Tuesday, 20 June 2017

दुनिया को भारत की रीत से ही बचाया जा सकता है

दुनिया के महान और मशहूर भौतिकशास्त्री स्टीफन हॉकिंग ने 5 मई को दुनिया को चेतावनी देते हुए कहा है कि धरती के पास सिर्फ 100 साल, बचे हैं, इंसान को दूसरे ग्रह में अपना ठिकाना तलाशना होगा. ऐसे में सवाल उपजता है क्या धरती का काउंटडाउन शुरू हो गया है? क्या धरती की उम्र सिर्फ 100 साल बची है? क्या 22वीं शताब्दी धरती की तबाही के नाम होगी? क्या मानव सभ्यता धरती पर पूरी तरह 100 साल में खत्म हो जाएगी? सवाल बहुत सारे हैं क्योंकि सवाल सिर्फ एक जिंदगी का नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता का है.  धरती में जलवायु परिवर्तन, तेजी से बढ़ती जनसंख्या, करीब से गुजरते उल्का पिंडों के टकराने का खतरा तो युद्ध उन्माद में डूबे आक्रमक होते इंसानों के हाथों में न्यूकलियर हथियारों का होना अनिश्चित भविष्य का संकेत है. ऐसे में हॉकिंग का सौ साल का अल्टिमेटम ही सिहरन पैदा करने के लिये काफी है.

धरती के पर्यावरण का चीरहरण आदि से अनंत की तरफ बढ़ रहा है. धरती की खूबसूरती में इंसानी अतिक्रमण ही उसके बेदखल होने की वजह बनेगा. कटते जंगल और बढ़ते सीमेंट के जंगलों से बने शहरों से निकलता विषैला धुआं, फैक्ट्रियों, कारखानों और मोटर-कारों से निकलता जहर आब-ओ-हवा को गैस चैंबर बनाता जा रहा है. न जमीन पर जीवों के लिये साफ जल और वायु बचा है और न पानी के भीतर मौजूद जीवों के लिये पानी. समुद्र के किनारों पर व्हेल मछलियों का मृत मिलना तो आसमान से पक्षियों का बेसुध होकर जमीन पर गिरना अजब-गजब खबरों में गुम हो जाता है.
लेकिन इसके बावजूद भी कोई जंग के लिए संसाधन जुटा रहा है तो कोई मुक्त व्यापार का रास्ता खोजकर दुनिया पर शाशन करना चाह रहा है. लेकिन इस समय कुछ ऐसे भी लोग है जो मानवता के लिए उसके जीवन के लिए आने वाली भावी पीढ़ी के लिए साफ हवा, पीने योग्य पानी और स्वच्छ वातावरण कैसे रहे इस पर शोध कर रहे है. ताकि आने वाली मानवता उन्मुक्त साँस ले सके. परन्तु जब सांस ही जहरीली हो जाए, तब उससे जीवन की आशा क्या की जा सकती है? वस्तुतः सांस की सार्थकता वातावरण की मुक्तता में निहित है. आज वातावरण मुक्त है कहाँ? मुक्त वातावरण का अर्थ है आवश्यक गैसों की मात्रा में सन्तुलन का बना रहना. चूँकि पेड़ एवं जन्तु दोनों ही वातावरण-सन्तुलन के प्रमुख घटक हैं, इसलिए दोनों ही का सन्तुलित अनुपात में रहना परमावश्यक है. वेदों में वृक्ष-पूजन का विज्ञान है. इसके विपरीत, आज पेड़-पौधों की निर्ममता-पूर्वक कटाई से वातावरण में कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा में अतिशय वृद्धि हो रही है. इससे तापमान अनपेक्षित मात्रा में बढ़ता जा रहा है, जो पर्यावरण के लिए संकट का सूचक है.

