Monday, 25 April 2016

ज्ञान की चुनौती लें, इसमें हार नहीं होती 


मेरे बचपनकी कहानी सचमुच सकारात्मकता की कहानी है। मैं जब पांच वर्ष का था तो पिताजी की मृत्यु हो गई। उसके सदमे में मेरे दादा भी चल बसे। मैं दृष्टिहीन बाबा (दादाजी के भाई) के साथ रहता था। मां का पुनर्विवाह हुआ। हमारे सौतेले पिता का एक बेटा था। उसके साथ हमें पढ़ने स्कूल भेजा। थोड़े दिनों बाद उन्होंने स्कूल में जाकर पूछा कि बच्चे पढ़ाई में कैसे हैं तो अध्यापक ने कहा कि आपके बड़े बेटे (हमारा सौतेला भाई) में तो संभावना नहीं है, लेकिन छोटा बच्चा कुछ होनहार लगता है। इस पर ध्यान दीजिए। अध्यापक की बात का हमारे पिताजी पर उल्टा ही असर हुआ। उन्होंने हमारी किताबें छीनी, पट्‌टी फोड़ दी। हमारी मां उनसे किताबें लेने की कोशिश करती रहीं, लेकिन उन्होंने किताबें सामने जल रहे चूल्हे में जला दीं। फिर कह दिया कि आज से कोई स्कूल नहीं जाएगा। मेरी आत्मकथा मेरा बचपन, मेरे कंधों परमें मैंने सबकुछ बयान किया है। अब इसका दूसरा भाग युद्धरतरहा है। 



इस तरह हमारी पढ़ाई रुक गई, लेकिन पढ़ने की बेचैनी थी। हम कोशिश करते कि कोई किताब मिल जाए पढ़ने की। साथ के बच्चे थे, उनके पास जाकर कुछ सीखने की कोशिश की। उन्हें वह भी बुरा लगता था। हमारे सौतेले पिता के भाई जुआरी थे। बदायूं के पास नदरौली गांव की बात है। दीपावली का समय था और वे जुए में जीतकर आए थे। सारे पैसे जिसमें थे वह कुर्ता घर में टंगा था और वे बाहर गए थे। मैंने सोचा इतने रुपए में एक रुपया निकालकर किताब खरीदी जा सकती है। रुपया निकालकर मैं दुकान पर जाकर किताब देख रहा था कि पिताजी के बीच वाले भाई ने देख लिया। मैंने आशंका से किताब नहीं खरीदी और चला आया। घर लौटा तो देखा कि मेरी मां रास्ते पर कराह रही है, उसे बहुत मारा है। उन पर रुपया चुराने का इल्जाम लगाया गया था। मैंने सोचा सच्चाई बताई तो जो हालत मां की हुई है, उससे ज्यादा बुरी हालत मेरी हो जाएगी। बाद में पढ़ाई भी की। मैं सोचता रहा कि मां को यह बात बताऊंगा पर कभी बता नहीं पाया। मुझे इसका बड़ा अफसोस रहा। जब मां थीं, मुझे रोजगार नहीं मिल सका कि मैं बताऊं कि किताब के लिए चुराने का कितना अच्छा नतीजा निकला है। यह कसक लंबे समय बनी रही। 

