Friday, 22 April 2016

नारी शोषण की कुप्रथा है हलाला ?

मुस्लिम समुदाय में महिला यदि अपने लिए किसी अनहोनी से सबसे ज्यादा डरती है तो वो है तलाक, क्योंकि मात्र तीन शब्द उसके हँसते खेलते जीवन में अंधकार ला सकते है। ऐसा भी तो नहीं है कि चलो तलाक बोल दिया अगले दिन सॉरी कह दिया, या भूल सुधार कर ले और मामला टल जाये, नहीं! उसे उसी वक्त पति का घर छोडना पडेगा सोचों वो महिला कहाँ जाएगी? पिछले दिनों अफजल प्रेमी गेंग के लोग उमर खालिद की अगुवाई में जेएनयू के केम्पस में आजादी के नारे लगाये  थे| कह रहे थे कश्मीर में लेंगे आजादी, बन्दुक से लेंगे आजादी, हम लडकर लेंगे आजादी इस प्रकार के देश  विरोधी नारे लगने के बाद भी किसी कट्टरवादी उलेमा की ओर से निंदा आलोचना का कोई बयान नहीं सुनाई दिया। किन्तु अब जैसे ही तीन तलाक जैसी कुरीति से मुस्लिम महिलाओं की आजादी पर देश की सर्वोच्च अदालत में सुनवाई का मामला आया तो उलेमा और अल्पसंख्यक संगठन इसके समर्थन में उतर आये। तो मन में सवाल यह उठा कि मुस्लिम समाज की महिलाओं को आखिर तीन तलाक से कब मिलेगी आजादी?  तीन तलाक पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और सुप्रीम कोर्ट की तकरार के बाद मुस्लिम समाज एक अजीब घालमेल करता नजर आ रहा है।

जब सऊदी अरब और पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम देशों में इस प्रथा पर पाबंदी लगा दी गई है तो भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में इस प्रथा को जारी रखने का क्या तुक है? बस इसलिए कि पुरुष को तो मनमानी का अधिकार है और महिलाओं को कोई अधिकार नहीं है इनका जीवन और भविष्य उनकी जुबान से तीन बार निकलने वाले इस कड़वे शब्द पर ही निर्भर है? क्या महज तीन बार तलाक शब्द के उच्चारण के साथ ही जीवनभर का बंधन टूट जाता है? क्या इस्लाम में महिलाओं का दर्जा, दोयम है? मुसलमानों के धर्मग्रंथ कुरान में किसी पुरुष  को अपनी पत्नी से अरबी भाषा का शब्द “तलाक” तीन बार दोहराकर शादी जैसे जीवन भर के को बंधन तोड़ने का हक बताया गया है| तलाक के बारे में कुरान की आयत के आधार पर हदीसों में इस प्रकार लिखा है, इमाम अल बगवी ने कहा है, यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी से कहे की मैंने तुझे दो तलाक दिए और तीसरा देना चाहता हूँ,  तब भी तलाक वैध मानी जाएगी और विडम्बना देखिये सभी विद्वानों ने इसे जायज बताया है। हमारा उद्देश्य किसी समुदाय विशेष की आस्था पर चोट करना नहीं है| हमने पुराण से लेकर गीता की गलत व्याख्या पर हमेशा  सवाल खडे करते आये है| हम हमेशा मानवीय द्रष्टिकोण अपनाने की पैरवी करते है सब जानते है अब परिस्थिति पहले के अनुरूप नहीं रही इसलिए क्या अब हमें धार्मिक कानून से लेकर बहुत सारी कुरूतियों की पुन: समीक्षा की जरूरत नहीं है? भारत के मुसलमानों में पति फोन, एसएमएस संदेश  यहां तक कि फेसबुक जैसे सोशल मीडिया साइटों तक पर पत्नियों को तलाक देते आए हैं। एक नई रिपोर्ट दिखाती है कि महिलाएं अब इस चलन के खिलाफ आवाज उठाकर उसमें बदलाव लाना चाहती हैं।


अभी पिछले दिनों एक न्यूज चैनल पर पाकिस्तानी मूल के कनाडाई लेखक विचारक तारेक फतेह साहब ने तलाक के बाद हलाला शब्द का जिक्र किया मुझे यह सब बडा दिलचस्प लगने के साथ ही नारी के प्रति एक बडा क्रूर मजाक नजर आया। उन्होंने बताया कि अधिकतर मौलवी, मुल्ला तलाक जैसी प्रथा को क्यों खत्म नहीं चाहते! कई ऐसा बार होता है कि व्यक्ति अपनी पत्नी को तलाक देकर बाद में पछताता है, क्योंकि औरतें गुलामों की तरह काम करती हैं और बच्चे भी पालती हैं| कुछ पढ़ी लिखी औरतें पैसा कमा कर घर भी चलाती है| इसलिए लोग फिर से अपनी औरत चाहते है तलाक शुदा औरत का हलाला करवाकर उसकी घर वापसी करा दी जाती है| हलाला इस तरह होता है, कि पहले तलाकशुदा महिला इद्दत का समय पूरा करे। फिर उसका कहीं और निकाह हो। और उस शोहर के साथ उसके वैवाहिक रिश्ते बनें। इसके बाद वो शोहर अपनी मर्जी से उसे तलाक दे या उसका इंतकाल हो जाए। फिर बीवी इद्दत का समय पूरा करे। तब जाकर वह पहले शोहर से फिर से निकाह कर सकती है। सबसे शर्मनाक यह कि हलाला करवाने वाली औरत को किसी दूसरे व्यक्ति के साथ हमबिस्तर होने का सबूत भी प्रस्तुत करना जरूरी होता है तो फिर ऐसे व्यक्ति को खोजना होता है, जो बाद में उसे तलाक भी दे दे, तभी वह औरत अपने पहले पति के पास जा सकती है| इसके लिए काजी मौलवी सबसे ज्यादा भरोसेमंद माने जाते है तारेक फतेह के अनुसार इस कारण भी कुछ मुस्लिम धर्मगुरु तीन तलाक जैसी कुरीतियों का पक्ष भी लेते नजर आते है।