यदि बात जलवायु परिवर्तन से लेकर पर्यावरण से जुड़े संवेदनशील मामले पर हों तो हमें दुनिया को  वेद का मार्ग बताने में हिचक नहीं चाहिए वेद जो जो सफल जीवन का निर्माता-अग्रणी नेता है. उसे स्वयं आगे आकर समस्त परिवेश का हित करनेवाला,  मनुष्य और समाज सच्चा संचालक माना गया है. पृथ्वी पर होने वाली कुछ रासायनिक क्रियाओं से पर्यावरण में फैलने वाले प्रदूषण के कारण आकाश स्थित ओजोन की परत में एक बड़ा छिद्र हुआ है यदि इसी गति से होते रहेंगे तो पैराबैंगनी किरणों को रोकना संभव नहीं रहेगा. मतलब साफ है की जहरीली किरणों को रोकने का कोई उपाय हमारे पास नहीं रहेगा. और इसका परिणाम यह होगा कि कैन्सर, आँखों की ग्रन्थि आदि भयंकर रोगों का शिकार होंगे.

आप सब जानते है आज जब हमें प्यास लगती है तो उसे बुझाने के लिए बीस रूपये की मिनरल वाटर की बोतल खरीदनी पड़ती है. कारण आज हमारे आस-पास पानी दूषित हो चूका लेकिन कल अगर हम स्वच्छ वायु के लिए ओक्सीजन सिलेंडर पीठ पर बांधकर चले तो इस सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता. यदि कोई सोच हो कि नहीं ऐसा तो नहीं होगा तो उनसे बस यह सवाल है कि क्या आज से बीस वर्ष पहले किसी ने सोचा था कि हमें साफ पानी के लिए घरों में फिल्टर आदि लगाने पड़ेंगे? यदि आज प्रदूषण से उत्पन्न महाविनाश के विरुद्ध सामूहिक रूप से कोई उपाय नहीं किया जायेगा तो इस युग में मानव जीवित नहीं रह पायेगा.

प्रकृति के इस भयावह असंतुलन से बचने के लिए जहाँ विश्व के लोग विज्ञान के और दौड़ रहे है वहीं अनेकों वैज्ञानिक उपाय समाधान और आशा की खोज में हमारे वेदों की और लौट रहे है. रूस के प्रसिद्ध वैज्ञानिक शिरोविच ने लिखा है कि गाय के घी को अग्नि में डालने से उससे उत्पन्न धुंआ परमाणु विकिरण के प्रभाव को बड़ी मात्रा में दूर कर देता है. हमारी आध्यात्मिक पद्धति में इस क्रिया को यज्ञ कहा जाता है. जलती शक्कर में वायु शुद्ध करने बड़ी शक्ति विधमान है इससे चेचक, हेजा, तपेदिक आदि बीमारियाँ तुरंत नष्ट हो जाती है. पर्यावरण पर शोध करने वाले फ्रांस के वैज्ञानिक ट्रिलवर्ट ने यह बात दावे के साथ लिखी है कि मुनक्का, किशमिश आदि फलों को (जिनमें शक्कर अधिक होती है) को जलाकर देखा तो पता चला कि आन्त्रिक ज्वर के कीटाणु 30 मिनट और दुसरे कीटाणु एक या दो घंटे में नष्ट होते है. पर्यावरण के इस विज्ञान में डॉ. कर्नल किंग कहते है कि केसर तथा चावल को मिलाकर हवन करने से प्लेग के कीटाणु भी समाप्त हो जाते है.