इस घटना के बाद मेरी मां मुझे दिल्ली ले आईं मेरी मौसी के यहां राजौरी गार्डन में। उनका एक बेटा पढ़ता था। मेरी मां मुझे वहां छोड़कर चली गईं। वहां मैंने काम करना शुरू किया। कुछ दिन तो घरों में अखबार डाले। कुछ दिन मुझे एक रुपए रोज पर होटल में बर्तन साफ करने का काम मिल गया था। उसी दौरान मुझे मौसाजी ने सब्जी मंडी जाकर नींबू लाकर बेचना सीखा दिया था। मैं राजौरी गार्डन में नींबू बेचता था। मौसाजी के पड़ोस में रिटायर्ड अफसर रहते थे। बुजुर्ग थे और दृष्टिहीन हो चुके थे। उनके बच्चे विदेश चले गए थे उन्होंने मौसाजी से कहा कि इस बच्चे को सामने के नगर निगम के स्कूल में दाखिला दिला दो। यह दोपहर तक नींबू बेचकर जाता है और यहां दोपहर की दूसरी पाली में इसका एडिमिशन हो जाएगा। मेरा एडमिशन हो गया, लेकिन पहले ही दिन मेरे नींबू नहीं बिके और मुझे लौटने में देर हो गई। मैं 12-12:30 तक जाता था, लेकिन उस दिन 1 बजे से भी ज्यादा वक्त हो गया। मौसाजी ने बहुत फटकारा कि स्कूल तुम्हारे मौसा का नहीं है। स्कूल हाथ से निकल गया। पढ़ने का मौका फिर रह गया। 
वहीं एक सिख युगल था, जिसकी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने कहा कि हम इस बच्चे को गोद लेना चाहते हैं। उन्होंने मुझे पढ़ने के लिए कुछ पुरानी किताबें दीं और कहा कि हम इसे पढ़ाएंगे। मां को पता चला तो वे भागी-भागी आईं और मोह-ममता में हमें वहां से लेकर चली गईं। वे हमें जहां हम पैदा हुए थे नदरौली में छोड़कर वे अपने पति के घर चली गईं, क्योंकि वहां उनके दो बच्चे थे। गांव में फिर मजदूरी शुरू हो गई। 

उस वक्त गांव में स्कूल बन रहा था। गांव में दो-तीन स्वतंत्रता सेनानी थे, जो स्कूल के लिए लोगों से श्रमदान करा रहे थे। मैं भी चला गया। काम के साथ-साथ मैं कुछ कविता गुनगुुना रहा था। शौक था तुकबंदी का। दो स्वतंत्रता सेनानी अध्यापकों ने सुना तो अलग ले गए और पूछा कि किसकी कविता गा रहे हो। मैंने कहा कि मन बहलाने के लिए खुद ही लिख लेता हूं, गा लेता हूं। चूंकि मैं दलित बच्चा था, कपड़े फटे थे, मजदूरी करता था तो कोई सोच नहीं सकता था कि मुझे अक्षर-ज्ञान होगा। उन्होंने पूछा क्या तुम पढ़े हुए हो? गांव के लोगों को खुशी हुई कि जिसका दादा दृष्टिहीन है, पिता है नहीं, मां नहीं है और कविता करता है, यह तो चमत्कार है। उन दिनों में एक राजमिस्त्री के साथ काम कर रहा था और सुबह थैला लेकर भागा-भागा जा रहा था तो एक अध्यापक खेत में फसल देख रहे थे। उन्होंने मुझे बुलाया और कहां तुम्हें हम पढ़ाएंगे। दया की कोई बात नहीं है। स्कूल के बाद तुम हमारे यहां काम कर लेना तो हम वह खर्च वसूल लेंगे। हमने फैसला ले लिया। यह जिंदगी के जुएं जैसा था। मैं वहां चला गया। सालभर वे काम कराते रहे। उसी साल सीधे छठी की परीक्षा दी तो मैं पास हो गया। मैंने पास के गांव जाकर स्कूल में परीक्षा दी थी तो वहां के प्रिंसिपल ने एक सरकारी योजना के तहत मुुझे सीधे आठवीं में प्रवेश दिला दिया। फिर मैं नौवीं और दसवीं कक्षा भी पास कर ली थी मैं दिल्ली गया। मेरे मौसेरे भाई ने एमबीबीएस कर लिया था। उन्होंने कहा दसवीं से कुछ होगा नहीं, तुम थोड़ा और पढ़ लो। 
गांव लौटा तो जुलाई गुजर गया था। इंटर कॉलेज गया तो प्रिंसिपल ने कहा कि भई तुम लेट आए हो और मजबूरी है कि प्रवेश दे नहीं सकते। जब मैं निराश होकर लौट रहा था उन्होंने बुलवाकर कहा कि एक तरीका है। 15 अगस्त को हमारे यहां वाद-विवाद स्पर्द्धा होती है। यदि तुम वह जीत लो तो तुम्हें एडमिशन मिल जाएगा। हमारा मैनेजमेंट उसके लिए तैयार रहता है। मैंने चुनौती ली। बहुत बेचैनी थी। नींद नहीं रही थी। मेरे बाबा ने पूछा क्या बात है बेटा। मैंने समस्या बताई तो बोले, ‘रुपया-पैसे की बात तो है नहीं कि हार मान लो, ज्ञान की बात है पूरा दम लगा दो।मेरे मौसेरे भाई ने दिल्ली में कई दूतावासों में मेरा नाम लिखा दिया था। उन दिनों विदेशी दूतावास अपना प्रचार साहित्य मुफ्त भेजा करते थे। मैंने उसी में से रेफरेंस निकाल-निकालकर अपना भाषण तैयार किया। यह 1977 की बात होगी। लोग भाषण सुनकर चकित रह गए कि यह मजदूर बच्चा दुनियाभर के रेफरेंस दे रहा है। हम स्पर्द्धा जीत गए। हमारा एडमिशन हो गया। 

