Tuesday, 6 June 2017

भारत में गौ की रक्षा नहीं होगी तो क्या पाकिस्तान में होगी?

मोदी सरकार ने खुलेआम गौ आदि पशुओं की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगा दिया। सरकार के इस कदम की तथाकथित सेक्युलर/वामपंथी/नास्तिक/ मुस्लिम और ईसाई संगठन विरोध करने बैठ गए। केरल में तो कुछ कांग्रेसी नेताओं ने सरे आम गौहत्या कर मुसलमानों को खुश करने का प्रयास किया। उनके इस कदम की जितनी निंदा हो सके होनी चाहिए। भारतीय इतिहास में गौ हत्या को लेकर कई आंदोलन हुए हैं और कई आज भी जारी हैं।  लेकिन अभी तक गौहत्या पर प्रतिबन्ध नहीं लग सका है। इसका सबसे बड़ा कारण राजनितिक इच्छा शक्ति की कमी होना है। आप कल्पना कीजिये हर रोज जब आप सोकर उठते है तब तक हज़ारों गौओं के गलों पर छूरी चल चुकी होती है।  गौ हत्या से सबसे बड़ा फ़ायदा तस्करों एवं गाय के चमड़े का कारोबार करने वालों को होता है।  इनके दबाव के कारण ही सरकार गौ हत्या पर प्रतिबन्ध लगाने से पीछे हट रही है। वरना जिस देश में गाय को माता के रूप में पूजा जाता हो, वहां सरकार गौ हत्या रोकने में नाकाम है। 

आज हमारे देश में जनता ने नरेंदर मोदी जी की सरकार है। सेक्युलरवाद और अल्पसंख्यकवाद के नाम पर पिछले अनेक दशकों से बहुसंख्यक हिन्दुओं के अधिकारों का दमन होता आया है। उसी के प्रतिरोध में हिन्दू प्रजा ने संगठित होकर, जात-पात से ऊपर उठकर एक सशक्त सरकार को चुना है। इसलिए यह इस सरकार का कर्त्तव्य बनता है कि वह बदले में हिन्दुओं की शताब्दियों से चली आ रही गौरक्षा की मांग को पूरा करे और गौ हत्या पर पूर्णत प्रतिबन्ध लगाए। अक्सर देखने में आता है कि बिकाऊ मीडिया और पक्षपाती पत्रकारों के प्रभाव से हम यह आंकलन निकाल लेते है कि सारे देशवासियों की भी यही राय होगी जो इन पत्रकारों, बुद्धिजीवियों की होती है। मगर देश की जनता ने चुनावों में मोदी जी को जीत दिलाकर यह सिद्ध कर दिया कि नहीं यह केवल आसमानी किले है। इसलिए सरकार को चंद उछल कूद करने वालों की संभावित प्रतिक्रिया से प्रभावित होकर गौहत्या पर प्रतिबन्ध लगाने से पीछे नहीं हटना चाहिए। ध्यान दीजिये मुस्लिम शासनकाल में गौ हत्या पर रोक थी।  भारत में मुस्लिम शासन के दौरान कहीं भी गौकशी को लेकर हिंदू और मुसलमानों में टकराव देखने को नहीं मिलता। बाबर से लेकर अकबर ने गोहत्या पर रोक लगाई थी। औरंगजेब ने इस नियम को तोड़ा तो उसका साम्राज्य तबाह हो गया। आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने भी 28 जुलाई, 1857 को बकरीद के मौक़े पर गाय की क़ुर्बानी न करने का फ़रमान जारी किया था।  साथ ही चेतावनी दी थी कि जो भी गौ वध करने या कराने का दोषी पाया जाएगा, उसे मौत की सज़ा दी जाएगी।

भारत में गौ हत्या को बढ़ावा देने में अंग्रेज़ों ने अहम भूमिका निभाई।  जब 1700 ई. में अंग्रेज़ भारत आए थे, उस वक़्त यहां गाय और सुअर का वध नहीं किया जाता था।  हिंदू गाय को पूजनीय मानते थे और मुसलमान सुअर का नाम तक लेना पसंद नहीं करते थे। अंग्रेजों ने मुसलमानों को भड़काया कि क़ुरआन में कहीं भी नहीं लिखा है कि गाय की क़ुर्बानी हराम है।  इसलिए उन्हें गाय की क़ुर्बानी करनी चाहिए। उन्होंने मुसलमानों को लालच भी दिया और कुछ लोग उनके झांसे में आ गए। इसी तरह उन्होंने दलित हिंदुओं को सुअर के मांस की बिक्री कर मोटी रकम कमाने का झांसा दिया। 18वीं सदी के आख़िर तक बड़े पैमाने पर गौ हत्या होने लगी। अंग्रेज़ों की बंगाल, मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी सेना के रसद विभागों ने देश भर में कसाईखाने बनवाए।  जैसे-जैसे यहां अंग्रेज़ी सेना और अधिकारियों की तादाद बढ़ने लगी, वैसे-वैसे गौ हत्या में भी बढ़ोत्तरी होती गई।
गौ हत्या और सुअर हत्या की आड़ में अंग्रेज़ों को हिंदू और मुसलमानों में फूट डालने का भी मौक़ा मिल गया।  इस दौरान हिंदू संगठनों ने गौ हत्या के ख़िला़फ मुहिम छेड़ दी। नामधारी सिखों का कूका आंदोलन की नींव गौरक्षा के विचार से जुड़ी थी। हरियाणा प्रान्त में हरफूल जाट जुलानी ने अनेक कसाईखानों को बर्बाद कर कसाइयों को यमलोक पंहुचा दिया। हरफूल जाट ने बलिदान दे दिया मगर पीछे नहीं हटें। 1857 की क्रांति, मंगल पांडेय का बलिदान इसी गौरक्षा अभियान के महान बलिदानों से सम्बंधित है। आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द ने गौरक्षा के लिए आधुनिक भारत में सबसे व्यापक प्रयास आरम्भ किये। उन्होंने गौरक्षा एवं खेती करने वाले किसानों  लिए गौ करुणा निधि पुस्तक की रचना कर सप्रमाण यह सिद्ध किया कि गौ रक्षा क्यों आवश्यक है। स्वामी जी यहाँ तक नहीं रुके। उन्होंने भारत की पहली गौशाला रिवाड़ी में राव युधिष्ठिर के सहयोग से स्थापित की जिससे गौरक्षा हो सके। इसके अतिरिक्त उन्होंने पांच करोड़ भारतियों के हस्ताक्षर करवाकर उन्हें महारानी विक्टोरिया के नाम गोहत्या पर प्रतिबन्ध लगाने का प्रस्ताव भेजने का अभियान भी चलाया। यह अभियान उनकी असमय मृत्यु के कारण पूरा न हुआ। मगर इससे भारत वर्ष में हज़ारों गौशाला की स्थापना हुई एवं गौरक्षा अभियान को लोगों ने अपने प्रबंध से चलाया। भारत में गौरक्षा अभियान के समाचार लंदन भी पहुंचे। आख़िरकार महारानी विक्टोरिया ने वायसराय लैंस डाउन को पत्र लिखा।  महारानी ने कहा, हालांकि मुसलमानों द्वारा की जा रही गौ हत्या आंदोलन का कारण बनी है, लेकिन हक़ीक़त में यह हमारे ख़िलाफ़ है, क्योंकि मुसलमानों से कहीं ज़्यादा गौ वध हम कराते हैं।  इसके ज़रिए ही हमारे सैनिकों को गौ मांस मुहैया हो पाता है।  इसके बाद 1892 में देश के विभिन्न हिस्सों से सरकार को हस्ताक्षरयुक्त पत्र भेजकर गौ वध पर रोक लगाने की मांग की जाने लगी।  इन पत्रों पर हिंदुओं के साथ मुसलमानों के भी हस्ताक्षर होते थे। 1947 के पश्चात भी गौरक्षा के लिए अनेक अभियान चले। 1966 में हिन्दू संगठनों ने देशव्यापी अभियान चलाया। हज़ारों गौभक्तों ने गोली खाई मगर पीछे नहीं हटे।  राजनितिक इच्छा शक्ति की कमी के चलते यह अभियान सफल नहीं हुआ।
इस समय भी देशव्यापी अभियान चलाया जा रहा है।  जिसमें केंद्र सरकार से गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने और भारतीय गौवंश की रक्षा के लिए कठोर क़ानून बनाए जाने की मांग की जा रही है। गाय की रक्षा के लिए अपनी जान देने में भारतीय मुसलमान किसी से पीछे नहीं हैं. उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले के गांव नंगला झंडा निवासी डॉ. राशिद अली ने गौ तस्करों के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ रखी थी, जिसके चलते 20 अक्टूबर, 2003 को उन पर जानलेवा हमला किया गया और उनकी मौत हो गई. उन्होंने 1998 में गौ रक्षा का संकल्प लिया था और तभी से डॉक्टरी का पेशा छोड़कर वह अपनी मुहिम में जुट गए थे. गौ वध को रोकने के लिए विभिन्न मुस्लिम संगठन भी सामने आए हैं. दारूल उलूम देवबंद ने एक फ़तवा जारी करके मुसलमानों से गौ वध न करने की अपील की है. दारूल उलूम देवबंद के फतवा विभाग के अध्यक्ष मुती हबीबुर्रहमान का कहना है कि भारत में गाय को माता के रूप में पूजा जाता है। इसलिए मुसलमानों को उनकी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए गौ वध से ख़ुद को दूर रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि शरीयत किसी देश के क़ानून को तोड़ने का समर्थन नहीं करती।  क़ाबिले ग़ौर है कि इस फ़तवे की पाकिस्तान में कड़ी आलोचना की गई थी।  इसके बाद भारत में भी इस फ़तवे को लेकर ख़ामोशी अख्तियार कर ली गई।