आज यज्ञ विज्ञान को दुनिया के बड़े-बड़े शोधकर्ता पर्यावरण को बचाने में एकमात्र सबसे सरल उपयोग का साधन बता रहे है हमारे तत्त्वदर्शी ऋषियों के निर्देशों के अनुसार जीवन व्यतीत करने पर पर्यावरण-असन्तुलन की समस्या ही उत्पन्न नहीं हो सकती. पर्यावरण-सन्तुलन से तात्पर्य है जीवों के आसपास की समस्त जैविक एवं अजैविक परिस्थितियों के बीच पूर्ण सामंजस्य. इस सामंजस्य का महत्त्व वेदों में विस्तारपूर्वक वर्णित है विश्व विख्यात इतिहासकार आर्नोल्ड टॉयनबी ने मानवता के लिए भविष्य की राह देखी थी. उन्होंने कहा है कि बीसवीं सदी के अंत तक विश्व पर पश्चिमी प्रभुत्व रहेगा किन्तु 21वीं सदी में भारत उन देशों को जीत लेगा जिन्होंने कभी उसे पराजित किया था. और भारत की यह जीत उसके अध्यात्म के बल पर होगी, हथियारों के बल पर नहीं. टॉयनबी का स्पष्ट विचार था कि मानवता को यदि आत्मविनाश से बचना है तो उसे पश्चिमी तौर-तरीके से प्रारंभ हुए अध्याय का समापन भारतीय रीति-रिवाज और वेदों के माध्यम से करना ही होगा. बात सच होती दिख रही है. दुनिया भारतीय आध्यात्म में संस्कृति की सुगंध अनुभव कर रही है. लेकिन इसमें आप और हम मिलकर सहयोग करेंगे तभी मानवता बच सकती है.
विनय आर्य



अबकी बार हुर्रियत की जड़ों पर प्रहार

आखिर कौन है हुर्रियत कांफ्रेंस कोई राजनैतिक दल, संगठन या समाजसेवी संस्था.? अक्सर लोग इस सवाल को राजनीति और मीडिया की लालटेन के नीचे बैठकर उसके उजाले में इसका हल ढूंढते है, आखिर कैसे अलगाव और आजादी के नाम कश्मीर का वैचारिक आतंकी संगठन भारत जैसे एक विशाल राष्ट्र के लोकतंत्र उसके संविधान को एक लम्बे अरसे से चुनोती दे रहा है? हुर्रियत कांफ्रेंस की जड़ों  को समझना हो तो कश्मीर में क्या कैसे कब घटा ये याद करना होगा. साल 1988-89 के बीच कश्मीर की आजादी को लेकर जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट या जेकेएलएफ ने कश्मीर की बर्फीली वादियों में बारूद की जो गर्माहट पैदा की, जो जल्दी ही आग बनकर वहां के हरे भरे चिनार और भारत की सम्प्रभुता को झुलसाने लगी थी. आग की इस तपिश से जब कश्मीर का हिन्दू समुदाय झुलसने लगा तब पड़ोसी देश पकिस्तान ने हाथ तापने शुरू किए. तब इसे दुनिया ने भी पहली महसूस किया.

हुआ यह कि जम्मूकश्मीर लिबरेशन फ्रंट के कुछ नौजवानों ने कश्मीर में आजादी के नाम पर भारतीय सुरक्षा बलों से लड़ना शुरू किया शुरू में सेना को इन लड़ाकों को पहचानने में दिक्कत पेश आई. फिर अचानक एक के बाद एक जेकेएलएफ के लड़ाके मारे जाने लगे. तब इन लोगों ने कश्मीरी पंडितों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया भारतीय सुरक्षा बल बेहद मुस्तेदी से अतिवादियों के सफाए में लगे थे. इससे पहले की जेकेएलएफ के झंडे तले जमा हुई कश्मीरी जनता अपने घरों को लौटती इस्लामी-अतिवादियों के गिरोहों ने उनका स्थान ले लिया. इन्हें पकिस्तान की आईएसआई का समर्थन हासिल था. इसी स्थिति के गर्भ से हुर्रियत का जन्म होता है, जिसने अलगाववाद के लिए लड़ रहे अलग-अलग संगठनों को एक परचम तले इकठ्ठा किया. नाम दिया ‘ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस’ जिसके बाद भारत सरकार का रुख नरम हुआ और नतीजा  89 से 93 यानी पांच वर्षों में लापरवाहियों की खाद से ताकत हासिल करता ये छोटा सा पौधा आज 28 वर्षों में एक ऐसा दरख्त बन चुका है, जिसे उखाड़ पाना भारत सरकार के लिए सर दर्द बन चूका है.

