Wednesday, 7 February 2018

विद्या प्राप्ति के उपाय


चतुर्भिः च प्रकारैः विद्या उपयुक्ता भवति आगमकालेन स्वाध्यायकालेन प्रवचनकालेन व्यवहारकालेन इति (महाभाष्य.) अर्थात् चार प्रकार से विद्या आती है, आगम काल, स्वाध्याय काल, प्रवचन काल और व्यवहार काल के माध्यम से ।

आगम काल :- श्रवण काल को ही आगम काल कहते हैं, अर्थात् जब अध्यापक, गुरु, आचार्य विद्यादान कर रहे हों, पढ़ा रहे हों, प्रवचन कर रहे हों तो अपने मन को श्रोत्रेन्द्रिय कान के साथ और कान को अध्यापक के शब्दों के साथ संयुक्त करे तथा उन शब्दों को अर्थ सहित मन में संचित करते जाये, इसी को आगम काल कहा जाता है ।
स्वाध्याय काल :- जब हम गुरु जी से पढ़ लेते हैं, उसके पश्चात् उस पढ़ी हुई विद्या को स्वयं आवृत्ति करें, विचार करें, चिन्तन करें तो इसी को स्वाध्याय काल कहा जाता है । श्रवण चतुष्टय के अन्तर्गत यह दूसरा ‘मनन’ कहलाता है ।
प्रवचन काल :- गुरु जी के मुख से पढ़ी हुई विद्या को अच्छी प्रकार श्रवण करके, उसको पुनः अच्छी प्रकार चिन्तन-मनन पूर्वक सत्यासत्य का निर्णय करके उस विद्या को दूसरों के उपकार या लाभ के लिए उपदेश करना या पढ़ाना है उसको प्रवचन काल कहा जाता है ।
व्यवहार काल :- जब तीनों स्तर को पार कर लेते हैं अर्थात् विद्या को भलीभांति सुनते हैं, चिंतन-मनन करते हैं, दूसरों के कल्याण हेतु उस विद्या को पढ़ाते, प्रवचन करते हैं तो उसके पश्चात् सबसे अंत में बताया गया है कि उस विद्या को अपने जीवन व्यवहार में उतार लेना ही व्यवहार काल कहलाता है ।
इन चारों को श्रवण चतुष्टय के नाम से अर्थात् क्रमशः श्रवण, मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार भी कहते हैं ।
इस विद्या प्राप्ति के चार उपायों को एक दृष्टान्त के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे ।
एक आचार्य ने पहले दिन अपने शिष्यों को उपदेश किया, पाठ पढाया, कि ‘सत्य बोलना चाहिए’ । गुरूजी ने आदेश भी दिया कि इस पाठ को याद (कंठस्थ) करके ले आना । अगले दिन सभी शिष्यों ने उस पाठ को कंठस्थ करके गुरु जी को सुना दिया कि ‘सत्य बोलना चाहिए’ । इसी प्रकार दूसरे दिन आचार्य ने पाठ पढाया कि ‘क्रोध नहीं करना चाहिए’ और यह आदेश दिया कि इस पाठ को भी याद करके ले आना । अगले दिन भी सभी विद्यार्थी कक्षा में पहुँच गए और एक के बाद एक अपना कंठस्थ किया हुआ पाठ सुनाने लगे ।
उनमें से एक विद्यार्थी ने कहा कि ‘गुरु जी मुझे पाठ याद नहीं हुआ’ । गुरु जी ने कहा ‘कोई बात नहीं कल याद करके सुना देना’ । अगले दिन भी यही स्थिति रही, विद्यार्थी ने कहा कि ‘आज भी मुझे पाठ याद नहीं हुआ’ । फिर गुरु जी ने कहा कि एक छोटा सा वाक्य याद नहीं हो रहा है ?तुम्हारे सभी सहपाठियों ने सुना दिया लेकिन तुम क्यों नहीं सुना पा रहे हो ? कल याद करके सुना देना, नहीं तो दण्ड मिलेगा । अगले दिन भी जब वह विद्यार्थी कक्षा में पहुंचा तो उसका उत्तर यही था कि ‘गुरु जी पाठ याद नहीं हुआ’। फिर तो क्या था गुरु जी ने डंडे मंगवाये और उस विद्यार्थी को खूब ताड़ना की, तभी उस विद्यार्थी ने कहा कि ‘गुरु जी अभी मुझे पाठ याद हो गया’ ।
गुरु जी ने पूछा कि अबतक तो याद नहीं हुआ था फिर डंडे खाने से कैसे याद हो गया ? तभी उस विद्यार्थी ने कहा कि ‘गुरु जी ! आपने पहले यह भी बताया था कि विद्या चार प्रकार से आती है, श्रवण, मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार इसका दूसरा नाम है आगम, स्वाध्याय, प्रवचन और व्यवहार काल, अतः आपने जो पढाया कि ‘क्रोध नहीं करना चाहिए’ तो उसको मैंने ध्यान से सुन भी लिया, फिर चिंतन-मनन भी कर लिया, अपने सहपाठियों को भी पढ़ा दिया या उपदेश कर दिया परन्तु यह पाठ मेरे व्यवहार में अबतक नहीं आया था, जब आपने मुझे दण्ड दिया फिर भी मेरे मन में कोई क्रोध उत्पन्न नहीं हुआ, तो इससे मुझे पता चला कि मुझे पाठ पूरी तरह याद हो गया ।
इस दृष्टान्त से हम समझ सकते हैं कि विद्या किस प्रकार चार उपायों से प्राप्त की जाती है ? पहले सुनें, उसको स्वयं पढ़ें, फिर दूसरों को पढ़ायें और अपने व्यवहार में भी उतारें, तभी मान सकते हैं कि हमें वह विद्या अच्छी प्रकार अथवा पूर्णतया आ गयी ।
जब हम गुरु जी से पढ़ते हैं अर्थात् आगम काल को पूर्ण करते हैं तब हमें केवल (10%) दस प्रतिशत ही विद्या आती है । जब हम स्वाध्याय काल को पूरा करते हैं तब हमें (20%) बीस प्रतिशत विद्या प्राप्त होती है अर्थात् प्रथम चरण और दूसरे चरण का मिला कर 30% तीस प्रतिशत विद्या प्राप्त हो जाती है । जब हम प्रवचन काल को पूरा करते हैं तब हमें (30%) तीस प्रतिशत विद्या प्राप्त होती है अर्थात् दो चरण का 30 और तृतीय चरण का 30 मिलाकर (60%) साठ प्रतिशत विद्या मिल जाती है । इस प्रकार जब हम चौथे चरण में पहुँच जाते हैं और विद्या को अपने जीवन व्यवहार में उतार लेते हैं तो विद्या (40%) चालीस प्रतिशत प्राप्त हो जाती है अर्थात् पूर्व के 60 और इस चौथे चरण का 40 मिलाकर 100% विद्या प्राप्त हो जाती है । इसका तात्पर्य यह हुआ कि जब हम व्यवहार में उस विद्या को उतार लेते हैं तभी हमें 100% विद्या प्राप्त होती है ।
30%
 