बीए करने चंदौसी के लिए निकला तो किराए के पैसे तक नहीं थे। घर के बर्तन तक बहन की शादी में चले गए थे। मजदूरी से छोटी-सी लुटिया थी। सीधे बेचता तो चोरी का आरोप लगता इसलिए उसे तोड़कर बेचा और किराये की व्यवस्था हुई। फिर बीए किया। इतनी मुश्किल से मैंने शिक्षा पूरी की। एमए में हम ट्रेन से बिना टिकट जा रहे थे। चैकिंग शुरू हुई तो मैंने सोचा कि पकड़े गए तो पढ़ाई छूट जाएगी, इसलिए चलती ट्रेन से कूद गया। सिर फुट गया, कपड़े फट गए, किताबें फट गईं। मुझ पर गांव के आर्य समाज का बहुत असर था। उनके भजनों के असर से ही मैं कवि बना। गांव में दो शास्त्री भाई पक्के गांधीवादी थे। मैं जब लिखने लगा तो छोटे भाई कवि थे। वे उसकी समीक्षा करते, प्रोत्साहन देते। सफर कठिन और बहुत लंबा रहा। मेेेरे जीवन का मूल मंत्र रहा है शिक्षा। हर हाल में पढ़ना। पढ़ाई की ललक ऐसी थी कि मैं कोई भी जोखिम लेने को तैयार था, भूखा रहने को तैयार था, कुछ भी करने को राजी था। घर छोड़ना है, नाते-रिश्ते छोड़ने हैं। सबसे बड़ी बात है कि मेरी जीत हुई और बड़ी जीत हुई है। 

बीए करने दूसरे शहर जाना था तो किराये के पैसे नहीं थे। घर में मजदूरी करके खरीदी हुई एक लुटिया थी। उसे बेचकर किराये के पैसे जुटाए। 

मुझे कहा गया कि वाद-विवाद स्पर्द्धा जीत लो तो इंटर कॉलेज में प्रवेश मिल जाएगा। मुझे चिंता में देख मेरे बाबा ने कहा, ‘रुपए-पैसे की बात तो है नहीं कि हार मान लो। ज्ञान की बात है तो पूरा दम लगा दो। 
आर्यसमाज द्वारा दलितोद्धार का प्रेरणादायक प्रसंग  