इस सारे प्रसंग को सुनने के बाद यदि नारी के द्रष्टिकोण से कोई प्रश्न करें तो क्या अल्लाह की नजर में औरतें पैदायशी अपराधी होती है?  क्या कुरान में पति की जगह पत्नी को ही सजा देने का नियम है? यद्यपि तलाक देने के कई कारण और तरीके हो सकते हैं?  लेकिन सजा सिर्फ औरत को ही क्यों  मिलती है? कई बार इस प्रकार के तर्क या सुझाव रखने पर अक्सर कुछ लोग उल्टा हिन्दू धर्म में व्याप्त करुतियों को सामने रखकर इस प्रकार के सवालों से बचना चाहते है| हम मानते है एक नहीं बल्कि बहुत सारी कुरीतियाँ अभी भी जिन्दा है जिनको खत्म किये जाने की आज आवष्यकता है| अब हमें धार्मिक रूप से इन सवालों के जबाब तलाशने में समय नहीं गवाना चाहिए बल्कि इन सवालों को कहो या सवाल खडे करती इन कुरूतियों का ही अंत कर देना चाहिए हमें पुरुषवादी या धार्मिक कट्टरवादी विचारधारा का त्याग कर महिलाओं को वो ही स्वतंत्रता और सम्मान देना होगा जैसा वेदों में अंकित है कि नारी हमारे लिए पूजनीय है। राजीव चौधरी 

Tuesday, 19 April 2016

आस्था का प्रदूषण

जैसे ही कोई त्यौहार निकट आता है तो हमारे चेहरों पर खुशियों के साथ ललाट पर कुछ रेखाएं चिंता की भी स्पष्ट दिखाई दे जाती है कि कहीं आस्था की आड में फिर नदियाँ प्रदूषित तो नहीं  होगी? चिंता के  साथ एक प्रष्न भी खडा होता कि आखिर गंगा हो या यमुना शिप्रा हो या अन्य जीवनदायनी नदी जो आज प्रदुषण के कारण दम तोड रही है किसकी है?  मेरी या तेरी? पंडित जी की या शेख साहब की? अगडे की या पिछडे की? जुलाहे की या मोची की? दलित की या अति महादलित की? समाजवादी या पूंजीवादी की? सांप्रदायिक है या धर्मनिरपेक्ष? हमारा ख्याल है इससे या उससे पूछने की बजाय यह सवाल   सीधे इन नदियों से ही पूछा जाना चाहिए। कि आखिर यह किसकी है? इसको स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी हमारी है या सरकार की? हम इन पर निर्भर है या फिर ये हम पर? या फिर हम दोनों एक दुसरे पर निर्भर है?

कलियुग के बीते पांच हजार वर्षो में गंगा हो या यमुना सूखने के कगार पर पहुंच चुकी है। नदियों में व्याप्त प्रदुषण के कारण आज उनके पानी से आचमन और उससे स्नान पर भी सवाल उठने लगे हैं। हम  जिम्मेदारी से भागते भागते कहीं इनका अस्तित्व तो खत्म नहीं कर रहे है? लेकिन मानवीय सभ्यता में प्रश्न यह भी है कि क्या इनका अस्तित्व खत्म होने पर हमारा अस्तित्व बचेगा? नहीं ना? तो फिर यह नदियाँ गन्दी क्यों



यदि बात राजधानी दिल्ली की ही करें तो दुकान पर लोग धुपबत्ती अगरबत्ती जलाते है| तस्वीरों पर फूल माला चढाते है फिर वहाँ पर जमा राख और सुखी फूल माला को पोलोथीन बैग में डालकर यमुना में फेंक आते है| जिसे प्रवाहित कहते है| लेकिन भूल जाते है कि जब नदियों का प्रवाह ही समाप्त हो जायेगा तो क्या प्रवाहित करोंगे? आस्था की आड में हम अपनी नदियों को प्रदूषित कर आते है| इसे आर्य समाज का अपनी पूजा विधि पर हमला मत समझना बस हम चाहते है आपकी आस्था भी जीवित रहे और साथ में प्रकृति को भी हानि ना हो| इसके लिए यदि आप नदी बदलना चाहते तो क्या अब हम थोडा तरीका नहीं बदल सकते? पहली बात यह है कि फूल पेड पर खिले है वो प्रकृति में अपनी महक बिखेर रहे है यानि के वो पेड पर ही ईश्वर को अर्पित है| उसे तोडकर उसकी हत्या कर किसे अर्पण कर रहे हो? फिर भी यदि आप माला अर्पण करना ही चाहते हो तो सुखी माला और वो जमा राख अपने घर के गमलों में डाल दे ताकि वो खाद बनकर फिर प्रकृति के काम आ जाये|

इस प्रसंग यदि आस्था की बात की जाये तो भारतीय संस्कृति में नदी को मां का दर्जा दिया गया है लेकिन अफसोस तो इस बात का है कि हम जिसे मां कहकर सम्मान देते हैं उसे हमने इस कदर गंदा कर दिया गया है कि उसके  पानी को पीने की आचमन करने की बात तो कोसो दूर गयी| उसमें डुबकी लगाना सेहत को चुनौती देने के बराबर है। लेकिन इसी सदी का एक इतिहास यह भी है कि इन नदियों का पानी इतना साफ हुआ करता था कि लोग उसे पीने के काम में भी लाते थे लेकिन अफसोस अब यह बात इतिहास के किताबों में दर्ज हो चुकी है। कहीं ऐसा ना हो कि ये नदियाँ सिर्फ इतिहास बनकर रह जाएं। सामने जो हालात दिख रहे हैं उससे ऐसा लग रहा है कि गंगा यमुना की गंदगी हमारे लिए एक बड़ी मुसीबत बनकर हमारे आसपास मंडराने लगी है। और तब हमारे पास समाधान के नाम पर कुछ भी नहीं होगा।


