Monday, 26 June 2017

रमजान माह, शान्ति का या जिहाद का!

श्रीनगर की जामा मस्जिद के बाहर सुरक्षा में तैनात पुलिस अधिकारी मोहम्मद अयूब पंडित की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। यह इस्लाम में पवित्र मानी गई रात शब-ए-कद्र का मौका था। इसके बाद पाकिस्तान में करांची, क्वेटा और मकरान में एक बाद एक बम धमाके होना मासूमों की हत्या यहीं नहीं रुकती। 22 जून को अफगानिस्तान के हेलमंड प्रांत के लश्करगाह में एक बैंक में हुए धमाके में लगभग 29 लोगों की मौत हो गई और अनेक घायल हुए। 27 मई से इस्लाम धर्म को मानने वालों के लिए रमजान का पहला दिन था। एक महीने चलने वाले रमजान के दौरान प्रार्थना और उपवास किया जाता है। लेकिन अफगानिस्तान के पूर्वी हिस्से में हुए एक आत्मघाती कार बम धमाके में कम से कम 13 लोगों की मौत हो गई। तब से लेकर अभी तक मजहबी हत्याओं का यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। बल्कि यह आंकड़ा प्रतिवर्ष की तरह ही सेंकड़ों के पार पहुँच गया है। ऐसा नहीं कि रमजान में भीषण रक्तपात की यह कोई नई शुरुआत है बल्कि दिन के उजाले में इतिहास उठाकर देखें तो पिछले या उससे पिछले वर्ष, हर वर्ष और ज्यादा पीछे जायें तो करीब 1400 वर्षो से ये सिलसिला लगातार जारी है।


हालांकि इस्लामिक कैलेंडर में रमजान को सबसे मुबारक और आध्यात्मिक महीना माना जाता है। तीस दिन के लिए मुसलमान दिन के वक्त खाना नहीं खाते और पानी नहीं पीते। उनका मानना है कि इस दौरान अल्लाह उन्हें हर भूल के लिए क्षमा कर देता है। मस्जिद में नमाजियों की भीड़ होती है, जो ऊपर वाले से क्षमा और दुआ मांगने आते हैं। लेकिन उसके उलट इस्लाम के रक्षक के रूप में दुनिया में अपनी छवि गढ़ने वाले कट्टरपंथी ऐसा भी मानते हैं कि इस महीने में जीत दर्ज करनी और लूट मचानी चाहिए। वह मानते हैं कि ये सही मौका है जब लड़ाई को दोगुना तेज कर देना चाहिए। इसलिए इस दौरान वह सामान्य से ज्यादा हमले करते हैं।

खबर है मक्का में काबा की मस्जिद को निशाना बनाने की एक चरमपंथी योजना को नाकाम कर दिया गया है। वैसे देखा जाये तो रमजान को युद्ध का महीना मानने की प्रथा इस्लामिक इतिहास से ही आती है। पैगंबर मोहम्मद ने अपनी पहली जिहाद, जिसे बद्र की लड़ाई के नाम से जाना जाता है, वर्ष 624 में रमजान के महीने में ही लड़ी थी। इसके आठ साल बाद उन्होंने रमजान के ही महीने में मक्का पर जीत हासिल की थी। शायद इस कारण भी पिछले वर्ष सीरिया में अलकायदा के आधिकारिक संगठन नुस्रा फ्रंट ने रमजान को विजय अभियान का महीना बताया था और रमजान के नजदीक आते ही आईएस के प्रवक्ता अबु मोहम्मद अल-अदनानी ने दुनियाभर के अपने समर्थकों से कहा था, तैयार हो जाओ. काफिरों के लिए इसे आपदा का महीना बनाने के लिए तैयार हो जाओ, शायद यही वह अपील थी जिसने उमर मतीन, जैसे अकेले आतंकी को फ्लोरिडा के ऑरलैंडो में एक क्लब में 49 लोगों की हत्या के लिए प्रोत्साहित किया था।

अभी ताजा घटनाक्रम पर नजर डालें तो खुद को इस्लाम का सबसे बड़ा रखवाला कहने वाले इस्लामिक स्टेट ने मूसल में सबसे पुरानी अल-नूरी मस्जिद को उड़ा दिया है। यह वही मस्जिद है जहाँ से आईएस के नेता अबू बक्र अल-बगदादी ने 2014 में खिलाफत की घोषणा की थी। दरअसल आईएस जिस कट्टरवादी इस्लाम में यकीन रखता है, उसमें उन्हें लगता है कि इस दरगाह के होने की वजह से लोगों का ध्यान अल्लाह से परे हट रहा है, इसलिए इसे ढ़हा देना चाहिए. ‘‘आधुनिक  जिहाद के जनक’’ माने जाने वाले अब्दुल्ला अजाम ने 1980 के दशक में अफगानिस्तान में अरब विदेशी लड़ाकों का नेतृत्व किया था। वह तर्क देते हैं कि जिहाद की उपेक्षा करना एक किस्म से उपवास और नमाज छोड़ने के बराबर है। बाद में उन्होंने लिखा, जिहाद, इबादत करने का सबसे बेहतरीन तरीका है। इस रास्ते से ही मुसलमान को जन्नत हासिल हो सकती है।
जिहाद और रमजान से उसके सम्बन्ध की इन व्याख्याओं को लेकर आम मुसलमान निराश हो सकता है। उनके लिए ये महीना है संयम और खुद के अंदर झांकने का है, लेकिन इस्लाम में संकट कुछ ऐसा है कि चरमपंथियों की व्याख्या, प्रामाणिकता और हिंसा समझ से परे है कट्टरपंथी तो ये भी मानते हैं कि रमजान के महीने में अगर ज्यादा नमाज पढ़ने और दान देने को प्रोत्साहन दिया जाता है तो ज्यादा रक्तपात को क्यों नहीं? यदि इसको इस तरीके से देखेंगे तो समझ में आएगा कि आखिर क्यों हर वर्ष रमजान के महीने में इतनी भयानक घटनाएँ, हत्याएं रक्तपात होता हैं।

हाल की घटनाओं ने दुनिया के मुसलमानों में ये एहसास ताजा कर दिया है कि इस्लाम का डर बाकी शेष दुनिया में बढ़ चुका है। ये मसला महज नस्लपरस्तों और अल्पसंख्यकों का ही नहीं बल्कि समाज की एक असली सच्चाई भी है। इन सबके बाद यदि अपनी नजर विश्व के अन्य कोनों में दौड़ायें तो 11 सितंबर, 2001 के हमलों को 15 साल से अधिक हो गए हैं, लेकिन सही मायने में पश्चिमी समाज में इस्लाम का असली डर अब फलफूल रहा है। पिछले दो साल की राजनीतिक घटनाओं ने इन सबमें बड़ी भूमिका निभाई है। ब्रिटेन में जून से पहले तीन चरमपंथी हमलों में शामिल सारे लोग मुसलमान थे। जिन्होंने जिहादी इस्लाम का हवाला देकर लोगों का मजहब के नाम पर कत्ल किया।

11 सितंबर के बाद की अवधि में यह सोच तो बढ़ रही थी कि मुसलमान पश्चिमी समाज के लिए एक समस्या है और उनकी सोच और धर्म का पश्चिमी समाज के मूल्यों से कोई तालमेल नहीं है। लेकिन हाल ही के हमलों और खूनी खेल की आहट अपनी देहलीज पर देख यूरोप वासी भी खुद को असहज महसूस करने लगे हैं। वेस्टमिंस्टर, मैनचेस्टर एरीना और लंदन ब्रिज के पास होने वाले हमलों के बाद लोगों ने खुलेआम मुसलमानों को कसूरवार ठहराना शुरू कर दिया। मुसलमानों को केवल या तो असहिष्णु या रूढ़िवादी या फिर अति आधुनिक और धर्म से दूर रहने वालों के रूप में देखा जाता है और इन दोनों विरोधी विचारों के बीच सोच रखने वाले ब्रिटिश मुसलमानों को जान-बूझकर नजरअंदाज किया जाने लगा है। आलम यह कि लोग मुसलमान होने पर शर्मिंदगी तक महसूस करने लगे हैं और लोगों को समझाने की उनकी वह हर कोशिश बेकार जा रही कि इस्लामिक चरमपंथी उनके धर्म का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं लेकिन उनकी यह कोशिश उस समय और बेकार हो जाती है जब रमजान के महीने में ही अंधाधुंध फायरिंग या फिर बम धमाकों के बीच मासूम लोगों की चीख पुकार सुनाई देती है।
राजीव चौधरी 