आर्यसमाज द्वारा दलितोद्धार का प्रेरणादायक प्रसंग 

श्योराज सिंह बेचैन का जन्म  दलित परिवार में हुआ था। बचपन में पिता का साया सर से उठ गया। माता ने दूसरा विवाह कर लिया। सौतेले पिता ने पढ़ने लिखने में रूचि रखने वाले श्योराज की पुस्तकें जला दी। विषम परिस्थितियों में श्योराज सिंह ने जीवन में अत्यन्त गरीबी को झेलते हुए, मजदूरी करते करते कविताओं की रचना करना आरम्भ किया। आर्यसमाज के भजनोपदेशक उनके छोटे से गांव में उत्तर प्रदेश में प्रचार करने के लिए आते थे। उनके राष्ट्रवादी, समाज कल्याण एवं आध्यात्मिकता का सन्देश देने वाले भजनों से प्रेरणा लेकर श्योराज सिंह ने कवितायेँ लिखना आरम्भ किया।  गांव के एक आर्यसमाजी शास्त्री ने जातिवाद की संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर उनके पढ़ने लिखने का प्रबंध किया। स्वामी दयानन्द से प्रेरणा लेकर प्रगति की सीढियाँ चढ़ते हुए श्योराज सिंह को आज साहित्य जगत में लेखन के लिए साहित्य भूषण पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया है। आप दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग में प्रोफेसर है। वाणी प्रकाशन द्वारा आपकी आत्मकथा को प्रकाशित किया गया है।

आर्यसमाज ने अपनी स्थापना से लेकर आज तक न जाने कितने होनहार लोगों का जीवन निर्माण किया हैं। आशा है स्वामी दयानन्द कि यह कल्याणकारी चेतना संसार का इसी प्रकार से कल्याण करती रहे। 

श्योराज सिंह बेचैन की संक्षिप्त आत्मकथा को पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर समाचार पत्र के इस लिंक पर जाये 

हिन्दू या सिख होकर जन्म लेना पाप है?

अपना घर छोडना आसान नहीं होता साहब, हम वहां जिल्लत की जिंदगी जी रहे थे, हमारे बच्चे स्कूल नहीं जा सकते थे| हमेशा खौफ का साया घेरे रहता था| औरतें घरों में कैद होकर रह जाती थी, ऐसे माहौल में अब ज्यादा रहना मुश्किल था, लिहाजा मौका मिलते ही भारत चले आए| यह कहते कहते पाकिस्तान से आये हिन्दू रोने लगे थे| लेकिन भारत के अन्दर किसी भी तथाकथित मानवाधिकारों के रक्षक, वोट बेंक की खातिर आतंकी अफजल को गुरु जी कहने वाले लोगों का दिल नही पसीजा था| अभी कई रोज पहले पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत में आतंकियों ने प्रांतीय विधानसभा सदस्य सरदार सूरन सिंह की हत्या कर दी गयी| जिसकी वजह इतनी थी की उसने उस इलाके में 75 साल से बंद पड़े गुरूद्वारे को खुलवाया था| हम अखलाक या इशरत जहाँ, की तुलना इस हत्या से कर समय बेकार करना नहीं चाहते| बस उन लोगों से सीधा सा सवाल करना चाहते है जो बाटला हॉउस मुठभेड में शहीद हुए दिल्ली पुलिस निरीक्षक मोहन चंद शर्मा के शव पर आँखे नम करने के बजाय इंडियन मुजाहिदीन  के आतंकियों की लाश पर आंसू बहा रहे थे, कि क्या पाकिस्तान में हिन्दू या सिख होकर जन्म लेना पाप है? उस मीडिया से भी प्रश्न है जो ब्रिटेन दौर पर भारत के प्रधानमंत्री से असहिष्णुता पर प्रश्न करती दिखाई देती है| किन्तु नवाज शरीफ से पाकिस्तान में लगातार अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमले पर कोई सवाल पूछने से आज पीछे क्यों हट जा रहे है?
पिछले दिनों  लाहौर के पब्लिक पार्क में ईस्टर त्योहार मना रहे ईसाई समुदाय के करीब 72  लोगों को एक आतंकी संगठन का शिकार होना पडा था जिसमें करीब 300  लोग घायल हुए थे| विडम्बना देखिये हिसार के अन्दर एक चर्च की दीवार से कुछ पत्थर गिरने की आवाज तो अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को सुन गयी थी किन्तु इन मासूमों की चीख भारत से लेकर अमेरिका तक शायद नहीं पहुंची? पाकिस्तान में अल्पसंख्यको की दुर्दशा वैसे तो आम बात है लेकिन हिन्दुओ के साथ जो व्यवहार दूसरे देशो  में हो रहा है वो वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है| लेकिन यदि बात अपने पडोसी मुल्कों की करें तो पकिस्तान हो या बांग्लादेश, हिन्दुओ पर होने वाले अत्याचारो पर कोई कमी नही आ रही है| अपनी आवाज मुखर करने की कीमत अल्पसंख्यक हिन्दू समुदायो को जान,माल और इज्जत गवां कर चुकानी पड रही है पिछले  दिनों खुद बांग्लादेश का मिडिया इस बात को कह रहा था कि जिस तरह से कुछ इलाको में अल्पसंख्यको के साथ व्यवहार हो रहा है उनपर अत्याचार हो रहे है उसने 1971 में पाकिस्तान समर्थक समूहो द्वारा दिखाई गयी बर्बरता की यादे ताजा हो गयी है| उत्तरी बांग्लादेश के कुछ इलाके और दक्षिणी हिस्से के कई गांवों में जब इस तरह की वारदातें हुई तब करीब सौ से भी ज्यादा हिन्दू परिवार अपना घर-बार छोड कर भाग गए| हिन्दू धार्मिक स्थलो पर तोडफोड किया जाना, महिलाओ के साथ जबरन विवाह और अपहरण, अंत्येष्टि स्थलो पर कब्जे की घटनाये लगातार जारी है|