आगम काल – 10%            
60%
 
स्वाध्याय काल – 20%
100%
 
प्रवचन काल – 30%
व्यवहार काल – 40%
 

कुलयोग –  100%  
यदि हम 100% विद्या प्राप्त करना चाहते हैं तो उस पढ़ी-सुनी हुई विद्या को हमें आगे के स्तर में ले जाते हुए व्यवहार काल में पहुंचना होता है अन्यथा यदि केवल हम सुन कर के ही छोड़ देते हैं तो 10% विद्या ही रह जाती है । जब हम किसी विद्या को पढ़ते हैं तो वह तब तक सार्थक नहीं होती जब तक कि हम उसे अपने जीवन में, अपने व्यवहार में उतार नहीं लेते अतः हमारा कर्तव्य है कि हम इस विद्या प्राप्ति के चार उपायों व स्वरुपों को ठीक ठीक समझें और अच्छी प्रकार से विद्या प्राप्ति कर जीवन को सुख-शान्ति से युक्त करें ।   

 लेख-आचार्य नवीन केवली 

बलिदानियो की परंपरा में छोटा सा इतिहास हमारा "


यह आर्यसमाज के लिए गौरव है कि सबसे अधिक देश , धर्म पर बलिदानी आर्यसमाज से प्रेरित थे , मेरा शाहजहांपुर भी आर्यसमाज के तेज से अछूता नही रहा और बलिदानियो की नगरी बनने का सौभाग्य प्राप्त किया । 
विशेषकर वर्तमान में जो तिथियां चल रही है वह महान बलिदानों की गवाह है । 
आज के दिन ही  ( ब्रम्हचारी ब्रम्हदत्त ) ने बलिदानी परम्परा का निर्वहन किया था । 
एक थे ब्रह्मदत्त .....