अत्याचारी व्यक्ति जीवन में दुःख का ही भागी बनता है

डॉ विवेक आर्य
बाबर और औरंगजेब ने अपने जीवन में हिन्दू जनता पर अनेक अत्याचार किये थे। हमारे मुस्लिम भाई उनकी धर्मान्ध नीति का बड़े उत्साह से गुण गान करते हैं। पर सत्य यह है कि अपनी मृत्यु से पहले दोनों को अपने जीवन में किये गए गुनाहों का पश्चाताप था। अपने पुत्रों को लिखे पत्रों में उन्होंने अपनी व्यथा लिखी हैं।
बाबर ने जीवन भर मतान्धता में हिन्दुओं पर अनेक अत्याचार किये। एक समय तो ऐसा आया की हिन्दू जनता बाबर के कहर से त्राहि माम कर उठी।

बाबर की मतान्धता को गुरु नानक जी की जुबानी हम भली प्रकार से जान सकते है। भारत पर किये गये बाबर के आक्रमणों का नानक ने गंभीर आकलन किया और उसके अत्याचारों से गुरु नानक मर्माहत भी हुए। उनके द्वारा लिखित बाबरगाथा नामक काव्यकृति इस बात का सबूत है कि मुग़ल आक्रान्ता ने किस तरह हमारे हरे-भरे देश को बर्बाद किया था।
बाबरगाथा के पहले चरण में लालो बढ़ई नामक अपने पहले आतिथेय को संबोधित करते हुए नानकदेव ने लिखा है:-
हे लालो,बाबर अपने पापों की बरात लेकर हमारे देश पर चढ़ आया है और ज़बर्दस्ती हमारी बेटियों के हाथ माँगने पर आमादा है। धर्म और शर्म दोनों कहीं छिप गये लगते हैं और झूठ अपना सिर उठा कर चलने लगा है। हमलावर लोग हर रोज़ हमारी बहू-बेटियों को उठाने में लगे हैं, फिर जबर्दस्ती उनके साथ निकाह कर लेते हैं। काज़ियों या पण्डितों को विवाह की रस्म अदा करने का मौका ही नहीं मिल पाता। हे लालो, हमारी धरती पर खून के गीत गाये जा रहे हैं और उनमे लहू का केसर पड़ रहा है। लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि बहुत जल्दी ही मुग़लों को यहाँ से विदा लेनी पड़ेगी, और तब एक और मर्द का चेला जन्म लेगा।
कविता के दूसरे चरण में नानक ने लिखा:
हे ईश्वर, बाबर के शासित खुरासान प्रदेश को तूने अपना समझ कर बचा रक्खा है और हिन्दुस्तान को बाबर द्वारा पैदा की गयी आग में झोंक दिया है। मुगलों को यम का रूप प्रदान कर उनसे हिन्दुस्तान पर हमला करवाया, और उसके परिणामस्वरूप यहाँ इतनी मारकाट हुई कि हर आदमी उससे कराहने लगा। तेरे दिल में क्या कुछ भी दर्द नहीं है?
तीसरे चरण का सारांश है:
जिन महिलाओं के मस्तक पर उनके बालों की लटें लहराया करती थीं और उन लटों के बीच जिनका सिन्दूर प्रज्ज्वलित और प्रकाशमान रहता था, उनके सिरों को उस्तरों से मूंड डाला गया है और चारों ओर से धूल उड़ उड़ कर उनके ऊपर पड़ रही है। जो औरतें किसी ज़माने में महलों में निवास करती थीं उनको आज सड़क पर भी कहीं ठौर नहीं मिल पा रही है। कभी उन स्त्रियों को विवाहिता होने का गर्व था और पतियों के साथ वह प्रसन्नता के साथ अपना जीवन-यापन करती थीं। ऐसी पालकियों में बैठ कर वह नगर का भ्रमण करती थीं जिन पर हाथी दाँत का काम हुआ होता था। आज उनके गलों में फांसी का फन्दा पड़ा हुआ है और उनके मोतियों की लड़ियाँ टूट चुकी हैं।
चौथे चरण में एक बार फिर सर्वशक्तिमान का स्मरण करते हुए नानक ने कहा है:
यह जगत निश्चित ही मेरा है और तू ही इसका अकेला मालिक है। एक घड़ी में तू इसे बनाता है और दूसरी घड़ी में उसे नष्ट कर देता है। जब देश के लोगों ने बाबर के हमले के बारे में सुना तो उसे यहाँ से भगाने के लिये पीर-फकीरों ने लाखों टोने-टोटके किये, लेकिन किसी से भी कोई फ़ायदा नहीं हो पाया। बड़े बड़े राजमहल आग की भेंट चढ़ा दिये गये, राजपुरूषों के टुकड़े-टुकड़े कर उन्हें मिट्टी में मिला दिया गया। पीरों के टोटकों से एक भी मुग़ल अंधा नहीं हो पाया। मुगलों ने तोपें चलायीं और पठानों ने हाथी आगे बढ़ाये। जिनकी अर्ज़ियाँ भगवान के दरबार में फाड़ दी गयी हों, उनको बचा भी कौन सकता है? जिन स्त्रियों की दुर्दशा हुई उनमें सभी जाति और वर्ग की औरतें थीं। कुछ के कपड़े सिर से पैर तक फाड़ डाले गये,कुछ को श्मशान में रहने की जगह मिली। जिनके पति लम्बे इन्तज़ार के बाद भी अपने घर नहीं वापस लौट पाये, उन्होंने आखिर अपनी रातें कैसे काटी होंगी?
ईश्वर को पुनः संबोधित करते हुए गुरू नानकदेव ने कहा था:
तू ही सब कुछ करता है और तू ही सब कुछ कराता है। सारे सुख-दुख तेरे ही हुक्म से आते और जाते हैं, इससे किसके पास जाकर रोया जाये, किसके आगे अपनी फ़रियाद पेश की जाये? जो कुछ तूने लोगों की किस्मत में लिख दिया है, उसके अतिरिक्त कोई दूसरी चीज़ हो ही नहीं सकती। इससे अब पूरी तरह तेरी ही शरण में जाना पड़ेगा। उसके अलावा अन्य कोई पर्याय नहीं।
(सन्दर्भ- स्टॉर्म इन पंजाब – क्षितिज वेदालंकार)
बाबर मतान्धता में जीवन भर अत्याचार करता रहा। जब अंत समय निकट आया तब उसे समझ आया की मतान्धता जीवन का उद्देश्य नहीं हैं अपितु शांति, न्याय, दयालुता, प्राणी मात्र की सेवा करना जीवन का उद्देश्य हैं।
अपनी मृत्यु से पहले बाबर की आँखें खुली ,उसे अपने किये हुए अत्याचार समझ मैं आये। अपनी गलतियों को समझते हुए उसने अपने बेटे हुमायूँ को एक पत्र लिखा जिसे यहाँ उद्धृत किया जा रहा हैं।
“जहीर उद्दीन मोहम्मद बादशाह गाज़ी का गुप्त मृत्यु पत्र राजपुत्र नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ के नाम जिसे खुद जिंदगी बक्शे सल्तनत की मजबूती के लिए लिखा हुआ। ए बेटे हिंदुस्तान की सल्तनत मुखत लीफ़ मज़हबों से भरी हुई हैं। खुद का शुक्र हैं की उसने तुझे उसकी बादशाही बक्शी है। तुझ पर फर्ज है कि अपने दिल के परदे से सब तरह का मज़हबी तअस्सुब धो दाल। हर मज़हब के कानून से इंसाफ कर। खास कर गौ की कुरबानी से बाज आ जिससे तू लोगों के दिल पर काबिज़ हो सकता है और इस मुल्क की रियाया तुझसे वफादारी से बंध जाएगी। किसी फिरके के मंदिर को मत तोड़ जोकि हुकूमत के कानून का पायबंद हो।इन्साफ इस तरह कर की बादशाह से रियाया और रियाया से बादशाह खुश रहे। उपकार की तलवार से इस्लाम का काम ज्यादा फतेयाब होगा बनिस्पत जुल्म की तलवार के। शिया और सुन्नी के फरक को नजरंदाज कर वरना इस्लाम की कमजोरी जाहिर हो जाएगी।और मुख्तलिफ विश्वासों की रियाया को चार तत्वों के अनुसार (जिनसे एक इन्सानी जिस्म बना हुआ है) एक रस कर दे, जिससे बादशाहत का जिस्म तमाम बिमारियों से महफूज रहेगा।खुश किस्मत तैमुर का याददाश्त सदा तेरी आँखों के सामने रहे जिससे तू हुकूमत के काम में अनुभवी बन सके। “
इस मृत्यु पत्र पर तारीख 1 जमादिल अव्वल सन 395  हिज्री लिखा है।
(सन्दर्भ- अलंकार मासिक पत्रिका, 1924 मई अंक )
हुमायूँ ने अपने पिता बाबर की बात को कई मायने में अनुसरण किया। उसके बाद अकबर ने भी इस बात को नजरअंदाज नहीं किया।
इसी से अकबर का राज्य बढ़ कर पूरे हिंदुस्तान में फैल सका था। बाद के मुग़ल शराब, शबाब के ज्यादा मुरीद बन गए थे। जब औरंगजेब का काल आया तो उसने ठीक इसके विपरीत धर्मान्ध नीति अपनाई। पहले गद्दी पाने के लिए अपने सगे भाइयों को मारा।  फिर अपने बाप को जेल में डालकार प्यासा और भूखा मार डाला। मद में चूर औरंगजेब ने हिन्दुओं पर बाबर से भी बढ़कर अत्याचार किये। जिससे उसी के जीवन में अपनी चरम सीमा तक पहुँचा मुग़ल साम्राज्य का पतन आरंभ हो गया।
औरंगजेब के अत्याचार से हिन्दू वीर उठ खड़े हुए। महाराष्ट्र में वीर शिवाजी,पंजाब में गुरु गोविन्द सिंह , राजपूताने में वीर दुर्गा प्रसाद राठोड़, बुंदेलखंड में वीर छत्रसाल, भरतपुर और मथुरा में जाट सरदार, असम में लचित बोर्फुकान। चारों ओर से औरंगजेब के विरुद्ध उठ रहे विद्रोह को दबाने में औरंगजेब की संगठित सारी शक्ति खत्म हो गयी। न वह जिहादी उन्माद में हिन्दुओं पर अत्याचार करता, न उसके विरोध में हिन्दू संगठित होकर उसका प्रतिरोध करती। उसका मज़हबी उन्माद ही मुगलिया सल्तनत के पतन का कारण बना।
अपनी मृत्यु से कुछ काल पहले औरंगजेब को अक्ल आई तो उसने अपने मृत्यु पत्र में अपने बेटों से उसका बखान इस प्रकार किया हैं।
शहजादे आज़म को औरंगजेब लिखता है-
बुढ़ापा आ गया, निर्बलता ने अधिकार जमा लिया और अंगों में शक्ति नहीं रही। मैं अकेला ही आया, और अकेला ही जा रहा हूँ। मुझे मालूम नहीं की मैं कौन हूँ और क्या करता रहा हूँ। जितने दिन मैंने इबादत में गुजारे हैं, उन्हें छोड़कर शेष सब दिनों के लिए मैं दुखी हूँ। मैंने अच्छी हुकूमत नहीं की और किसानों का कुछ नहीं बना सका। ऐसा कीमती जीवन व्यर्थ ही चला गया। मालिक मेरे घर में था पर मेरी अन्धकार से आवृत आँखें उसे न देख सकी।
छोटे बेटे कामबख्श को बादशाह ने लिखा था -”मैं जा रहा हूँ और अपने साथ गुनाहों और उनकी सजा के भोझ को लिये जा रहा हूँ। मुझे आश्चर्य यही है कि मैं अकेला आया था, परन्तु अब इन गुनाहों के काफिले के साथ जा रहा हूँ। मुझे इस काफिले का खुदा के सिवाय कोई रहनुमा नहीं दिखाई देता। सेना और बारबरदारीकी चिंता मेरे दिल को खाये जा रही हैं। “
(सन्दर्भ मुग़ल साम्राज्य का क्षय और उसके कारण- इन्द्र विद्या वाचस्पति )

