Thursday, 13 July 2017

अंतर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन म्यंमार में ही क्यों?

पिछले वर्ष नेपाल अंतर्राष्ट्रीय महासम्मेलन की सफलता के बाद अगले महासम्मेलन के लिए ब्रह्मदेश का चुना जाना एतिहासिक द्रष्टिकोण में एक गौरव का विषय है। ब्रह्मदेश यानि बर्मा और आज वर्तमान में म्यंमार कहा जाता है। इसी म्यांमार के मध्य में बसने वाले शहर मांडले का आर्य महासम्मेलन के लिए चुना जाना हमारे लिए और भी सौभाग्य का क्षण है। यह स्वतंत्र बर्मा की भूतपूर्व राजधानी, मुख्य व्यापारिक नगर एवं आवागमन का केंद्र है जो इरावदी नदी के बाएँ किनारे पर रंगून से लगभग 350 मील उत्तर दिशा में बसा है, कहते हैं इसे 1856-57 ई. में राजा मिंडान ने इसे बसाया था। शहर में बौद्ध  धर्मावाल्म्बियों के अतिरिक्त हिन्दू, मुसलमान, यहूदी, चीनी एवं अन्य जाति के लोग निवास करते हैं। द्वितीय महायुद्ध के समय 1942 ई. को जापानियों ने इस पर अधिकार कर लिया था। उस समय राजमहल की दीवारों के अतिरिक्त लगभग सभी इमारतें जल गई थीं। तब जापानियों ने इसे ‘‘जलते हुए खंडहरोंवाला नगर’’ कहा था हालाँकि आज मांडले से बर्मा की सभी जगहों के लिये स्टीमर सेवाएँ हैं तथा यह रेल एवं सड़क मार्ग द्वारा भी देश के अन्य हिस्सों से जुड़ा है। कभी वैदिक सभ्यता काल के इस ब्रह्मदेश में आज पगोडा शैली में बने भवन व मंदिर बौद्ध स्पुत बौद्ध धर्म से जुड़ी आस्था के केंद्र होने का आसानी से पता चल जाता है।

मांडले का मौसम लगभग भारत जैसा ही है। सर्दियों में कड़ी सर्दी, गर्मियों में आकाश से लेकर धरती तक भट्टी की तरह तपती है तो बरसात में भारी वर्षा भी यहाँ होती है। मंदिरों, प्राकृतिक सुषमा और सौन्दर्य से भरपूर यह शहर अपनी अनेक विशेषताओं के कारण भी जाना जाता है। यहाँ दुनिया की सबसे बड़ी पुस्तक के रूप में एक मंदिर विधमान है यानि कि किताब के हर प्रष्ठ के रूप में एक मंदिर बना है जिनकी संख्या करीब 500 से ज्यादा है।

इस वर्ष महासम्मेलन की तैयारियों से जुड़े सम्बन्धित कार्यों का जायजा लेने के लिए मेरा मांडले जाना हुआ तो मांडले की धरती पर पांव पड़ते ही भारत के महान गौरव लाला लाजपत राय और बाल गंगाधर तिलक, नेताजी सुभाषचंद्र बोस मन में उभर आये। मांडले में ब्रिटिश शासनकाल में यहां किलानुमा जेल थी जहाँ भारत माता के इन वीर सपूतों को बंदी बनाकर रखा गया था। किले के अवशेष आज भी भारतीय क्रांति की स्मृति ताजा कर देते हैं। प्रसिद्ध आर्य समाजी लाजपत राय समेत कई क्रन्तिकारी यहाँ एकांतवास में रखे गये थे। अकेले और असुविधाओं के बीच, सिर्फ इसलिए कि आर्य समाज भारत देश से गुलामी की बेड़ियाँ काटकर फेंक देने पर अडिग था जिसे अंग्रेजी हकुमत नहीं चाहती थी।


हालाँकि बर्मा की गलियों में आर्य समाज के नाम का डंका बज चुका था। क्योंकि आर्य समाज की स्थापना के बाद बर्मा के इसी मांडले शहर में वैदिक धर्म के अनुयायियों महर्षि दयानन्द के अनन्य भक्तों का आगमन लगभग सन् 1897 में हो गया था। भौगोलिक इतिहास में कभी भारत से जुड़े इस देश में महर्षि दयानन्द, पंडित लेखराम स्वामी श्रद्धानन्द  समेत अन्य समकालीन महात्माओं, संतो के वैदिक उपदेश जब यहाँ के लोगों के कानों में गूंजे तो शीघ्र ही बर्मा के प्रसिद्ध  नगर रंगून (यंगून) और मांडले में आर्य समाज मंदिर बन गये। यह सब कार्य वैदिक धर्म प्रेमी लोग बड़े उत्साह और लग्न से करने लगे। वैदिक ध्वज एक फिर ब्रह्मदेश की धरती पर लहरा उठा। 

धीरे-धीरे वर्ष बढ़ते गये अगली सदी के सूर्य उदय के साथ आर्य समाज दिन-दूनी रात-चौगनी प्रगति करने लगा। आर्य समाज की गतिविधियां  विद्यालय, अनाथालय, सत्संग संचालित होने लगे प्रत्येक बड़े शहर में जैसे रंगून, माण्डले, लाशियो, मिचिना, मोगोग, जियावाड़ी में स्थापित अनाथालय, स्कूल व सामाजिक संस्थाओं के कार्यों समेत स्त्री समाज की शिक्षा के प्रोत्साहन को लेकर तथा अन्य सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आर्य समाज के कार्यों ने लोगों का मन जीत लिया था। लोग अपने साधारण भवनों के साथ जमीन और पैसे समाज के कार्यों के लिए दान स्वरूप भेंट करने लगे। 