उनके समकालीन उन्हे सुखदेव बुलाते थे .. 
प्रतिभा के विलक्षण , साहसी प्रवृति और ऋषिवरदेवदयानंद के सच्चे सैनिक 
बात उनके अंतिम व सोलहवे बंसत की करते है 
स्थान गुरुकुल महाविद्यालय रुद्रपुर था समय ब्रह्ममुहुर्त का था अग्निहोत्र विधिवत सम्पन्न कराया लेकिन आज की यज्ञीय व्यवस्था अन्य दिनो की अपेक्षा भिन्न व आकर्षक थी क्योकि यह यज्ञ उनका अंतिम यज्ञ था इसके उपरान्त तो इन्हे घृत सामग्री की भाँति अपने जीवन की हवि पक्षियो के परित्राण के लिए बलिदान यज्ञ मे समर्पित करनी थी गुरुकुलीय छात्रो को स्वाध्याय हेतु बिठाकर एकान्त प्रदेश मे वे अध्ययन के लिए बैठना चाहते थे कि गुरुकुल के विशाल सरोवर के किनारे मनुष्य की अस्पष्ट आकृति कुहरे मे दिखाई पङी , कौन है ? कैसे है ? क्या है ? कि जिज्ञासा ने कर्तव्य निर्वाह के लिए प्रेरित किया वह देवदयानंद का सैनिक अकर्मण्य बन भला कैसे बैठसकता था पास जाकर देखा एक आखेटक अपनी बन्दूक लिए पक्षियो को निशाना बना रहा था( जानकारी के लिए बता दू गुरुकुल मे पक्षी विहार था जहा प्रतिवर्ष असंख्य विदेशी पक्षी आते थे ) तत्काल प्रतिकार के ध्येय से अनुरोध पूर्ण वे बोले कि ये आश्रम है पक्षी विदेशी है इन्हे मारना जघन्य अपराध होगा अतः आप तत्काल चले जाओ , मुस्लिम आखेटक ने अनसुना कर बाधक न बनने को कहा अन्यथा मे तुम भी मारे जाओगे ...,
वह षोडश वर्षीय नवयुवा इस गीदङ भभकी से भयभीत होने वाला कहा और बोले " खबरदार जो मेरे रहते इन विदेशी पक्षियो पर फायर किया " 
पर उस क्रूर आततायी का हूदय परिवर्तन होने के स्थान पर मात्र लक्ष्य ही परिवर्तित हुआ अब लक्ष्य पक्षी नही ब्रह्मचारी ब्रह्मदत्त था और पहला प्राण घातक फायर कर दिया जब उनको शौर्य पराक्रम की खुली चुनौती दी जाने लगी तो उन्होने पक्षियो की प्राणार्पण से रक्षा करना ही वीरोचित कर्तव्य लगा सो निश्चय कर लिया अब तो किसी भी मूल्य पर पक्षियो की हत्या नही होने दूगा उस आत्मबल के धनी अदम्य साहसी ब्रह्मचारी ने निहत्थे व घायल होते हुए भी आततायी को भगाना चाहा पर आततायी ने कुछ दूर जाकर दूसरा फायर भी कर लिया जो हृदय विदीर्ण कर गया रक्तधारा ने परिधान व भूमि को रंजित कर दिया इतना सबकुछ होते हुये भी कोई व्यथा कथा नही और अपने बङे भाई (मेरे पिता जी ) की गोदमे "ओ3म् " ध्वनि कर जाचुके थे एक असीम और हृदय विदारक माहौल चहुओर करुणा विलाप की ध्वनिया पर ब्रह्मदत्त तो अपने पार्थिव शरीर से असंख्य पक्षियो की जीवन रक्षा करके कर्तव्य निर्वाह का पाठ पूरा कर चुके थे .....22 दिसम्बर के दिन मात्र 16 वर्ष की अवस्था मे ही

......है लिए हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर,
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर.
हाथ, जिन में है जूनून, कटते नही तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से.
और भड़केगा जो शोला सा हमारे दिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.......