अलमगीर यानि खुदा के बन्दे के नाम से औरंगजेब को मशहूर कर दिया गया जिसका मुख्य कारण उसकी धर्मान्धता थी। पर सत्य यह है कि हिन्दुओं पर अत्याचार करने के कारण अपराध बोध उसे अपनी मृत्यु के समय हो गया था।
इस लेख को लिखने का मेरा उद्देश्य बाबर या औरंगजेब के विषय में अपने विचार रखना नहीं हैं अपितु यह सन्देश देना है कि
“अत्याचारी व्यक्ति जीवन में दुःख का ही भागी बनता है ”


एक अकेली गाय का आर्तनाद सौ योजन भूमि को शमशान बना देता है

भारत ऋषियों-मुनियों की पावन धरती है जो संसार का गुरु रहा हे। यह राम-कृष्ण का देश है। जब तक इस भारत भूमि पर गौ हत्या जारी रहेगी, हमारा देश अशांत रहेगा। इसकी अशांति स्वप्न में भी दूर नहीं हो सकती। क्योंकि इस राष्ट्र के लोगों को पता ही नहीं कि एक अकेली गाय का आर्तनाद सौ-सौ योजन तक भूमि को शमशान बना देता है। महात्मा गांधी का नाम लेकर हर दो अक्टूबर और 30 जनवरी को राजघाट पर बापू के नाम पर ढांग करने वाले लोग चाहते ते उनका स्वप्न पूरा कर सकते थे लेकिन तथाकथित धर्म निरपेक्षता के चलते उन्होंने ऐसा नहीं किया। बापू ने कहा था-‘‘गौवध को रोकने का प्रश्न मेरी नज़र में भारत की स्वतत्रता से अधिक महत्त्वपूर्ण है।’’ लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने घोषणा की थी कि भारत के आजाद होने पर गौ-हत्या का कलंक कलम की एक नोक से दूर कर दिया जाएगा। जगतगुरु महर्षि दयानन्द सरस्वती ने तो गो को माता का दर्जा दिया था तथा गौ करुणानिधि पुस्तक की रचना कर गौ का महत्त्व सकल संसार को बता दिया था।