लेकिन जल्दी ही नई सदी के इस सूर्य को दूसरे विश्व युद्ध का ग्रहण लग गया जो द्वितीय विश्व यु( के बाद बर्मा में पैदा हुए भारत विरोधी रुझान का शिकार बन गया था। उस समय रंगून में आधी आबादी भारतीयों की थी। वे ब्रिटिश प्रशासन में महत्त्वपूर्ण पदों पर थे और इसीलिए बर्मा के नागरिकों के निशाने पर थे। उन्हें नस्लभेदी हमलों का सामना भी करना पड़ा। सन् 1962 में भारतीयों को बर्मा से निकाला जाने लगा और उनकी निजी और धार्मिक सम्पति का राष्ट्रीयकरण किया जाने लगा था। उस समय भारतीय मूल के लगभग तीन लाख लोगों को बर्मा से पलायन करना पड़ा था।

बर्मा में सैनिक शासन के प्रारम्भ के साथ वैदिक साहित्य आदि पर रोक लगा दी गयी। बौद्ध धर्मी बहुसंख्यक इस प्रदेश में नवीन साहित्य के प्रकाशन, बिक्री आदि पर रोक लगा दी गयी। एक किस्म से आर्य समाज के उत्साहित विद्वानों के उत्साह आर्य समाज के कर्मठ कार्यकर्ताओं के कार्यों पर चोट जैसा था। लेकिन इसके बावजूद भी हमारा प्रणाम और नमन उन आर्य कार्यकर्ताओं को जिन्होंने फटे, पुराने आर्ष ग्रन्थों से ही वेद की ज्योति के दीपक को बुझने से बचाए रखा। यदि आज वर्तमान में बर्मा के अन्दर आर्य समाज की बात की जाये तो शहरी क्षेत्रों की आर्य समाज मंदिर बेहद भव्य तो ग्रामीण क्षेत्रों की आर्य समाजें वैदिक ज्ञान की लोलुपता के कारण खस्ताहाल हैं। आज मुझे लिखते हुए हर्ष हो रहा है कि आर्य महासम्मेलन जैसा गौरवान्वित कार्य को करने में सार्वदेशिक सभा के तत्वावधान में एक बार फिर करीब 120 साल बाद दयानन्द के सिपाही मांडले में अंतर्राष्ट्रीय महासम्मेलन आयोजित कर ब्रह्मदेश (म्यांमार) में वैदिक ज्योति को पुनः उसी वेग से जागृत करने का कार्य करेंगे।
-विनय आर्य 


दादागिरी और मजहब में फर्क समझिये

जलती दुकान, जलते मकान, बेघर सुबकते लोग मन में सवाल लिए जरुर घूम रहे होंगे कि क्या बंगाल में हिन्दू होना गुनाह है? ममता बनर्जी जब सत्ता में आई तब उनका नारा था माँ, माटी और मानुष लेकिन जिस तरह उनके वर्तमान कार्यकाल में काण्ड हो रहे है उसे देखकर कोई भी कह देगा कि राज्य में उनका नारा माँ, माटी और मौलवी ही बनकर रह गया.  अब तक राज्य से की ख़बरों से मालूम होता है कि उपद्रवी मुसलमानों की भीड़ ही हमलावर रही है, हिंदू इसमें शरीक नहीं हुए हैं. इस कारण इसे दंगे के बजाय सिर्फ मुस्लिम हिंसा का नाम देना भी गलत नहीं होगा फेसबुक पर पोस्ट डालने वाला लड़का गिरफ्तार हो गया. फिर भी हिंसा हुई. यह भी कहा जा रहा है कि गिरफ्तारी से मुसलमानों की आहत भावना संतुष्ट नहीं हुई है. तो वे चाहते क्या थे? क्या उस लड़के को उसी वक़्त सजा दी जानी चाहिए थी और क्या वह सजा भीड़ देती? लेकिन क्या उसके ऐसा करने से हिंसा न होतीमालदा, धुलागढ़ और अब बशीरहाट बंगाल का मुस्लिम क्या यही चाहता है कि हर चीज सड़क पर निबटाई जाये?

ऐसा इसलिए नहीं है कि इस राज्य में सांप्रदायिक तनाव की स्थिति कभी बनती ही नहीं बल्कि इसलिए कि उनकी ख़बरें कभी बाहर आती ही नहीं थी. कम से कम पिछले हफ्ते तक तो यही सूरत थी बंगाल में मुसलमान दूसरे राज्यों के मुक़ाबले ज्यादा तादाद में हैं. राजनीतिक दलों में भी वे दिखलाई पड़ते हैं. स्थानीय स्तर पर भी वे दब कर नहीं रहते बल्कि चढ़कर रहते है पिछले साल मालदा में भी इसी तरह पैगम्बर मोहम्मद और मजहब के अपमान से गुस्साए मुसलमानों ने सरकारी संपत्ति को भारी नुक़सान पहुँचाया था. सड़क पर गाड़ियों को आग लगाते मुसलमानों की तस्वीरें ख़ूब घूमती रहीं इससे यह लोग क्या साबित करना चाहते है सिर्फ यही कि मुसलमानों को मौक़ा दो और देखो! बशीरहाट में मुसलमान बहुसंख्या में हैं. वहां प्रसाशन मौन बना रहा मीडिया की माने तो पुरे प्रकरण में जिस तरह वहां राज्य सरकार खामोश रही इसे देखकर भी लोग अपनी-अपनी सुविधानुसार अंदाजा लगा सकते है.