आज इन नदियों को साफ करने के नाम पर सरकारें मोटे बजट पेश करती है जबकि सब जानते है कि वो पैसा हमारी जेब से टेक्स के रूप में जाता है किन्तु यदि हम शपथ ले इन जीवनदायनी नदियों को साफ रखने में अपनी जिम्मेदारी समझे एक आदर्श नागरिक का कर्तव्य निभाए खुद समझे लोगों को अपने बच्चों को समझाए तो इन नदियों को साफ रखने के साथ हम सरकार का काफी पैसा अन्य मौलिक सुविधाओं के लिए  बचा सकते है| जिसके लिए सबसे आगे नदियों के घाट पर बने पूजा स्थलों के पुजारियों के साथ छोटे बडे असंख्य मंदिरों के महंत, महामंडलेश्वर,पंडितों को पहल करनी होगी| धर्म को रोजगार की बजाय आचरण का विषय मानकर बताना होगा कि जल है तो कल है ये नदियाँ है तो इनका धर्म और मनुष्य जीवित है| उन्हें लोगों को पूजा पाठ के नाम पर फेंकी जाने वाली सामान रोकना होगा| लोगों को भी सोचना होगा कि ये नदियाँ गंदे नाले में तब्दील क्यों हो गई? लगभग हर सभ्यता के विकसित होने में नदी का योगदान रहा है। लेकिन नदियों के स्वरुप को हमने जिस प्रकार से तार-तार किया है, गंदलाया है वह माफी के लायक कतई नहीं है। सोचो अगली पीढी को हम जल को लेकर क्या मुंह दिखायेंगे?....आर्य समाज 

Monday, 18 April 2016

ये बेटी किसकी है ?

हमारे देश में जरा- जरा सी बात पर अक्सर लोकतंत्र की हत्या होने का राग अलापा जाता है, मानवाधिकार आयोग सकते में आ जाते है| रोहित वेमुला आत्महत्या, और अख़लाक़, की हत्या को राजनेताओं द्वारा लोकतंत्र की हत्या बताई गयी थी| इशरत जहाँ जो मुठभेड़ में कई साल पहले मारी गयी थी लेकिन मानवाधिकार आयोग अभी तक आंसू बहा रहा है| किन्तु मानवधिकारों के लिए लड़ने वाले उन लोगों को शायद पता हो जो एक आतंकी की फांसी के लिए पूरी रात सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े पर पड़े रहे थे कि असली मानवाधिकारों हनन कैसे होता है तो सुने - दो साल पहले बोको हराम द्वारा अगवा की गई लड़कियों का एक वीडियो सामने आया है| दो साल पहले चरमपंथी संगठन बोको हराम ने 276 लड़कियों को चिबोक शहर से अगवा कर लिया था| इन लड़कियों के अगवा किए जाने के बाद सोशल मीडिया पर 'ब्रिंग बैक ऑवर गर्ल्स' नाम से एक प्रचार अभियान चल रहा था जिसमें अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पत्नी मिशेल ओबामा और कई हस्तियां जुड़ीं थी| बोको हराम के नेता अबु बकर शेकाउ ने कहा है कि लड़कियों ने इस्लाम कबूल कर लिया है और उन्हें बोको हराम के लड़ाकों से शादी के लिए सोप दिया जाता है या फिर उन्हें योंन गुलाम के तौर पर बेचा जाता है बोको हराम के नेता अबु बकर शेकाउ ने कहा है कि लड़कियों ने इस्लाम कबूल कर लिया है और उन्हें बोको हराम के लड़ाकों से शादी की धमकी दी जाती है या फिर उन्हें गुलाम के तौर पर बेचा जाता है| अगवा की गई लड़कियों में से 57 लड़कियां भागने में कामयाब रही हैं, 219 अभी भी बोको हराम के कब्ज़े में हैं|
समूचे विश्व में मानवधिकारों के पैरोकार आवाज़ बुलन्द करते दिखाई पड़ते है| मानवधिकारों की रक्षा को तत्पर यह लोग अक्सर दोगली नीति करते दिखाई देते है| यह दोगलापन ही तो है कि कश्मीर और याकूब मेमन पर मानवाधिकार का हनन बताने वाले स्वामी अग्निवेश जैसे महानुभाव इन अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर बोलने से कतराते क्यों है? इसलिए की नाइजीरिया इनसे दूर है चलो नाइजीरिया और सीरिया में यजीदी समुदाय की बेटियों पर हुए जुल्म इनकी पहुँच से दूर है लेकिन पाकिस्तान में जुल्मों का शिकार हुई रिंकल का मामला तो अमेरिका की संसद तक गूंजा था क्या तब इन्हें रिंकल की चीख सुनाई नहीं दी थी? या तब मानवाधिकार बहरा हो गया था?
पाकिस्तान में फरवरी 2012 में मुसलमान बनने के लिए मजबूर की गयी 19 वर्षीय हिन्दू लड़की रिंकल कुमारी ने वहाँ की एक अदालत में कहा था पाकिस्तान में सब लोग एक दुसरे से मिले हुए है यहाँ इंसाफ सिर्फ मुसलमानों को मिलता है हिन्दू और सिखों के लिए कोई इंसाफ नहीं है| मुझे यहीं कोर्ट रूम में मार डालों लेकिन दारुल अमन मत भेजो| रिंकल के इस बयान से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है| रिंकल अब फरियाल के नाम से जानी जाती है वह इन दिनों जबरदस्ती के अपने शोहर नवीद शाह के साथ रहने को मजबूर है| रिंकल का मामला अमेरिका तक पहुंचा था| अमेरिकी सांसद ब्रेड शरमन ने पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जरदारी को पत्र लिखकर कहा था सिंध में हिन्दुओं का दमन रोके| लेकिन तब भारत से रिंकल के लिए एक आवाज़ ना तो सरकार की ओर से उठी और ना ही मानवाधिकारों के रक्षको के मुंह से रिंकल को न्याय देने की बात नहीं कही गयी! इशरत जहाँ को अपनी बेटी तक बताने वाले तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेता तब खामोश पाए गये थे| अख़बारों के ताजा आंकड़ों के मुताबिक पाकिस्तान के अन्दर पिछले 3 महीने में करीब 47 हिंदू लड़कियों का रेप आदि के बाद धर्मपरिवर्तन करा दिया गया क्या रिंकल समेत यह बेटी किसी की बेटी नहीं है? यदि है तो फिर यह दोगलापन क्यों? क्या इन मामलों इनका मानवधिकार मर जाता है?