गाय भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक अहम भाग है।  यहां गाय की पूजा की जाती है।  यह भारतीय संस्कृति से जुड़ी है।  महात्मा गांधी कहते थे कि अगर निस्वार्थ भाव से सेवा का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कहीं देखने को मिलता है तो वह गौ माता है।  गाय का ज़िक्र करते हुए वह लिखते है-
"गौ माता जन्म देने वाली माता से श्रेष्ठ है। हमारी माता हमें दो वर्ष दुग्धपान कराती है और यह आशा करती है कि हम बड़े होकर उसकी सेवा करेंगे।  गाय हमसे चारे और दाने के अलावा किसी और चीज़ की आशा नहीं करती। हमारी मां प्राय: रूग्ण हो जाती है और हमसे सेवा की अपेक्षा करती है।  गौ माता शायद ही कभी बीमार पड़ती है।  वह हमारी सेवा आजीवन ही नहीं करती, अपितु मृत्यु के बाद भी करती है।  अपनी मां की मृत्यु होने पर हमें उसका दाह संस्कार करने पर भी धनराशि व्यय करनी पड़ती है।  गौ माता मर जाने पर भी उतनी ही उपयोगी सिद्ध होती है, जितनी अपने जीवनकाल में थी।  हम उसके शरीर के हर अंग-मांस, अस्थियां, आंतों, सींग और चर्म का इस्तेमाल कर सकते हैं।  यह बात जन्म देने वाली मां की निंदा के विचार से नहीं कह रहा हूं, बल्कि यह दिखाने के लिए कह रहा हूं कि मैं गाय की पूजा क्यों करता हूं।"- महात्मा गाँधी

 महात्मा गाँधी का नाम लेकर पूर्व में अनेक सरकारें बनी मगर गौहत्या पर प्रतिबन्ध नहीं लगा। आज इस देश की सरकार से हम प्रार्थना करते है कि समस्त देश की भवनाओं का सम्मान करते हुए गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाए एवं गौहत्या करने वाले को कठोर से कठोर दंड मिले।
डॉ विवेक आर्य

#गौरक्षाराष्ट्रधर्महै

ब्राह्मण शब्द को लेकर भ्रांतियां एवं उनका निवारण

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डॉ विवेक आर्य
ब्राह्मण शब्द को लेकर अनेक भ्रांतियां हैं। इनका समाधान करना अत्यंत आवश्यक है।  क्यूंकि हिन्दू समाज की सबसे बड़ी कमजोरी जातिवाद है।  ब्राह्मण शब्द को सत्य अर्थ को न समझ पाने के कारण जातिवाद को बढ़ावा मिला है।
शंका 1 ब्राह्मण की परिभाषा बताये?
समाधान-
पढने-पढ़ाने से,चिंतन-मनन करने से, ब्रह्मचर्य, अनुशासन, सत्यभाषण आदि व्रतों का पालन करने से,परोपकार आदि सत्कर्म करने से, वेद,विज्ञान आदि पढने से,कर्तव्य का पालन करने से, दान करने से और आदर्शों के प्रति समर्पित रहने से मनुष्य का यह शरीर ब्राह्मण किया जाता है।-मनुस्मृति 2/2
शंका 2 ब्राह्मण जाति है अथवा वर्ण है?
समाधान- ब्राह्मण वर्ण है जाति नहीं। वर्ण का अर्थ है चयन या चुनना और सामान्यत: शब्द वरण भी यही अर्थ रखता है। व्यक्ति अपनी रूचि, योग्यता और कर्म के अनुसार इसका स्वयं वरण करता है, इस कारण इसका नाम वर्ण है। वैदिक वर्ण व्यवस्था में चार वर्ण है।  ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।
ब्राह्मण का कर्म है विधिवत पढ़ना और पढ़ाना, यज्ञ करना और कराना, दान प्राप्त करना और सुपात्रों को दान देना।
क्षत्रिय का कर्म है विधिवत पढ़ना, यज्ञ करना, प्रजाओं का पालन-पोषण और रक्षा करना, सुपात्रों को दान देना, धन ऐश्वर्य में लिप्त न होकर जितेन्द्रिय रहना।
वैश्य का कर्म है पशुओं का लालन-पोषण, सुपात्रों को दान देना, यज्ञ करना,विधिवत अध्ययन करना, व्यापार करना,धन कमाना,खेती करना।
शुद्र का कर्म है सभी चारों वर्णों के व्यक्तियों के यहाँ पर सेवा या श्रम करना।
शुद्र शब्द को मनु अथवा वेद ने कहीं भी अपमानजनक, नीचा अथवा निकृष्ठ नहीं माना है। मनु के अनुसार चारों वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य एवं शूद्र आर्य है।-   मनु 10/4
 शंका 3- मनुष्यों में कितनी जातियां है ?
समाधान- मनुष्यों में केवल एक ही जाति है।  वह है "मनुष्य"। अन्य की जाति नहीं है।
शंका 4- चार वर्णों का विभाजन का आधार क्या है?