सरकारी शुतुरमुर्गी प्रवृत्ति वोट के लालच में सरकार को देखने नहीं देती कि यह बीमारी उसके भीतर मौजूद है. लेकिन यहाँ तो बंगाल के सबसे प्रभावशाली समाचार समूह ने भी इस हिंसा ख़बर नहीं बनने दी. धूलागढ़ की हिंसा की ख़बर को भी इसी तरह दबाने की कोशिश हुई थी. हालाँकि इस बार ख़बरें बाहर आ रही हैं. हद से कुछ सेकुलरवाद से प्रभावित नेता इस घटना की निंदा करने के बजाय केंद्र सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि अल्पसंख्यको के खिलाफ काम कर रहे हैं. पर इसमें भी जो मुद्दे उठा रहे हैं, वो धर्म को लेकर ही हैं. ये अफसोस की बात है 2017  में भी आकर इस्लाम को महमूद गजनवी के चश्मे से ही देखा जा रहा है. तैमूर की आंखों से. जो कि इतिहास का एक हिस्सा भर थे. जब थे, तब थे. जहां थे, वहां थे. अब किस बात का स्वांग?

इस मामले में ताबिश सिद्दीकी ने लिखा है कि अगर आप मुसलमान हैं और आपको मेरी बात बुरी लग रही है तो जान लीजिये कि आप पूरी तरह से अरबी दादागिरी की गिरफ्त में हैं. ये सब धर्म नहीं है. ये राजनीति है और शुद्ध राजनीति. अरबों का इस्लाम, धर्म नहीं है. मस्जिदों में इस्राईल को बद्दुआ देना मजहब नहीं है. ग्यारह साल के बच्चे को एक कार्टून के लिए दोष देना और उस वजह से पचासों लोगों की दुकानें जला देना मजहब नहीं है. ये राज =नैतिक दादागिरी है. और आपके धर्म का ढांचा कुछ नहीं अब सिर्फ राजनीति है. बस गड़बड़ ये हुआ कि आपकी इस दादागिरी को लोगों ने अब तक सहा है. तो आपको ये अपने धर्म का हिस्सा लगने लगा है.


वो आगे लिखते है इसे मजहब कहते हैं आप? शर्म नहीं आती है आपको खुद को मुसलमान कहते हुए? बांग्लादेश में आपने कितने ब्लागर बच्चों को मार दिया, पाकिस्तान में  ईशनिंदा के नाम पर कितनो को मार दिया. और यहां चूंकि आपका बस नहीं चल रहा है तो आप दुकानें जला के काम चला ले रहे हैं. ये बिमारी बहुत बहुत गहरी है और ये बिमारी बढ़ी ही इसलिए क्योंकि सारी दुनिया ने इसे स्वीकार कर लिया. ये आक्रामक बने रहे और लोग इसे स्वीकार करते रहे. ये मजहब है कि सारी दुनिया आपसे डरे? ये धर्म है कि वहां लोग चैन से जी न पायें जहां आप बहुसंख्यक हो जाएं? इस खूंखार मानसिकता को मजहब कहते हुए आपकी जबान नहीं जलती है? दादागिरी और मजहब में फर्क समझिये. जल्दी समझिये क्योंकि दुनिया का भरोसा और सब्र अब टूट रहा है.
राजीव चौधरी 

आखिर सीधी कार्यवाही कब..!!

अमरनाथ यात्रियों पर किया हमला मन को व्यथित और विचलित करने वाला है कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में अमरनाथ यात्रियों पर हुए एक आतंकी हमले में एक बार फिर कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और कम से कम 19 अन्य लोग घायल हुए हैं. हमले में चरमपंथियों का निशाना बनी बस में कुल 56 यात्री सवार थे जिनमें से ज्यादातर यात्री गुजरात के थे. कुछ यात्री महाराष्ट्र के भी थे. सरकार के बड़े मंत्रियों से लेकर नेताओं तक इस घटना की कड़ी निंदा की है. पर प्रश्न यह कि कब तक निंदा रूपी शब्द से काम चलेगा इस आतंक के खिलाफ सीधी कारवाही कब होगी? निंदा किसी मसले का हल नहीं है क्योंकि अगस्त, 2000 को आतंकियों द्वारा पहलगाम के बेस कैंप में पर हमला किया था. बेस कैंप में 32 लोग मारे गए थे. तब भी हमने सिर्फ निंदा की थी यदि उस समय सीधी कारवाही की होती तो अगले वर्ष जुलाई, 2001 को अमरनाथ गुफा के रास्ते की सबसे ऊंचाई पर स्थित पड़ाव शेषनाग पर 13 लोगों की मौत आतंकियों द्वारा हत्या नहीं होती! लेकिन फिर भी हमने निंदा ही की यदि सीधी कारवाही की होती अगले वर्ष अगस्त, 2002 को चरमपंथियों ने पहलगाम में हमला करने की जरूरत नहीं करते जिसमें नौ लोगों की मौत हुई थी और 30 अन्य लोग घायल हो गए थे.

