Wednesday, 30 January 2019

दानवीर कर्मवीर और धर्मवीर महाशय धर्मपाल जी को पद्मभूषण सम्मान


समस्त आर्य समाज से जुड़े लोगों के लिए यह एक गर्व, गौरव और प्रेरणा देने वाली खबर है कि महाशय धर्मपाल जी को भारत सरकार द्वारा नामित किये जाने पर उन्हें गणतंत्र दिवस के मौके पर पद्मभूषण से सम्मानित किया गया है। ट्रेड एवं इंडस्ट्री में काम के लिए उन्हें ये पुरस्कार मिला है। शून्य से चले महाशय आज शिखर तक कैसे पहुंचे ये कोई रहस्य नहीं हैं बल्कि उनकी मेहनत, कर्तव्यनिष्ठा और लग्न का परिणाम है कि एक साधारण सा तांगे वाला आज भारत में व्यापार के क्षेत्र में पद्मभूषण बन गया।

लेकिन उनकी इस प्रसिद्धि की केवल यही एक वजह नहीं है और न ही महाशय जी कार्यों और प्रसिद्धी का उल्लेख कागज के कुछ टुकड़ों पर किया जा सकता है। क्योंकि महाशय जी ने सार्वजनिक जीवन के दायित्व का पालन तो बखूबी किया ही साथ ही समाज में गरीब, बेसहारा लोगों के अनाथालय, स्कूल, अस्पताल जैसे न जाने कितने संस्थानों का निर्माण कराकर समाज को समर्पित किये, जिनकी सूची काफी लम्बी है। इन अनुकरणीय कार्यों के बाद भी महाशय जी ख्याति यही समाप्त नहीं होती यह टीवी विज्ञापन में आने वाले दुनिया के सबसे अधिक उम्र के स्टार के रूप में भी जाने जाते हैं। 
उनकी लंबी उम्र का राज उनका शुद्ध शाकाहारी भोजन और रोजाना किये जाने वाले व्यायाम है। पार्क में सैर करने के लिए वह रोज सुबह 4 बजे उठते हैं, वह योगा भी करते हैं वह शाम को भी सैर करने जाते हैं और रात को खाने के बाद भी। बावजूद इसके वह हर रोज कम से कम एक फैक्ट्री में जाते हैं। चाहे फिर वह दिल्ली की फैक्ट्री हो या फरीदाबाद और गुरुग्राम की।

इस सबके बावजूद महाशय जी एक सबसे बड़ी ख्याति यह है कि वह महर्षि दयानन्द सरस्वती जी द्वारा स्थापित और समाज को श्रेष्ठ मार्ग दिखाने वाले संगठन आर्य समाज के ध्वज को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। हम आर्यजनों के लिए यह गौरव का विषय इसलिए भी है कि भारत जैसे धार्मिक देश में कथित छत्तीस करोड़ देवी देवताओं उनके नाम पर कार्य करने वाले हजारों संगठनों और लाखों स्वयंभू बाबाओं से न जुड़कर महाशय जी ने आर्य समाज की आवाज को न केवल बुलंद किया बल्कि आर्य समाज के कार्यों को आगे बढ़ाने में अपने तन, मन और धन से सहयोग दिया। यही कारण है कि आज महाशय जी के आशीर्वाद से देश के पूर्वोत्तर भाग से लेकर मध्य भारत और दक्षिण भारत में वेद रिसर्च सेंटर से लेकर, गरीब आदिवासी बच्चों के लिए स्वामी दयानन्द सरस्वती जी द्वारा दिखाए मार्ग को प्रेरणादायक मानते हुए स्कूल कालिजो की स्थापना की। यदि पूर्वोत्तर भारत में आज वेद के मन्त्र गूंज रहे है तो इसका एक बड़ा श्रेय महाशय जी ही को जाता हैं।

हाल ही अंतर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन का सफलतापूर्वक सम्पन्न होना इसके पश्चात आर्य समाज को वैचारिक दुनिया में संवाद के रूप में आर्य मीडिया सेंटर के तौर पर एक हथियार देना महाशय जी की दानवीर ख्याति को दर्शाने के लिए काफी हैं। आर्य जगत से जुड़ें लोगों से निरंतर संवाद आर्य समाज की गतिविधियों की निंरतर जानकारी लेना हम सब लोगों को प्रेरित करना एवं स्वयं 96 वर्ष की अवस्था में एक युवा की भांति साथ चलना ही महाशय जी को दानवीर, कर्मवीर और धर्मवीर बना जाता हैं। महाशय जी आर्य रत्न तो थे ही अब उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्मानित किया जाना हम सब आर्यों को एक नई दिशा, उत्साह और प्रेरणा देगा। हम भारत सरकार का ह्रदय से आभार व्यक्त करते है साथ ही महाशय जी कर्तव्यनिष्ठा को भी नमन करते हैं। अंत में एक शायर की कुछ पंक्तियाँ याद आ गयी कि खुश रहे तुम्हे देखने वाले वरना किसने खुदा को देखा है

क्या चीन में बदल दिया जाएगा इस्लाम


हाल में विश्व भर के अखबारों की यह सुर्खिया हर किसी को सोचने पर मजबूर कर रही कि क्या वास्तव में चीन इस्लाम को बदलने जा रहा है! सूचनाओं के माध्यम से खबर है कि चीन अपने यहाँ मुसलमानों पर नियंत्रण करने के लिए एक राजनीतिक अभियान की शुरुआत करने वाला है। इसके लिए एक पंचवर्षीय योजना बनाई जा रही है जिसके तहत इस्लाम का चीनीकरण किया जाएगा ताकि इस्लाम को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के विचारों के अनुरूप ढाला जा सके। अगर ऐसा हुआ तो यह अपने आप में एक बड़ा क्रांतिकारी कदम होगा जिसकी मांग भी पिछले काफी समय से बार-बार की जा रही है।