शिक्षा और विद्या


भौतिक उन्नति प्रगति, विकास और ज्ञान का सम्बन्ध शिक्षा से है। शिक्षा अक्षर ज्ञान, पुस्तकीय ज्ञान, सूचना संग्रह, अच्छे नम्बर और डिग्रियों तक सीमित है। शिक्षा शारीरिक सुख भोगों तक सीमित है। विद्या आत्मिक उन्नति परमात्म-चिन्तन और जीवन को श्रेष्ठ एवं पवित्र बनाती है। जीवन में धार्मिकता, आधुनिकता, नैतिकता, सदाचार शिष्टाचार आदि की भावना जाग्रत करती है। विद्या सुखी नीरोगी प्रसन्नता जीवन की कुंजी कहलाती है तभी कहा है, ‘‘विद्वाविहीनः पशुभिः समानः’’ विद्या हीन व्यक्ति पशु के समान होता है। विद्या से ही व्यक्ति विद्वान बनता है। शिक्षा से तरह-तरह का ज्ञान तो एकत्र हो जायगा, मगर सच्चे अर्थ में आत्मज्ञानी तथा विद्वान नहीं हो सकता है।


भारत सदा से विद्या का उपासक रहा है। यूरोप ने शिक्षा के क्षेत्र में बहुत उन्नति की है। मगर जीवन से विद्या और परमार्थ विद्या में पिछड़ गया। विद्या से ही मनुष्य सच्चे अर्थ में मानव बनता तथा कहलाता है। शास्त्र कहते हैं- ‘‘विद्या सा या विमुक्तये’’, सच्ची विद्या वह है जो हमें वचनों, बुराईयों, दोषों एवं अवगुणों से छुड़ाए। हमारे अन्दर प्रभुता से हटकर देवत्व की भावना जाग्रत करें। जो हमें जीवन का सत्य स्वरूप और सन्मार्ग बताए। सच्ची विद्या का पढ़ना-समझना जीवन का असली स्लेबस है। आज स्कूलों, कालेजों एवं विश्वविद्यालयों में भौतिक ज्ञान व शिक्षा पर तो पूरा समय, शक्ति, धन लगाया जा रहा है। जीवन की असली आत्मपरमात्म विद्या पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। उसी का परिणाम है कि आदमी सच्चे अर्थ में इन्सान नहीं बन पा रहा है। जिसमें इन्सानियत, मनुष्योचित, गुण, कर्म, स्वभाव और आकर्षण हो।

‘‘विद्या धर्मेण शोभते’’ विद्या धर्म से बढ़ती, फलती-फूलती और शोभा प्राप्त होती है। विद्या से ही जीवन में आर्ट ऑफ लिविंग की कला आती है। जीवन में यदि जीवन नहीं तो चाहे कितना भी भौतिक ज्ञान, सुख-साधन, भोग पदार्थ एकत्र कर लें तब भी जीवन अपूर्ण तथा अधूरा ही रहता है। शिक्षा स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग को बढ़ाती है और विद्या स्टैंडर्ड ऑफ लाईफ को ऊंचा ले जाती है। विद्या धर्म युक्त जीवन जीते हुए धर्म अर्थ काम मोक्ष तक ले जाती है। यही जीवन का सत्य लक्ष्य है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वर्तमान भौतिक शिक्षा में कुछ पढ़ाया और बताया नहीं जा रहा है। इसलिए वर्तमान शिक्षा विद्या से रहित अधूरी है।

 वेद का सन्देश विद्या च अविद्या, च अविद्यो च’’ भौतिक ज्ञान के साथ मात्र आध्यात्म विद्या दोनों का समन्वय करके चलो तभी जीवन-जगत में सुख-शान्ति प्रसन्नता विश्वबन्धुत्व की भावना बनेगी। उपनिषद भी कहते हैं विद्यया अमृतं अश्नुते’’ विद्या से अमृतत्व ;आनन्दद्ध की प्राप्ति संभव है। शिक्षा से भौतिक सुख भोग पदार्थ तो मिल जायेंगे, मगर सच्चा आत्म आनन्द नहीं मिलेगा। सच्चे आनन्द के खजाने का ताला तो आत्मविद्या की कुंजी से ही खुलेगा। जीवन जगत को जितनी भौतिक भिक्षा ;ज्ञानद्ध की जरूरत है, उतनी ही आत्म विद्या की भी आवश्यकता है। तभी वर्तमान समस्याओं, उलझनों, विवादों, दुःखों, कष्टों अशान्ति आदि का समाधान संभव है। आज शिक्षा बढ़ रही है। जीवन की असली विद्या घट रही है। भारत का जीवन-दर्शन रहा है शिक्षा-विद्या, भोग योग, भौतिकता आध्यात्मिकता, शरीर-आत्मा, प्रकृति परमात्मा आदि का सन्तुलन एवं समन्वय करके चलो। तभी जीवन-जगत सन्मार्ग की ओर प्रेरित रहेगा। भारतीय शिक्षा दर्शन में विद्यार्थी और विद्यालय बोला जाता है। जिसका सीधा सम्बन्ध विद्या के साथ है, न कि शिक्षा के साथ है। शिक्षा का सम्बन्ध इहलोक के साथ है और विद्या का सम्बन्ध इह श्रेष्ठ जीवन तथा परलोक दोनों के साथ है। आर्य समाज डॉ महेश विद्यालंकार