पिछले साल 9 जुलाई को हिजबुल का आतंकी बुरहान वानी भारतीय सेना के हाथों मार गिराया गया गया. जिसके बाद उम्मीद की जा रही कि सुलगते चिनार और रक्त से लाल हुई बर्फ की चादर अपने पुराने रंगों में लौट आयेंगे. लेकिन आज हालत ये है कि मीर वाइज जैसे नेता लगातार अपनी रैलियों में इस बात का ऐलान कर रहे हैं कि वही कश्मीरियों के दर्द को समझते हैं और उनके हिमायती हैं और अगर लोगों ने उनका साथ दिया तो वो एक दिन कश्मीर को आजादी दिला देंगे. मीर वाइज जैसे नेता कश्मीर को आजादी दिलाकर कहां ले जाएंगे? मजहबी मानसिकता के कारण कश्मीर जैसा खूबसूरत राज्य अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है, बढ़ता आतंकवाद और पाकिस्तान परस्ती राज्य की एक गंभीर समस्या है. राज्य की खस्ताहाली में जो कमी रह गयी थी उसे मीरवाइज उमर फारूक, गिलानी और यासीन मलिक जैसे कट्टरपंथी नेताओं ने पूरा कर दिया है. हालाँकि राज्य में जिस तरह सेना और पुलिस द्वारा आतंकियों का खात्मा करके आतंकवाद पर नकेल कसी जा रही है उसके लिए निस्संदेह ही सेना और पुलिस की सराहना होनी चाहिए. जहां एक तरफ कश्मीर से आ रहीं ऐसी खबरें एक आम भारतीय को सुकून देतीं हैं तो वहीं उसका दिल तब बैठ जाता है जब वो किसी आतंकी के जनाजे में जिंदाबाद के नारों के बीच अमरनाथ यात्रियों पर हमला बोल देते है.

कश्मीर में तहरीक ए आजादी का नारा देकर अलगाववादी खुलेआम जहर बाँट रहे है मस्जिदों का उपयोग प्रार्थना इबादत के बजाय राजनीति और अलगाव के लिए हो रहा है. जिसे सीधे तौर पर मजहब से जोड़ दिया गया है. बड़ा सवाल यही उभरता है कि आखिर कश्मीर को आजादी दिलाकर कहां ले जाएंगे? यह सवाल किसी एक कश्मीरी से नहीं बल्कि भारत में राजनैतिक और बोद्धिक रूप से इनका समर्थन करने वाले सब लोगों से है. यदि कश्मीरी समुदाय कुछ पल को मजहबी भावनाएं किसी संदूक में रखकर ये सोचे कि मजहब के नाम पर बनने वाले पाकिस्तान से किसे लाभ हुआ? क्या पाकिस्तान के बनने से ख़ुद पाकिस्तान को लाभ हुआ? यानी अगर वह इलाका आज भारत के अधीन होता तो क्या वहां हालात आज से बदतर होते या बेहतर होते? सवाल घूमकर फिर वहीं आ जाता है कि मजहब के नाम पर पाकिस्तान बनाने वालों के सिवा किसे लाभ हुआ? आज जो कश्मीरी समुदाय आजादी के लिए कट्टरपंथ और अलगाववाद का हिस्सा बन रहा है वो जरुर सोचें क्या पाकिस्तान बनने से मुसलमानों को कोई फायदा हुआ?

जिन्ना ने पाकिस्तान मांगते हुए कहा था कि हिन्दू मेरी इबादत में खलल डालेगा इसलिए मुझे पाकिस्तान चाहिए. क्या हुआ आज उसकी इबादत का? पाकिस्तान का बच्चा-बच्चा या कहो 20 करोड़ की आबादी संगीनों के साये में अपनी इबादत करते नजर आते है. जबकि भारत में रह रहे मुस्लिम सड़कों तक पर आराम से सुरक्षित नमाज अता करते दिख जायेंगे. लेकिन यहाँ का बहुसंख्यक समुदाय अपनी आस्था उपासना के लिए सरकार का मुंह देख रहा कि कब सुरक्षा का आश्वासन मिले और में बिना विघ्न अपनी पूजा अर्चना कर पाए. आखिर क्यों देश के टेक्स की बड़ी रकम से हजयात्रा पर सब्सिडी मिल रही है और अमरनाथ यात्रा पर गोली? ऐसे हमलों की निंदा तो हम के वर्षों से सुनते आ रहे हैपर अब समय आ गए है की इसके खिलाफ  सीधी कार्यवाही की जाये!
 राजीव चौधरी 


Saturday, 8 July 2017

वेटिकन के सफेद कपड़ों का काला सच

गुड फ्राइडे 6 मार्च और साल 2010 सुबह.सुबह पुरे जर्मनी के गिरजाघरों में चर्च पदाधिकारियों के हाथों यौन शोषण का शिकार बने लोगों के लिए विशेष प्रार्थना सभाएँ आयोजित की गई थीं. उसी दिन रोम के अख़बारों में ये ख़बर पहले पन्ने की सुर्ख़ियों में छपी थी कुछ अख़बारों ने इसे वैटिकन सामूहिक नरसंहार का नाम दिया है. क्योंकि इससे चार दिन पहले ही फ्राइडे के अवसर पर अपने संदेश में आर्चबिशप रॉबर्ट सोलिच ने कहा था कि चर्च ने संभवतरू अपना नाम ख़राब होने के डर से पादरियों द्वारा मासूम यौन उत्पीडितों की मदद नहीं की. हम कि बीते काल की गलतियों के लिए कैथोलिक चर्च हमेशा शर्मसार रहेंगे.