राष्ट्रीय जांच एजेंसी, ईडी सहित कश्मीर की पुलिस अलगाववादियों को मिलने वाली आर्थिक मदद की जांच में जुटे हैं. साथ ही ये सभी एजेंसियां मिलकर खुफिया एजेंसी को इस मामले की जांच में पूरी मदद कर रही हैं. अधिकारी बता रहे है कि जम्मू-कश्मीर में शांति के माहौल को बिगाड़ने के लिए सीमापार से इन अलगाववादियों को बड़ी आर्थिक मदद मिलती है. ऐसे में वादियों की फिजा को बिगाड़ने के लिए इस्तेमाल हो रहे पैसे की जांच इस सरकार का मुख्य एजेंडा है.

श्रीनगर, जम्मू, दिल्ली और हरियाणा में कई जगहों पर पड़े राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी एनआईए के छापों ने कश्मीर में बहस छेड़ दी है. कुछ लोगों का मानना है कि इस कदम से सरकार को “चरमपंथियों को मिलने वाले फंड” के स्रोतों के बारे में जानकारी मिलेगी और वो उन्हें धर-दबोचेगी. एनआईए के सूत्रों की मानें तो देश में आने वाला यह पैसा कई आतंकी संगठनों सहित अलगाववादियों तक पहुंचता है. हुर्रियत कांफ्रेंस, जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट, इस्लामिक स्टूडेंट फ्रंट, हिजबुल मुजाहिद्दीन, जैश ए मुजाहिद्दीन, जमीयतुल मुजाहिद्दीन सहित कई संगठनों को यह पैसा पहुंचाया जाता है.

मूल-प्रश्न यह भी है कि आतंक का यह पेड़ इतना फला-फुला कैसे तो इसे समझने के लिए जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला का यह बयान काफी कि हुर्रियत वालों! हम तुम्हारे साथ हैं, एक हो जाओ, आगे बढ़ो, हमें अपना दुश्मन मत समझो” इससे साफ हो जाता है कि देश के अन्दर अन्य आतंकी संगठनों नक्सलवाद, माओ, बोडो आदि की तरह हुर्रियत को भी पर्दे के पीछे से राजनितिक संरक्षण प्राप्त होना नकारा नहीं जा सकता. सच कहे तो कश्मीर का समाधान न हुर्रियत चाहती न कश्मीर पर हर समय आंसू बहाने वाला पाकिस्तान बस इन लोगों को अपने-अपने हिस्से का कश्मीर पर चाहिए.

भारतीय राजनीति गलत या सही रही इस बात को अलग रखकर चर्चा करे तो आज सरकार जिन भी तेवरों के साथ आगे बढ़ रही है, इससे कश्मीर में डूबते शिकारे को बचाने में एक आशा की किरण नजर आ रही है. अगर बदलाव का यह शिकारा भारत सरकार अपनी ओर खींचने में कामयाब हुई तो पथराव करने तक को रोजगार की तरह देखने पर मजबूर कश्मीरी, अपने लीडरों के मुख पर खुद तमाचा जड़ देंगे.
राजीव चौधरी

ऐसे धर्म को धिक्कार है, जो हमें सत्यता की ओर जाने से रोके

प्रत्येक प्राणी का यह स्वभाव होता है कि वह दुःख से बचना तथा सुख को पाना चाहता है। फिर मनुष्य तो सृष्टि का सबसे श्रेष्ठ प्राणी है, वह क्यों नहीं सुख की प्राप्ति के लिए पूर्ण पुरूषार्थ करेगा? आज संसार भर के प्रबुद्ध मनुष्य (चाहे वे किसी भी महत्वपूर्ण पद पर आसीन हो) संसार को सुखी बनाने का यत्न अपने-अपने ढ़ंग से करते प्रतीत हो रहे हैं। परंतु इसके उपरांत भी आज सम्पूर्ण मानव समाज अशांति, आतंक, हिंसा, घृणा, मिथ्या, छल, कपट,ईर्ष्या, राग, द्वेष से ग्रस्त होकर अति दुःखी व अशांत है। विचार आता है कि क्या कारण है कि चिकित्सा करते रहने पर भी रोग बढ़ता ही जा रहा है? 