मुसलमानों को बनाने दें दूसरा मुल्क


कहते हैं एक इन्सान के सोचने का ढंग उसका पारिवारिक परिवेश तय करता है या फिर स्कूल में मिली शिक्षा, या फिर उसके धर्म ग्रन्थ। अगर इन सभी जगह अलगाव और नफरत की शिक्षा मिल रही हो तो स्वाभाविक है इन्सान अलगाववादी ही होगा। हाल ही में मुस्लिम पर्सनल बोर्ड के उपाध्यक्ष और डिप्टी ग्रैण्ड मुफ्ती नासिर उल इस्लाम का कहना है कि समय आ गया है कि हिन्दुस्तान में रहने वाले मुसलमान अपने लिए अलग देश की मांग करें। जो लोग कहते हैं कि यह देश हिन्दुओं के लिए है तो फिर ठीक है। हिन्दुस्तान का एक और हिस्सा कर दीजिए और हिन्दुस्तान के मुसलमानों को एक और मुल्क बनाने दीजिए। मुफ्ती नासिर यही नहीं रुके उन्होंने आगे कहा कि ‘‘जो फैसला उस समय मुसलमानों ने लिया वह सही फैसला था। हिन्दुस्तान में उनके लिए कोई जगह नहीं है किसी भी जगह उनकी नुमाइंदगी नहीं है। उनका कहना था, उस समय सिर्फ 17 करोड़ मुसलमानों ने पाकिस्तान बनाया। अगर हिन्दुस्तान में मुसलमानों की हालत ऐसी ही रही तो फिर आज 20 करोड़ मुसलमान दूसरा देश क्यों नहीं बना सकते


हालाँकि मुफ्ती नासिर के इस बयान का खण्डन करते हुए पीडीपी के नेता और मंत्री चौधरी जुल्फिकार अली ने कहा कि ये बयान उनकी निजी सोच हो सकती है। उनका कहना था कि हिन्दुस्तान को बनाने में मुसलमानों का भी हाथ है और यह देश जितना दूसरों का है उतना ही मुसलमानों का भी है। साथ ही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के राज्य सचिव और विधायक यूसुफ तारिगामी ने मुफ्ती नासिर के बयान पर टिप्पणी करते हुए कहा कि उनका बयान गैर-जिम्मेदाराना है। उनका कहना था, ‘‘मैं ऐसे लोगों से एक सवाल पूछना चाहता हूं कि 70 साल पहले पाकिस्तान नाम का एक अलग देश वजूद में आया। धर्म की बुनियाद पर एक अलग देश बनने से मसले कम हुए या और भी पेचीदगियां पैदा हुईं?’’ 

पूरे बयान में मुफ्ती नासिर की एक बात सबके समझ से परे है कि जो फैसला उस समय मुसलमानों ने लिया वह सही फैसला था। हिन्दुस्तान में उनके लिए कोई जगह नहीं है। उन्होंने 1947 के फैसले को जायज ठहराते हुए ये बात कही। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि जो फैसला उनके लीडरों ने लिया उन्होंने उसका पालन क्यों नहीं किया?

असल में यह एक गंभीर प्रसंग है जिसे अधिसंख्य मुसलमान मन ही मन लेकर जीता है। नवम्बर 1990 में नेशनल रिव्यू नाम की एक संस्था ने मुसलमानों के भय के कुछ कारणों को गिनाया था। उन्होंने लिखा था कि  मुसलमान हजार वर्षों में एक ही अवसाद की स्थिति से गुजर रहे हैं, लड़ाई लड़ी, धर्म प्रचार किया। लोगों को धर्मान्तरित किया। अपनी संख्या बढाई। किन्तु हर बार स्वयं को बिना किसी ज्ञात कारण के सबसे नीचे के पायदान पर पाया। मुस्लिम देशों के पास सबसे अधिक कट्टरपंथी हैं और विश्व के सबसे कम लोकतंत्र। केवल तुर्की ;और कुछ अवसरों पर पाकिस्तान ही पूरी तरह लोकतांत्रिक है। परन्तु वह व्यवस्था भी काफी कमजोर है। अन्य सभी स्थानों पर सरकार के मुखिया ने जबरन सत्ता प्राप्त की है फिर वह स्वयं अपने द्वारा हो या अन्य के माध्यम से इन समस्याओं के बाद यह तर्क सही ठहराया जा सकता है कि मुसलमान ही मुसलमान के सबसे बडे शत्रु हैं।