आर्चबिशप के इस बयान के बाद समूचे यूरोप में पादरियों के विरुद्ध लोगों का कुछ गुस्सा तो कम हुआ पर चर्चों के प्रति लोगों की आस्था में भारी गिरावट हो गयी थी. ऐसा नहीं है कि इसके बाद पादरियों के कारनामे रुके हो! लेकिन एक आयोग का गठन जरुर किया था जो पादरियों के व्यवहार उनके चरित्र पर नजर बनाये रखेगा. उसी दौरान  कार्डिनल पेल जो आस्ट्रेलिया के सबसे वरिष्ठ पादरी समेत कैथोलिक चर्च की दुनिया में भी सबसे बड़े अधिकारियों में से कए थे उन्हें यौन शोषण के मामलों में चर्च की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया देने की जिम्मेदारी दी गयी थी. जो अब खुद अपने ऊपर लगे आरोपों पर ही घिर गये है.

वेटिकन सिटी में कुछ समय पहले ईसाईयों के सर्वोच्च धर्मगुरु पॉप जान पॉल के लव लेटर्सभी सामने आये थे जिन्होंने एक शादीशुदा अमेरिकी विचारक महिला अन्ना.टेरेसा ताइमेनिका से रिश्ता रखा हुआ था. अब तीसरे नंबर के अधिकारी कार्डिनल जॉर्ज पेल अपने ऊपर लगे यौन शोषण के आरोपों में घिरते दिखाई दे रहे है 76 वर्षीय कार्डिनल पेल फिलहाल वेटिकन सिटी में रहते हैं और उन पर यौन शोषण के आरोप उनके ही देश आस्ट्रेलिया में लगाए गए हैं.  पेल ने कहा है कि पोप ने उन्हें इन आरोपों का सामना करने के लिए छुट्टी दी है. आस्ट्रेलिया में विक्टोरिया स्टेट पुलिस ने कहा है कि वकीलों से सलाह.मशविरे के बाद कार्डिनल पर आरोप लगाए गए हैं. कार्डिनल पेल को आने वाली 18 जुलाई को मेलबर्न की अदालत में पहुंचना है. इस मामले में अब तक आरोपों से जुड़ी जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया गया है. लेकिन अगले हफ्ते एक जज कार्डिनल की पेशी से पहले जानकारी को सार्वजनिक किए जाने पर फैसला हो सकता है. उसी दिन एक बार फिर वेटिकन की पादरियों की सेना के द्वारा पहने जाने वाले सफेद कपड़ों का काला सच सामने आ जायेगा.

अधिकांश ऐसा माना जाता रहा है कि जब मनुष्य का मन भोग.विलास से भर उठता है तो वह अध्यात्म की और रुख करता है. उससे जुड़ता है. उसमे राग द्वेष मोह भोग आदि चीजों का त्यागकर एक सरल जीवन जीता है जिसके भारत देश में बहुत सारे उदहारण सुनने देखने को मिलते है. लेकिन यदि ईसाइयत के अन्दर चर्चों के पादरियों को झांककर देखे तो लगता है जैसे इनके जीवन का उद्देश्य पूजा. उपासना और आम जन को सही राह दिखाने के बजाय सिर्फ यौन शोषण ही मुख्य उद्देश्य रह गया हो. दरअसल रोमन केथोलिक चर्च का एक छोटा राज्य है जिसे वेटिकन सिटी बोलते हैं. जिसे ईसाइयों का मक्का भी कहे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. अपने धर्म (ईसाई) के प्रचार के लिए वे हर साल गरीब देशों में शिक्षा, स्वास्थ आदि का बहाना ले करीब 17 हजार करोड़ डॉलर खर्च करते हैं. वेटिकन के किसी भी व्यक्ति को पता नहीं है कि उनके कितने व्यापार चलते हैं. बताया जाता है कि रोम शहर में 33 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक, प्लास्टिक, एयर लाइन, केमिकल और इंजीनियरिंग बिजनेस वेटिकन के हाथ में हैं. इटालियन बैंकिंग में उनकी बड़ी संपत्ति है और अमेरिका एवं स्विस बैंकों में उनकी बड़ी भारी राशि जमा होने के साथ विश्व भर की मीडिया में वेटिकन का सीधा हस्तक्षेप बताया जाता रहा है. इसी कारण पादरियों पर लगने वाले आरोपों उनके दुष्ट कारनामों पर अक्सर मीडिया में खामोशी छाई रहती है.


कहीं मिशनरियों के जरिये बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन को लेकर तो कहीं बच्चों का यौन शोषण को लेकर कैथोलिक चर्च अक्सर आलोचना का केंद्र रहा है. लोगों के मुताबिक इसके लिए इनके चरित्र का दोहरापन जिम्मेदार है. इसी कारण यूरोप के लोग धीरे.धीरे चर्च से निकल रहे है पर दुरूखद बात यह कि जब यूरोप के लोग चर्च छोड़कर बाहर निकल रहे उसी समय भारत जैसे देश में बड़ी संख्या में लोग चर्च में घुस रहे है और खुद को राम कृष्ण की संतान की बजाय जीसस का पुत्र समझ रहे है. सुदर्शन न्यूज चैनल के मालिक श्री सुरेश चव्हाणके की बात यहाँ सही निकलती है कि भारत की मीडिया को अधिकतर फंडिग वेटिकन सिटी जो ईसाई धर्म का बड़ा स्थान है वहाँ से आती  है इसलिए मीडिया केवल हिन्दू धर्म के साधु.संतों को बदनाम करती है और ईसाई पादरियों के दुष्कर्म को छुपाती है. बहुत पहले चीनी विचारक नित्शे ने कहा था कि मैं ईसाई धर्म को एक अभिशाप मानता हूँ, उसमें आंतरिक विकृति की पराकाष्ठा है. वह द्वेषभाव से भरपूर वृत्ति है. एक ऐसा जहर विष जिसका का कोई इलाज नहीं हैं.
लेखक राजीव चौधरी 