इस बात से सारी दुनिया परिचित है कि इस्लाम अपने आप में एक साम्राज्यवादी विचारधारा है और जिसका लक्ष्य अधिक से अधिक भूभाग पर अधिकार और सातवीं सदी में बनाएं गये कानून से लोगों को हांकना है। कई इस्लामविद इसके लिए हर एक वो रास्ता भी अपनाने से नहीं चुकते जिसे आधुनिक संविधान कई मायनो में अपराध की संज्ञा भी प्रदान करता है। यानि जो भी टकराव है वह सिर्फ आधुनिक संविधान और शरियत कानून के मध्य रहा है। अब हो सकता है चीन इस टकराव को समाप्त करने लिए इस्लाम की अवधारणाओं को अपने कम्युनिस्ट कानून के अनुरूप ढालना चाहता हो।

बताया जा रहा है कि शुरुआत में मुसलमानों को मूल सामाजिक मूल्यों, कानून और पारंपरिक संस्कृति पर भाषण और प्रशिक्षण दिया जाएगा। मदरसों में नई किताबें रखी जाएंगी ताकि लोग इस्लाम के चीनीकरण को और बेहतर ढंग से समझ सकें। सकारात्मक भाव के साथ विभिन्न कहानियों के माध्यम से मुसलमानों का मार्गदर्शन किया जाएगा। हालांकि, इस योजना के बारे में और ज्यादा जानकारी नहीं दी गई है। अभी इसे गुप्त रखा जा रहा है।

यह बात तो मान्य है कि वतर्मान परिस्थितियों में इस्लाम अपने आप में एक बड़े बदलाव की बाट जोह रहा है। पिछले दिनों सऊदी अरब में महिलाओं के लिए बने कई कठोर कानूनों में बदलाव किया गया हैं। वर्ष 2005 में इस्लामिक लेखक सलमान रुश्दी ने ब्रिटेन से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र द टाइम्स में अपने एक लेख में कहा था कि अब इस्लामवादियों को इस बात की जरूरत है कि परंपरा से अलग हटकर बढ़ा जाए। इसके लिए एक सुधार आंदोलन चलाना होगा जिससे इस्लाम की मूल भावनाओं को आधुनिक दौर में लाया जा सके। रुश्दी ने ये भी तर्क दिया है कि पवित्र ग्रंथ कुरान को एक ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह पढ़ाया जाना चाहिए ना कि किसी ऐसी पुस्तक के तौर पर जिसपर कोई सवाल ना उठाया जा सके। अगर सुधार हुए तो तभी सातवीं शताब्दी में बनाए गए कानून 21वीं सदी की जरूरतों को अपना मार्ग बनाने दे पाएँगे।

अब सवाल यही उठता है इस्लाम के अन्दर यह बदलाव कैसे हो सकता है? चीन के संदर्भ में जो अनुमान लगाये जा रहे है वह इस प्रकार कि इस्लामिक पहनावे में बदलाव किया जायेगा।  रोजाना के धार्मिक प्रयोग जैसे नमाज पढ़ना, रोजा रखना जैसी पारम्परिक बाध्यता को खत्म किया जायेगा, साथ ही दाढ़ी बढ़ाने भी पांबदी की तैयारी है। कट्टर इस्लामिक नाम रखने पर पाबंदी होगी और इस्लाम से पहले चाइना की संस्कृति को महत्व देना होगा। हालाँकि इस पहल की शुरूआती तौर पर चीन की मस्जिदों से इस्लामिक ध्वज उतारकर उनकी जगह चीनी ध्वज भी लगाये जा रहे है।

अब यदि इस प्रश्न को चाइना की सीमा पार कर भारत के संदर्भ में रखा जाये मुझे नहीं पता कितना उपयुक्त होगा। किन्तु इतना तय की इस बदलाव से काफी धार्मिक संघर्षो एवं राष्ट्रीय मुद्दों को कफन जरुर पहनाया जा सकता है। किन्तु धर्मनिरपेक्षता के ढोंग की राजनीति के रहते यहाँ ऐसा संभव होता दिखाई नहीं देता, क्योंकि जब-जब हमारे पास बदलाव के ऐसे अवसर आये तब-तब हमने बदलाव को अस्वीकार कर वोट बेंक को तरजीह ज्यादा दी।
   
कौन भूल सकता है 1978 का पांच बच्चों की मां 62 वर्षीय शाहबानो का मामला जिसने तलाक के बाद गुजारा भत्ता पाने के लिए कानून की शरण ली थी। कोर्ट ने सुनवाई के बाद अपना फैसला सुनाते हुए शाहबानो के हक में फैसला देते हुए उसके पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश भी दिया था। परन्तु शाहबानो के कानूनी तलाक भत्ते पर देशभर में राजनीतिक बवाल मच गया और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं को मिलने वाले मुआवजे को निरस्त करते हुए एक साल के भीतर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था। अगर यह फैसला ना पलटा गया होता तो जरुर मुस्लिम महिलाओं को सातवीं सदी के एक कानून से तो छुटकारा मिल गया होता किन्तु मुल्ला मौलवियों के दबाव में यह बड़ा बदलाव नहीं सका।

असल में आज मुस्लिमों को भी एक बात स्वीकार करनी होगी कि पूरी दुनिया में जो प्रगति और परिवर्तन हो रहे हैं मुस्लिम उससे कटे हुए नहीं बल्कि ज्यादातर उस परिवर्तन का लाभ उठाने वालों में शामिल हैं, परिवर्तन लाने वालों में नहीं। आधुनिक शिक्षा के विकास के साथ यह स्थिति बदल रही है। मगर मुल्ला मौलवियों का एक बड़ा वर्ग अब भी पुरानी लीक पर जमा हुआ है। इससे इस तर्क को बल मिल जाता है कि पूरा मुस्लिम समाज कट्टरपंथी है शायद यही इस्लाम अस्थिरता का कारण भी है। कहा जाता है कि एक बार मौलाना आजाद ने अपने एक इंटरव्यू में इन्हीं मौलवियों के लिए कहा है,  इस्लाम की पूरी तारीख उन मौलवियों से भरी पड़ी है जिनके कारण इस्लाम हर दौर में सिसकियां लेता रहा है।