हमेशा की तरह पिछला इतिहास यही कहता है कि पहले अपने लोगों को मजहब के नीचे एकत्र करो जनसँख्या का अनुपात बढ़ाओ और फिर नये देश की मांग करो। लेकिन इसके बाद क्या करना है इस विषय से लगभग समूचा इस्लाम अछूता सा दीखता है। वरना 50 से अधिक मुल्कों में कहीं भी लोकतंत्र और आधुनिकता को नकारना यही सवाल क्या मुस्लिम समाज की बोद्धिक शक्ति पर खड़ा नहीं होता?

जब मुफ्ती नासिर इस्लाम के नाम पर अलग देश की मांग कर रहे थे उसी दौरान अफगानिस्तान में इस्लाम के नाम पर दक्षिणी यमन के अदन शहर में अलगाववादियों ने सरकारी इमारतों पर कब्जा कर लिया था। यहां राष्ट्रपति अब्दरब्बुह मंसूर हादी की सेनाओं और अलगावादियों के बीच संघर्ष चल रहा था। ठीक इसी समय अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में हुए आत्मघाती हमले में 100  लोग मारे गये जबकि 158 अन्य घायल हुए। तो तुर्की के लड़ाकू विमानों ने सीरिया के एक हिस्से पर यह कहकर बमबारी शुरू की कि हम अकेले नहीं हैं, अल्लाह हमारे साथ है और हम अपने अभियान में जल्द ही सफल होंगे। इस्लाम के नाम पर बने देश पाकिस्तान का हाल किसी से छिपा नहीं है। ये सभी उदाहरण वर्तमान समय के हैं न कि ऐतिहासिक। इसमें गौर करने वाली बात यह है कि मुफ्ती नासिर ने कहा भारत में इस्लाम सुरक्षित नहीं है तो मुफ्ती नासिर यह जरूर बतायें कि किस इस्लामिक देश में मुसलमान सुरक्षित है?


यमन तबाह, लीबिया तबाह, इराक तबाह, सीरिया का हाल सबके सामने है। इसके बाद अफगानिस्तान को ले लीजिये अकेले जनवरी माह में इस्लाम के नाम पर सेंकड़ां लोग मारे गये। ईरान में मुल्ला मौलवियों की सत्ता के खिलाफ लोग सड़कों पर हैं। कश्मीर में तो मुसलमान बहुसंख्यक हैं कई जिलों में तो अन्य मत के लोग न के बराबर हैं वहां इस्लाम भी है, मस्जिद भी। सभी अधिकार उनके हाथों में है क्या वहां शांति है? यूरोप से अमेरिका तक नाइजीरिया से लेकर अदन तक हर जगह हाहाकार मची है। क्या यह सभी उपरोक्त उदाहरण मुफ्ती नासिर के लिए काफी नहीं हैं? शायद नासिर मुफ्ती के इस बयान के बाद उन तमाम तथाकथित नकली धर्मनिरपेक्ष समाज को सच का आईना देखने को मिला है जिन्होंने भारत के बंटवारे का बेहद आधारहीन आरोप हिन्दूवादी सोच पर अब तक थोपने का कुत्सित प्रयास किया था। नासिर मुफ्ती के इस बयान के बाद एक बार फिर से धर्मनिरपेक्ष धड़ा पूरी तरह से खामोश है और हिन्दू दलों के छोटे छोटे बयानों को भी ब्रेकिंग बनाने वाले तमाम अन्य लोग भी निष्क्रिय अवस्था में दिख रहे हैं।
-राजीव चौधरी 


चन्द्र ग्रहण था या धन का ग्रहण ?