केन्द्र सरकार के पशु क्रूरता निरोधक अधिनियम के बाद विवाद पैदा हो गया है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के जारी किये गये व प्रीवेशंन ऑफ क्रुएलटी टू एनिमल्स नियम 2017 जारी किए गजट नोटिफिकेशन को लेकर केरल और कुछ दक्षिणी राज्यों में तीव्र प्रतिक्रिया देखने को मिली है। इस नियम के जरिए केन्द्र सरकार ने बूचड़खानों के लिए मवेशियों की खरीद-फरोख्त पर रोक लगा दी है। सरकार का तर्क है कि बाजार से जानवर खरीदने और बेचने वालों को अब यह बताना होगा कि जानवर को कत्ल करने के लिए नहीं खरीदा जा रहा। केरल में यूथ कांग्रेस नेताओं ने बीफ-बैन के विरोध में बीफ पार्टी का आयोजन किया और उसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर डाला।
केरल विद कांग्रेस नाम के एक ट्रिवटर हैण्डल से कुछ तस्वीरें भी री-ट्वीट की गई हैं। कभी कांग्रेस गाय-बछड़ा चुनाव चिन्ह पर वोट मांगती थी। गाय-बछड़ा चुनाव चिन्ह इतना लोकप्रिय था कि लोग कांग्रेस को ही बोट डालते थे। लेकिन आज के यूथ-कांग्रेसी गाय काटकर व कटवाकर खा रहे हैं। कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी भी रहा। उसके सहारे वह सत्ता में रही। कांग्रेसियों ने छुरी गाय की गर्दन पर तो चलाई ही छुरी कांग्रेस की गर्दन पर भ चली है।
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए कहा  ‘‘जो कुछ केरल में हुआ वह मुझे व कांग्रेस पार्टी को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं है। यह विचारहीन व बर्बर है, मैं इस घटना की कड़ी निंदा करता हूं।
कांग्रेस उपाध्यक्ष का बयान स्वागत योग्य है। कांग्रेस ने बीफ पार्टी करने वाले नेताओं को पार्टी से निलम्बित कर दिया है। केरल पुलिस ने फिलहाल यूथ कांग्रेस नेताओं के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। मद्रास के एक कॉलेज में बीफ फेयर का आयोजन किया गया। यह कैसी सियासत है।
यह मुद्दा सिर्फ गाय काटने का नहीं है बल्कि देश के करोड़ो हिन्दुओं की भावनाओं को चुनौती देना है। कांग्रेस ने केरल के यूथ कांग्रेसी नेताओं को पार्टी से बाहर कर सही कदम उठाया है।
भारतीय संविधान के दिशा-निर्देशक सिद्धांतो में यह स्पष्ट लिखा हुआ है कि देश में कृषि व पशुधन की बढ़त के लिए आधुनिकतम वैज्ञानिक उपायों को अपनाते हुए गाय व बछड़े के वध को प्रतिबंधित करते हुए अन्य दुधारू व माल ढ़ोने वाले पशुओं के संरक्षण को सुनिश्चित किया जाना चाहिए तो स्वतंत्र भारत में गौवध का सवाल ही कहां पैदा हो सकता है। साथ ही उसके मांस भक्षण का मुद्दा किस प्रकार उठ सकता है। मगर इस मुद्दे पर जिस तरह राजनीति की जा रही हे वह केवल उस सच को नकारने की कोशिश है। इसके प्रतिबिंव हमें सिंधुघाटी की सभ्यता से लेकर आज तक के भारत के जीवन के सत्य को चीख-चीख कर बताते रहे हैं। 1965 के अंत में स्वर्गीय इंदिरा गांधी के शासनकाल में भारत भर में संतों व साधुओं ने संसद को घेर लिया था। यह आंदोलन गौ-हत्या पर पूर्ण  प्रतिबंध लागने के लिए किया जा रहा था साधुओं के आन्दोलन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दवाव देकर गुलजारी लाल नंदा गृह मंत्री भारत द्वारा आदेश दिलाकर और उन पर दवाव डालकर गोली चलवाकर कई हजार साधु-संतों-गौभक्तों की हत्या करा दी थी। अब भी कांग्रेस उसी परम्परा का संदेश दे रही है जो निंदनीय है। भारत की जनता इसे सहन नहीं करेगी।
मैं वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से आशा करता हूं कि भारत में गौ रक्षा का कानून बनाकर गौ हत्या का कलंक इस देवों की भूमि भारत से मिटाकर सच्चे गौ भक्त होने का प्रमाण देंवे। आने वाले चुनाव में जो लोग गौ-रक्षा का विरोध कर रहे हैं उन दुष्टों का भारत की जनता खात्मा कर देगी तथा अंत में विजय धर्म का पालन  करने वाले ईश्वर भक्त धर्मात्माओं की ही होगी। परमात्मा इस देश के नेताओं को सुमति प्रदान करे।

  -पंडित नन्दलाल निर्भय

भारत, पाक और बांग्लादेश में मुस्लिम नहीं

खुद को इस्लागमी राष्ट्र के तौर पर प्रदर्शित करने वाले पाकिस्तान को सऊदी प्रिंस सुलेमान ने अरब का गुलाम बताया है। उनके मुताबिक यहां के मुसलमान दोयम दर्जे के मुस्लिम हैं। उनका मानना है कि सही मायने में मोहम्मद साहब के असली वंशज उन्हीं के देशवासी हैं। वह पाकिस्तान को इस्लामी देश भी नहीं मानते हैं। उनके मुताबिक पाकिस्तान ही नहीं बांग्लासदेश के लोग भी मुस्लिम नहीं हैं, बल्कि ये वह लोग हैं जिन्होंने हिंदू धर्म छोड़कर मुस्लिम धर्म को अपनाया है। लिहाजा यह मुस्लिम नहीं हैं। उनके मुताबिक खुद को मुस्लिम कहने वाले यहां के लोग दरअसल हिन्दू-मुस्लिम हैं। प्रिंस सुलेमान भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुसलमानों को अल हिन्दी-मुस्कीन कहते हैं। इसका अर्थ है कि वह दोयम दर्जे के मुस्लिम हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिमों के लिए सऊदी प्रिंस का यह बयान वास्तव में ही काफी तकलीफ देने वाले होगा। इसका जिक्र पाकिस्तान के एक पत्रकार ने ट्विटर पर किया है।


प्रिंस सुलेमान का यह बयान उस समय आया जब भारतीय उपमहाद्वीप में बसे मुस्लिम खासकर भारत में खुद को मुस्लिम दिखाने के लिए इस्लाम से जुड़े प्रतीकों, चिन्हों भारत की संस्कृति और सभ्यता को रोंदने वाले बाहरी आक्रमणकारियों को श्रेष्ट दिखाने के तमाम हतकंडे अपना रहे हैं चाहे उनका प्रदर्शन इस्लामिक पहनावे को लेकर हो या फिर तीन तलाक जैसी इस्लामिक रीति-रिवाज को कायम रखने के लिए। वह खुद का दिखावा कर यहाँ की मूल संस्कृति, सभ्यता संस्कार आदि के विपरीत जाने की होड़ में शामिल रहना चाहते हैं।
सऊदी प्रिंस का बयान भले ही यहां के मुस्लिमों के लिए कड़वा घूंट हो लेकिन पाकिस्तान का पढ़ा लिखा तबका इस बात को कई बार स्वीकार कर चुका है अभी पिछले दिनों एक न्यूज डिबेट में पाकिस्तान की मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार फौजिया सईद ने स्वीकार करते हुए कहा था कि हम लोगों को नहीं भूलना चाहिए कि हम हिन्दू से मुस्लिम बने है इससे पहले पाकिस्तान के जाने-माने लेखक हसन निसार ने वहां के एक प्रसिद्ध टीवी प्रोग्राम ‘‘मेरे मुताबिक’’ में कहा था कि पाकिस्तान हिन्दुस्तान और बांग्लादेश में मुस्लिम दहशतगर्दी तो होती है किन्तु यहाँ आईएस जैसा खूंखार आतंकी संघटन इस तरह नहीं पनप सकता क्योंकि हम लोग हिन्दू से मुसलमान बने हैं अभी हमारे खून में हिन्दू वाली सहनशीलता शेष है।

एशिया ;भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेशद्ध के मुसलमान अपने आपको अरबों का वंशज मानते हैं और अपने आपको अरबी दिखाने के जुनूनी होते हैं लेकिन 50 साल किसी अरब देश में नौकरी करने पर भी किसी एशिया के मुसलमान को वहाँ की नागरिकता नहीं मिलती। कोई एशिया का मुसलमान वहाँ की अरबी मुसलमान औरत से शादी नहीं कर सकता और अगर कोशिश करे तो मार दिया जाता है।
इस बात को कौन नहीं जनता कि आज से लगभग 1200 वर्ष पहले मुस्लिमां ने संगठित होकर आर्यावर्त पर हमला करना शुरू किया था और इन 1200 वर्षां में उन्होंने भले ही आशातीत सफलता न पाई हो परन्तु वे आर्यावर्त पर काफी हद तक चोट करने में सफल हुए। उन्होंने भारतवर्ष के उन भागों का लगभग पूरी तरह से इस्लामीकरण कर दिया जो पश्चिम में पड़ते थे और अफगानिस्तान और पाकिस्तान नामक दो देश बनाने में भी सफल हो गए। हलांकि ये सफलता विश्व के अन्य हिस्सों में मिली सफलता से काफी कम है क्योंकि इस्लामिक आक्रमणकारी विश्व में जहाँ-जहाँ गए उन-उन सभ्यताआें को पूर्णतः नष्ट करके एक बर्बर कृकृत्रिम और थोपी गयी असभ्यता लाद दी। किन्तु यहाँ के लोगों का धर्म में अगाध प्रेम होने के कारण सम्प्रदाय परिवर्तन इतना आसान काम न था जिसके कारण आक्रमण दर आक्रमण के बावजूद ये इस्लामी शासक भारत वर्ष में पूर्णरूप से इस्लामीकरण करने में असफल रहे परन्तु इन मुस्लिमां ने एक काम बहुत ही चालाकी से कर दिया वह था यहाँ के मजबूर हिन्दुओ को मुस्लिम सम्प्रदाय में बदलना। इस सम्प्रदाय परिवर्तन के लिए जो सबसे आसन शिकार नजर आये वे विभिन्न कारणों से असहाय लोग थे।