कुछ महीनें पहले पाकिस्तान से आये गजल गायक गुलाम अली का शिव सेना की धमकी के बाद मुम्बई में शो रद्द हुआ था, उस समय मीडिया से लेकर तमाम धर्मनिरपेक्ष दल दुखी नजर आये और अपने-अपने राज्यों में गुलाम अली का कार्यक्रम करने को लालायित भी  हुए थे किन्तु इन मुद्दों पर आज तक  एक भी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेता ने पाकिस्तान सरकार को चिट्टी लिखकर यह कहने का साहस नहीं किया कि सरदार सुरन सिंह की हत्या पर पाक सरकार खामोश क्यों है? या फिर पाकिस्तान में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार बंद करे| 2012 में हिन्दुओ का एक जत्था जब भारत आया था जो इतना डरा हुआ था की वापस जाने को तैयार नही था| कानाराम भील पहले पाकिस्तान के पंजाब सूबे में रहीमयार खान जिले में रहते थे, अब वो सदा के लिए अपने घर वतन को छोड  आए थे| खिम्मी भील ने पाकिस्तान से आते समय वचन दिया था कि वो तीर्थ यात्रा पूरी कर के वापस लौटेंगी लेकिन अब वह भारत में ही रहेगी| इन हिंदुओ के मुताबिक, इनसे यह करार लिया गया था कि वो भारत में नहीं रुकेंगे और अपनी धार्मिक यात्रा पूरी होते ही, वीजा में दी गई मियाद के भीतर ही पाकिस्तान लौट आएँगें| लेकिन इनमें से हर हिंदू का कहना था कि चाहे जेल भेज दो लेकिन पाकिस्तान के लिए रेल में मत भेजो| बांग्लादेश  हो या पाकिस्तान या कोई और देश, नागरिकों की हैसियत से अल्पसंख्यको के घरों और परिवारों की सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी है?  


कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत के सिविल सोसायटी के संगठन, मानवाधिकार पर शोर मचाने वाली शबाना आजमी, याकूब मेनन की फांसी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने वाले लोग, अखलाक के परिजनों पर लाखों रूपये बरसाने वाले तमाम नेता, इस महत्वपूर्ण सवाल पर चुप्पी साध जाते है| क्या आज वोट मानवता से बडी हो गयी? क्या इनकी नजर में एक इन्सान के रूप में दर्द सिर्फ मुसलमान को ही होता है? पाकिस्तान में बलात्कार का शिकार हो रही हिन्दू सिख महिलाएं, ईषनिंदा के झूठे आरोपो में जेलों सड रहे लोगों का दर्द इनसे दूर भाग जाता है| क्यों यह लोग इन संवेदनशील  मुद्दों पर मूक हो जाते है? यह लोग अपना मत अपना उद्देष्य स्पष्ट करने से हिचकते क्यों है? बहरहाल इन सब प्रश्नों पर हमारा अंत में एक ही प्रश्न है कि सोचों जब ही हम चुप रहेंगे तो उन लोगों की आवाज कौन बनेगा?....दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा लेखक राजीव चौधरी 

नेपाल में कुछ इस तरह जल उठी वेद की ज्योति

नेपाल के भिडियाखेडी (जिला पर्सा) में 101 यजमान दम्पत्तियों द्वारा की गई पूर्णाहुति से हुआ छह दिनों के आर्य समाज के वार्षिकोत्सव का समापन |

10से 15  अप्रैल 2016 तक छह दिनों में हुआ वेदों का धुआंधार प्रचार अंतिम दिन 30 यज्ञवेदियों में लगा यजमानों व श्रद्धालुओ का भारी जमघट |

20,21 ,22 अक्टूबर 2016 में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मलेन काठमांडू की दी गई सभी को सूचना व आत्मीय निमंत्रण |

आर्यसमाज भिडीयाखेडी में विगत ३७ वर्षो से यज्ञ प्रवचन सत्संग का कार्य चल रहा है प्रथम दिवस १० अप्रैल को दोपहर में बहुत बड़ी शोभा यात्रा निकली गई | सकारात्मक प्रभाव पड़ा ,और कार्यक्रम की जानकारी पूरे क्षेत्र को हो गई |

जनता भी पूरी रूचि से बैठी रहकर कार्यक्रम का आनंद लेती थी |गायिका जी ने गृहस्थ, परमेश्वर , यज्ञ , कन्या भ्रूण हत्या, सामाजिक उत्थान आदि सामयिक विषयों पर अपने अत्यंत मधुर कंठ से कुछ उपदेश देते हुये भजन गायन किया | वेदों के अंतर्राष्ट्रीय प्रवक्ता आचार्य श्री आनंद पुरुषार्थी जी ने लगभग हर सभा में अलग २ वेद मंत्रो की व्याख्या की | जिसमे चाणक्य नीति विदुर नीति, दर्शन उपनिषद आदि के प्रमाणों से उन बातों को पुष्ट किया |इसमें ईश्वर, जीव ,प्रकृति, आर्यसमाज, १६ संस्कार, कर्म व उसके प्रकार, सत्यार्थ प्रकाश आदि विषयों का कुशलता से समावेश किया गया था |
अंतिम दिन १०१ यजमान दम्पतियों की विशाल संख्या कार्यक्रम में समुपस्थित हुई प्रतिदिन रात्रि में जनता अपने काम काज से निवृत्त हो बड़ी संख्या में आती थी |यह हमारे आर्यसमाज के ३७ वर्षो में पहली बार हुआ कि सभी यज्ञ वेदियों में बैठने के स्थान पूरे भरे हुये थे |
२०,२१,२२ अक्टूबर २०१६ में काठमांडू में होने जा रहे सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा व नेपाल आर्य प्रतिनिधि सभा के संयूक्त तत्वावधान में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय आर्य महा सम्मेलन में आचार्य जी ने सभी को आमंत्रित किया इस विराट महोत्सव में श्री प्रभु शाह, योगेन्द्र मेहतो,बिरजा मेहतो,नागेन्द्र मेहतो,हरिंदर मेहतो,काशी मेहतो आदि आर्यजनों का विशेष सहयोग रहा |श्री नथुनी प्रसाद आर्य जी ने सभी विद्वानों व जनता जनार्दन व सहयोगियों का धन्यवाद किया|
 आर्य समाज दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा 