हमे तब भी उम्मीद थी और आज भी है कि इस्लाम के वे अनुयायी जो इस्लाम को अध्यात्म शांति और सहिष्णुता का मजहब बताने वाले लोग उठ खड़े होंगे| लेकिन एक निंदा तक का स्वर कहीं सुनाई नहीं दिया| किन्तु जब किसी पर इशनिंदा का आरोप लगता है तो लाखो मुसलमान विरोध प्रदर्शन हिंसा करने को सड़कों पर उतर जाते है| लेकिन इस्लामवादी आतंकियों बोको हरम से लेकर इस्लामिक स्टेट द्वारा बरपाई जा रही ज्यादतियों शायद ही कोई मुसलमान सामने आता हो? विगत कुछ सालों से धर्मनिरपेक्ष दलों के नेताओं के बयान और आतंकवादियो के प्रति उठती उनकी सवेंदना से भारत का उदारवादी मुस्लिम असमंजस की स्थिति में आ गया  कि कहीं जिहाद की बातें और कृत्य शायद अधिक इस्लाम प्रमाणित हो| चाहें उनका व्यवहार कुरूप क्रूर ही क्यों ना हो! आज अमेरिका से लेकर जो खुद को आतंक का सबसे बड़ा रक्षक कहता है भारत तक आतंक के मुद्दे पर दोगली राजनीति हो रही है कारण अमेरिका का हित अपना हथियार कारोबार और भारत के नेताओं का वोट हित जिसके कारण सच को दबाया जाता है| वरना अख़लाक़ की मौत को यूएनओं में उठाने वाले नेता एक कुर्दिस बच्चे ऐलन कुर्दी की मौत पर कई दिन रोने वाली विश्व की मीडिया इन बेगुनाह बेटियों के मुद्दे पर बोलने से हिचकते क्यों है? या हो सकता है इन्हें खबर मिली ही ना हो शायद उन्हें यह खबर तब ही मिलती जब उनमें से कोई एक बेटी इनकी भी होती? राजीव चौधरी दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा 


Thursday, 14 April 2016

प्लीज़ सेना को मत घसीटो?

कई बार न्यूज़ चैनल देखते है तो लगता है जैसे मीडिया के मन में एक संदेह घर कर गया है कि वो ही इस देश का सञ्चालन कर रही है| किसी को दागदार तो किसी को साफ सुथरा कहने का अधिकार सिर्फ चंद मीडिया घरानों के पास रह गये है| जिस पर चाहों आप कलंक लगाओ जिसे चाहों आप हीरो बना दो यह कैसे हो सकता है? अब आप सीमा के सजग प्रहरी भारतीय सेना के जवानों को कैसे बदनाम कर सकते है? कन्हेया द्वारा सेना पर आरोप के बयान के बाद जैसे कुछ मीडिया चैनलों में जैसे जान सी आ गयी थी| किन्तु अब मंगलवार को हुई हंद्वाडा की हिंसा को जिस तरीके से मीडिया ने पेश किया वो वाकई शर्मनाक था| दरअसल, हंदवाड़ा में कुछ शरारती तत्वों ने एक छात्रा के साथ छेड़छाड़ और मारपीट की इसके बाद उपद्रवियों ने सेना के खिलाफ लोगों को उकसाया, जिससे हालात खराब हो गए। इस दौरान हालात पर काबू करने के लिए सेना को फायरिंग करनी पड़ी जिसमें एक महिला समेत तीन लोगों की मौत हो गई और चार लोग जख्मी हुए थे।
 यह खबर कुछेक ऑनलाइन न्यूज़ रूम से कुछ इस तरह चली कि आज घाटी के हंद्वाडा में हुई एक घटना में सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों पर भारतीय सेना के जवानों ने गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। इस गोलीबारी के बाद मची भगदड़ में जहाँ कई लोग घायल हो गए वहीँ सेना की गोलियों का शिकार हुए २ नौजवानों की मौके पर ही मौत हो गई। लोगों के विरोध प्रदर्शन की वजह आर्मी के एक जवान की घिनौनी करतूत थी जिसमें उसने एक कॉलेज की स्टूडेंट के साथ छेड़छाड़ की थी। मारे गए लड़कों में से एक का नाम मोहम्मद इक़बाल है जोकि कुपवोर के बोमहाम इलाके का रहने वाला है वहीँ दुसरे का लड़के का नाम नईम क़दीर भट्ट है जोकि हंद्वाडा से ही है। जबकि लड़की ने सामने आकर सारी सच्चाई सामने रख दी खुद पीड़ित लड़की ने सामने आकर बताया कि एक युवक ने पहले उसे थप्पड़ मारा था और फिर बाद में लोगों को इकट्ठा कर उन्हें उकसा दिया जिससे माहौल खराब हो गया। मैं अपने स्कूल से वापस आ रही थी उसी वक्त मैंने अपना स्कूल बैग अपनी दोस्त को दिया और बाथरूम जाने  लगी। तभी एक स्थानीय लड़का वहां आया और उसने मेरा बैग छीनने की कोशिश की, मैंने उस लड़के का विरोध किया तो उसने मुझे थप्पड़ मारा। तभी एक पुलिसवाला आया और  मुझे पुलिस स्टेशन ले गया। बाद में उस लड़के  ने और भी लड़कों को भड़काया जिससे माहौल खराब हो गया।
कश्मीर कभी भारत के सबसे बड़े राज्यों में से एक हुआ करता था। आज भी धरती का स्वर्ग कश्मीर को ही माना जाता है। पर अब कश्मीर असलियत में कश्मीर रहा ही नहीं, यहां तो कश्मीर के कई टुकड़े हो चुके हैं। वैध और अवैध रूप से कश्मीर पर 3  देशों की हुकूमत है। जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है, तो पाक अधिकृत कश्मीर और गिलगित बाल्टिस्तान पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है। वहीं अक्साई चिन पर चीनी कब्जा है| पिछले दिनों अभिनेता अनुपम खेर ने कहा था कि जिस दिन संविधान का अनुच्छेद 370 हटेगा और बंगाल, पंजाब, गुजरात तथा देश के अन्य भागों के लोगों को जम्मू-कश्मीर में बसने की अनुमति होगी, उस दिन कश्मीर समस्या सुलझ जाएगी।