         वे गरीब लोग शिकार बने जो मुस्लिम शासकां द्वारा लगाये गए जजिया कर को देने में असमर्थ थे और भुखमरी से बचने के लिए मुस्लिम बन गए, वे हिन्दू परिवार जिनके पुरुष इनसे युद्ध के दौरान मार दिए गए तो उनकी बीबी को अपनी रखैल और उनके बच्चों को गुलाम अतः ये मजबूर परिवार भी मुस्लिम बने।  वे जातिया जो उस समय समाज में उच्च वर्ग में आती थी उनसे असोभानीय कार्य कराना जैसे कि बाल्मीकि समाज के लोगां को मैला उठाने का काम देना। दूसरा यदि कोई मुस्लिम किसी हिन्दू महिला के साथ जोर जबरदस्ती से सम्बन्ध बना लेता था तो उस महिला का मन न होते हुए भी मुस्लिम बने रहना पड़ता था क्योंकि हिन्दू परिवार उसे अस्वीकार कर देते थे।
इस तरह ज्यादातर लोग विभिन्न मजबूरियों के कारण मुस्लिम सम्प्रदाय में चले गए परन्तु भारत की आत्मा जोकि स्थायी है और यहाँ के लोगों के साथ जन्म जन्मान्तर से जुड़ी है और जुड़ी रहेगी वह आज भी इन बदले हुए मुस्लिमां में विभिन्न रूपों में विद्यमान है हालाँकि ज्यादातर मुस्लिम इन बातां से इन्कार करते है परन्तु यहाँ के मुस्लिमां में तमाम ऐसी बाते पाई जाती है जो की इन्हें केवल मुस्लिम कहने के बजाय हिन्दू ‘मुस्लिम’ कहने पर मजबूर करती है। 
जाति व्यवस्था पूरे विश्व में हिन्दुओं की एक विशिष्ट पहचान के रूप में देखी जाती है परन्तु भारत वर्ष के मुस्लिमां में आज भी विभिन्न जातियां पाई जाती हैं जैसे की पठान, अंसारी, हज्जाम, कसाई, धोबी, मालिक, चौधरी, पटेल आदि और उससे बड़ी बात ये है कि ये समस्त जातियां विवाह के दौरान उसी तरह जाति व्यवस्था का पूर्ण पालन करती है जैसे कि हिन्दू पालन करते हैं। इससे आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह व्यवस्था पूर्ण रूप से हिन्दुत्व से प्रेरित है।

परन्तु गलत और घटिया इतिहास पढ़ाने की वजह से वह आज अपने ही पूर्वजां को भूलकर उन्हीं को मारने-काटने पर उतारू दिखाई दे रहे हैं जिस सम्प्रदाय ने उनके बाप दादाआें पर तमाम तरह के अत्याचार किये आज उसी असभ्यता का गुणगान करते हुए नहीं थकते। गाय से लेकर वंदेमातरम्, योग से लेकर पूर्व भारतीय हिन्दू शाशकों का विरोध करना अपना असली धर्म समझते हैं यदि प्रिंस सुलेमान की बात को गंभीरता से लिया जाये तो सत्य के काफी करीब भी हैं, क्योंकि सयुंक्त अरब अमीरात मंदिर के लिए जमीन दान कर सकता है लेकिन यहाँ का मुस्लिम भारत के आदर्श महापुरुष राम के मंदिर में अड़चने खड़ा करता दिखाई देता है इस वजह से भी साफ कहा जा सकता है कि यहाँ मुस्लिम न होकर सिर्फ सनातन विचारधारा के विरोधियों का एक जमघट मात्र है।
-राजीव चौधरी


औरंगज़ेब इतिहास की दृष्टि में नायक या खलनायक

मुगल खानदान में सबसे लम्बे समय तक राज औरंगज़ेब का रहा था। जितना लम्बा औरंगज़ेब का राज था उतनी ही लम्बी उसके अत्याचारों की सूची थी। भारत के 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के पश्चात पाठ्यकर्म में इतिहास के उन रक्तरंजित पृष्ठों को जिनमें मुसलमानों ने हिन्दुओं पर अथाह अत्याचार किये थे स्थान नहीं दिया गया। देश के नीतिकारों का मानना था कि इससे हिन्दू -मुस्लिम वैमनस्य फैलेगा। मेरे विचार से यह सोच अपरिपक्वता की बोधक है। देशवासियों को सत्य के दिग्दर्शन करवाने से देश के नागरिकों विशेष रूप से मुसलमानों को जितना सत्य का बोध होगा, उतने वे अपने आपको भारतीयता के निकट समझेगे। जब समस्त देशवासियों को चाहे हिन्दू हो या मुसलमान यह बोध होगा कि सभी के पूर्वज श्री राम और श्री कृष्ण जी को अराध्य रूप में मानते थें। इससे धर्म के नाम पर होने वाले विवाद अपने आप रुक जाते। सत्य की आवाज़ का गला दबाने के कारण रह रहकर यह उठती रही और इस समस्या का हल निकालने के स्थान पर उसे और अधिक विकट बनता रहा। कुछ अवसरवादी लोग अपने क्षणिक लाभों की पूर्ति के लिए उनका गलत फायदा उठाते रहते हैं। ऐसा ही अन्याय औरंगज़ेब को आलमगीर, जिन्दा पीर और महान शासक बताने वाले लोगों ने देशवासियों के साथ किया हैं।

औरंगजेब को न्यायप्रिय एवं शांतिदूत सिद्ध करने के लिए एक छोटी सी पुस्तक "इतिहास के साथ यह अन्याय: प्रो बी एन पाण्डेय" हाल ही में प्रकाशित हुई है । पुस्तक के लेखक दुनिया के सबसे अनभिज्ञ प्राणी के समान व्यवहार करते हुए लिखता है कि औरंगजेब ने अपने आदेशो में किसी भी हिन्दू मंदिर को कभी तोड़ने का हुकुम नहीं दिया। अपितु औरंगज़ेब द्वारा अनेक हिन्दू मंदिरों को दान देने का उल्लेख मिलता हैं। लेखक ने बनारस के विश्वनाथ मंदिर को दहाने के पीछे यह कारण बताया है कि औरंगजेब बंगाल जाते समय बनारस से गुजर रहा था। उसके काफिले के हिन्दू राजाओं ने उससे विनती की कि  अगर बनारस में एक दिन का पड़ाव कर लिया जाये तो उनकी रानियाँ बनारस में गंगा स्नान और विश्वनाथ मंदिर में पूजा अर्चना करना चाहती हैं। औरंगजेब ने यह प्रस्ताव तुरंत स्वीकार कर लिया। सैनिकों की सुरक्षा में रानियां गंगा स्नान करने गई। उनकी रानियों ने गंगा स्नान भी किया और मंदिर में पूजा करने भी गई। लेकिन एक रानी मंदिर से वापिस नहीं लौटी। औरंगजेब ने अपने बड़े अधिकारियों को मंदिर की खोज में लगाया। उन्होंने देखा की दिवार में लगी हुई मूर्ति के पीछे एक खुफियाँ रास्ता है और मूर्ति हटाने पर यह रास्ता एक तहखाने में जाता है। उन्होंने तहखाने में जाकर देखा की यहाँ रानी मौजूद है।  जिसकी इज्जत लूटी गई और वह चिल्ला रही थी। यह तहखाना मूर्ति के ठीक नीचे बना हुआ था। राजाओं ने सख्त कार्यवाही की मांग की। औरंगजेब ने हुक्म दिया की चूँकि इस पावन स्थल की अवमानना की गयी है।  इसलिए विश्वनाथ की मूर्ति यहाँ से हटाकर कही और रख दी जाये और मंदिर को तोड़कर दोषी महंत को सख्त से सख्त सजा दी जाये। यह थी विश्वनाथ मंदिर तोड़ने की पृष्ठभूमि जिसे डॉक्टर पट्टाभि सीतारमैया ने अपनी पुस्तक "Feather and the stones" में भी लिखा हैं। आइये लेखक के इस प्रमाण की परीक्षा करे –
1. सर्वप्रथम तो औरंगजेब के किसी भी जीवन चरित में ऐसा नहीं लिखा है कि  वह अपने जीवन काल में युद्ध के लिए कभी बंगाल गया था।