कमजोर होते इंसानी रिश्ते


भले ही तेजी से गुजरते समय ने हाथों में आईफोन दिए हो लेकिन उन्ही हाथों से रिश्ते छीन लिए है इस भूमंडलीकरण और उपभोक्तावाद का सबसे ज्यादा असर इंसानी रिश्तों पर पड़ा है. इन्हीं बदले हुए हालात का सबसे बड़ा दंश झेल रहे हैं हमारे बुजुर्ग. उन्हें आज के इस आधुनिक समाज में कई तरह की परेशानियों को झेलना पड़ रहा है. दिल्ली के भजनपुरा के इलाके की रहने वाली सत्यवती की उम्र भी अब उनपर हावी होने लगी है और उनका शरीर कमजोर होता चला जा रहा है. सत्यवती अपनी पहचान गुप्त रखती है उसे डर है कि कहीं उनके चार बेटे उनपर हाथ ना उठा दें. जिल्लत की जिन्दगी से तंग आकर सत्यवती ने एक वृद्धाश्रम में पनाह ली है. ऐसी ना जाने कितने बुजुर्ग आज बसेरे ढूंढ रहे बसेरे भावनाओं के अपनत्व के. बड़े शहरों की अगर बात की जाए तो सर्वेक्षण बताते है कि बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार के मामलों में दिल्ली के हालात बेहतर नहीं हैं.

ऐसी ही एक अन्य महिला बुजुर्ग कांता की उम्र अब 75 साल के लगभग होने वाली है. उनकी आँखें कमजोर हो गईं हैं और शरीर भी. ऐसे में जब उन्हें घर पर ही देखभाल की जरूरत है, तो उन्हें जुल्म का शिकार होना पड़ रहा है.  यह जुल्म कोई और नहीं बल्कि वो लोग कर रहे हैं जिनसे उनका खून का रिश्ता है. तंग आकर कांता ने भी पास के ही एक वृद्धाश्रम में सहारा लिया है. वो अब अपना वक्त भजन गाकर या टीवी पर प्रवचन सुनकर बिताती हैं. देवीराम हनुमान मंदिर के आसपास आसानी से दिख जाता है. चेहरे पर पड़ी झुर्रियां, आँखों में अजीब से खामोशी लिए वो कहता है कि मुझपर यह सबकुछ तब आ पड़ा है जब मैं कुछ झेलने के लायक ही नहीं बचा हूँ. अब मेरी आँखों से दिखता नहीं. दांत टूट गए हैं. शरीर कमजोर हो गया है. ऐसे में मुझे घर से निकाल दिया गया. मैं कहाँ जाऊं. बस दिल की एक ही तमन्ना है कि मेरा बेटा किसी दिन मुझसे बोले पापा तू कैसा है? तूने खाना खाया या नहीं?

इस तरह की पीड़ा समेटे अकेले राजधानी दिल्ली की सड़कों और वर्द्ध आश्रमों में आपको जा जाने कितने लोग मिल जायेंगे जिन्हें अब इंसानी रिश्तों की बात सिर्फ एक मजाक लगती है. वो भले ही खुल कर कुछ नहीं बताते लेकिन अन्दर अन्दर ही घुट घुटकर जीने पर मजबूर हैं. वो लोग ख़ुशक़िस्मत हैं जिन्हें कहीं किसी का सहारा मिल सका है. मगर जिन लोगों को यह सहारा नहीं मिला उन्हें बस बहुत हो गया कहने की जरूरत है, वो लोग बड़ी तकलीफदेह जिन्दगी गुजार रहे हैं. इनमें से कुछ ऐसे हैं जो अपने ही बच्चों के यहाँ नौकरों की तरह रहने को मजबूर हैं. शिकायत करें भी तो किसकी? इन्हें तो अपनों ने सताया है. वो अपने जिन्होंने इनकी कोख से जन्म लिया है. इसलिए इनकी तकलीफ बहुत ज्यादा है जो शायद कोई दूसरा महसूस ना कर सके. हांलाकि बुजुर्गों की अनदेखी करने वाली औलादों के ख़िलाफ सरकार ने वर्ष 2012 में सीनियर सिटिजन एक्ट 2007 को नए सिरे से लागू किया जिसके तहत 60 वर्ष से ऊपर के व्यक्ति को सीनियर सिटिजन माना है. इस एक्ट में सजा का प्रावधान रखा गया पर जुल्म सहने के बावजूद बुजुर्ग अपने बच्चों के ख़िलाफ शिकायत दर्ज कराना नहीं चाहते. इस एक्ट के प्रावधानों के अनुसार औलादों को अपने माँ पिता को आर्थिंक सहायता देनी होती है.