लेकिन जिस तरीके से 2011 में विकीलीक्स ने खुलासा करते हुए कहा था कि कश्मीर की राजनीति में पैसे का बोलबाला है। उसे देखकर नहीं लगता कि यह मामला सुलझ सकता है| विकीलीक्स ने अमेरिकी डिप्लोमैट्स के केबल्स के हवाले से लिखा है कि अलगाववादी नेताओं में पैसे का लालच इतना है कि वो अपने फायदे के लिए यहां की समस्या का समाधान नहीं होने देना चाहते। फरवरी 2006 के एक केबल में तब अमेरिकी राजदूत डेविड मलफर्ड ने अपने विदेश मंत्रालय को लिखा था कि कश्मीर की राजनीति डल झील जितनी गंदी है। विकीलीक्स के मुताबिक कश्मीर के लगभग सभी अलगाववादी नेता भारत और पाकिस्तान दोनों से पैसे लेते हैं और वो कश्मीर से लेकर दुबई तक में जायदाद खरीदते हैं। अब हम कैसे मान ले कि इस खेल में सिर्फ अलगाववादी नेता शामिल है? वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण से लेकर लेखिका अरुधंति राय, वामपंथी सेकुलर सब के सब एक सुर में बोलते दिखाई देते है| हमें नही पता इन लोगों को देश का विरोध करने का क्या मिलता है किन्तु इतना पता है कि अतीत में गद्दारों के कारण ही भारत देश हजार वर्षो के करीब गुलाम रहा था| अत: मीडिया से अनुरोध है प्लीज़ सेना को मत घसीटो यह काम तो पाकिस्तान की मीडिया कर ही रही है आप क्यों उसके दावे को मजबूत कर रहे है? लेखक राजीव चौधरी 

Thursday, 7 April 2016

लहरा दो तिरंगा प्यारा

"हम पर अश्लील फब्तियां कसी जाती हैं। कहते हैं, एक का रेप हो जाएगा तो बाकी सभी चुप हो जाएंगी। यहां त्योहार मनाने की इजाजत लेनी पड़ती है। अपने देश में तिरंगा लहराने की अनुमति नहीं है, अगर विरोध करो तो फेल करने की धमकी दी जाती है। चार साल की डिग्री छह साल में पूरी करने को धमकाया जाता है। कई बार तो जान से मारने की धमकियां तक मिलीं। बस, बहुत हो गया, अब और सहन नहीं होता।" बुधवार को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआइटी) श्रीनगर में हालात का जायजा लेने पहुंचे मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) के प्रतिनिधियों के सामने बाहरी राज्यों के छात्र-छात्राओं का दर्द और गुस्सा उबल पड़ा। ये कहानी किसी अन्य देश की नहीं बल्कि अपने अभिन्न अंग कहलाये जाने वाले मुस्लिम बहुल राज्य कश्मीर की है जहाँ हर साल भारत सरकार अरबो रुपया वहाँ के निवासियों की जीवन शैली सुधारने के लिए खर्च करती है|  
सालों पहले दूरदर्शन चैनल पर एक गीत आता था “मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा” जिसमे देश के अलग –अलग हिस्सों की भाषाओ में देश की एकता में पिरोया जाता था| लेकिन आज क्या हो गया देश को, यहाँ के राजनेताओं को और मीडिया को? क्यों सच को दबाकर देशद्रोही लोगों को हीरो बनाने पर तुले है| अफसोस सिर्फ इस बात का है की जो हाल
जेएनयू  छात्रों का होना था वो हाल एन आई टी छात्रों का हो रहा है| सेना को गाली देने वाले कन्हेया को मीडिया और राजनैतिक दल हीरो बताते है उसकी तुलना शहीद भगतसिंह से की जाती है| शायद यह लोग भूल गये कि इस तिरंगे को लहराने के लिए लाखों माताओं के लाल अपना बलिदान दे गये थे ताकि आज हम इस तिरंगे की शान को झुकने ना दे| हमें गर्व है एनआईटी श्रीनगर के उन छात्रों पर जिन्होंने जम्मू कश्मीर पुलिस की बर्बरता पूर्वक कार्रवाही के बाद भी देश का धवज नहीं झुकने दिया| विद्यार्थियों ने एक-एक कर अपने साथ हुई प्रताड़ना, लाठीचार्ज व धमकियों के बारे में टीम को बताया हाथों में पट्टी बंधे और फूटे सिर लिए छात्रों ने हालात बताए कि तिरंगा फहराने और देश हित में नारेबाजी करने के बाद उन्हें किसी तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है। और एनआइटी को किसी सुरक्षित जगह स्थानांतरित करने की मांग की।
एनआईटी श्रीनगर में कुल 3000 छात्र हैं, जिनमें से 20 फीसदी छात्र  स्थानीय हैं| बाकी 80 फीसदी छात्र देश के तमाम हिस्सों से आते हैं| ये सभी छात्र JEE के माध्यम से चुने जाते हैं, जो पहले AIEEE हुआ करता था| अभी हाल ही में देश के प्रधानमंत्री जी जब सऊदी अरब की यात्रा पर थे तब सैकड़ों भारतीय अप्रवासियों ने भारत माता की जयका उद्घोष किया। इस नारेबाजी में न केवल भारतीय कामगार-मजदूर थे, बल्कि अधिकांश बुर्काधारी मुस्लिम उद्यमी महिलाएं भी थीं। जब सऊदी अरब निवासी मुस्लिम महिलाएं भारत माता की जयका नारा लगाकर अपना मजहब सुरक्षित रख सकतीं हैं, तो भारत के कुछेक मुसलमानों को क्या परेशानी है ? उन्हें तो अपनी मातृभूमि के प्रति और अधिक कृतज्ञ होना चाहिए। कुछ सिरफिरे मजहबी मानसिकता में लिप्त लोगों से बचना चाहिए जो साम्प्रदायिक उन्माद की आग को हवा दे रहे हैं। भारत के मुसलमानों को देश की एकजुटता के प्रति, सहिष्णुता के प्रति एवं अभिव्यक्ति की आजादी के प्रति बहुत ही समझदारी से काम लेना होगा। देश में लोकतंत्र रहेगा तो ही वो अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर सकते है वरना सीरिया, लेबनान सोमालिया, इण्डोनेशिया जैसे कितने इस्लामिक मुल्क है जहाँ जीवन नरक से भी बदतर हो चला है|