2. औरंगजेब के व्यक्तित्व से स्पष्ट था कि वह हिन्दू राजाओं को अपने साथ रखना नापसंद करता था क्यूंकि वह उन्हें "काफ़िर" समझता था।
3. युद्ध में लाव लश्कर को ले जाया जाता हैं ना कि सोने से लदी हुई रानियों की डोलियाँ लेकर जाई जाती हैं।
4. जब रानी गंगा स्नान और मंदिर में पूजा करने गयी तो उनके साथ सुरक्षा की दृष्टी से कोई सैनिक थे तो फिर एक रानी का अपहरण बिना कोलाहल के कैसे हो गया?
5. दोष विश्वनाथ की मूर्ति का था अथवा पाखंडी महंत का तो सजा केवल महंत को मिलनी चाहिए थी।  हिन्दुओं के मंदिर को तोड़कर औरंगजेब क्या हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ नहीं कर रहा था?
6. पट्टाभि जी की जिस पुस्तक का प्रमाण लेखक दे रहे है सर्वप्रथम तो वह पुस्तक अब अप्राप्य है। दूसरे उस पुस्तक में इस घटना के सन्दर्भ में लिखा है कि इस तथ्य का कोई लिखित प्रमाण आज तक नहीं मिला है। केवल लखनऊ में रहना वाले किसी मुस्लिम व्यक्ति को किसी दूसरे व्यक्ति ने इसका मौखिक वर्णन देने के बाद। इस का प्रमाण देने का वचन दिया था। परन्तु उसकी असमय मृत्यु से उसका प्रमाण प्राप्त न हो सका। इस व्यक्ति के मौखिक वर्णन को प्रमाण बताना इतिहास का मजाक बनाने के समान ही है। कूल मिला कर यह औरंगजेब को निष्पक्ष घोषित करने का एक असफल प्रयास के अतिरिक्त ओर कुछ नहीं है।
सत्य तो इतिहास है और इतिहास का आंकलन अगर औरंगजेब के फरमानों से ही किया जाये तो निष्पकता उसे ही कहेंगे। फ्रेंच इतिहासकार फ्रैंकोइस गौटियर (Francois Gautier) ने औरंगजेब द्वारा फारसी भाषा में जारी किये गए फरमानों को पूरे विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर सभी छदम इतिहासकारों के मुहँ पर ताला लगा दिया। जिसमे हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित करने और हिन्दू मंदिरों को तोड़ने की स्पष्ट आज्ञा थी। ध्यान दीजिये औरंगजेब ने “आलमगीर” बनने की चाहत में अपनी सगे भाइयों की गर्दन पर छुरा चलाने से लेकर अपने बूढ़े बाप को जेल में डालकर प्यासा मारा था। तो उससे हिन्दू प्रजा की सलामती की इच्छा रखना बेईमानी होगी।
औरंगजेब द्वारा हिन्दू मंदिरों को तोड़ने के लिए जारी किये गए फरमानों का कच्चा चिट्ठा
1. 13 अक्तूबर,1666- औरंगजेब ने मथुरा के केशव राय मंदिर से नक्काशीदार जालियों को जोकि उसके बड़े भाई दारा शिकोह द्वारा भेंट की गयी थी को तोड़ने का हुक्म यह कहते हुए दिया कि किसी भी मुसलमान के लिए एक मंदिर की तरफ देखने तक की मनाही है। और दारा शिको ने जो किया वह एक मुसलमान के लिए नाजायज है।
2. 12 सितम्बर 1667- औरंगजेब के आदेश पर दिल्ली के प्रसिद्द कालकाजी मंदिर को तोड़ दिया गया।
3. 9 अप्रैल 1669 को मिर्जा राजा जय सिंह अम्बेर की मौत के बाद औरंगजेब के हुक्म से उसके पूरे राज्य में जितने भी हिन्दू मंदिर थे, उनको तोड़ने का हुक्म दे दिया गया और किसी भी प्रकार की हिन्दू पूजा पर पाबन्दी लगा दी गयी। जिसके बाद केशव देव राय के मंदिर को तोड़ दिया गया और उसके स्थान पर मस्जिद बना दी गयी। मंदिर की मूर्तियों को तोड़ कर आगरा लेकर जाया गया और उन्हें मस्जिद की सीढियों में गाड़ दिया गया और मथुरा का नाम बदल कर इस्लामाबाद कर दिया गया। इसके बाद औरंगजेब ने गुजरात में सोमनाथ मंदिर का भी विध्वंश कर दिया।
4. 5 दिसम्बर 1671 औरंगजेब के शरीया को लागु करने के फरमान से गोवर्धन स्थित श्री नाथ जी की मूर्ति को पंडित लोग मेवाड़ राजस्थान के सिहाद गाँव ले गए। जहाँ के राणा जी ने उन्हें आश्वासन दिया की औरंगजेब की इस मूर्ति तक पहुँचने से पहले एक लाख वीर राजपूत योद्धाओं को मरना पड़ेगा।
5. 25 मई 1679 को जोधपुर से लूटकर लाई गयी मूर्तियों के बारे में औरंगजेब ने हुकुम दिया कि सोने-चाँदी-हीरे से सज्जित मूर्तियों को जिलालखाना में सुसज्जित कर दिया जाये और बाकि मूर्तियों को जामा मस्जिद की सीढियों में गाड़ दिया जाये।
6. 23 दिसम्बर 1679 औरंगजेब के हुक्म से उदयपुर के महाराणा झील के किनारे बनाये गए मंदिरों को तोड़ा गया। महाराणा के महल के सामने बने जगन्नाथ के मंदिर को मुट्ठी भर वीर राजपूत सिपाहियों ने अपनी बहादुरी से बचा लिया।
7. 22 फरवरी 1980 को औरंगजेब ने चित्तोड़ पर आक्रमण कर महाराणा कुम्भा द्वाराबनाएँ गए 63 मंदिरों को तोड़ डाला।
8. 1 जून 1681 औरंगजेब ने प्रसिद्द पूरी का जगन्नाथ मंदिर को तोड़ने का हुकुम दिया।
9. 13 अक्टूबर 1681 को बुरहानपुर में स्थित मंदिर को मस्जिद बनाने का हुकुम औरंगजेब द्वारा दिया गया।
10. 13 सितम्बर 1682 को मथुरा के नन्द माधव मंदिर को तोड़ने का हुकुम औरंगजेब द्वारा दिया गया। इस प्रकार अनेक फरमान औरंगजेब द्वारा हिन्दू मंदिरों को तोड़ने के लिए जारी किये गए।
हिन्दुओं पर औरंगजेब द्वारा अत्याचार करना