अब चीन से सबक लेकर सभी उदारवादी मुस्लिमों को समझ जाना चाहिए कि मध्यकालीन पुस्तकों और कानूनों से भले ही उन्होंने अनेक शताब्दियों तक काम चलाया हो परंतु अब परिस्थियाँ बदल रही और इस कारण स्वयं ही आगे बढ़कर सामाजिक बदलाव और आधुनिक संविधान को स्वीकार कर लेना चाहिए इससे ही अनेकों स्थानों से सामाजिक और धार्मिक संघर्षों को मुक्ति मिल सकती है।

Tuesday, 15 January 2019

हत्या और खून यह कैसी आस्था


यूरोप में पशु वध के मुस्लिम और यहूदी तरीकों पर एक जनवरी से प्रतिबंध प्रतिबंध लागू कर दिया गया हैं. बेल्जियम के पशु अधिकार समूह के ग्लोबल एक्शन के निदेशक एन डी ग्रीफ ने जोर देकर कहा है कि आस्था के नाम पर पशु वध का मुस्लिम और यहूदी तरीका एकदम अमानवीय है. जीव अधिकारों से जुड़े कार्यकर्ता लंबे समय से इस कानून की मांग कर रहे थे, लेकिन यहूदी और इस्लामिक नेता इसे उदारवादी एजेंडे की आड़ में धार्मिक आस्थाओं पर हमला बता रहे हैं.

इस कानून के विरोध में बेल्जियम की सड़कों पर यहूदी और इस्लाम के मानने वाले प्रदर्शन कर अपना विरोध जता रहे है लेकिन वहां की सरकार अभी अपने इस फैसले पर अडिग दिखाई दे रही है. सरकार का कहना है कि लोग आस्था और धर्म के नाम पर मध्य युग में रहना चाहते हैं लेकिन बेल्जियम में कानून धर्म से ऊपर है और वह उसी तरह रहेगा.
मुझे नहीं पता इस कानून से उनकी धार्मिक आस्था की स्वतंत्रता कितनी प्रभावित हो रही है. लेकिन यह जरुर पता है कि आस्था, परम्परा और मजहब के नाम पर निरीह पशुओं दर्दनाक मौत जरुर दी जा रही हैं. इसके लिए स्वस्थ पशुओं का चुनाव किया जाता है इसके बाद मुस्लिम हलाल और यहूदी कोषेर नियमों के अनुसार जानवरों को तड़फा-तड़फाकर मारते हैं.

जबकि उत्सव कोई भी हो उसका उद्देश्य होता है एक साथ खुशियां मनाना. लेकिन कुछ उत्सव ऐसे भी हैं जिनमें परम्पराओं के नाम पर पशुओं के साथ खुले आम बर्बरता दिखाई जाती है. मजहब, आस्था और अल्लाह के नाम पर सबसे बड़ी कुप्रथा का नाम है कुर्बानी जिसमें प्रतिवर्ष करोड़ों निरीह जानवरों के साथ क्रूरता की सारी हदें लांघ दी जाती है और अंधी आस्था में डूबे लोग इसे त्यौहार का नाम देते हैं.

ऐसे ही एक उत्सव नेपाल के देवपोखरी बड़ी ही धूम-धाम और संवोदनहीन होकर मनाया जाता है. यहां संवेदनाएं सिर्फ छोटे मासूम बच्चों की आंखों में दिखाई देती हैं, जो बेजुबान जानवर के साथ हो रही क्रूरता का मंजर हर साल अपनी आंखों से देखते हैं. हालाँकि नेपाल के गढ़ीमाई मंदिर में दी जाने वाली लाखों पशुओं की बलि पर रोक लग गई है. जिसे संवेदना के स्वयं गढ़ीमाई मंदिर ट्रस्ट ने आगे बढ़कर इस क्रूर प्रथा पर रोक लगाई थी इस मंदिर में हर पांचवें साल में होने वाली पूजा में लाखों पशुओं की बलि दी जाती थी.

सालों पहले भारत में भी कुछ मंदिरों में पशु बलि प्रथा का रिवाज था जो अब कानून के माध्यम से रोक दिया गया है. अंधविश्वास में घिरे लोगों द्वारा देवताओं को प्रसन्न करने के लिए बलि का प्रयोग किया जाता  था. लेकिन हिन्दू धर्म से जुड़ें कुछ विचारक और आर्य समाज जैसी संस्थाओं के घोर विरोध के कारण आज यह प्रथा ना मात्र को ही शेष बची है यदि कहीं बची भी है तो खुले तौर पर इसे नहीं मनाया जाता हैं.

भारत समेत पूरे विश्व में मानवीय संवेदनाओं को किनारे कर इस्लाम और यहूदी मत से जुड़े लोग आज भी इसकी वकालत करते दीखते हैं. जबकि ये बर्बर थी और बर्बर ही है. ईश्वर के नाम पर किसी का ख़ून बहाने के बजाय किसी को ख़ून देना, कहीं ज्यादा पवित्र काम है. ईश्वर के नाम पर अपना रक्तदान करना न सिर्फ मानवीय है, बल्कि इससे आप किसी की जान बचा सकते हैं.

किन्तु इसके उलट बकरीद पर बहुत से जानवरों को बहुतायत में मारा जाता है, और उन्हें खाया भी जाये यह जरूरी नहीं. बहुत से ऊंटों की भी कुर्बानी दी जाती है और आप सोच सकते हैं कि आस्था के नाम पर यह व्यापार कितना बड़ा होता होगा. जानवरों के कल्याण के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस परंपरा के चलते जानवरों को कत्ल के समय असहनीय दर्द सहना पड़ता है जबकि धार्मिक नेताओं का कहना है कि परंपरागत तरीके में भी जानवरों को कोई दर्द नहीं होता.