भारत माता की जय बोलने से किसी का मजहब खतरे में नहीं होगा। इस नारे का ईश्वरी आस्था से कोई लेना-देना नहीं है। यदि कोई मुस्लिम भारत वासी है तो भारत माता की जयका तात्पर्य यह समझना चाहिए कि भारत मेरा मादरे वतन है, इसे मैं सलाम करता हूँ। यदि धर्म को ही ब्रह्म वाक्य यानि सब कुछ मान के चलेंगे तब तो धरती पर सुख चैन से जीना ही हराम हो जायेगा. इस्लाम में तो संगीत सुनना और फिल्म देखना दोनों ही मना है| क्या देश के करोड़ों मुसलमान इसे छोड़ सकते हैं? कभी नहीं, चाहे कितने भी फतवे मुस्लिम समाज द्वारा क्यों न जारी हो जाएँ| इस्लाम में तो फोटो खिंचवाना भी मना है, लेकिन बिना फोटो खिचवाए तो आज के युग में काम ही नहीं चलेगा. देश में कोई भी सरकारी कार्य हो या राशन कार्ड, आधार या पासपोर्ट बनवाना हो या फिर हज करने जाना तो भी फोटो चाहिए. अधिकतर मुस्लिम भाई हर मामले में शरीयत की दुहाई देंगे, लेकिन कभी भूल से भी शरीयत में वर्णित सजाओं को मुस्लिम समाज पर लागू करने की बात नहीं करेंगे, क्योंकि तब उन्हें भारतीय संविधान ही ठीक और सुविधाजनक लगता है| भाई मेरे भारतीय संविधान को मानने के साथ साथ भारत को भी तो अपनी मातृभूमि मान सम्मान देकर तिरंगा लहराने से परहेज क्यों? परहेज तो देश विरोधी फतवों से करो| सोचो 1400 साल से फतवों ने मुस्लिम समाज को क्या दिया? और 69 साल की लोकतांत्रिक प्रणाली ने इस देश के मुस्लिम समाज को क्या नहीं दिया? राजीव चौधरी 

Monday, 4 April 2016

कब तक मरते रहेंगे ??