मेरा मानना है कि इस सब का मूल कारण सत्य और वास्तविकता से अनभिज्ञ रहना अथवा जानकर भी उसके अनुकूल व्यवहार न करना ही है। आज सारे संसार में विकास की होड लग रही है। हम छल से दूसरों को गिराकर उससे आगे जाना चाहते हैं। दूसरों की झोपडियां जलाकर अपने भव्य भवन बनाना चाहते हैं, दूसरों की थाली से सूखी रोटियां भी छीनकर स्वयं सुस्वाद सरस भोजन करना चाहते हैं, दूसरों के तन से जीर्ण शीर्ण वस्त्र भी छीनकर स्वयं बहुमूल्य वस्त्र पहनकर फैशन करना चाहते हैं तथा दूसरों का गला दबाकर स्वयं एकाकी अमर जीवन जीना चाहते हैं। क्या ऐसा जीवन हमारी सुख, शांति का विनाशक नहीं ? क्या मानवीय हत्या का हनन करने वाला नहीं है ? हमारा विकास तो तभी होगा जब हमारा जीवन सत्यता से परिपूर्ण होगा। क्योंकि सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं होता। धर्म के नाम पर, ईश्वर के नाम पर, देवी-देवताओं के नाम पर जितना रक्तताप व वैमनस्यता संसार में हो रही है, संभवतः उतना किसी अन्य कारण से नहीं। धर्म के नाम पर यह पाप क्यों ? 

धर्म और ईश्वर के नाम पर ईर्ष्या, राग, द्वेष,घृणा, हिंसा क्यों ? हमें धर्म का ऐसा सच्चा स्वरूप संसार के सामने लाने का प्रयास करना होगा, जिसमें पाखण्ड, अंधविश्वास व असत्य का कोई स्थान न हो। यही विचार संसार के ऋषियों (ब्रह्मा से लेकर जैमिनी पर्यन्त) का रहा है। महर्षि दयानंद सरस्वती तो परमाणु से लेकर परमेश्वर तक का यथार्थ ज्ञान व उससे अपना व दूसरों का उपकार करना ही विद्वानों का कर्तव्य बताते हैं। दुर्भायवश महाभारत के समय से वेद के नाम पर, धर्म के नाम पर, ईश्वर के नाम पर, देवी-देवताओं के नाम पर कुछ विकृतियों ने जन्म लिया और वेद केवल कर्मकाण्ड तक ही सीमित रह गया। उस वैदिक कर्मकाण्ड के नाम पर मांसाहार, व्यभिचार, पशुबलि, नरबलि, स्त्री व शूद्र वर्ग के प्रति हीन भावना, मदिरापान आदि कुरीतियां इस देश में फैल गईं। एक ईश्वर की जगह अनेक देवी-देवता प्रचलित होकर विश्व में हजारों मत-मतान्तर चल पड़े।