मुस्लिम और यहूदी धर्म के धार्मिक नेता हमेशा इस तरह के तरीके को स्वीकार नहीं करते हैं और इसे ईश्वर का कानून समझते है क्या कोई तार्किक व्यक्ति यह स्वीकार कर सकता है कि ईश्वर अपने बनाए जीवों की हत्या का आदेश देंगा? बेशक धर्म के नाम पर जानवरों की बलि देना एक प्राचीन परंपरा रही है, लेकिन निर्दयी रिवाजों को ख़त्म करने का काम तो अब तो सभी को मिलकर करना चाहिए. लोगों को स्वयं विचार करना चाहिए कि जो परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं, पर ये किस समय और किस उद्देश्य से बनाई गई थीं,  कम से कम इस पर बहस से तो शुरूआत की ही जा सकती है.
आज तार्किक बहस कर समाधान खोजना चाहिए. धर्म और पूजा में निस्वार्थ भाव, शांति और मानवता ही सिखाई जाती है. यदि उसके किसी क्रिया कलाप में दानवता है तो क्या वहां धर्म होगा? मानवता को जिंदा रखने का नाम धर्म है, फिर चाहे आप किसी भी मत या पंथ को क्यों न मानते हों. दया और स्नेह से बेहतरीन कोई कर्म नहीं होता, अगली बार जब किसी जानवर की हत्या कर किसी परम्परा या प्रथा को निभाने का मन हो तो चाकू पहले अपनी अंगुली पर चलाकर देखिये यदि दर्द का अहसास हो तो फिर उस निरीह पशु की आंखों में देखिये वह आपको अलग-अलग तरह से अपनी आंखों आभार  व्यक्त कर रहा होगा. कम से कम इतना मानवीय व्यवहार तो अपने अन्दर सिमित रखिए कि अब पशुओं को भी यूरोप की तरह अदालतों की ओर देखना न पड़ें..


सबरीमाला मंदिर विवाद, कितनी आस्था कितना षड्यंत्र


2 जनवरी की सुबह हर रोज की तरह ठंड थी पर अचानक माहौल तब गरमा गया जब ये खबर आई कि केरल के सबरीमाला मंदिर में भारी विरोध के बीच 50 वर्ष से कम उम्र की दो महिलाओं ने प्रवेश कर इतिहास रच दिया। बिंदु और कनकदुर्गा नाम की इन दो महिलाओं ने आधी रात को मंदिर की सीढ़ियां चढ़नी शुरू की और मुंह अँधेरे भगवान के दर्शन किए. इसके बाद बढ़ते विवाद की आशंका को देखते हुए मंदिर को अगले 2 दिन के लिए बंद कर दिया गया है।
पिछले काफी समय से सबरीमाला मंदिर विवाद देश की सुर्खियाँ बना हुआ है। जिसमें आस्था हैं, कोर्ट और महिलाएं हैं, दिखने में तो ये इस मुद्दे के मूल विषय है, लेकिन इसमें राजनीति और षड्यंत्र से भी इंकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि मन्दिर में अन्दर जाने का आन्दोलन चला कौन रहे है? रेहाना फातिमा नाम की मुस्लिम महिला और रोज मैरी नाम की ईसाई महिला। महिलाओं के प्रवेश के नाम पर चल रहे इस मंदिर में ऐसा क्या है कि ईसाई और इस्लाम धर्मों को मानने वाले तथाकथित विचारक भी मंदिर में घुसने को लालायित हैं?

इसके लिए सबसे पहले केरल का धार्मिक संतुलन समझना होगा और इस बात से शायद कोई अनजान नहीं होगा कि सत्तर के दसक से ईसाई और इस्लाम के मानने वाले के लिए धर्मांतरण की सबसे उपजाऊ जमीन बनी हुई है। धर्मांतरण की जमीन में सबरीमाला मंदिर सबसे बड़ी रुकावट बना हुआ खड़ा है। इसलिए इस मामले को ऐसे समझिये कि मंदिर में प्रवेश पाने के पीछे नीयत धार्मिक नहीं, बल्कि यहां के लोगों की मंदिर के प्रति सदियों पुरानी धार्मिक आस्था परम्परा को तोड़ना है। इस कारण बार-बार नये तमाशे लेकर स्थानीय लोगों की आस्था को चोट पहुंचाने का काम चल रहा है। कारण सबरीमला उन मंदिरों में से हैं जहाँ जातीय भेदभाव नहीं है। इस मंदिर के रिवाज अनूठे और अलग है, यहां दर्शन के दौरान भक्त ग्रुप बनाकर प्रार्थना करते हैं। एक दलित भी इस प्रार्थना को करवा सकता है और अगर उस समूह में कोई ब्राह्मण है तो वह भी उसके पैर छूता है।  इस जाति विहीन व्यवस्था का नतीजा है कि इलाके के दलितों और आदिवासियों के बीच मंदिर को लेकर अटूट आस्था है और यही आस्था इन धर्मांतरण के खिलाफाओं के रास्ता का काँटा बनी हुई है।
बताया जाता है कि यहाँ जब कोई दीक्षा लेता है तो उसे स्वामी कहा जाता है। यानी अगर कोई रिक्शावाला दीक्षा ले तो उसे रिक्शेवाला बुलाना पाप होगा इसके बजाय वो स्वामी कहलायेगा। इस परंपरा ने एक तरह से सामाजिक क्रांति का रूप ले लिया। मेहनतकश मजदूरी करने वाले और कमजोर तबकों के लाखों-करोड़ों लोगों ने मंदिर में दीक्षा ली और वो स्वामी कहलाये।
ये तो थी आस्था अब षड्यंत्र ये है कि मंदिर के बाहर मुस्लिम महिलाएं कतार में खड़ी है, जिन्हें इस्लाम के आरंभिक काल से मस्जिद में जाने की इजाजत नहीं है वे मंदिर में जाने का अधिकार मांग रही है। क्योंकि वह जानती है कि मंदिर प्रसाशन इसकी अनुमति देगा नहीं और आसानी से यह सन्देश सभी जगह चला जायेगा कि भगवान अयप्पा में कोई शक्ति नहीं है और वो अब अशुद्ध हो चुके हैं। अगर सबरीमला की इस पुरानी परंपराओं को तोड़ दिया गया तो धर्मांतरण करने वाली मिशनरियां अपना प्रचार आसानी से कर सकेगी। इस वजह से इस मामले में स्पष्ठ रूप से राजनीति और एक षड्यंत्र से इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि पेशे से पत्रकार कविता जक्कल, मुस्लिम विचारक रेहाना फातिमा, और मैरी स्वीटी यदि सच में महिलाओं के हक की बात करने वाली है तो क्यों नहीं अभी तक किसी मस्जिद के द्वार मुस्लिम महिलाओं के लिए खटकाये?
यह कोई नई साजिश नहीं है बताया जाता है कि 80 के दशक में 1980 में सबरीमला मंदिर के प्रांगण में ईसाई मिशनरियों ने रातों रात एक क्रॉस गाड़ दिया था। फिर उन्होंने इलाके में परचे बांट कर दावा किया कि यह 2000 साल पुराना सेंट थॉमस का क्रॉस है इसलिये यहां पर एक चर्च बनाया जाना चाहिये। यही नहीं सबरीमाला मन्दिर की एक मान्यता यह भी कि मंदिर में पूरे विधि-विधान से पूजा करने वालों को मकर संक्रांति के दिन एक विशेष चंद्रमा के दर्शन होते हैं और इस दिन यहाँ श्रद्धालुओं का बड़ा भारी जमावड़ा भी होता है। इसी की देखा-देखी इन धर्मांतरण की फसल काटने वालें ने सबरीमला मंदिर के आसपास चर्च में भी मकर संक्रांति के दिन फर्जी तौर पर चंद्र दर्शनकार्यक्रम आयोजित कराए जाने लगे।
आज सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बावजूद भी यह इतना बड़ा मसला इसलिये बना दिखाई दे रहा है क्योंकि वो समझ रहे हैं कि इस पूरे विवाद की जड़ में नीयत क्या है। इसलिए यह लोग बार-बार इस मुद्दे को उबालकर गर्म रखना चाहते हैं। सबरीमाला मंदिर विवाद सिर्फ मंदिर और महिलाओं तक सीमित नहीं हैं इसका दायरा राजनीति और षड्यंत्र तक फैलता है जो लोग आज इस मामले में टीवी पर बैठकर आस्था से तर्क करना चाहते है तो उन्हें समझना होगा कि कुछ आस्था में तर्क-वितर्क नही चलते, क्योंकि यदि एक भी दिन टीवी पर खुलकर तर्क-वितर्क  हुआ तो शायद इस्लाम, ईसाई से जुड़े बुद्धिजीवी एक भी तर्क के सामना नहीं कर पाएंगे।
हालाँकि मैं सबरीमाला मंदिर के पुजारियों की इस हट से सहमत नहीं हूँ कि 10 से 50 वर्ष के बीच महिलाएं अपवित्र होती है क्योंकि सौ अपराध करके भी कोई आदमी अगर अपवित्र नहीं और मंदिर जा सकता है तो कोई लड़की सिर्फ़ माहवारी की वजह से कैसे अपवित्र हो जाती है? मंदिर के पुजारियों को अपने तर्क बदल लेने चाहिए। हाँ यदि महिलाएं मंदिर में स्वयं ही आने की इच्छुक नहीं है और जो सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बावजूद भी अपनी किसी श्रद्धा के कारण मंदिर ने नहीं जाना चाहती उन पर दबाव बनाया जाना भी गलत हैं।