समाधान- वर्ण बनाने का मुख्य प्रयोजन कर्म विभाजन है। वर्ण विभाजन का आधार व्यक्ति की योग्यता है। आज भी शिक्षा प्राप्ति के उपरांत व्यक्ति डॉक्टर, इंजीनियर, वकील आदि बनता है। जन्म से कोई भी डॉक्टर, इंजीनियर, वकील नहीं होता। इसे ही वर्ण व्यवस्था कहते है।
शंका 5- कोई भी ब्राह्मण जन्म से होता है अथवा गुण, कर्म और स्वाभाव से होता है?
समाधान- व्यक्ति की योग्यता का निर्धारण शिक्षा प्राप्ति के पश्चात ही होता है। जन्म के आधार पर नहीं होता है।  किसी भी व्यक्ति के गुण, कर्म और स्वाभाव के आधार पर उसके वर्ण का चयन होता हैं। कोई व्यक्ति अनपढ़ हो और अपने आपको ब्राह्मण कहे तो वह गलत है।
मनु का उपदेश पढ़िए-
जैसे लकड़ी से बना हाथी और चमड़े का बनाया हुआ हरिण सिर्फ़ नाम के लिए ही हाथी और हरिण कहे जाते है वैसे ही बिना पढ़ा ब्राह्मण मात्र नाम का ही ब्राह्मण होता है।-मनुस्मृति 2/157
शंका 6-क्या ब्राह्मण पिता की संतान केवल इसलिए ब्राह्मण कहलाती है कि उसके पिता ब्राह्मण है?
समाधान- यह भ्रान्ति है कि ब्राह्मण पिता की संतान इसलिए ब्राह्मण कहलाएगी क्यूंकि उसका पिता ब्राह्मण है।  जैसे एक डॉक्टर की संतान तभी डॉक्टर कहलाएगी जब वह MBBS उत्तीर्ण कर लेगी।   जैसे एक इंजीनियर की संतान तभी इंजीनियर कहलाएगी जब वह BTech उत्तीर्ण कर लेगी। बिना पढ़े नहीं कहलाएगी। वैसे ही ब्राह्मण एक अर्जित जाने वाली पुरानी उपाधि हैं।
मनु का उपदेश पढ़िए-
माता-पिता से उत्पन्न संतति का माता के गर्भ से प्राप्त जन्म साधारण जन्म है। वास्तविक जन्म तो शिक्षा पूर्ण कर लेने के उपरांत ही होता है। -मनुस्मृति 2/147
शंका 7- प्राचीन काल में ब्राह्मण बनने के लिए क्या करना पड़ता था?
समाधान- प्राचीन काल में ब्राह्मण बनने के लिए शिक्षित और गुणवान दोनों होना पड़ता था।
मनु का उपदेश देखे-
वेदों में पारंगत आचार्य द्वारा शिष्य को गायत्री मंत्र की दीक्षा देने के उपरांत ही उसका वास्तविक मनुष्य जन्म होता है।-मनुस्मृति 2/148
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, ये तीन वर्ण विद्याध्ययन से दूसरा जन्म प्राप्त करते हैं। विद्याध्ययन न कर पाने वाला शूद्र, चौथा वर्ण है।-मनुस्मृति 10/4
आजकल कुछ लोग केवल इसलिए अपने आपको ब्राह्मण कहकर जाति का अभिमान दिखाते है क्यूंकि उनके पूर्वज ब्राह्मण थे। यह सरासर गलत है। योग्यता अर्जित किये बिना कोई ब्राह्मण नहीं बन सकता।  हमारे प्राचीन ब्राह्मण अपने तप से अपनी विद्या से अपने ज्ञान से सम्पूर्ण संसार का मार्गदर्शन करते थे। इसीलिए हमारे आर्यव्रत देश विश्वगुरु था।
शंका  8-ब्राह्मण को श्रेष्ठ क्यों माने?
समाधान- ब्राह्मण एक गुणवाचक वर्ण है। समाज का सबसे ज्ञानी, बुद्धिमान, शिक्षित, समाज का मार्गदर्शन करने वाला, त्यागी, तपस्वी व्यक्ति ही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी बनता है। इसीलिए ब्राह्मण वर्ण श्रेष्ठ है। वैदिक विचारधारा में ब्राह्मण को अगर सबसे अधिक सम्मान दिया गया है तो ब्राह्मण को सबसे अधिक गलती करने पर दंड भी दिया गया है। 
मनु का उपदेश देखे-
एक ही अपराध के लिए शूद्र को सबसे दंड कम दंड, वैश्य को दोगुना, क्षत्रिय को तीन गुना और ब्राह्मण को सोलह या 128 गुणा दंड मिलता था।- मनु 8/337 एवं 8/338
इन श्लोकों के आधार पर कोई भी मनु महाराज को पक्षपाती नहीं कह सकता।
शंका 9- क्या शूद्र ब्राह्मण और ब्राह्मण शूद्र बन सकता है?
समाधान -ब्राह्मण, शूद्र आदि वर्ण क्यूंकि गुण, कर्म और स्वाभाव के आधार पर विभाजित है। इसलिए इनमें परिवर्तन संभव है। कोई भी व्यक्ति जन्म से ब्राह्मण नहीं होता। अपितु शिक्षा प्राप्ति के पश्चात उसके वर्ण का निर्धारण होता है।
मनु का उपदेश देखे-
ब्राह्मण शूद्र बन सकता और शूद्र ब्राह्मण हो सकता है। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपने वर्ण बदल सकते है। -मनुस्मृति 10/64
शरीर और मन से शुद्ध- पवित्र रहने वाला, उत्कृष्ट लोगों के सानिध्य में रहने वाला, मधुरभाषी, अहंकार से रहित, अपने से उत्कृष्ट वर्ण वालों की सेवा करने वाला शूद्र भी उत्तम ब्राह्मण जन्म और द्विज वर्ण को प्राप्त कर लेता है।   -मनुस्मृति 9/335
 जो मनुष्य नित्य प्रात: और सांय ईश्वर आराधना नहीं करता उसको शूद्र समझना चाहिए। -मनुस्मृति 2/103
जब तक व्यक्ति वेदों की शिक्षाओं में दीक्षित नहीं होता वह शूद्र के ही समान है।-मनुस्मृति 2/172
ब्राह्मण- वर्णस्थ व्यक्ति श्रेष्ठ–अतिश्रेष्ठ व्यक्तियों का संग करते हुए और नीच- नीचतर व्यक्तिओं का संग छोड़कर अधिक श्रेष्ठ बनता जाता है। इसके विपरीत आचरण से पतित होकर वह शूद्र बन जाता है। -मनुस्मृति 4/245
जो ब्राह्मण,क्षत्रिय या वैश्य वेदों का अध्ययन और पालन छोड़कर अन्य विषयों में ही परिश्रम करता है, वह शूद्र बन जाता है। -मनुस्मृति 2/168
शंका 10. क्या आज जो अपने आपको ब्राह्मण कहते है वही हमारी प्राचीन विद्या और ज्ञान की रक्षा करने वाले प्रहरी थे?
समाधान- आजकल जो व्यक्ति ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होकर अगर प्राचीन ब्राह्मणों के समान वैदिक धर्म की रक्षा के लिए पुरुषार्थ कर रहा है तब तो वह निश्चित रूप से ब्राह्मण के समान सम्मान का पात्र है। अगर कोई व्यक्ति ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होकर ब्राह्मण धर्म के विपरीत कर्म कर रहा है। तब वह किसी भी प्रकार से ब्राह्मण कहलाने के लायक नहीं है। एक उदहारण लीजिये। एक व्यक्ति यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर है, शाकाहारी है, चरित्रवान है और धर्म के लिए पुरुषार्थ करता है। उसका वर्ण ब्राह्मण कहलायेगा चाहे वह शूद्र पिता की संतान हो। उसके विपरीत एक व्यक्ति अनपढ़ है, मांसाहारी है, चरित्रहीन है और किसी भी प्रकार से  समाज हित का कोई कार्य नहीं करता, चाहे उसके पिता कितने भी प्रतिष्ठित ब्राह्मण हो, किसी भी प्रकार से ब्राह्मण कहलाने लायक नहीं है। केवल चोटी पहनना और जनेऊ धारण करने भर से कोई ब्राह्मण नहीं बन जाता। इन दोनों वैदिक व्रतों से जुड़े हुए कर्म अर्थात धर्म का पालन करना अनिवार्य हैं। प्राचीन काल में धर्म रूपी आचरण एवं पुरुषार्थ के कारण ब्राह्मणों का मान था।

इस लेख के माध्यम से मैंने वैदिक विचारधारा में ब्राह्मण शब्द को लेकर सभी भ्रांतियों के निराकारण का प्रयास किया हैं। ब्राह्मण शब्द की वेदों में बहुत महत्ता है।  मगर इसकी महत्ता का मुख्य कारण जन्मना ब्राह्मण होना नहीं अपितु कर्मणा ब्राह्मण होना है।  मध्यकाल में हमारी वैदिक वर्ण व्यवस्था बदल कर जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो गई। विडंबना यह है कि इस बिगाड़ को हम आज भी दोह रहे है। जातिवाद से हिन्दू समाज की एकता समाप्त हो गई।  भाई भाई में द्वेष हो गया। इसी कारण से हम कमजोर हुए तो विदेशी विधर्मियों के गुलाम बने। हिन्दुओं के 1200 वर्षों के दमन का अगर कोई मुख्य कारण है  तो वह जातिवाद है। वही हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। आईये इस जातिवाद रूपी शत्रु को को जड़ से नष्ट करने का संकल्प ले।