भारतीय समाचार चैनलों पर ज्योतिष के जानकर और बाबा सुबह-सुबह बैठते हैं वे स्वर्ग से नरक तक के, जीवन से मृत्यु तक के, सारे राज आधा-पौन घंटे में निपटा देते हैं। किस मार्ग से जाना है, किस मार्ग से नहीं। ऐसा कहते हुए उनके चेहरे पर एक आलोकिक आभा दिखाई देने लगती है। तब इन्हें देखकर लगता हैं देश को सरकार नहीं बल्कि ये ज्योतिष शास्त्री ही चला रहे हैं। आज किस रंग के कपड़े पहने, कैसे शुभ सूचना मिलेगी, किस दिशा में जाने से कार्य मंगलमय होंगे। किस यंत्र को घर में रखने से धन के भंडार भर जायेंगे। सब कुछ सुबह सवेरे हाथ मुंह धोने से पहले ही पता चल जाता है। लेकिन 31 जनवरी की शाम को लगभग 4 बजे से समस्त न्यूज चैनलों पर इन सभी की भरमार थी। घटना खगोलीय थी पर जिस तरीके से ये ज्योतिषी आम मनुष्य के जीवन पर उसके परिणाम और प्रभाव बता रहे थे उसे सुनकर लग रहा था आज चंद्रमा किसी खगोलीय घटना से नहीं बल्कि कथित ज्योतिषों से डरकर इधर-उधर छिप गया हो।

हालाँकि विज्ञान कहता है ये स्थिति तब उत्पन्न होती है जब सूर्य, पृथ्वी और चांद लगभग एक सीधी रेखा में आते हैं। इस स्थिति में सूरज की रौशनी चांद तक नहीं पहुंच पाती है और चांद पैनंबरा की तरफ जाता है तो वे हमें धुंधला सा दिखाई देने लगता है। वैज्ञानिक भाषा में पैनंबरा को ही ग्रहण कहा जाता है। दुनिया के लिए भले ही यह घटना अन्तरिक्ष विज्ञान से जुड़ी हो पर भारत के लिए यह किसी धार्मिक उत्सव से कम नहीं होती। लम्बे-लम्बे तिलक लगाये, महंगी-महंगी जैकेट पहने पंडित जी इसका असर बजट की तरह पेश कर रहे थे। बस अंतर इतना था, बजट में उच्च-माध्यम और निम्न वर्ग का ध्यान रखा जाता है यहाँ नाम और राशि के हिसाब से भय बांटा जा रहा था।

बता रहे थे कि पुराणों के अनुसार राहु ग्रह चन्द्रमा और सूर्य के परम शत्रु हैं। जब सागर मंथन से प्राप्त अमृत कलश प्राप्त हुआ तो राहु अमृत पीने के लिए देवताओं की पंक्ति में बैठ गया लेकिन सूर्य और चन्द्रमा के इशारे पर भगवान विष्णु राहु को पहचान गए और अमृत गटकने से पहले ही सुदर्शन चक्र से राहु का गला काट डाला। इस घटना के बाद से ही समय-समय पर राहु चन्द्रमा और सूर्य को खाने की कोशिश करता है लेकिन कभी खा नहीं पाता क्योंकि कटे सिर की वजह से राहु के मुंह में जाकर सूर्य और चन्द्रमा पुनः मुक्त हो जाते हैं। जबकि विज्ञान का मानना है कि जब सूर्य चन्द्र के मध्य पृथ्वी आ जाती है तो चन्द्रग्रहण लग जाता है।

आधुनिक ज्योतिष विद्या या लूट विद्या के अनुसार माना जाता है कि ग्रहण का प्रभाव काफी लम्बे समय तक रहता है और इसका प्रभाव कम करने के लिए स्नान, दान और धार्मिक कार्य करने के लिए कहा जाता है। इस दिन किए गए दान-पुण्य से मोक्ष का द्वार खुलता है, साथ ही ये भी बता रहे थे कि दान-पुण्य करने वालों को यह ध्यान रखना चाहिए कि जो भी करना हो वह सुबह 8 बजे से पहले कर लें। कोई सुजीत जी महाराज बता रहे थे कि इस चन्द्र ग्रहण का हर राशि पर अलग प्रभाव होगा। किस राशि के लोगों को कितना दान करना चाहिए वे बता रहे थे फला राशि वाले मंगल से संबंधित द्रव्यों गुड़ और मसूर की दाल का दान करें, इस राशि वाले का धन व्यर्थ व्यय होगा, मानसिक चिंता से बचने के लिए श्री सूक्त का पाठ करें और मंदिर में दिल खोलकर दान करें या इस राशि वाले शिव उपासना करें, ग्रहण के बीज मंत्र का जप करें। वरना रोगों में वृधि होगी, बने काम बिगाड़ जायेंगे, शारारिक कष्ट होगा, संतान सुख नहीं होगा आदि-आदि।