प्रयाग राज कुम्भ में आर्य समाज


भारत देश आध्यात्मिक देश है धर्म की थाती है और अनेकों पन्थो मतो का उदगम स्थल भी है। आध्यात्म का ज्ञान यहाँ से प्रसारित हुआ साथ ही अनेकों महापुरुषों ने इसी धराधाम पर जन्म भी लिया। यहाँ कई उत्सव, त्यौहार मनाए जाते हैं तो साथ ही धार्मिक-आध्यात्मिक आयोजन बहुत ही भव्य व आस्था के साथ मनाए जाते हैं। कुंभ मेला भी इन्ही आयोजनों में से एक है, इसमें शामिल होने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग आते हैं। इस बार 2019 में कुंभ मेले का आयोजन प्रयागराज में किया जा रहा है। प्रयागराज में अर्धकुंभ 15 जनवरी 2019 से प्रारंभ हो जाएगा और 04 मार्च 2019 तक चलेगा।

कुम्भ का पर्व एक महान अवसर हैं सम्पूर्ण देश के साथ विदेशों से करोड़ों व्यक्तियों का धार्मिक भावना से एकत्र होना अपने आप में हिन्दू संस्कृति के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि हैं। यह एक ऐसा आयोजन होता है जिसमें करोड़ों श्रद्धालु, जिज्ञासु, संत, महात्मा विद्वान और तपस्वी गण भाग लेते है। भला देश के अन्दर एक विशाल भू-भाग पर इतना बड़ा आयोजन हो और आर्य समाज की भूमिका न हो यह कैसे संभव हो सकता है। किन्तु इससे भी बड़ा सवाल यह है कि इस महान आयोजन का आध्यात्मिक लाभ आर्य समाज किस तरह लोगों तक पहुंचा सकता है। मन में इसी सवाल के साथ सैंकड़ों वर्ष पूर्व महर्षि दयानन्द सरस्वती ने हरिद्वार कुम्भ मेले में पाखण्ड खंडिनी पताका फहराकर हजारों व्यक्तियों तक वैदिक विचारधारा को पहुँचाया था।

भले ही पौराणिक कहानियों में कुम्भ के आयोजन को लेकर अनेकों कथाएं प्रचलित हो जिनमें से सर्वाधिक मान्य कथा देव-दानवों द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुंभ से अमृत बूँदें गिरने को लेकर है, किन्तु यह सिर्फ एक प्रचलित कथा हैं। असल में भारत ज्ञान की भूमि थी और कुम्भ जैसे आयोजन करने का उद्देश्य हमारे पूर्व विद्वानों का यह था कि ऐसे आयोजन में विचारों का मंथन करके ज्ञान का अमृत निकाला जाये। इसमें विश्व भर के विद्वान अपने ज्ञान, तर्क मान्य एवं अमान्य विषयों पर विचारों का मंथन किया करते थे। अंत में जो सत्य होता उसे मान्यता प्रदान करते और उस सत्य को अमृत समझ जीवन में उतारते।

इस महान व्यवस्था और आयोजन को समय के साथ कलंकित सा होना पड़ा जब पौराणिक कथाओं को सत्य मानकर अनेकों ढोंगियों, बाबाओं के वेश में जादू दिखाकर इसे अपनी धार्मिक शक्ति बताकर अंधविश्वास को प्रोत्साहित कर कुम्भ जैसे महान अवसर को सिर्फ गंगा स्नान और पूजा प्रार्थना तक सिमित कर दिया। इससे उनका व्यक्तिगत लाभ पता नहीं कितना हुआ पर आमजन सनातन वैदिक धर्म के सत्य स्वरूप से दूर होता चला गया।