आर्यसमाज हिन्दू समाज का प्रहरी है।

(इतिहास का एक लुप्त पृष्ठ)

अविभाजित भारत में पंजाब का क्षेत्र विशेष रूप से लाहौर आर्यसमाज की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र तो था। आर्यसमाज का प्रचार पंजाब क्षेत्र के साथ साथ सिन्ध क्षेत्र में भी खूब फैला।  जिस प्रकार पंजाब की मिटटी विधर्मियों के आक्रमण से पीछे एक हज़ार वर्षों से लहूलुहान थी उसी प्रकार सिंध का क्षेत्र भी इस्लामिक आक्रांताओं के अत्याचार से अछुता नहीं था। आर्यसमाज का प्रचार सिंध में किसी पुराने रोग की अचूक औषधि जैसा था। सिंध की धरती पर सदैव अजेय रहने वाले हिन्दुओं की पहली हार मुहम्मद बिन कासिम से राजा दाहिर को मिली।  अपने पिता की हार और अपने राज्य की तबाही का बदला राजा दाहिर की वीर बेटियों ने उसी के बादशाह से अपने ही सेनापति को मरवा कर लिया था। राजा दाहिर का पूरा परिवार अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए बलिदान हो गया।  सिंध का अंतिम शासक मीर था। मीर में अनेक दोष थे। मीर को पता चला कि उसके हिन्दू दीवान गिदुमल की बेटी बहुत खुबसूरत है तो उसने गुदुमल के घर पर उसकी बेटी को लेने की लिए डोलियाँ भेज दी।  बेटी खाना खाने बैठ रही थी तो उसके पिता ने बताया की यह डोलियाँ मीर ने तुम्हें अपने हरम में बुलाने के लिए भेजी है। तुम्हें अभी निर्णय करना है।  यदि तुम तैयार हो तो जाओ। पिता के शब्दों में निराशा और गुस्सा स्पष्ट झलक रहा था।  बेटी ने फौरन अपना निर्णय सुना दिया “आप अभी तलवार लेकर मेरा सर काट दीजिये, जाने का प्रश्न ही नहीं उठता।” पिता को ऐसा उत्तर मिलने का पूरा विश्वास था। उन्होंने अपनी बेटी को बचपन से धर्म और स्वाभिमान के संस्कार दिए थे। बिना किसी संकोच के पिता ने तलवार उठाई।  भूखी बेटी ने सर झुकाया और बाप की तलवार ने काम कर दिया।  वह पिता जिसने लाड़ प्यार से अपनी बेटी को जवान किया था एक क्षण के लिए भी न रुका। परिणाम यह हुआ की मीरों ने दीवान गिदुमल को बर्बाद कर दिया पर वे और उनका परिवार इतिहास में अपने धर्म और स्वाभिमान के रक्षा के लिए एक बार फिर राजा दाहिर के परिवार के समान अमर हो गया।