ये लोग हर एक अंधविश्वास फैलाने से पहले यह कहना नहीं भूल रहे थे कि शास्त्रों के दिशानिर्देश के अनुसार ये करना चाहिए वो करना चाहिए। लेकिन ऐसा झूठ और भय फैलाने का कौन सा शास्त्र आज्ञा देता है। वेद में तो ऐसा कुछ नहीं है? न गीता में न किसी उपनिषद में फिर वह कौन सा शास्त्र है? शायद यह इनका काल्पनिक शास्त्र होगा। 
दरअसल हमारी प्राचीन ज्योतिष विद्या समय की गणना का वैज्ञानिक रूप है। जिसकी सराहना करने और समझने के बजाय लोग उसके अन्धविश्वास से भरे व्यापारिक रूप का ज्यादा समर्थन करते हैं। आखिर इस पाखण्ड की शुरुआत कहाँ से हुई? प्राचीन समय में राजा होते थे और राजाओं के बड़े-बड़े राजसी शौक थे, उनका कोई भी कार्य साधारण कैसे हो सकता है तो वे हर कार्य के लिए ज्योतिषियों से शुभ मुहूर्त निकलवाते थे। अब आज के समय में सभी के लिए यह ज्योतिष की सुविधा उपलब्ध है हर चौराहे पर ज्योतिषी उपलब्ध है तो सभी इसका आनंद उठा रहे हैं, आज सभी राजा हैं। लेकिन आज के समय में ज्योतिष विद्या का पूरी तरह से बाजारीकरण हो चुका है अब बहुत से पाखण्डी आपको डरा कर अपना उत्पाद आपको बेच रहे हैं। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार फेयर एण्ड लवली वाले आपको गोरा कर देने का दावा करते हैं।

इस ढोंग का  सबसे बड़ा नुकसान यह है की इंसान यह भूल जाता है कि जीवन, होनी और अनहोनी, सुख और दुःख, कभी अच्छा तो कभी बुरा इन दोनों पहलुओं को लेकर आगे बढ़ता है। दूसरा एक नुकसान यह भी है कि यदि व्यक्ति से कोई गलती हो भी जाए तो वह भाग्य या ग्रहों को दोषी ठहरा देता है बजाय इसके कि वह उस पर आत्ममंथन करके उसके मूल कारण को समझे। जिससे भविष्य में उसी गलती के पुनरावृत्ति होने की सम्भावना बढ़ जाती है। मतलब ऐसे किसी भी नियम को स्थापित करने के पीछे मुख्य रूप से दो बातें प्रभावी होती हैं, पहली-भय और दूसरी-लोभ या लालच। धर्म के नाम इन दोनों बातों का समावेश कर दिया गया है। 

इस सत्य से शायद ही कोई इंकार करे कि हम जब भी किसी संकट में घिर जाते हैं तो अपने से सक्षम का सहारा तलाशते हैं, विशेष रूप से अपने से बड़े का। दैवीय शक्ति की मान्यता के पीछे भी यही उद्देश्य रहा होगा कि जब इन्सान किसी मुसीबत में घिर जाये तो उसका स्मरण करके खुद में एक तरह का विश्वास पैदा कर सके। लेकिन इस मान्यता को भी धार्मिक कर्मकांडियों ने अपनी गिरफ्त में लेकर लोगों के सामने भगवान का भय जगाना शुरू कर दिया। मुसीबतों से बचाने का कारोबार करना शुरू कर दिया। हर समस्या का समाधान निकालना शुरू कर दिया। अशिक्षितों की कौन कहे जब पढ़े-लिखे लोग ही ढ़ोंगियों के चक्कर में फंसकर धर्म को रसातल की ओर ले जाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय द्रष्टि से बनाई गई मान्यताओं को अन्धविश्वास के सहारे पल्लवित-पुष्पित करने लगे। आज हालत ये है कि अधिसंख्यक व्यक्ति या तो घनघोर तरीके से धर्म के कब्जे में हैं। इसके लिए हमें अंध-विश्वास से बाहर आना होगा, अंध-श्रद्धा से बाहर आना होगा, अंध-व्यक्ति से बचना होगा। आने वाली पीढ़ी को उन्नत ज्ञान वेद का मार्ग समझाना होगा वरना अंधविश्वास के इस जाल से न धर्म बचेगा न विज्ञान।
अंधविश्वास निरोधक वर्ष 2018 दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा
-विनय आर्य