सुबह जब अख़बार उठाया तो उसके पहले पेज की प्रमुख खबर थी केजरीवाल का बजट ध्वनि मत से पारित| मतलब बिना किसी शोर शराबे के बजट पास हुआ सबसे बड़ी बात ये कि मीडिया को यह खामोशी तो सुनाई दी किन्तु नक्सलियों ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के वाहन को बारूदी सुरंग विस्फोट में उड़ा दिया है| इस घटना में सीआरपीएफ के एक अधिकारी समेत सात पुलिसकर्मी शहीद हो गए, इस धमाके की आवाज़ मीडिया को सुनाई नहीं दी और विडम्बना देखिये देश की रक्षा करते हुए शहीद सात जवान अख़बार के आखिरी पन्ने पर अपनी जगह बा मुश्किल बना पाए| इस घटना में सीआरपीएफ के सहायक उपनिरीक्षक डी बिजय राज, हवलदार प्रदीप तिर्की, आरक्षक रूप नारायण दास, आरक्षक देवेंद्र चौरसिया, आरक्षक रंजन दास, आरक्षक वाहन चालक नाना उदय सिंह और आरक्षक जे राजेंद्रन शहीद हो गए| किन्तु मीडिया और राजनेताओं के लिए इससे जरूरी खबर यह थी कि भारत माता की जय ना बोलने पर एक मुस्लिम को आखिर क्यों पीटा गया!!
ऐसा नहीं कि नक्सलवादियों का सेना के जवानों पर यह पहला हमला है बल्कि इससे पहले भी सेकड़ों हमले हो चुके है राज्य सरकार और केंद्र सरकार के ढुलमुल रवैये के कारण कहो या नक्सलवाद में भी राजनीति की घुसपैठ के कारण अभी तक इतने नक्सलवादियों ने आत्मसमर्पण नहीं किया जितना उनसे निपटने में कहीं अधिक जवान अपने प्राण गवां चुके है| आज नक्सलवाद का नाम आते ही या तो सेना के जवानों का खून खोल उठता है या पिछले कुछ सालों में नक्सलवाद का चेहरा इतना बर्बर हो चुका है जिसे देखकर उनकी रूह कांप जाती है| आज नक्सली सत्ता की बन्दूक से गोली निकलती है के सिद्धांत पर चल रहे है| जिनके आगे सरकार ने जवानों को गाजर मुली की तरह कटने के लिए छोड़ दिया है| प. बंगाल के नक्सलवाड़ी गाँव से शुरू हुआ नक्सलवाद अब उड़ीसा, महाराष्ट्र, झारखंड और कर्नाटक में भी पैर पसार चुका है। दिन पर दिन नक्सलवाद का लाल गलियारा भारत में फैलता जा रहा है| ऐसा नहीं है नक्सल का शिकार सिर्फ जवान हुए है बल्कि मई 2013 में नक्सलियों द्वारा घात लगाकर किए गए नक्सलवादी हमले में कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा सहित 29 नेताओं की मौत हो गई थी, नक्सलवादियों ने उस हमले को सलवा जुडूम का बदला करार दिया था। चश्मदीदों का कहना था कि हमले में एक हजार से ज्यादा नक्सली शामिल थे। आखिर कहाँ से जमा से हुए एक हजार नक्सली? किसी अन्य देश से या फिर ये लाल केंसर भारत के अन्दर ही पल रहा है| क्या इसके लिए राजनेता और क्षेत्रिय स्तर की राजनीति दोषी नहीं है? क्यों कभी वामपंथ के ठेकेदार इसकी आलोचना निंदा नहीं करते देखे जाते? दंतेवाडा हमले में मारे गये 75 जवानों की शहादत के बाद जेनेयु में जश्न मनाया गया था| हो सकता है इस हमले के बाद भी कन्हैया कुमार व् उसके साथी जश्न मनाये?  
कश्मीर हो नक्सल प्रभावित क्षेत्र जवानों की इस प्रकार हुई हत्या के बाद जब भी विपक्ष सत्ता से सवाल करता है तो सत्ता पक्ष उसे अतीत में सेना पर हुए हमलों का उदहारण देकर पल्ला झाड़ लेते है| क्या इसका मतलब यह है कड़ी कारवाही के बदले कि सेना को राजनीति की भेंट चढ़ना पड़ता रहेगा? वैसे स्वतंत्र भारत में सशस्त्र क्रांति का इतिहास खोलकर देखे तो हथियारों से पहली लड़ाई 1948 में तेलगाना संघर्ष आरम्भ हुई थी उस काल में तेलगाना के गाँवो के किसानों ने हथियारों के साथ लड़ाई का झंडा उठाया था इसके बाद इनके अन्दर विखराव के बीज पड़े और इनमें से कुछ लोगों ने मार्क्स का सिद्धांत बता मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया इनका मानना रहा है जब तक सही समय ना आये सत्ता का स्वाद चखकर ही कुछ हासिल किया जाये और इन गरीबों को सत्ता से लड़ाते रहे| दूसरा कुछ महीनों पहले संघ से जुड़े इंद्रेश कुमार ने आरोप लगाया और कहा कि चर्च और इसाई समुदाय देश में नक्सलवाद को बढावा देने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने माओवादी हमलों को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि इनके हमले ईसाई संस्थाओं पर क्यों नहीं होते? आज छत्तीसगढ उच्च स्तर पर नक्सलवाद से जूझ रहा है, लेकिन यहां नक्सलियों ने कभी चर्च या पादरी को निशाना नहीं बनाया, क्योंकि वह उनकी मदद करते हैं या फिर इसके पीछे कोई और वजह है?

नक्सलवादी नेताओं का हमेशा आरोप रहा है कि भारत में भूमि सुधार की रफ्तार बहुत सुस्त है। उन्होंने आँकड़े देकर बताया कि चीन में 45 प्रतिशत जमीनें छोटे किसानों में बाँटी गई हैं तो जापान में 33 प्रतिशत, लेकिन भारत में आजादी के बाद से तो केवल 2 प्रतिशत ही जमीन का आवंटन हुआ है। जबकि यह हथियार उठाने का बस बहाना मात्र है सत्ता हथियाना एक मात्र लक्ष्य दिखाई देता है| अब तक सरकार की ढुलमुल नीतियों व केंद्र-राज्य में सामंजस्य न होने का फायदा उठाकर बीते सालों में नक्सलवादियों ने पुलिस और विशेष दल के जवानों पर घात लगाकर किए जाने वाले हमले एकाएक बढ़ा दिए हैं। आज नक्सली नेपाल से लेकर आंध्रप्रदेश तक हिंसा के बल अपनी जड़े मजबूत करते जा रहे है| हमारी सरकारी नीति पाकिस्तान प्रायोजित  आंतक को लेकर पुरे विश्व में रोना रो लेती है किन्तु जब घर के आतंक की बात आती है तो सत्ता सुख बगले झाँकने को विवश कर देता है, सोचो आखिर इस नरम रवैये की कीमत सेना के जवान कब तक मरकर चुकाते रहेंगे? 

राजनेता मूक क्यों है?