2 अप्रैल 1679 को औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया गया जिसका हिन्दुओं ने दिल्ली में बड़े पैमाने पर शांतिपूर्वक विरोध किया परन्तु उसे बेरहमी से कुचल दिया गया। इसके साथ-साथ मुसलमानों को करों में छूट दे दी गयी जिससे हिन्दू अपनी निर्धनता और कर न चूका पाने की दशा में इस्लाम ग्रहण कर ले। 16 अप्रैल 1667 को औरंगजेब ने दिवाली के अवसर पर आतिशबाजी चलाने से और त्यौहार बनाने से मना कर दिया गया। इसके बाद सभी सरकारी नौकरियों से हिन्दू कर्मचारियों को निकाल कर उनके स्थान पर मुस्लिम कर्मचारियों की भरती का फरमान भी जारी कर दिया गया। हिन्दुओं को शीतला माता, पीर प्रभु आदि के मेलों में इकठ्ठा न होने का हुकुम दिया गया। हिन्दुओं को पालकी, हाथी, घोड़े की सवारी की मनाई कर दी गयी। कोई हिन्दू अगर इस्लाम ग्रहण करता तो उसे कानूनगो बनाया जाता और हिन्दू पुरुष को इस्लाम ग्रहण करनेपर 4 रुपये और हिन्दू स्त्री को 2 रुपये मुसलमान बनने के लिए दिए जाते थे। ऐसे न जाने कितने अत्याचार औरंगजेब ने हिन्दू जनता पर किये और आज उसी द्वारा जबरन मुस्लिम बनाये गए लोगों के वंशज उसका गुण गान करते नहीं थकते हैं।
एक मुहावरा है कि एक जूठ को छुपाने के लिए हज़ार जूठ बोलने पड़ते हैं। औरंगज़ेब को न्यायप्रिय घोषित करने वालों ने तो उसके अत्याचार और मतान्धता को छुपाने के लिए इतने कमजोर साक्ष्य प्रस्तुत किये जो एक ही परीक्षा में ताश के पत्तों के समान उड़ गए। यह भारत के मुसलमानों के समक्ष यक्ष प्रश्न है कि उनके लिए आदर्श कौन है?
औरंगज़ेब जैसा अत्याचारी अथवा उसके अत्याचार का प्रतिकार करने वाले वीर शिवाजी महाराज।




Tuesday, 20 June 2017

अफवाह भारत का नया राजनीतिक उद्योग है

हमारा तार्किक मन छोटा होता है, बस ज़रा सी आवाज़ कहीं से आती है, भीड़ का एक शोर होता है, इसके बाद मां-बहन की गंदी-गंदी गालियां, चीख पुकार की आवाज़, खूब हल्ला, दौड़ने-भागने और चिल्लाने की आवाज़ें, मानो देश पर कोई हमला हुआ हो! और हम समझ नहीं पाते इसके बाद जब तक मन तर्क करता है तब पता चलता है भीड़ ने एक और जान ले ली।
फोटो आभार: getty images
बात एक धर्म की नहीं, ना एक समाज की, न किसी जाति या पंथ विशेष की, बात एक भीड़ की है। ये भीड़ राजधानी दिल्ली में एक हिन्दू डॉ नारंग की जान भी ले सकती है। ये भीड़ पहलू खान को पीट-पीटकर मौत के घाट उतार सकती है, तो यही भीड़ जमशेदपुर के दो भाई- विकास और गौतम की हत्या कर सकती है या फिर चाहे वो सरायकेला खरसांवा जिले में चार लोगों की हत्या का मामला हो। अनियंत्रित भीड़ की चपेट में जो आया वो बेरहमी से मारा गया- अरे पकड़ो, मारो, ये रहा, वो गया, ज़िंदा न जाने पाए… इन तेज़ आवाज़ों के सहारे किसी को भी अपराधी घोषित कर यह भीड़ न्यायाधीश बन ऑन द स्पॉट फैसले कर रही है।
इस भीड़ का कोई निश्चित ठिकाना नहीं है, ये कहीं भी पाई जा सकती है। बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, चौक चैराहों से लेकर सोशल मीडिया तक हर जगह इनकी भरमार है। बस समझदार लोग खामोश हैं और यह भीड़ उत्तेजित। इस चुप्पी से भी यह भीड़ समझ रही है कि हम सही जा रहे हैं। कल ही उत्तर प्रदेश के सीएम की पिक अपलोड करने पर सोशल मीडिया की भीड़ द्वारा लेखिका तवलीन सिंह को ट्रोल किया गया। जिन शब्दों का सहारा लेकर उन्हें ज्ञान दिया गया शायद उन शब्दों को सुनकर गालियां भी मुंह छिपाने को मजबूर हो जाए।
यह भीड़ साइना नेहवाल को एक चाइना निर्मित फोन हाथ में लेकर फोटो अपलोड करने पर राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ा सकती है। अभिनेत्री सना खान और क्रिकेटर मोहम्मद समी की पत्नी को उनकी ड्रेस पर मज़हब के पाठ और संस्कृति पर मज़हबी फटकार लगा सकती है वो भी विद गाली। इससे साफ पता चलता है कि ये थ्योरी है और इसके बाद सड़क पर प्रेक्टिकल होता है।
ये भीड़ बस फूंक रही है, ये भीड़ ट्रेन की पटरी उखाड़ रही है। कभी बरेली में मज़हब की आड़ में हिंसा तो कभी शोभायात्राओं के नाम पर सब कुछ स्वाह कर देने के लिए आगे बढ़ रही है।
दो तीन रोज़ पहले रवीश कुमार ने अपना दर्द बयां किया था कि अफवाह भारत का नया राजनीतिक उद्योग है। राजनीतिक दल का कार्यकर्ता अब इस अफवाह को फैलाने वाला वेंडर बन गया है। सिर्फ दो सवाल कीजिए, आपको सारे जवाब मिल जाएंगे। ये लोग कौन हैं और कौन लोग इनके समर्थन में हैं।
कुछ लोग नेताओं के भाषणों से हद से ज़्यादा प्रभावित हो जाते हैं, क्योंकि इससे उनके तर्क उनकी विचारधारा को भी मजबूती मिलती है। अपने पक्ष में कहने के लिए और फैक्ट मिल जाते हैं। इससे वो और कट्टर हो जाते हैं, यही वजह है कि आज अपनी विरोधी विचारधारा के प्रति लोगों का रुख़ सख़्त और हिंसक होता जा रहा है। क्या इन घटनाओं के उदहारण देकर भी कहा जा सकता है कि मेरा भारत बदल रहा है?
कल-परसों ही राजस्थान में कथित गौरक्षकों की भीड़ ने जैसलमेर से 50 गायें और 30 बछड़े खरीदकर ले जा रहे तमिलनाडु के सरकारी अधिकारियों के साथ बदतमीजी की। इससे भी पता चलता है कि गौरक्षा के नाम पर चलने वाला हिंसक तमाशा अभी बंद नहीं हुआ।
सीताराम येचुरी पर हमला कर सकती है ये भीड़, यूपी के शाहज़हांपुर में पुलिस स्टेशन में लड़की से छेड़खानी के आरोप में बंद अपने साथी को जबरदस्ती छुड़ा ले जाती है ये भीड़ और पीड़ित लड़की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इंसाफ की गुहार लगाती रह जाती है।

मैंने खुद के अनुभव के तौर पर पहले भी लिखा था कि बीते पिछले कुछ सालों में पूरी दुनिया समेत भारत में भी काफी व्यवहारिक परिवर्तन आया है। चाहे इसमें एक अमेरिका के अन्दर नस्लीय हमले का शिकार कोई भारतीय इंजीनियर श्रीनिवास हो या ईशनिंदा के नाम पर पाकिस्तान में किसी उदारवादी छात्र मशाल खान की पांच सौ छात्रों द्वारा बेरहमी से हत्या, सब कुछ बदल रहा है।

आज एक अजीब सी नफरत लोगों के मन में घर करती दिख रही है। बस हो या ट्रेन, लोग एक अजीब सा गुस्सा-नफरत लिए घूम रहे है। शायद इसके कई कारण हो सकते हैं। एक तो ये कि आज से कुछ साल पहले एक कट्टरता, नफरत या हिंसा की विचारधारा से ग्रस्त लोग दूर-दूर थे, लेकिन आज दौर के संचार माध्यमों ने उन्हें निकट ला खड़ा किया है। संचार के तमाम तरीकों से एक तरह की विचारधारा वाले लोग एक-दूसरे से प्रभावित हो रहे हैं। ये राष्ट्रवादी हैं और वो गद्दार! एक दूसरे के हद से ज़्यादा प्रोत्साहन की वजह से उनकी अपनी राय भी कट्टर होती जाती है। मैं अपनी जगह सही हूं, इस विचारधारा पर भरोसा बढ़ने के साथ ही लोग दूसरों से नफरत करने लगते हैं। थोड़े समय पहले तक इस्लामिक चरमपंथी ही इसका सबसे बड़ा उदहारण थे। अब जहां दुनिया तेज़ी से बदल रही है तो ज़ाहिर सी बात है कि उदाहारण भी बदलेंगे!!..राजीव चौधरी 

पहले बचपन बचाओं!!