सर्वशक्तिमान और सर्वसामथ्र्य सम्पन्न ईश्वर शक्ति के अस्तित्व में रहते हुए भी इन देवी-देवताओं (वह भी एक दो नहीं, चार छः नहीं अपितु पूरे तैतीस करोड) को प्रभाव में लाने की आवश्यकता क्यों हुई ? इसका किसी के पास कोई तर्क संगत उत्तर नहीं है। जीवन में पूजा का किसी रूप में कोई भी उपयोग संभव नहीं है और पूजा से कुछ भी प्राप्त कर पाना संभव नहीं, व्यक्ति जो कुछ प्राप्त करना चाहता है या करता है वह केवल अपने पौरूष और पुरूषार्थ भरे प्रयासों से प्राप्त करता है। लेकिन सहज और सरलतम रूप में प्राप्त करने की मनुष्य की स्वाभाविक मनः प्रवृत्ति ने उसे पौरूष और पुरूषार्थ से दूर ढकेल दिया और पूजा से वह कुछ भी प्राप्त नहीं कर सका। इस कारण देश और समाज पतित होता चला गया। समस्याएं बढ़ती गईं, समाधान संभव नहीं हो सका। देश पराधीन हो गया, विदेशी आक्रमणकारी हमारी राजसत्ता को हथियाकर बैठ गये। अत्याचार हो रहे, समाज में हा हाकार हो रहा, समाज लुटता-पिटता रहा पर कोई बचाने वाला पैदा ही नहीं हुआ। जिन देवी-देवताओं पर हम विश्वास साधकर बैठे वह दीन-हीन स्थिति में मौन धारण कर देवालयों में बैठे कांप रहे थे। हमारी रक्षा करना तो दूर वह स्वयं अपनी रक्षा भी नहीं कर पा रहे थे। हम ढ़ोल, मजीरा, शंख, झांझर और चिमटा लेकर उन पत्थर के देवी-देवताओं के सामने गीत गाते कीर्तन करते रहे। मौत के भय से थर-थर कांपते कायर कायर और क्लीवजन कंठीमाला हाथ में लेकर ग्रहों, नक्षत्रों एवं राशियों में अपना भाग्य लेख पढ़ने के लिए जन्मकुण्डली बिछाकर बैठे रहे। मंदिरों-देवालयों में जाकर देवी-देवताओं की मूर्तियों के सामने माथा रगडते रहे लेकिन उनके दिव्य चक्षु इहलोक के पैशाचिक दुराचारों को कभी नहीं देख सके। 


विदेशी आक्रांता इन मूर्तियों को तोडकर चकनाचूर करते रहे। उन्हें खण्ड-खण्ड कर कुओं, पोखरों में फैंका गया, पर न तो ये देवी-देवता कुछ कर सके और न उनके पुजारी। बल्कि यह पुजारी तो बलात्कार पीडित महिला की तरह असहाय और विवश होकर आंसू बहाते रहे। यदि इन्होंने इसके विपरीत स्वयं पौरूष की भाषा पढ़ी होती, धर्म और ईश्वर के सच्चे निराकार स्वरूप को समझा होता तो कोई शक्ति इस देश की ओर आंख उठाकर नहीं देख पाती। सोमनाथ मंदिर की कहानी जब हमारे स्मृति पटल पर उभर कर आती है तो आंखों में खून उतर आता है। हम केवल पौराणिक आख्याओं तक सीमित बने रहे। भूगोल से हम प्रारंभिक परिचय कभी प्राप्त नहीं कर सके। इसलिए धरती को कभी शेषनाग के फन पर टिका दिया, कभी कश्यप की पीठ पर और कभी गाय के सींग पर। क्योंकि सभी जीवधारियों की कालावधि निश्चित है, अतः झूठ को स्थाई रूप देने की दृष्टि से इन तीनों को त्रिकालजयी बना दिया और धरती का गैंद रूप देकर इधर से उधर उठाकर रखते रहे। झूठ में हमारी अगाध आस्था रही है कि हमें अपने पूर्वजों की कही बात का भी ध्यान नहीं रहता। आर्यभट्ट और वरामिहिर हमारे ही पूर्वज थे, जिन्होंने पृथ्वी, सूर्य और चन्द्रमा की परिधि, उनका व्यास और उनकी आपस की दूरी की माप सटीक रूप में दी थी। लेकिन हमारे झूठ के क्षेत्र में वह कहीं बाधक न बन जाये इसलिए उसे जान-बूझकर दृष्टि ओझल कर दिया। हमारे यह पुजारी के व्यवसायी टिपकादास धरती पर फल कटहेरी की तरह ब्रह्म का बीज बोत रहे हैं, जिनके बेल रूप में फैलकर कहीं पैर टिकाने को स्थान नहीं छोडा है। हमारे यहां महाभारत के महानायक कर्मयोगी श्रीकृष्ण और गीता के रूप में उपलब्ध उनकी वैचारिक धरोहर युगों युगों तक मनु पुत्रों का मार्गदर्शन कर सकती है। लेकिन इन टिपकादासों ने उसकी विषयवस्तु की सहज विश्वसनीयता पर तमाम तरह के प्रश्नवाचक चिन्ह खडे कर दिये हैं। श्रीकृष्ण जैसे योगीराज,अदम्य व्यक्तित्व पर भी इन मिथ्यावाद के प्रणेता टिपकादासों ने अपनी अतृप्त यौन पिपासा को विभिन्न रूपों में उन पर निर्ममता से प्रत्यारोपित कर उन्हें रसिक बिहारी, छैल बिहारी,रास बिहारी, लीला बिहारी और बांके बिहारी जैसे तमाम तरह के नाम देकर उन्हें राधा के पैरों में महावर रचाने बैठा दिया। 