जब स्वामी जी यह सब देखा तो उनका मन द्रवित हो गया गुरु से धर्म प्रचार की प्रतिज्ञा करके निकले स्वामी दयानन्द जी ने विचार किया कि छोटे-छोटे स्थानों में पांच-सात लोगों को समझाने से बेहतर है कि एक जगह इकठ्ठा हुए सभी विद्वानों संतों से धर्म चर्चा करके विचारों का मंथन करके क्यों न उन्हें वैदिक धर्म के सत्य स्वरूप का अमृत पिलाया जाये ताकि देश भर में एक ही बार में वैदिक सिद्धांतो की चर्चा फैल जाये। इस विचार से समाज को सत्य का सन्देश देने हेतु 1866 में जब स्वामी जी हरिद्वार कुम्भ में पहुंचे तो अपार भीड़ साधुओं के विशाल अखाड़ों को देखा तो उनका साहस टूटने लगा। किन्तु उनकी अंतरात्मा ने आवाज दी कि साहस मत तोड़ सब कार्य पूर्ण होगा क्या एक अकेला सूर्य संसार के सभी अंधकार को दूर नहीं कर देता?

आवाज सुनते ही उस दिव्य आत्मा ने अपने निवास स्थान के आगे एक झंडे पर पाखण्ड खंडिनी पताका लिखकर दिया, पाखंडों, अंधविश्वासों अवतारों श्राद्ध आदि पर जब स्वामी जी ने बोलना आरम्भ किया उस धार्मिक जन समुदाय में एक प्रकार की हलचल मच गयी अनेकों लोग धर्म की सच्चाई के सम्बन्ध में विचार करने लगे। अकेले स्वामी जी का यह प्रताप था कि सत्य ने असत्य को और ज्ञान ने अज्ञानता को हिलाकर रख दिया था।

स्वामी के निर्वाण के बाद इस कार्य को आर्य समाज के महानुभावों ने समय-समय पर संचालित रखा और इसे गति देने का कार्य किया. पंडित लेखराम जी, स्वामी श्रद्धानन्द ने ऐसे अवसर पर ही हरिद्वार में पाखण्ड-खण्डिनी पताका गाड़ कर अपने महान् और विशाल मिशन की विजय-दुंदुभि बजाई थी। वर्तमान समय में धर्म-कर्म और ईश्वर के नाम पर भटक कर अशांत जीवन जी रहे है या फिर ढोंगियों के चंगुल में फंसकर धन आदि की हानि करते नजर आ रहे है। यही एक ऐसा अवसर है जब हम अपनी प्राचीन वैदिक संस्कृति, वैदिक धर्म के सन्देश और हमारे विद्वान वैज्ञानिक ऋषियों की विचारधारा को करोड़ों के बीच प्रसारित कर सकते है। क्योंकि आज भी सत्य ज्ञान के आभाव में अंधविश्वास, पाखण्ड कुरीतियाँ और तरह-तरह के धर्म और भगवान उत्पन्न होते जा रहे है।

इसलिए इस अवसर पर सत्य ज्ञान एवं वैदिक विचारधारा को प्रवाहित करने हेतू पुन: प्रयागराज कुम्भ में वैदिक विद्वान् सन्यासी, विदुषी आचार्य, गुरुकुल के विद्यार्थियों समेत आमंत्रित किया गया है. इसके साथ ही देश विदेश से आर्यजनों की उपस्थिति में कार्यक्रम स्थल पर वैदिक साहित्य एवं सामग्री हेतु भव्य स्टाल सुन्दर आकर्षक यज्ञशाला एवं ज्ञानवर्धक कार्यक्रम प्रस्तुत कर ओ३म ध्वज और पाखंड खंडिनी पताका को फहराया जायेगा।


अंधविश्वास पर चढ़ी एक और बली


छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में अंधविश्वास में लिप्त एक बेटे ने तंत्र क्रिया के लिए अपनी मां की बलि चढ़ा दी हत्या कर उसका खुन पीया, शव के टुकड़े किये और पूजा कर चूल्हे में जला दिया ये खबर इसी भारत देश से हैं जो पिछले वर्ष 104 सेटेलाइट अन्तरिक्ष में एक साथ प्रेक्षित कर गर्व से दुनिया को अपने विज्ञान की ताकत से रूबरू करा रहा था किन्तु इसके बावजूद हम शर्मिदा हैं क्योंकि जितने लोग किसी देश में आतंक या युद्ध का शिकार होते है उससे कहीं ज्यादा लोग हमारे देश में प्रतिवर्ष अंधविश्वास का शिकार हो जाते है, यदि इस विषय के आंकडें उठाकर देखें तो इस अंधी श्रद्धा को देखकर सिर शर्म से झुक जाता है बावजूद इसके अंधविश्वास के इस खेल की दुदंभी बज रही है जब ऐसे हादसे होते है बड़े-बड़े धर्माचार्य या तो मौन पाए जाते या फिर एक कातिल को अज्ञानी कहकर मामले को रफा दफा करने की कोशिश करते हैं

संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट कहती है कि भारत में 1987 से 2003 तक 2 हजार 556 महिलाओं को डायन या चुड़ैल कह कर मार देने के हादसे हुए, एक दूसरी रिपोर्ट के अनुसार देश में 2011 में 240, 2012 में 119, 2013 में 160 हत्याएं अंधविश्वास के नाम पर की गयी. इसके बाद यदि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा पेश किये गये आंकडें देखें तो अकेले आंध्र प्रदेश और तेलंगाना दोनों राज्यों में साल 2000 से 2012 के दौरान 350 लोगों को इस शक में मार दिया गया कि वो दूसरों पर काला जादू कर रहे हैं.