देश के अन्दर रीति-रिवाज बचाने की बात होती है, प्रथाओं-कुप्रथाओं को बचाने के लोग भिड जाते है कोई मजहब बचाने की बात करता है कोई जाति या उनसे उत्पन्न विसंगतियां, लेकिन इस और किसी का ध्यान नहीं है कि पहले राष्ट्र का भविष्य, हमारी भावी पीढ़ी यानि आज का बचपन इसे बचाओं! आज राष्ट्र का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों में नशा़खोरी की लत इस तेजी से बढ़ रही है कि दस वर्ष की आयु में प्रवेश करते ही ज्यादातर बच्चे विभिन्न प्रकार के नशीले और मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं.

बच्चों में नशा़खोरी की लत का अध्ययन करने वालों का कहना है कि ज्यादातर बच्चों को नशे की लत उनके वयस्क या हमउम्र नशा़खोरों के जरिए ही लगती है. परिवार की उपेक्षा के कारण ये भोले-भाले बच्चे नशा कराने वाले को ही अपना मित्र और सच्चा हमदर्द मान लेते हैं और नशे की आदत में पड़कर हर तरह के शोषण का शिकार हो जाते हैं.
नशे की गिरफ्त में आए बच्चे जब मनचाहा नशा नहीं कर पाते हैं तो वे खून में बढ़ती मादक पदार्थो की मांग को पूरा करने के लिए शरीर के लिए घातक पदार्थों का भी सेवन करने लगते हैं, जैसे कि बोन फिक्स, क्यूफिक्स और आयोडेक्स. कई बच्चे तो पेट्रोल और केरोसिन सूंघकर नशे की प्यास बुझाते हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड और  2013  की एक सरकारी रिपोर्ट से पता चला कि भारत में नशे के आदी हर पांच में से एक व्यक्ति की उम्र 21 साल से कम है.विशेषज्ञों का मानना है कि अपने साथ के लोगों की देखादेखी, साथियों के दबाव और पढ़ाई की चिंता के कारण कई बच्चे तो 11 साल की उम्र से ही नशे के लिए ड्रग्स लेना शुरु कर देते  हैं. इनमें से करीब 5 फीसदी की उम्र 12 से 17 साल के बीच पाई गई.  बेघर बच्चों के बीच तो यह समस्या और भी गंभीर है. रिपोर्ट में पाया गया कि भारत के करीब दो करोड़ बेघर बच्चों में से 40-70 फीसदी किसी ना किसी तरह के ड्रग्स के संपर्क में आते हैं और इनमें से कई को तो पांच साल की उम्र से ही नशे की लत लग जाती है.


बात केवल एक शहर या स्थान की नहीं है राजधानी दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर नवी मुंबई के अनेकों कोनों में स्कूली यूनिफॉर्म पहने बच्चों को अक्सर घास रूपी नशीले पदार्थ खरीदते देखा जा सकता है. नशे वाले ये पौधे वहीं उगाए जाते हैं और चोरी-छिपे उन्हें बेचा जाता है. बच्चों को 50 से 100 रुपये अदा करने पर कई दिन के लिए नशे की यह सामग्री मिल जाती है और आजकल इतनी रकम पाना बच्चों के लिए आम बात है.मांग बढने के साथ ही इन नशीली चीजों में भी मिलावट की जाती है  और इसमें रसायन, कीटनाशक पदार्थ और यहां तक की जूतों की पालिश भी मिलाकर बच्चों को दे दी जाती है. यह बेहद खतरनाक है और इन चीजों से और भी ज्यादा नशा होता है. ज्यादा समझने के लिए आमतौर पर किसी भी परचून या पान दुकान की से भोला गोली 2 से 5 रुपये में मिल जाती है, जो असल में भांग से ही बनती है. लड़कियां धूम्रपान करने में हिचकती हैं ऐसे में उनके लिए गांजे का पेस्ट होता है श्वे इसे मसूढ़ों पर रगड़ती हैं और यह खून में मिल जाता है. इसकी खुशबू भी माउथ फ्रेशनर की तरह होती है, इसलिए लड़कियां पकड़ में भी नहीं आतीं.श् जब बच्चों में इस तरह के नशीले पदार्थ की लत बढ़ती है तो उनकी जेबखर्च की मांग भी बढ़ जाती है. लेकिन सभी माता-पिता बच्चों की अधिक जेबखर्च की मांग पूरी नहीं करते. ऐसे में बच्चे चोरी करने लगते हैं. कई बार तो नशीले पदार्थ बेचने वाले लोग शुरुआत में बच्चों को मुफ्त पैकेट देते हैं और बाद में नशे के लिए अधिक रकम वसूलते हैं क्योंकि उन्हें पता चल जाता है कि लत लगने के कारण बच्चे कहीं से भी पैसे का इंतजाम कर ही लेंगे.

नशे के गुलाम ये बच्चे या तो बेमौत मर जाते हैं या फिर अपराध की अंधी दुनिया में प्रवेश कर समाज और देश के लिए विकट समस्या बन जाते हैं. सरकार और समाज बच्चों को नशे की आदत से बचाने के जो भी उपाय कर रही हैं, वे पर्याप्त और प्रभावी नहीं हैं. इसलिए जरूरी है कि देश के भविष्य को पतन के रास्ते से बचाने के लिए परिवार से उपेक्षित, गरीब, अशिक्षित और बाल मजदूरी करने वाले बच्चों को नशे से बचाने के लिए गंभीरता से प्रभावी और कारगर उपाय किए जाने चाहिए.इस विषय पर यदि शोधकर्ताओं की माने तो इसका सबसे बड़ा कारण संयुक्त परिवार के खत्म होने और एकल परिवार में माता-पिता दोनों के नौकरीपेशा होने की वजह से कई घंटे तक बच्चे किसी की निगरानी में नहीं रहते हैं और बच्चों की जिंदगी से स्थायित्व हटने लगता है. ऐसे में बच्चे अकेले में वहीं सब कुछ करना चाहेंगे जो उन्हें पसंद आता हो.  ऐसी स्थिति में बच्चे अपने दोस्तों और इंटरनेट पर ज्यादा निर्भर रहने लगते हैं, जहां उन्हें गलत सूचना भी मिलती है, मसलन पोर्न मूवी से लेकर भांग और गांजे के लाभ की सूचना.

अधिकांश बच्चे इन बातों पर भी गौर करते हैं कि उनके अभिभावक भी धूम्रपान कहते हैं तो इसका मतलब यह सब कुछ सामाजिक मान्यता प्राप्त कार्य है. इसमें कोई बुराई नहीं है. बीड़ी- सिगरेट, शराब आदि की लत बच्चों में कैसे पड़ती है, इस विषय पर मनोवैज्ञानिकों ने खूब अध्ययन किया है और वे बड़े विचित्र नतीजों पर पहुंचे हैं. उनका कहना है कि छोटा बच्चा जल्दी से जल्दी बड़ा होना चाहता है. आप बड़ों को सुहाने बचपन के गीत गाते सुनेंगे, मगर यथार्थ में ऐसा है नहीं. कोई बच्चा खुश नहीं है बच्चा होने से. उसको लगता है- मैं शक्तिहीन हूं, स्वयं कोई निर्णय नहीं ले सकता. छोटी सी छोटी चीजों के लिए दूसरों से पूछना पड़ता है, मेरी कोई स्वतंत्रता नहीं है. बड़े लोग स्वतंत्र हैं. इसलिए, बच्चा जल्दी बड़ा होना चाहता है. लेकिन वह यह भूल जाता है उम्र में बड़ा होने की यह चाहत उसकी उम्र की खत्म कर रही है.