मुसलमानों के बाद अंग्रेज सिंध में आये। इस्लामिक तलवार का स्थान कब्र परस्ती,पीर पूजा और सूफी विचारधारा ने ले लिया। कई हिन्दू पीरों के मुरीद बन गए जिनकी हिन्दू औरतें पीरों पर जाकर तावीज़ आदि ले आती थी। हिन्दुओं के अन्धविश्वास में वृद्धि ही हुई।  हिन्दुओं का मुसलमान बनना अब भी पहले की तरह ही जारी था। कहीं से किसी मुसलमान के हिन्दू बनने की खबर नहीं आती थी। 1878 में एक हिन्दू युवक ठारुमल मखीजाणि एक मुसलमान लड़की के चक्कर में फँसकर मुसलमान बन गया। जबकि वह पहले से ही विवाहित और एक बच्चे का बाप भी था। ये मुस्लिम लड़कियां आमतौर पर नाचने वाली होती थी जो धनी हिन्दू युवकों को अपना शिकार बनाती थी।  कुछ वर्षों के बाद उसकी मुसलमान बीवी का देहांत हो गया। ठारु शेख को अब अपने पुराने परिवार की याद आई।  उसने वापिस हिन्दू बनना चाहा पर किसी ने उसकी न सुनी।  अंत में बाबा गुरुपति साहिब ने शुद्ध करके वापिस उसका नाम ठारुमल रख दिया। परन्तु दीवान शौकिराम ने उसका कड़ा विरोध किया। इस कारण हिन्दू लोगों में इसकी बड़ी प्रतिक्रिया हुई जिसका हिन्दू युवकों पर विपरीत प्रभाव पड़ा और कई युवक मुस्लमान बनने को तैयार हो गए। ऐसा ही एक मामला 1891 में प्रकाश में आया। दीवान सूरजमल दीवान शौकिराम का सौतेला भाई का था। दीवान सूरजमल और उसका बेटा दीवान मेवाराम भी मुसलमान बन गया था। उसने अपनी पत्नी और दोनों बेटियों को मुसलमान बनने का आग्रह किया।  उन्होंने मना कर दिया, जिसके लिए वह कोर्ट में चला गया।  आखिर वह केस हार गया।  दीवान हीरानंद ने उन दोनों हिन्दू लड़कियों का रातोंरात हिन्दू युवकों से विवाह कर दिया।  दीवान मेलाराम उनके पतियों के खिलाफ भी कोर्ट में गया पर हार गया। सिंध का हैदराबाद नगर जिसका असली नाम नारायण कोट था में अनेक हिन्दू युवक मुसलमान बनते जा रहे थे पर हिन्दू जाति कबूतर के समान आंख बंद कर सो रही थी। ऐसी विकट परिस्थितियों में आर्यसमाज की क्रांतिकारी विचारधारा से अनेक युवक धर्मरक्षा के लिए प्रेरित हुए।  दीवान दयाराम गिदूमल, दीवान नवलराय और दीवान गुलाब सिंह ने पंजाब आर्य प्रतिनिधि सभा को तार भेज कर सूचित किया की हिन्दू बड़ी संख्या में मुसलमान बनते जा रहे है।  उन्हें कैसे भी रोको। कोई उपदेशक या प्रचारक तत्काल भेजों।  स्वामी श्रद्धानन्द (तब महात्मा मुंशीराम) से विचार कर आर्य मुसाफिर पंडित लेखराम और पंडित पूर्णानंद ने सिंध में आकर विधर्मियों के विरुद्ध मोर्चा संभाल लिया।  दोनों महान आत्माओं ने न दिन देखा न रात।  उन्हें जिस भी हिन्दू का पता चलता कि वह मुसलमान बनने जा रहा है, तो वे झट उसके पास पहुँच जाते और उसे समझा बुझा कर वापिस से हिन्दू बना लेते।  हालत इतने नाजुक थे की आचार्य कृपलानी का भाई भी मुसलमान बन गया था। जिसे शुद्ध करके वापिस हिन्दू बनाया गया।  दोनों विद्वानों ने अपने प्रयासों से हिन्दू जनता में आत्म विश्वास पैदा कर दिया था। इन दोनों ने विधर्मियों के किले के किले तोड़ डाले। 1893 तक आते आते हिन्दू समाज में वापिस जान में जान आ गई और सिंध के अनेक शहरों में आर्यसमाज स्थापित हो गए।
सिंध में आर्यसमाज के प्रचार से अनेक व्यक्ति आर्य बने।  उनके त्यागी-तपस्वी जीवन आज भी हमें अध्यात्म का प्रेरित कर हमारा मार्गदर्शन करते रहते हैं। उनमें से एक महान आत्मा पंडित जीवन लाल जी के जीवन चरित्र का यहाँ वर्णन किया जा रहा है। आप बचपन से ही अध्यात्मिक विचारों के थे।  इसलिए बड़े होने पर नौकरी छोड़कर कंडड़ी के सूफी फकीर मुहम्मद हसन के पहले शिष्य फिर गद्दी के मालिक और सूफी महंत बन गए।  उनके शिष्य हजारों की संख्या में थे। सूफी मत में मांस और भांग का अत्यंत सेवन होता था। एक बार वे सूफी मत का प्रचार करते करते एक रेलवे स्टेशन पर पधारे।  उस रेलवे स्टेशन के मास्टर थे हाकिम राय आर्य। आर्य जी ने सूफी महंत जी को भोजन कराया और ज्ञान चर्चा भी की।  जब वे रेल में जाने लगे तो उन्हें एक पुस्तक कपड़े में लपेट कर दी और उसे पढ़ने का वचन उनसे ले लिया। पंडित जी ने जब पुस्तक खोल कर देखी तो उन्हें बड़ा क्रोध आया क्यूंकि उस पुस्तक का नाम था “सत्यार्थ प्रकाश” । परन्तु उनके मन में नित्य विचारों की नई नई लहरें आती रही , कभी मन आया की उसे फ़ेंक दे,कभी मन आया की मैं ऐसी पुस्तक को क्यों देखू जिसकी हिन्दूयों, ईसाईयों और मुसलमानों के प्राय: सभी नेता निंदा करते हैं। फिर मन में आया की मैं इतना बड़ा फकीर हूँ। मेरे पूरे जीवन के परिश्रम को भला एक पुस्तक कैसे तोड़ सकती है? अंत में उन्होंने निश्चय किया की सत्यार्थ प्रकाश को पढ़ कर उसकी परीक्षा करनी होगी। इतने सारे लोग इस पुस्तक के सम्बन्ध में जो राय देते है। वह कहाँ तक सत्य है? उन्होंने पुस्तक खोल कर उसे पढ़ना शुरू किया। सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम समुल्लास में परमात्मा के सच्चे नामों और दुसरे नामों के गुणों के अनुसार व्याख्या पढ़कर और ईश्वर की सच्ची शक्ति और सत्य स्वरुप को ज्ञात कर उन्हें सच्चे आनंद का आभास होने लगा।  उन्होंने सोचा कि जो ग्रन्थ सर्वप्रथम ईश्वर के सच्चे स्वरुप को स्वीकार करता है। वह नास्तिक कैसे हो सकता है? जो ईश्वर को इतना महान बता सकता है।  वह हिन्दू विरोधी कैसे हो सकता है? वे समझ गए की यह षड़यंत्र केवल और केवल विधर्मियों द्वारा स्वामी दयानंद को बदनाम करने की व्यर्थ कोशिश है।  उस दिन से उनके विचार स्वामी दयानंद के लिए बिलकुल बदल गए। उसी काल में उनके एक शिष्य ने उन्हें बिना बताये सिंध में ईश्वर का अवतार घोषित कर दिया और इस विषय में इंग्लैंड की रानी और भारत के वाइसरॉय तक को पत्र लिख दिया जिससे पूरे देश में आन्दोलन छिड़ गया।  सत्यार्थ प्रकाश पड़ने से उनके मन के विचारों में क्रांति का सूत्रपात हो चूका था। जिससे उनकी आत्मा ने इस अन्धविश्वास को छोड़ने और सत्य को ग्रहण करने का निश्चय किया।  वे सूफी मत और इस्लाम का त्याग कर आर्यसमाज में शामिल हो गए।  पंडित जीवनलाल जी का जीवन परिवर्तन हमे स्वामी दयानंद के अनमोल सन्देश की मनुष्य को सत्य के ग्रहण और असत्य के त्याग के लिए सदा तत्पर रहना चाहिए का दर्शन कराता है। सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर जाने कितनों का इसी प्रकार से जीवन परिवर्तन हुआ होगा।
सिंध का प्रसिद्द शास्त्रार्थ
मीरों के समय में सिंध के संजोगी परिवार मुसलमान बन गए थे।  वे केवल नाम से मुसलमान थे। जबकि उनके रीती रिवाज़ आज भी हिन्दुओं के समान ही थे। क़ाज़ी आरफ गाँव में एक संजोगी मुसलमान परिवार था। जिसके मुखिया का नाम था पर्यल।  आर्यसमाज के प्रचार के कारण पर्यल का हिन्दुओं से फिर से सम्बन्ध  स्थापित हुआ।  उसने वापिस हिन्दू बनने से पहले एक शर्त लगाई। थोड़ी मुहब्बत में आर्यसमाज के वार्षिक उत्सव पर पंडितों और मौलवियों के बीच में शास्त्रार्थ रखा जाये।  अगर आर्यसमाजी जीत गये तो उनका परिवार हिन्दू बन जायेगा और अगर मुसलमान जीते तो वे मुसलमान ही रहेगे। 1934 में आर्यसमाज के उत्सव में शास्त्रार्थ केसरी पंडित रामचंद्र देहलवी जी, महात्मा आनंद स्वामी जी (तब खुशहालचंद जी), प्राध्यापक ताराचंद गाजरा जी, प्रो हासानंद जी, पंडित उदयभानु जी, पंडित धर्मभिक्षु जी आदि पधारे। शास्त्रार्थ का विषय था ‘इस्लाम खुदा का मज़हब है क्या?’
जैसा की जग जाहिर है मुसलमान लोग अपना पक्ष सिद्ध न कर सके और वैदिक धर्म की जीत हुई।  हजारों की संख्या में संजोगी वैदिक धर्म में शामिल हो गए।  हवन आदि करके उन्हें यज्ञोपवित पहनाया गया।  पर्यल का नाम बदल कर प्रेमचंद रखा गया। प्रेमचंद के घर पहुँचने रात को मुसलामानों ने उनके घर पर हमला बोल दिया पर दंगे की आशंका पहले से ही थी इसलिए पहले से ही तैयार हिन्दुओं ने गुंडों को पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया और मामला शांत पड़ गया।
सिंध में हिन्दुओं पर अत्याचार
सिंध में एक ऐसा समय भी था की जब भी कोई मुसलमान अगर हिन्दू कन्या या महिला को भगाकर ले जाता था तो कोई मुँह भी न खोलता था।  हिन्दू समझते थे की कानून का सहारा लेना बदनामी मोल लेने के बराबर है। इसलिए भगवान की इच्छा समझकर चुप रहते थे। आर्यसमाज ने पहली बार हिन्दुओं को इस विकट परिस्थिति का सामना करने की शक्ति दी। लरकाना जिले में अपर सिंध में एक पीर का गाँव था। एक अमीर हिन्दू जमींदार भी उस गाँव में रहता था।  उसकी दो जवान लड़कियां थी।  एक दिन वे पड़ोसी के घर पर गयी तो वापिस नहीं आई।  पूरे गाँव में तलाशा गया पर कोई सुराग नहीं मिला।  अंत में मजबूर होकर जमींदार ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवा दी।  पूरे सिंध में शोर मच गया कि अगर एक अमीर जमींदार की बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं, तो एक गरीब हिन्दू की बेटी का क्या होगा? लगभग एक महिना बीत गया पर कोई सुराग नहीं मिला।  पुलिस भी भाग दोड़ कर ठंडी पड़ गई।  एक दिन लरकाना स्टेशन पर तीन जवान पहुँचे। उनके हाथ में एक पोटली थी।  शायद कुछ कपड़े थे।  वहां से बस पकड़ कर वे अम्रोट शरीफ गाँव में पहुँचे।  हर गुरूवार को अम्रोट शरीफ गाँव में एक मेला लगता था।  जिसमे कई सौदागर समान का लेन देन करने आते थे। ये तीनों नौजवान भी मुसलमानों जैसे कपड़े पहन कर उस मेले में पहुँच गए।  शाम को मस्जिद में नमाज अदा कर मौलवियों के साथ खाने पर बैठ गए।  खाने के दौरान आपसी बातचीत में उन्हें यह भी पता लगा की इस मस्जिद में तबलीगी का काम गुप्त रूप से होता है।  एक हिन्दू जमींदार की दो लड़कियाँ गुप्त रूप से भगा कर लाई गई है। जिनकी कल ही तबलीगी अर्थात धर्म परिवर्तन होना है।  कुछ समय के बाद ये जवान चुपके से वहाँ से खिसक गए और श्री गोविन्दराम जी को जाकर सूचना दी। यह काम कितना खतरनाक था। आप इसकी कल्पना कर सकते है।  अगर भेद खुल जाता तो तीनों के टुकड़े हो जाते।  गोविन्दराम जी को श्री ताराचंद गाजरा जी ने सी आई डी के कार्य पर लगा रखा था।  उनके घर से वे तीनों डीसपी के घर पर पहुँच गए और उन्हें सूचना दी। लड़कियों की जानकारी देने वालों पर 5000 का ईनाम था। डीसपी ने उन्हें हार्दिक धन्यवाद दिया और पुलिस अटाले के साथ मस्जिद पर धावा बोल दिया।  वहाँ से दोनों हिन्दू लड़कियों मीरा और मोहिनी को बरामद कर लिया गया। मौलवियों के साथ तीन बाहर के चौकीदारों को भी गिरफ्तार कर लिया गया।  लड़कियों ने बयान दिया कि जब वे पड़ोस के घर से वापिस आ रही थी तो उन्हें चादर डाल कर अगवा कर मस्जिद लाकर बंद कर दिया गया था।  बाद में हमें मुसलमान बनने का लालच दिया गया था। उन्होंने हमें यह कहकर भी धमकाया कि यहाँ से तुम कहीं पर भी नहीं भाग सकती और हिन्दू अब तुम्हे वापिस नहीं लेंगे। क्यूंकि अब तुम पतित हो चुकी  हो। ध के समाचारों में यह मामला छाया रहा।  अनेक मुस्लिम नेताओं को उन मौलवियों को मुक्त करवाने के लिए तार भेजे गए पर अंत में उन्हें सजा मिली।  यह तीन आर्य कार्यकर्ता जिन्होंने अपनी जान की बाज़ी लगाकर हिन्दू लड़कियों की रक्षा करी थी का नाम था श्री निहाल चंद आर्य जी, श्री चमनदास आर्य जी और श्री लेखराज जी।  स्पष्ट है कि स्वामी दयानंद ने आर्यसमाज न बनाया होता तो ऐसे शूरवीर  पैदा ही नहीं होते। सोचिये सिंध में हिन्दुओं की क्या दुर्दशा होती?
कुरान के पन्ने जलाने से दंगा होते होते बचा
श्री भीमसेन आर्य के बाल्यकाल की एक घटना का मैं यहाँ वर्णन करना चाहूँगा जिसकी बुनियाद अन्धविश्वास पर टिकी थी।  जब वे छोटे थे तो मस्जिद में कुछ मुसलमान लड़कों के साथ खेलते रहते थे।  उन्होंने सुन रखा था कि कुरान शरीफ के पन्नों में अगर आग लगा दी जाये तो या तो कुरान शरीफ हवा में जादू से उड़ जाता है अथवा आग ठंडी हो जाती है।  कुरान शरीफ कभी जल नहीं सकती। जिस मस्जिद में वे खेलते थे उस मस्जिद का दरवाजा नहीं था और एक पुराना कुरान जिसके पन्ने अलग हो चुके थे और जो प्रयोग में नहीं था वहाँ मस्जिद में रखा था।  बाल्यकाल की नासमझी और अंधविश्वास के चलते उन्होंने कुरान के कुछ पन्नों में आग लगा दी।  शाम को जब मस्जिद में बांग देने वाला आया तो उसने आर्यसमाजियों द्वारा कुरान की अवहेलना कह कर चारों तरफ शोर मचा दिया। मौलवी खास तौर पर भड़क उठे। पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई गई।  मामला तहसीलदार तक गया।  तहसीलदार अक्लमंद था। उसने समझाया की बच्चे वहाँ खेलते थे और मस्जिद का कोई दरवाजा नहीं था। बांग देने वाला भी मानता है कि कुरान के पन्ने अलग अलग थे और अक्सर उड़ जाते थे।  फिर तो यह बांग देने वाले की जिम्मेदारी है कि वह मस्जिद पर दरवाजा लगवाता और कुरान को सुरक्षित ढंग से रखता।  यदि वह ऐसा करता तो यह घटना नहीं घटती। तब कहीं जाकर मामला शांत हुआ नहीं तो हिन्दू मुस्लिम दंगे की एक और नींव पड़ जाती।