इन सब आंकड़ों के बाद पिछले वर्ष की खबरें ही उठाकर देखें बड़ी अफसोस जनक खबरें मिलती हैं, राजस्थान के भरतपुर के वैर में एक बाबा ने तांत्रिक विद्या हासिल करने के लिए अपने ही पोते की बलि दे दी थी जयपुर में पोते की चाह में एक दादी ने अपनी ही एक मासूम पोती को पानी के टैंक में डुबोकर मार दिया था, तो राजस्थान के ही जोधपुर में रमजान के महीने में एक शख्स ने अल्लाह को खुश करने के लिए अपनी ही 4 साल की मासूम बेटी की बलि दे थी
अंधविश्वास और तंत्र क्रिया का यह खेल हत्या तक ही सीमित नहीं हैं पिछले वर्ष ही मध्य प्रदेश के शहडोल में कैदी ने जेल के अंदर बने देवी मंदिर में अपनी जीभ काटकर चढ़ा दी थी, जांजगीर चंपा में एक महिला ने शिव मंदिर में अपनी जीभ काटकर चढ़ा दी थी एक घटना बिहार के दरभंगा जिला में हुई जहाँ चैती दुर्गा पूजा के दौरान अंधविश्वास की पराकाष्ठा का अविश्वसनीय नमूना देखने तब मिला, जब एक युवती ने गाँव में स्थापित मां दुर्गा के चरणों में अपनी आंख चढ़ाने का प्रयास करने लगी इसके अलावा तेलंगाना के हैदराबाद में एक शख़्स ने एक तांत्रिक के कहने पर चंद्र ग्रहण के दिन पूजा की और अपने बच्चे को छत से फेंक दिया

आधुनिक सदी में समाज में अंधविश्वास घटने के बजाय बढ़ता जा रहा है अंधविश्वास के अनेकों किस्म हैं, जिनमें भूत, चुड़ैल है, जिन्न हैं, वशीकरण, जादू, टोने टोटके आदि हैं जिसकी मदद से कुछ ढोंगी बाबाओं, ओझाओं और दरगाहों पर रहने वाले लोगों की रोजी चल रही है कोई पंथ-मजहब इससे अछूता नहीं है महत्वपूर्ण बात यह है कि अंधविश्वास फैलाने में विज्ञान से शिक्षा प्राप्त डॅक्टर, इंजीनियर भी शामिल हैं इनके अलावा देश के नेताओं लिए कुछ कहना सुनना बेकार है क्योंकि उन्हें सिर्फ वोट से मतलब चाहें समाज इससे और ज्यादा गर्त में क्यों न चला जाये क्या हम ऐसे डॉक्टरों और इंजीनियरों या नेताओं से यह अपेक्षा कर सकते हैं कि वे अंधविश्वास के खिलाफ खड़े हो सकेंगे?

शायद इसी कारण सरकारें मौन हैं और मीडिया ऐसे ढोंगियों के प्रसार का बड़ा माध्यम और सहयोगी बन चुका है इसी अनदेखी का ही नतीजा है कि अंधविश्वास फैलाने वालों का बड़ा नेटवर्क इंटरनेट से लेकर मीडिया और प्रिंट मीडिया पर छाया हुआ है नतीजा ज्यादातर लोग डॉक्टर से अधिक ऐसे ढोंगी तांत्रिकों पर विश्वास करने लगे हैं इन बहुरूपियों की शिकार अधिकांश महिलाएं हो रही है और महिलाओं के जरिए पुरुष भी इनके शिकार बन रहे हैं ये किसी प्रकार के आंतक से कम नहीं है क्योंकि इसमें भी भय का सिद्धांत सर्वोपरी बनाया जा रहा है इस आतंक की शिकार महिलाओं की आबरू लुटी जा रही और पुरुषों से धन की उगहाई की जा रही है

अंधविश्वास के सहारे लूट और हत्याओं का सिलसिला जारी है विडम्बना देखिये देश में किसी भी साम्प्रदायिक हिंसा या उसमें हुई किसी एक मौत के लिए महीनों कार्यक्रम चल सकते है, उस पर कड़े कानूनों की मांग हो सकती है, लेकिन अंधविश्वास के कारण लगातार हो रही हत्याओं और लूट बलात्कारों पर एक कार्यक्रम पेश नहीं किया जा रहा और न मीडिया के बुद्धिजीविओ की और से किसी कानून की मांग की जा रही हैं

अंधविश्वास के कारण हालात दिन पर दिन बदतर होते जा रहे है सरकारों को समझना होगा कि देश में चुनौती सिर्फ सत्ता का निर्माण करना नहीं है बल्कि आज हम जिस आधुनिक सदी में जीवन जी रहे है, उसके अनुकूल एक अंधविश्वास रहित समाज का निर्माण करना भी किस चुनौती से कम नहीं हैं आज हमारा इस गणतंत्र भारत की सभी राज्यों की सरकारों और केंद्र सरकार से अनुरोध है कि शिक्षा प्रणाली में अंधविश्वास पर एक विषय शामिल जरुर किया जाना चाहिए ताकि अंधविश्वास और विज्ञान का एक जगह समाहित ना हो सके दूसरा सभी प्रकार के अंधविश्वासो पर कड़े कानून का भी निर्माण किया जाये ताकि एक माँ अपने बेटे के हाथों बे मौत न मारी जाये, एक पोते का काल उसका दादा न बन पाए और किसी मासूम बच्ची को अल्लाह के लिए कुर्बान न होना पड़ेंराजीव चौधरी


इस्लाम छोड़ने की सजा


पिछले कई रोज से यह खबर अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियाँ बटोर रही कि सऊदी अरब की एक युवती इस्लाम तथा अपने परिवार से दूर भागकर आस्ट्रेलिया जाने की कोशिश कर रही थी और  बैंकॉक के मुख्य एयरपोर्ट में फंस गई है, अब 18 साल की रहफ मोहम्मद अल-कुनन कह रही है कि अगर वह दोबारा लौट कर अपने परिवार के पास गईं तो इस्लाम त्यागने के कारण उनकी हत्या हो सकती है. हालाँकि इस्लाम त्याग कर भाग रही सऊदी लड़की को कनाडा ने उसे अपने देश में शरण दे दी हैं. दुनिया के अनेकों विचारक इस विषय पर अपनी गंभीर राय रख रहे है कि क्या इस्लाम से बाहर जाने का मौत के अलावा कोई दूसरा विकल्प क्यों नहीं है?