मानव समाज में ऐसा कोई रिश्ता नहीं होता जिसमे तकरार और छोटी-मोटी बातें नहीं होती है. लेकिन वहीं छोटी-छोटी बातें जब बड़े तकरार का रूप ले लेती हैं तब आप चाहे जिंदगी में कितने ही आगे क्यों ना बढ़ जाएं. लेकिन कहीं ना कहीं दिल के कोने में एक याद हमेशा बसती रहेगी, जो हमेशा आपसे कहेगी की एक मौका उस रिश्ते को बचाने के लिए जो दिया जा सकता था. जीवन में कभी-न-कभी वह घड़ी आती है, जब कई माता-पिता खुद की देखभाल करने के काबिल नहीं रहते और उन्हें मदद की जरूरत पड़ती है. यहाँ तक कि कई बार तो वे अपने दिल में नाराजगी भी पालने लगते हैं. और-तो-और, कभी-कभी बुजुर्ग माँ या पिता ठेस पहुँचानेवाली बातें कह देते हैं. पर क्या हम सिर्फ इस बात से उनसे किनारा करें कि उन्हें गुस्सा आया या हमें ठेस पहुंचीबचपन में हम कई बार रुठते है माता-पिता हमें मनाते ही नहीं वरन हमारी जिद भी पूरी करते है इसी तरह कुछ अनबन भी हो तो हमें दोबारा उनकी तरफ की तरफ कदम बढ़ाने चाहिए. ऐसे में अगर आपसे कुछ गलती हुई है तो उसे स्वीकारने में कोई हर्ज नहीं है. माता-पिता है जितना जल्दी गुस्सा होते है उतना ही जल्दी माफ भी करते है. ये उम्र एक पड़ाव होता है जिसमें भावनात्मक रूप से सहारे की सबसे बड़ी जरूरत होती है.


कई बार अपने प्यारे माता-पिता को ढलती उम्र में होनेवाली तकलीफें झेलते देखकर हमें बहुत दुख होता है. उनका खयाल रखनेवाले कई बच्चे यह देखकर कभी-कभी उदास हो जाते हैं, परेशान हो जाते हैं, खुद को दोषी महसूस करने लगते हैं, उन्हें चिंता होती है, रह-रहकर गुस्सा आता है, भले ही आप अपने बुजुर्ग माता-पिता से दूर रहते हों, फिर भी आपको तय करना चाहिए कि माता-पिता को रोजाना किस तरह की देखभाल की जरूरत है. अगर आपका घर उनके घर के पास नहीं है तो सप्ताह में कम से कम एक बार उनसे बात जरुर करें. हालाँकि उम्र ढलने से होनेवाली समस्याओं के बारे में बातचीत करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन जब परिवार के सभी सदस्य मिलकर चर्चा करते हैं और पहले से अच्छी योजना बनाते हैं, बुजुर्गों की सेहत उनके रहन सहन से जुड़े फैसले लेते है है, तब वे सही चुनाव करने के लिए और भी अच्छी तरह तैयार होते हैं. हमें इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि कभी-न-कभी हमें बुढ़ापे में आनेवाली तकलीफों का सामना करना ही पड़ेगा. इसलिए यह बेहद जरूरी है कि एक परिवार के तौर पर हम इनका सामना करने के लिए तैयारी करें. इन जिम्मेदारियों को पूरा करते समय आप तरह-तरह की भावनाओं से गुजरें. बुजुर्गों से बुरा वर्ताव करते वक्त एक बार जरुर सोचें कि कल हम भी बुजुर्ग होंगे तो क्या इस व्यवहार के लिए हम तैयार होंगे?

 राजीव चौधरी 

हमारी महान राजनीतिक परंपरा की जातिवादी जड़ें

निसंदेह देश के सर्वोच्च पद के लिए रामनाथ कोविंद एक अच्छे, योग्य विनम्र और मृदुभाषी उम्मीदवार है कोई भी उनकी ईमानदारी और निष्ठां पर सवाल नहीं उठा सकता. वो किसी विवाद में नहीं फंसे, उनके राजनीतिक जीवन में कोई दाग नहीं लगा. लेकिन विवाद यह है कि क्या सत्तर बरस बिताकर सीखी लोकतंत्र ने बातमहामहिम में गुण मत ढूंढो, पूछो केवल जात?” राजनीति से लेकर आम जिंदगी तक में जातिवादी मानसिकता कितने गहरे पैठी है आप इससे अंदाजा लगा सकते है कि जैसे ही रामनाथ कोविंद का नाम राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के बतौर घोषित हुआ. सबसे पहले लोगों ने गूगल पर उनकी जाति सर्च की. ठीक उसी तरह जैसे ओलम्पिक पदक जीतने वाली भारत की तीन बेटियों की जाति लोगों ने गूगल पर खोजी थी.

शायद राजनीति के अखाड़ों से लेकर मीडिया हॉउस तक किसी ने यह जानने कि कोशिश की हो कि रामनाथ कोविंद कौन हैं. उन्होंने अपनी जिंदगी में किस बूते क्या-क्या हासिल किया. किन संघर्षों से गुजरकर उन्होंने कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ी. जानना चाहा तो बस इतना है कि वो किस जाति से आते हैं. ये कोई इत्तेफाक की बात नहीं है कि लोग सबसे ज्यादा उनकी जाति के बारे में जानना चाहते हैं. हमारी महान राजनीतिक परंपरा ने जातिवादी मानसिकता की जड़ें इतनी गहरे जमा दी हैं कि हम इसके आगे कुछ सोच ही नहीं पाते.