सूअर द्वारा हिंदुयों की रक्षा
शिकारपुर और जैकोबाबाद में अक्सर देखा जाता था कि कई मुस्लिम जमींदार हिन्दू हरिजनों की बस्तियों जाते और उन्हें इतना कर्ज दे देते कि वे जीवन भर उसे न चुका सके। कर्ज न चूका पाने पर उन्हें मुसलमान बना कर ,अपने किसी नौकर से उनकी बहन या बेटी का निकाह भी करवा देते थे।  आर्यसमाज के कार्यकर्तायों श्री भीमसेन आर्य जी और श्री जीवतराम को अंत में एक उपाय सुझा।  मुसलमान लोग उस बस्ती में जाने से परहेज रखते थे जिनमें सूअर पाले जाते थे। आर्य कार्यकर्ताओं ने घोषणा कर दी कि जो भी हरिजन अपने अपने घर को साफ रखेगा उसे एक एक सूअर ईनाम में दिया जायेगा। ईनाम के लालच में हरिजनों ने अपने अपने घर साफ़ कर लिए और उसके बदले में उन्हें एक एक सूअर दिया गया। एक एक सुअरी 20-20 बच्चों को जन्म देती है।  जिससे पूरी बस्ती में कुछ ही समय में सूअर ही सूअर नजर आने लगे।  सूअरों के दर्शन को नापाक मानने वाले मौलवी लोगों ने हरिजनों की बस्तियों में आना छोड़ दिया। इससे अनेक हिन्दू हरिजनों का न केवल धर्म परिवर्तन होने से बच गया अपितु अनेक अबलाओं  भी धर्म रक्षा हो गयी।
शुद्धिवाला प्रचारक -श्री खेम चन्द मुनोमल शुद्धिवाला
शुद्धि वाला के नाम से प्रसिद्द श्री खेमचन्द जी ने सिंध में जबरदस्ती हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के प्रयासों को शुद्धि का चक्र चला कर उत्तर दिया।  कोई उन्हें सिंध का सावरकर की उपाधि देता था, कोई उन्हें सिंध के श्रद्धानन्द की उपाधि देता था। धीरे धीरे वे शुद्धिवाला के नाम से प्रसिद्द हो गए। उनके जीवन से अनेक विवरण हमे आज भी शुद्धि की प्रेरणा देते है। हरपाल और धीरज मुसलमान हो गए थे।  उनके प्रयत्न से फिर से शुद्ध हो गए।  लीना नामक एक ईसाई लड़की को शुद्ध करके उनका विवाह हरिश्चंद से करवाया।  नवाबशाह के एक हिन्दू जमींदार की लड़की को मुसलमान भागकर ले गए। उसको वापिस लाकर शुद्ध करके एक हिन्दू नौजवान से उसकी शादी करवा दी।
हैदराबाद आन्दोलन के समय 1939 में शुद्धिवाला को सक्खर की सत्याग्रह समिति का अध्यक्ष बनाया गया। उन दिनों वह के मुसलमान हिन्दू लड़कियों को भगा कर एक स्थान खडे में ले जाकर रखते थे। बाद में उन अबलायों को मुसलमान बना देते थे।  शुद्धिवाला अपने प्राणों की फिक्र न करते हुए वहां पहुँच गया और कई हिन्दू लड़कियों का बचा लाये।  पंडित लेखराम के मस्जिद से हिन्दू लड़की को बचाने वाली घटना का पुन: स्मरण हो गया।
एक घटना उनके जीवन के संघर्ष को यथार्थ कर आज भी हमे गुदगुदाती है।  सिंध में तुल्सया नामक हिन्दू लड़की एक मुसलमान के साथ भाग गई। पुलिस के सामने तुलस्या उसी मुसलमान के तरफदारी करती रही जिसके साथ वह भागी थी। हिंदुयों को अंदेशा था कि तुलस्या तो जाएगी ही, उससे मुसलमानों की हिम्मत और बढ़ जाएगी।  जिससे उन्हें हिन्दू लड़कियों को भगाने की छुट ही मिल जाएगी। शुद्धिवाला के प्रयासों से भी वह तस से मस न हुई।  तुलस्या को जेल में रखा गया था।  शुद्धिवाला मुस्लिम वेश भूषा पहन कर जेल में चला गया।  जेल में वे तुलस्या से फिर से मिला। उसे समझाया बुझाया। कुछ दिनों में उसने तुलस्या को वापिस हिन्दू बना दिया।  अगली सुनवाई के समय तुल्सया ने हिंदुयों के पक्ष में गवाही दी और भगाने वालों को 5-5  वर्ष की सजा हुई।  तुलस्या को शुद्ध कर उसे हिन्दू पति के साथ रखा गया।  अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक तुलस्या हिन्दू ही रही।