आज धरती पर उपलब्ध सभी सुख सुविधाएं और उसके उपकरण स्वयं मानव ने पैदा किये हैं। किसी देवी देवता का उसमें इंच मात्र का योगदान नहीं है किंतु पाखण्डी-मिथ्यावादी अपने स्वार्थ हित में उसका विभिन्न रूपों में गुणगान करते चले आ रहे हैं। कलान्तर में धीरे-धीरे इस देवत्व भाव को समान भाव से पशु पक्षियों पर भी आरोपित कर दिया और अंत में यह देवता पत्थरों पर भी उकेरे जाने लगे। पराकाष्ठा की स्थिति तो यहां तक पहुंच गई कि ढ़ेले पर कलावा बांधकर उसे सीधे-सीधे गणेश भगवान बना दिया गया। इस देश में भिखारी से लेकर पुजारी तक मांगकर खाने वालों की फौज खडी होती चली गयी। ऋषि ने ’एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति’ का जो उपदेश दिया उसके विपरीत बहुदेवतावाद का अंतहीन सिलसिला खडा हो गया, जो आज भी समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा है। पत्थरों,धातुओं और लकडियों के टकड़ों पर तमाम तरह के देवी-देवताओं की विचित्र-विचित्र शक्लें उतारकर देवालयों, मंदिरों और घरों में खडी कर दी। यह देवी-देवता आज तक किसी को कुछ नहीं दे सके, बल्कि स्वयं इस कमाऊ समाज पर भार बन जाते हैं। हमारे ही पैदा किये हुए देवता, जो हमारी ही दी हुई व्यवस्था पर जीवित हैं, हमें उन्हीं के आगे मंगिता बनाकर बिठा दिया। वैसे सृष्टि नियम के विरूद्ध बातें सभी मतों में हैं, जैसे मुस्लिम भाई कहते हैं कि हमारे पैगम्बर मोहम्मद सहाब ने एक ही उंगली से चांद के दो टुकडे कर दिये। इसी प्रकार हमारे पुराणों में सबसे अधिक चमत्कारिक बाते हैं, जैसे हनुमान ने अपने बचपन में ही सूर्य को गाल में रख लिया, कुंती कर्ण कान से उत्पन्न हुआ, योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत अपनी उंगली पर उठा लिया, श्रीकृष्ण द्रोपदी का चीर बढ़ा दिया आदि। भूत-प्रेत, गण्डा,डोरी, श्राद्ध-तर्पण, फलित ज्योतिष, गृहों का नाराज होना या खुश होना तथा मूर्तिपूजा व अवतारवाद का मानना अंधविष्वास व पाखण्ड है। क्योंकि यह सब बातें प्रकृति नियम के विरूद्ध हैं। इसलिए इनको न मानकर वैदिक धर्म को मानना ही हर व्यक्ति के लिए श्रेयस्कर व लाभदायक होगा। 