राष्ट्रपति का पद देश का सर्वोच पद होता है. इसके लिए रामनाथ कोविंद जैसे इन्सान का चुना जाना एक गौरव की बात है. पर दुखद बात यह है महामहिम राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक होता है और प्रथम नागरिक ही अपनी योग्यता के बजाय अपनी जाति से जाना जाये तो हम किस मुहं से जातिवाद मुक्त भारत की बात कर सकते है. अपनी सिमित योग्यता के चलते में बता दूँ कि सविधान कहता है राष्ट्रपति चुनाव में राजनैतिक दलों की भूमिका का कोई उल्लेख नहीं है. देश का राष्ट्रपति बनने के लिए किसी जाति धर्म का भी कोई मानक स्थापित नहीं है. देश का कोई भी नागरिक जिसकी आयु 35 वर्ष से अधिक हो, लोकसभा का सदस्य बनने की योग्यता प्राप्त हो और केंद्र और राज्य की किसी स्थानीय प्राधिकरण में किसी लाभ के पद पर ना बैठा हो. वो ही देश का राष्ट्रपति बन सकता किन्तु यहाँ प्रथम नागरिक के चुनाव में ही सविंधान को एक किस्म से ठेंगा सा दिखाया जा रहा है.

अक्सर जब राष्ट्रपति चुनाव नजदीक आते है तो हमेशा सुनने को मिलता है कि राष्ट्रपति किस दल का होगा, उसकी जाति-धर्म क्षेत्र आदि पर सवाल खड़े होना शुरू हो जाते है. क्या देश का राष्ट्रपति किसी दल से जुडा होना जरूरी हो क्यों नहीं एक ऐसा मार्ग खोजा जाये कि देश का प्रथम नागरिक किसी दल जाति पंथ के बजाय इस देश की आत्मा से जुडा हो. दूसरा जो राजनीति पहले प्रतीकात्मक तरीके से जातीय बंधनों को तोड़ने की बातें करती है, वो उसी के सहारे जातिवादी पहचान पुख्ता करने की तमाम कोशिशें भी करती हैं. उसी का नतीजा है कि दलितों के उत्थान के नाम पर इसकी जातीय राजनीति सिर्फ एकाध चेहरों को आगे बढ़ाकर दलितों को भ्रमित करने की राजनीति करती है और इसमें सारी पार्टियां भागीदार है.
संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते है कि जरूरी नहीं है कि राष्ट्रपति पद के लिए कोई राजनीतिक व्यक्ति ही चुना जाये बल्कि अच्छा तब हो जब देश के सर्वोच्च पद के लिए किसी राजनैतिक दल से जुडा व्यक्ति न हो जैसे पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम किसी राजनैतिक दल से कोई सम्बन्ध न होने के बावजूद भी देश में राष्ट्रपति के रूप में अपना कार्यकाल अच्छे से निर्वहन किया. इस कारण राष्ट्रपति और उपराष्ट्रप्ति इन दोनों पदों के लिए राजनीति से बाहर का व्यक्ति हो तो ज्यादा बेहतर रहे. इन सबके बीच असल सवाल प्रतिनिधित्व का है. मूल बात ये है कि अगर किसी जाति विशेष के हितों की बात की जाती है तो उन्हें किस स्तर और कितनी मात्रा में सत्ता की हिस्सेदारी मिलती है. जातीय गणित बिठाने की कोशिशों के बीच सरकार यह तक भूल जाती है कि देश के संवेधानिक पदों की गरिमा को बचाए रखने के लिए योग्यता का मानक शीर्ष पर रखना चाहिए न जातिगत गणित. जब राजनीति समानता, योग्यता के आधार चुनाव करेगी निसंदेह तभी सामाजिक समरसता से भरा समाज खड़ा होगा.

सवाल किसी के पक्ष या विरोध का नहीं है बल्कि सवाल उपजा है 70 वर्ष की राजनीति, देश की शिक्षा और सामाजिक सोच की संकुचित विचारधारा पर, सत्तारूढ़ दल ने जैसे ही रामनाथ कोविंद का नाम आगे किया तो विपक्ष ने भी मीरा कुमार का नाम आगे कर ये दिखाने का प्रयास किया हम भी दलितवादी है सत्तारूढ़ के दलित चेहरे के सामने हम अपना दलित चेहरा आगे लायेंगे. कुल मिलाकर सवाल यह उपजते है कि क्या देश के महामहिम के पद के लिए क्या जाति ही असल मसला है.? दलित जाति के हैं इसलिए राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं.? दलित जाति के हैं इसलिए विपक्ष का धडा विरोध तक नहीं कर पा रहा.? दलित जाति के हैं इसलिए उनके मुकाबले में विपक्ष भी दलित उम्मीदवार लेकर आया.? यदि ऐसा है तो क्या एक दलित को पद देने से देश के समस्त दलित समुदाय का भला होगा.? क्या कोई भी सरकार कुछ ऐसा नहीं कर सकती कि यह दलितवाद का शोर थामकर इसमें राजनैतिक रोटी ना सेककर इस समुदाय की शिक्षा, रोजगार, सामाजिक समानता पर जोर देकर इन्हें इस दलितवाद से मुक्ति दिला सके.? महाकवि दिनकर की कविता की एक पंक्ति है कि मूल जानना बड़ा कठिन है नदियों का, वीरों का धनुष छोड़कर और गोत्र क्या होता है रणधीरों का ? पाते हैं सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर, जाति-जाति का शोर मचाते केवल कायर, क्रूर!
राजीव चौधरी