भूत प्रेत का भागना
यह घटना 1947 से पहले की है।  आर्यसमाज उस काल में हिन्दुओं में व्याप्त अन्धविश्वास के विरुद्ध जनजागरण अभियान चला रहा था। सिंध में हिन्दुओं के घरों में एक और अंधविश्वास पनप रहा था।  वह था भूत प्रेत का किसी भी औरत के शरीर में आना और उसका बाल खुले छोड़कर झूमना। उस भूत को भागने के लिए भूपे को बुलाया जाता जो पहले उस औरत को मारता पिटता, फिर उसकी मांग को पूछता।  जब उसकी मांग जैसे धन, वस्तु आदि की पूर्ति हो जाती। तो वह भूत औरत के शरीर से अलग हो जाता और औरत झूमना बंद कर देती। घोटकी जिला सक्खर में 1919-1920  में आर्यसमाज की स्थापना हुई थी।  आर्यसमाज के कार्यकर्ता श्री खियाराम जी की औरत ने भूत चिपकने का नाटक रचा।  भूपे बड़े खुश हुए।  वे कहने लगे की आर्यसमाजी तो भूत प्रेत को मानते ही नहीं अब देखेगे की वे कैसे भूतों से छुटकारा पाएँगे।
खियाराम जी पर आर्यसमाज का प्रभाव था व इस नाटक को समझते थे। उन्होंने पहले तो अपनी पत्नी को समझाया बुझाया पर वह नहीं मानी और झूमती रही तो उन्होंने उसे एक कोठरी में बंद करके वहाँ पर अग्निहोत्र करना शुरू कर दिया और चुपके से उसमे लाल मिर्ची दाल कर कोठरी को बंद कर बाहर आ गए। उन्होंने घोषणा कर दी की हवन के धुएँ से भूत स्वयं भाग जायेगा।  उनकी औरत मिर्ची का तेज धुआ सहन नहीं कर सकी और कोठरी से बहार निकलने के लिए चिल्लाने लगी।  श्री खियाराम ने कहाँ की जब तक प्रेत नहीं भागेगा तब तक दरवाजा नहीं खुलेगा।  अंत में उनकी औरत ने सत्य कथा कह सुनाई की उसे कुछ शिकायते थी। जिसे पूरा करने के लिए वह भूपे के पास गयी थी।  उसने यह ढोंग रचने को कहा था। सारी हकीकत पता चलने पर पूरे शहर में आर्यसमाजियों की अंधविश्वास से छुटकारा दिलवाने के लिए प्रशंसा मिली और भूपों को सभी ने धिक्कारा था। इस घटना के बाद सन 1947  तक फिर किसी भी महिला में कोई भूत नहीं आया।
आज भी गांव-देहात में किसी के शरीर में भूतों के आने की ख़बरें सुनने को मिलती है। आर्यों की यह पुरानी तरकीब अपना कर देखिये। निश्चित रूप से लाभ होगा। हिन्दू समाज को आर्यसमाज का अन्धविश्वास के विरुद्ध पुरुषार्थ करने के लिए आभारी होना चाहिए।
सन्देश
मैंने सिंध में आर्यसमाज के इतिहास का एक लुप्त पृष्ठ पाठकों के समक्ष यह सिद्ध करने के लिया लिखा है कि आर्यसमाज ने हिन्दू समाज पर कितना उपकार किया है। आर्यसमाज हिन्दू समाज का प्रहरी है। रक्षक है।  आपत्ति काल में धर्मरक्षा करने वाला है। आज की युवा पीढ़ी को आर्यसमाज द्वारा किये गए तप को स्मरण कर प्रेरणा लेनी चाहिए। सिंध में वर्तमान में भी हिन्दुओं की दुर्दशा किसी से भी छुपी नहीं है। भारत में यही परिस्थितियां धीरे धीरे जहाँ जहाँ हिन्दुओं की संख्या कम और मुसलमानों की अधिक होती जा रही है बनने लगी है। आज हिन्दुओं को एक होकर, संगठित होकर, अपने हिन्दू भाइयों की रक्षा करने का संकल्प लेना चाहिए अन्यथा श्री राम और कृष्ण का नाम तक लेने वाला कुछ दशकों में दुर्लभ हो जायेगा। स्वामी दयानन्द और आर्यसमाज का हिन्दू समाज पर उपकार अविस्मरणीय है।आर्यसमाज हिन्दू समाज का प्रहरी है।

डॉ विवेक आर्य

Monday, 5 June 2017

IIT मद्रास एवं अम्बेडकर पेरियार स्टडी सर्किल: नाम से भ्रमित मत होना

डॉ विवेक आर्य
IIT मद्रास में बीफ फेस्ट का आयोजन  किया गया।  कुछ पाठक IIT के नाम से प्रभावित हो जाते है। उन्हें लगता है कि IIT में पढ़ने वाले गौहत्या पर प्रतिबन्ध का विरोध कर रहे है तब तो अवश्य कोई बात होगी। सत्य यह है कि IIT मद्रास ने कुछ वर्ष पहले इंजिनीरिंग के अतिरिक्त कुछ अन्य पाठ्क्रम आरम्भ किये है। जैसे इतिहास, सामाजिक विज्ञान, विदेशी भाषा आदि में Phd आदि। इन पाठ्यक्रमों में भाग लेने वाले अधिकतर युवा JNU छाप होते है। यह संगठन अम्बेडकर पेरियार स्टडी सर्किल के नाम से बनाया गया है। यह संगठन कम भानुमति का कुम्बा अधिक है। यह कुम्बा दलित, मुस्लिम, साम्यवादी, वंचित , शोषित, मूलनिवासी, अनार्य, दस्यु, द्रविड़, नवबौद्ध, नास्तिक, रावण और महिषासुर के वंशज, नाग जाति के वंशज आदि का बेमेल गठजोड़ हैं। इस संगठन का मूल उद्देश्य हमारे महान इतिहास, हमारी संस्कृति, हमारे धर्म ग्रन्थ, हमारी सभ्यता और हमारी परंपरा का विरोध करना हैं। यह ठीक है कि कालांतर में जातिवाद, अन्धविश्वास, कुप्रथा आदि का समावेश हमारे समाज में हो गया है। मगर इसका अर्थ यह नहीं कि हम सभी श्रेष्ठ एवं उत्तम बातों का भी विरोध भी उसी समान करे जैसे हम गलत बातों का करते हैं। यह कार्य ठीक वैसा है जैसे एक ऊँगली पर फोड़ा निकल जाये तो उसमें चीरा लगाने के स्थान पर पूरे हाथ को काट दिया जाये। ध्यान देने योग्य यह है कि यह संगठन देश को तोड़ने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।