विश्व कप के सेमीफाइनल में वेस्टइंडीज से भारत की हार पर मैनपुरी में दो समुदाय आमने सामने आ गए। गोलियां चल गर्ईं। चार लोग बाल-बाल बच गए। गांव में तनाव है। घटना पिछले गुरूवार की रात की है। सूचना पर पुलिस और खुफिया विभाग अलर्ट हो गया है। यूँ तो मीडिया और राजनेता हर पल देश के लिए चिंता जाहिर करते है किन्तु इस मामले पर उनकी मूकता स्पष्ट दिखाई दे रही है| कुछ समय पहले रामगोपाल बजाज, ने कहा था जब भी देश के अन्दर कुछ अच्छा होता है या फिर देश के लोग बाहर जाकर कुछ अच्छा करते हैं या फिर उनके साथ विदेश में कुछ बुरा होता है उस वक़्त में हमारे अन्दर की राष्ट्रीयता कुछ ज़्यादा जग जाती है। जब भी हम विदेशों में जाकर वहाँ का सिस्टम देखतें हैं और उससे अपने देश की तुलना करते हैं तब थोड़ा अफ़सोस ज़रूर होता है। राष्ट्रीयता की भावना को ठेस पहुँचती है अपने देश के जन-प्रतिनिधियों की स्वार्थसिद्धि को देखकर और उन्हें चुनने वाले मतदाताओं की समझ पर दुःख होता। आज भले ही नेता विकास या सुशासन का राग अलापते हो किन्तु देश के अन्दर सेक्युलर फौज ने जाति और धर्म पर वोट की दुकान बना ली| इस समय देश के अन्दर जो पनप रहा है वो आने वाले दिनों में बड़ा खतरा बनकर उभरेगा|
हैदराबाद की एक इस्लामिक ऑर्गेनाइजेशन जामिया-निजामिया के बाद दारुल उलूम देवबंद ने भारत माता की जय बोलने पर फतवा जारी किया है| फतवा जारी करना भारत के मैच हारने पर पाकिस्तान के झंडे फहराना गोलियां पटाखे चलाकर ख़ुशी मनाना और भारत की जीत पर किसी डाक्टर नारंग को पीट-पीटकर मार देना सब कुछ उस देश के अन्दर हो रहा है जिस देश का प्रधानमंत्री अजान की आवाज़ सुनकर अपना भाषण बंद कर देता है, जिस देश में पिछले पांच सालों के दौरान देशभर से छह लाख 40 हजार 792 हजयात्रा पर गए, लोगों को  सब्सिडी के रूप में 2891.77 करोड़ रुपये दिए गए।  भारत माता की जय नहीं बोलेंगे, लाउडस्पीकर पर भजन चला तो मंदिर में घुस कर पुजारी को मारेंगे? यही धर्मनिरपेक्षता है क्या? पिछले दिनों टीवी डिबेट मे एक मौलवी से पूछे गये सवाल पर मौलवी जी ने साफ तौर पर कहा, 'मुस्लिम के लिए पहले कुरान और मजहब है बाद में मुल्क है| तो इस हिसाब से मुस्लिमो के लिए 'भारत माता की जय' कोई मुद्दा हो ही नही सकता। किन्तु एक प्रश्न है की भारत ही क्या किसी भी देश के प्रति इनकी कोई वफादारी है या नहीं? क्योकि हर देश में कुरान है और हर एक देश में मजहब!
मुसलमान इस सबका दोषी नहीं है दोषी वो राजनीति है जो सम्प्रदायों की नस नस में प्रवेश कर गयी वरना तो अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ, भारत माता की जय बोलकर फांसी के फंदे को चूम लेता है, वीर अब्दुल हमीद भारत माता की जय बोलकर पाकिस्तान के पेटेंट टेंक उड़ा देता है, हाल ही में आओ तो राज्य सभा सांसद जावेद अख्तर संसद के बीचों-बीच तीन बार भारत माता की जय बोलकर उन लोगों के मुंह पर करारा तमाचा जड़ा ही था| जो लोग आज कहते है पहले मजहब बाद में मुल्क, क्या असफाक उल्ला, अब्दुल हमीद, जावेद अख्तर मुसलमान नहीं थे ? या इन पढ़े लिखे लोगों को इस्लाम का ज्ञान नहीं था? ऐसे ही ना जाने कितने करोड़ मुसलमान है जिनका दिल इस वतन के लिए धडकता है| किन्तु कुछ लोग जबरन सम्प्रदाय का बहाना बना अपना पेट पाल रहे है| मंदिर मस्जिद मामला हो या किसी मुस्लिम समुदाय के व्यक्ति को कोई अन्य सम्प्रदाय का व्यक्ति चोट पहुचाये तो धर्मनिरपेक्ष कहें जाने वाले नेता जमकर सिंहगर्जना करते दिखाई दे जाते है| किन्तु जब देश के विरोध विशेष समुदाय के लोग कभी कश्मीर तो कभी केरल कभी उत्तरप्रदेश में देश विरोधी नारे लगाते है तो इन लोगों की ख़ामोशी देखकर सहज पता लगाया जा सकता है कि देश और सविधान के मूल्यों के प्रति इनकी आस्था कितनी गहरी है| या इनकी जबाबदारी सिर्फ वोटों के समीकरण की लाभ हानि को देखकर होती है? असल में इन नेताओं की नजर में धर्मनिरपेक्षता के मूल्य की कोई कीमत नही रह गयी है| ये सत्ता के मादक सुख के आगे देश के प्रति अपने कर्तव्य वो शपथ जो इन्हें मंत्री पद ग्रहण करते समय दिलाई जाती है उसकी सार्थकता को भूल बैठे है| मैनपुरी की घटना को कई दिन बीत चुके है किसी भी नेता या दल ने इस पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी क्या इनका मौन स्वीकृति का लक्षण समझा जाये? यदि नहीं तो कम से कम सामने आकर अपनी तो प्रतिक्रिया स्पष्ट करे..राजीव चौधरी