सऊदी अरब में इस्लाम त्यागने को एक जुर्म की तरह देखा जाता है, जिसकी सजा मौत होती है. यह कानून छठी-सातवीं शताब्दी से लागू है जिसका अभी भी पालन जारी है. माना जाता है कि यह व्यवस्था कुरान के अनुसार है जो सऊदी अरब की धार्मिक व्यवस्था का आधार भी है. यह व्यवस्था जन्म से लेकर मौत तक किसी भी इस्लाम के मानने वाले की जिंदगी के रास्ते तय करती है खासकर महिलाओं के मामले में तो इसका बेहद कड़ाई से पालन किया जाता है उनके साथ हर पल एक नाबालिग जैसे व्यवहार किया जाता है.

आज जिन लोगों को लगता होगा कि हर किसी को यह अधिकार हासिल है कि वो जिस धर्म-मजहब में पैदा हुए है उसको छोड़कर किसी दूसरे धर्म में आसानी से जा सकते है तो उनके लिए शायद इस्लाम बुरा सबक होगा क्योंकि इस्लाम शुरू से ही वन वे स्ट्रीट की तरह है जिसमें इन्सान आ तो सकता है लेकिन आसानी से जा नहीं सकता. इस्लामिक मुल्कों के जानकर कहते हैं कि कोई भी इन्सान इस्लाम स्वीकार करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है, लेकिन उसे इस्लाम को छोड़ने की स्वतन्त्रता नहीं है यदि कोई कोशिश करता है तो उसकी सजा मौत है जैसे अब 18 साल की सऊदी लड़की रहफ मोहम्मद अल-कुनन कह रही है कि यदि वह अपने घर वापिस गयी तो उसका परिवार उसकी हत्या कर देगा.

हालाँकि यह बात सभी जानते है कि अहिंसा, प्रेम, सद्भाव धर्म का मूल होता है, समस्त स्रष्टि ईश्वर की बनाई हुई हैं फर्क सिर्फ इतना हुआ कि बीते दो से तीन हजार सालों में बहुतेरे लोगों ने सोच, समझ और सनक से मत, पंथ और सम्प्रदाय बना डाले इस कारण आज ईश्वर को लोग अलग-अलग नामों से मानते हैं. इसमें सोचने की बात यह है कि अगर स्रष्टि का रचयिता एक है तो उसका आदेश अलग-अलग कैसे हो सकता है? मानवता ही हम सबका का पहला धर्म है.
पर इस्लाम के संदर्भ में क्या ऐसा कहा जा सकता है? क्योंकि देश-विदेश से जो भी जानकारी आती है वह इस कथन को उल्टा कर देती हैं. साल 2015 में बीबीसी ने धार्मिक स्वतन्त्रता को लेकर ब्रिटेन के अन्दर एक पड़ताल की थी. इस पड़ताल के बाद बीबीसी से जुड़ी पत्रकार समीरा अहमद ने एक रिपोर्ट जारी करते लिखा था कि ब्रिटेन के अंदर इस्लाम छोड़ने या छोड़ने का इरादा रखने वाले मुसलमान नौजवानों को धमकियां मिल रही है, उन्हें डराया जा रहा है और उनका समुदाय से बहिष्कार किया जा रहा हैं. ब्रिटेन के कुछ शहरी मुसलमानों का मानना है कि इस्लाम को छोड़ना गुनाह है और इसकी सजा मौत भी हो सकती है.

उन्होंने लिखा था कि कई मामलों में तो उन्हें गंभीर शारीरिक यातनाओं का भी शिकार होना पड़ रहा है. स्थानीय काउंसिलें भी हैं जिन्हें इस मसले पर कम जानकारी है कि मुसीबत में फंसे इन नौजवानों को कैसे बचाया जाए. समीरा ने एक चौदह वर्ष की लड़की का उदहारण देते लिखा था कि लंकाशायर की आयशा सिर्फ 14 साल की थीं जब उसने इस्लाम को लेकर सवाल करने शुरू कर दिए. वह क़ुरान का अध्ययन कर रही थीं. उसने हिजाब पहनने से मना कर दिया और आख़िरकार फैसला लिया कि वह इस्लाम छोड़ रही हैं. उसके बाद तो घर में हालात बुरे हो गए. उसके पिता ने उसके गले पर चाकू रखकर मारने की धमकी दी और कहा कि अगर वह ऐसा करके परिवार को शर्मिंदा करती हैं तो वो उसे मार सकते हैं. इसके बाद उसकी बुरी तरह पिटाई की गयी अंत में आयशा को पुलिस को बुलाना पड़ा.

इसी तरह कुछ समय पहले लेखक तुफैल अहमद ने भी लिखा था कि मौलिक स्वतंत्रता का हनन और बढ़ते कट्टरवाद के कारण भारत में मुसलमान इस्लाम को छोड़ रहे है. बीते 5 सालों से यह चलन बढ़ा है. यूरोप और अमेरिका में यह ट्रेंड सबसे अधिक देखा जा रहा है. इस्लाम धर्म को छोड़ने वाले मुसलमान स्वयं को एक्स-मुस्लिम अर्थात पूर्व मुसलमान कहते है. मुस्लिम धर्म को त्यागने वाले ज्यादातर नास्तिकता को अपना रहे है जबकि बड़ी संख्या में लोग हिन्दू और बौद्ध धर्म भी अपना रहे हैं. जैसे जैसे एक्स मुस्लिम का ट्रेंड बढ़ा है वैसे वैसे इनपर धमकियाँ और हमले भी बढ़े हैं.
आज मुद्दा यह नहीं है कि ये धमकियाँ और हमले क्यों बढे है बल्कि मुद्दा यह है कि सातवीं सदी के कानूनों से आज भी लोगों को उसी तरीकों से हांका जा रहा है और धार्मिक स्वतंत्रता देने की बजाय आधुनिकता का घोर विरोधी बनकर आज भी इस्लाम को छोड़ने की सजा रूप में मौत के फरमान सुनाये जा रहे हैं. शायद इसी कारण धार्मिक स्वतंत्रता के पक्षधर युवा इसे नकार रहे हैं...राजीव चौधरी