इस लेख में हम इस संगठन के मार्गदर्शक डॉ अम्बेडकर एवं पेरियार की मान्यताओं का तुलनात्मक अध्ययन कर यह सिद्ध करेंगे कि कैसे यह बेमेल गठजोड़ है। जो स्वयं से भटका हुआ है। वह अन्य को क्या मार्ग दिखायेगा।
पेरियार द्वारा ईसाई बिशप रोबर्ट कैम्पबेल की आर्यों के विदेशी होने की कल्पना का अँधा अनुसरण किया गया। कैम्पबेल के अनुसार आर्यों ने देश पर आक्रमण किया, मूलनिवासियों को मारा और उन्हें शूद्रों के नाम से संबोधित किया। कैम्पबेल का उद्देश्य दक्षिण भारत में रहने वाले हिंदुओं को भड़का कर उन्हें ईसाई बनाना था। जबकि पेरियार का उद्देश्य द्रविड़ राजनीती चमकाने का था।
रिसले नामक अंग्रेज अधिकारी ने भारतीयों की जनगणना करते हुए ब्राह्मणों और अछूतों के मध्य अंतर करने का पैमाना नाक के परिमाण के रूप में निर्धारित किया था। उसके अनुसार द्रविड़ मूलनिवासी 'अनास' अर्थात छोटी और चपटी नाक के थे जबकि आर्य विदेशी थे इसलिए तीखी और लंबी नाक वाले थे। इस अवैज्ञानिक और हास्यपद विभाजन का उद्देश्य भी ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों को विभाजित करना था। जिससे की हिन्दू समाज के अभिन्न अंग का ईसाई धर्मान्तरण किया जा सके।

यहाँ तक भी जब दाल नहीं गली तो ईसाईयों ने नया खेल रचा। उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि जो श्वेत रंग के है वो आर्य और विदेशी है, जो अश्वेत रंग के है वो द्रविड़ और मूलनिवासी है। जो मध्य रंग के है वो आर्यों द्वारा जबरन मूलनिवासियों की स्त्रियों को अपहरण कर उनके सम्बन्ध से विकसित हुई संतान है।

इस प्रकार से इन तीन मिथकों को ईसाईयों ने प्रचारित किया एवं पेरियार ने इनका सहारा लिया जिससे उत्तर भारतीयों और दक्षिण भारतीयों में विभाजित कर वोटों को बटोरा जा सके।
इतना ही नहीं अपनी इस महत्वकांशा के चलते पेरियार ने 1940 में दक्षिण राज्यों जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आँध्रप्रदेश को मिलाकर द्रविड़स्तान बनाने का प्रयास भी किया था। जिसे अंग्रेजों और राष्ट्रभक्त नेताओं ने सिरे से नकार दिया था। पेरियार का प्रभाव केवल तमिल नाडु और श्री लंका  में हुआ जिसका नतीजा तमिल-सिंहली विवाद के रुप में निकला।

पेरियार ने तमिल नाडु के प्रसिद्द कवि सुब्रमण्यम भारती की भी  जमकर आलोचना करी थी। कारण भारती द्वारा अपनी कविताओं की रचना संस्कृत भाषा में करी गई थी। जबकि पेरियार उसे विदेशी आर्यों की मृत भाषा मानते थे। सत्य यह है कि पेरियार को हर उस चीज से नफरत थी जिस पर हम भारतीय गर्व करते है।
डॉ अम्बेडकर के नाम लेवा यह संगठन भूल गया कि पेरियार ने 1947 में डॉ अम्बेडकर पर देश हित की बात करने एवं द्रविड़स्तान को समर्थन न देने के कारण तीखे स्वरों में हमला बोला था। पेरियार को लगा था कि डॉ अम्बेडकर जातिवाद के विरुद्ध संघर्ष कर रहे है। इसलिए उसका साथ देंगे मगर डॉ अम्बेडकर महान राष्ट्रभक्त थे। उन्होंने पेरियार की सभी मान्यताओं को अपनी लेखनी से निष्काषित कर दिया।
1. डॉ अम्बेडकर अपनी पुस्तक "शुद्र कौन" में आर्यों के विदेशी होने की बात का खंडन करते हुए लिखते है कि
नाक के परिमाण के वैज्ञानिक आधार पर ब्राह्मणों और अछूतों की एक जाति है। इस आधार पर सभी ब्राह्मण आर्य है और सभी अछूत भी आर्य है। अगर सभी ब्राह्मण द्रविड़ है तो सभी अछूत भी द्रविड़ है।

इस प्रकार से डॉ अम्बेडकर ने नाक की संरचना के आधार पर आर्य-द्रविड़ विभाजन को सिरे से निष्काषित कर दिया।
2. जहाँ पेरियार संस्कृत भाषा से नफरत करते थे, वही डॉ अम्बेडकर संस्कृत भाषा को पूरे देश की मातृभाषा के रूप में प्रचलित करना चाहते थे। डॉ अम्बेडकर मानते थे कि संस्कृत के ज्ञान के लाभ से प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ज्ञान को जाना जा सकता है। इसलिए संस्कृत का ज्ञान अति आवश्यक है।
3. पेरियार द्रविड़स्तान के नाम पर दक्षिण भारत को एक अलग देश के रूप में विकसित करना चाहते थे। जबकि डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण भारत को एक छत्र राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे जो संस्कृति के माध्यम से एक सूत्र में पिरोया हुआ हो।
4. डॉ अम्बेडकर आर्यों को विदेशी होना नहीं मानते थे जबकि पेरियार आर्यों को विदेशी मानते थे।
5. डॉ अम्बेडकर रंग के आधार पर ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण का विभाजन गलत मानते थे जबकि पेरियार उसे सही मानते थे।

6. डॉ अम्बेडकर मुसलमानों द्वारा पिछले 1200 वर्षों में किये गए अत्याचारों और धर्म परिवर्तन के कटु आलोचक थे। उन्होंने पाकिस्तान बनने पर सभी दलित हिंदुओं को भारत आने का निवेदन किया था। क्योंकि उनका मानना था कि इस्लाम मुस्लिम-गैर मुस्लिम और फिरकापरस्ती के चलते सामाजिक समानता देने में नाकाम है। 1921 में हुए मोपला दंगों की डॉ अम्बेडकर ने कटु आलोचना करी थी जबकि पेरियार वोट साधने की रणनीति के चलते मौन रहे थे।
7. डॉ अम्बेडकर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र सभी को आर्य मानते थे जबकि पेरियार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को आर्य और शुद्र को अनार्य मानते थे।
8. डॉ अम्बेडकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते थे जबकि पेरियार स्वहित को सर्वोपरि मानते थे।
9. डॉ अम्बेडकर नास्तिक कम्युनिस्टों को नापसन्द करते थे क्योंकि उन्हें वह राष्ट्रद्रोही और अंग्रेजों का पिटठू मानते थे जबकि पेरियार कम्युनिस्टों को अपना सहयोगी मानते थे क्योंकि वे उन्हीं के समान देश विरोधी राय रखते थे।
10. डॉ अम्बेडकर के लिए भारतीय संस्कृति और इतिहास पर गर्व था जबकि पेरियार को इनसे सख्त नफरत थी।
11. डॉ अम्बेडकर ईसाईयों द्वारा साम,दाम, दंड और भेद के नीति से विभिन्न प्रकार के प्रलोभन देकर धर्मान्तरण करने के कटु आलोचक थे। यहाँ तक कि उन्हें ईसाई बनने का प्रलोभन दिया गया तो उन्होंने उसे सिरे से नकार दिया।  क्योंकि उनका मानना था कि ईसाई धर्मान्तरण राष्ट्रहरण के समान है। इसके ठीक विपरीत पेरियार ईसाई मिशनरियों द्वारा गड़े गए हवाई किलों के आधार पर अपनी घटिया राजनीती चमकाने पर लगे हुए थे। पेरियार ने कभी ईसाईयों के धर्मान्तरण का विरोध नहीं किया।

इस प्रकार से डॉ अम्बेडकर और पेरियार विपरीत छोर थे जिनके विचारों में कोई समानता न थी। फिर भी भानुमति का यह कुम्बा जबरदस्ती एक राष्ट्रवादी नेता डॉ अम्बेडकर को एक समाज को तोड़ने की कुंठित मानसिकता से जोड़ने वाले पेरियार के साथ नत्थी कर उनका अपमान नहीं तो क्या कर रहे है।
निष्पक्ष पाठक विशेष रूप से अम्बेडकरवादी चिंतन अवश्य करे।

(सलंग्न चित्र में अम्बेडकर पेरियार स्टडी सर्किल की फेसबुक प्रोफाइल पर बीफ फेस्टिवल का न्योता)