Saturday, 23 April 2016

उज्जैन कुम्भ सिहस्थ मेला 2016

आर्य समाज के शिविर का उद्घाटन



प्रति 12 वर्ष में सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक नगरी उज्जयिनी में एक भव्य एवं विशाल कार्यक्रम सिहस्थ महापर्व आयोजित होता है| विश्वभर में सम्भवत: कुम्भ व् सिहस्थ ही दो ऐसे विशाल आयोजन है, जिसमे करोड़ों लोगों की उपस्थिति होती है एवं धर्म के नाम पर करोड़ों श्रद्धालु और जिज्ञासु इसमें भाग लेते है|
अवसर बहुत अच्छा है करोड़ों व्यक्तियों का किसी धार्मिक भावना से एक जगह एकत्रित होना अपने आप में एक बड़ा उपलब्धि है किन्तु इसका आध्यामिक लाभ आने वाले किस रूप में और कितना उठाते है, इस पर विचार करना चाहिए| इसी विचार से महर्षि दयानन्द सरस्वती ने हरिद्वार कुम्भ मेले में पाखण्ड खंडिनी पताका फहराकर हजारों व्यक्तियों तक वैदिक विचारधारा को पहुँचाया था| इस अवसर पर आध्यात्मिक विचारों के लिए करोड़ों व्यक्तियों को यहाँ आकर यदि सत्य सनातन वैदिक ज्ञान का अमृत प्राप्त हो जावे तो उनका आना पूर्ण सार्थक हो सकता है| 


वर्तमान समय में आज जन सामान्य सनातन धर्म के सत्य स्वरूप से दूर होता जा रहा है| धर्म कर्म और ईश्वर के नाम पर भटक कर या तो अशांत जीवन जी रहा है या फिर ढोंगियों के चंगुल में फंसकर धन आदि की हानि करता नजर आता है|

यही एक ऐसा अवसर है जब हम अपनी प्राचीन वैदिक संस्कृति, संतान धर्म के सन्देश और हमारे विद्वान वैज्ञानिक ऋषियों की विचारधारा को करोड़ों व्यक्ति के मद्य प्रसारित कर सकते है| यह मानवीय विडम्बना है आज सत्य ज्ञान के आभाव में अंधविश्वास, पाखण्ड कुरीतियाँ और तरह तरह धर्म और भगवान उत्पन्न होते जा रहे है| 


इसलिए इस अवसर पर सत्य ज्ञान एवं वैदिक विचारधारा को प्रवाहित करने हेतू वैदिक विद्वान् सन्यासी, भजनोपदेशक, संगीताचार्य, वेदपाठी विदुषी आचार्य एवं गुरुकुल की ब्रहमचारिणीयों को आमंत्रित किया गया है| इसके साथ ही कार्यक्रम स्थल पर साहित्य एवं सामग्री हेतु भव्य स्टाल, सुन्दर आकर्षक यज्ञशाला एवं ज्ञानवर्धक प्रदर्शनी निर्मित की जा रही है यह कार्य रचनात्मक मानव कल्याण के लक्ष्य को लेकर किया जा रहा है| आशा करते है आप सभी लोगों के सहयोग से सकारात्मक परिणाम होगा..आर्य समाज तत्वावधान (मध्य भारतीय आर्य प्रतिनिधि सभा)