेख, अमजद अली और जीशान जौहर मारे गए थे। जब इस मुठभेड़ का जिन्न बाहर आया तो बिहार राज्य के मुख्यमंत्री ने तो उन्हें बिहार की बेटी तक बता डाला. इशरत के नाम पर एक एंबुलेंस भी चलाई जाती है, जिस पर शहीद इशरत जहां लिखा होता है। जबकि मुंबई विस्फोट मामले के आरोपी डेविड हेडली ने पुष्टि कर दी थी कि इशरत जहां आतंकवादी थी। लश्कर ए तैयबा की वेबसाइट पर भी उसकी मौत पर मातम मनाया गया था। किन्तु इसके बाद भी आतंक अपनी और राजनीति अपनी चाले चलती रही।

घड़ी की सुई एक बार फिर आगे बढती है अब बारी आती है आतंकी याकूब मेमन की फांसी की। वह याकूब जो 1993 का मुंबई हमले में शामिल था और जिसमें 250 से ज्यादा लोग मारे गए थे। बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए थे। देश की आन्तरिक सुरक्षा चरमरा गयी थी और देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई खौफ के साये में सिमट गयी थी। किन्तु जब इस हत्यारे की फांसी की बात आई तो आंतक के मजहब से अनजान नेता अभिनेता और कथित सामाजिक कार्यकर्ता सामने आकर रोने लगते हैं। यहाँ तक कि 40 लोगों द्वारा राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर याकूब की फांसी रोकने की अपील तक की जाती हैं। चिट्ठी में फिल्म निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट, अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, स्वामी अग्निवेश, बीजेपी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा के अलावा जाने-माने वकील तथा सांसद राम जेठमलानी, वृंदा करात, प्रकाश करात और सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी आदि दस्तखत कर रात भर सर्वोच्च न्यायलय में सुनवाई कराते हैं।

समय फिर गति से आगे बढ़ता है राजनेताओं के बयान आतंक और मजहब को लेकर वोट की रोटी सेंकते है। अचानक सेना को बड़ी कामयाबी तब मिलती है जब वह हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादी कमांडर बुरहान वानी को मार गिराती है। घाटी में आक्रोश उठता है और उस आक्रोश को देश में बैठे कथित बुद्धिजीवी और राजनेता हवा देने लगते हैं। इस बार भारतीय सेना के मनोबल पर पहली चोट करती हुई सीपीएम कार्यकर्ता कविता कृष्णन बुरहान के एनकाउंटर को शर्मनाक बताती हुई कहती है जो मरा है उस पर बाद में चर्चा होगी,  लेकिन कोई बुरहान के एनकाउंटर की जांच जरूर होनी चाहिए। यही नहीं दिल्ली में एक युवा छात्र नेता उमर खालिद ने अपने फेसबुक अकाउंट पर बुरहान कि तुलना लैटिन अमेरिकी क्रांतिकारी चे ग्वेरा से करता है तो देश का एक बड़ा पत्रकार राजदीप सर-देसाई बुरहान वानी की तुलना अमर शहीद भगत सिंह से करने लगता हैं।

शायद इन सब कारणों से ही सुरेश चाहवान यह सवाल पूछने को मजबूर हुए कि कोई मुठभेड़ शुरू होती है तो आतंकी व सुरक्षा बल आमने-सामने होते हैं। उस समय कोई कुछ भी नहीं कर सकता है। सत्ता पाने के लिए महबूबा ने तो आतंकियों को धरती पुत्र करार दिया है लेकिन यहाँ सवाल यह खड़ा होता है कि हिंदुस्तान तथा हिंदुस्तान के सैनिकों को अपना दुश्मन मानने वाले आतंकी अगर धरती के बेटे हैं तो देश के लिए बलिदान देने वाले सैनिक क्या हैं?