वैदिक धर्म में ईश्वर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करने के लिए संध्या करना (जिसे ब्रह्मयज्ञ कहते हैं), दूषित वातावरण को शुद्ध करने के लिए हवन करना (जिसे देवयज्ञ कहते हैं)। शरीर को स्वस्थ्य रखने के लिए यम-नियमों से समाधि तक पहुंचने के लिए अष्टांग योग करना, दूसरों की भलाई के लिए परोपकार करना, वेदों सहित सभी आर्ष ग्रन्थों को पढ़ना और उनके अनुसार जीवन बनाना आदि मुख्य सिद्धांत वैदिक धर्म के हैं। इसलिए हम अपने जीवन को पवित्र स्वस्थ्य रखना चाहते हैं तो हमें अन्य मतों व पन्थों को छोड़कर वैदिक धर्म अपनाना चाहिए,जिससे हम अपने परिवार, समाज, राष्ट्र व केवल मानव मात्र ही नहीं बल्कि प्राणी मात्र के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करते हुए अपने जीवन को सफलता की ऊंचाईयों को छूते हुए मोक्ष के अधिकारी बने। इससे उत्तम अन्य कोई मार्ग नहीं है।

लेखक 
विवेक प्रिय आर्य

Thursday, 8 June 2017

सहारनपुर हिंसा: ये प्रतिरोध था या प्रतिशोध?

सहारनपुर हिंसा की घटना मीडिया के केमरों और राजनेताओं के बयान से खूब परवान चढ़ी. अब राज्य सरकार की नजर में स्थानीय अराजक तत्व दोषी है तो विपक्ष के लिए राज्य सरकार. किन्तु क्या कोई ऐसा भी है जो यह मनाने को तैयार हो कि सहारनपुर जैसी घटना के लिए सिर्फ वो लोग जिम्मेदार है जो आज समाज में एक दुसरे के प्रति नफरत बाँट कर अपनी राजनैतिक रोटी सेंक रहे हैं? दरअसल सामाजिक मोर्चे से शुरू हुई इस लड़ाई में राजनेताओं के बयानों की आहुति ने जो ज्वाला भड़काई वो एकदम समाप्त नहीं होगी. लेकिन हमें आज इसका हल सोचना है क्योंकि यह घटना एक प्रक्रिया भर है और आगे जो होगा कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकता है.

मीडिया और सामाजिक विश्लेषको के नजरिये से इस घटना का खूब विश्लेषण हो चूका है जिसमें कोई प्रसाशन तो कोई भीम सेना समेत अन्य धार्मिक जातिगत संगठनो को दोषी ठहरा रहा है हालाँकि इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता कि इन सबका इसमें कोई किरदार न रहा हो. किन्तु असल सच यह है कि इसका असली दोषी है वह झूठा साम्यवाद जो कलम से लेकर भाषणों तक में दलितों को दलित बनाकर रखना चाहते है जो उनकी गरीबी, उनकी सामाजिक स्थिति के लिए सिर्फ और सिर्फ कथित ऊँचे वर्ग को दोषी ठहराकर उनके वोट से लेकर भावनात्मक शोषण तक कर रहे है.

गरीब और शेक्षिक रूप से पिछड़े लोग हर देश, हर शहर, गाँव, मोहल्ले और परिवारों में मिल जायेंगे इसका हल क्या यही है कि हिंसा से सब कुछ पाया जाये? प्रतिरोध अवश्य हो लेकिन उसमें प्रतिशोध की भावना न हो. पर सहारनपुर हिंसा में जिस तरह के ओडियों वीडियो सामने आ रहे है उनमें प्रतिरोध के बजाय प्रतिशोध की भावना स्पष्ट दिखाई दे रही है. हो सकता है आज दलित चिन्तक, विचारक लेखक इसी आस में बैठे है कि यहाँ से हिंसा का कोई बड़ा तांडव हो और वो इन इनकी लाशों पर नया महाभारत लिख सके कि देखों हमने तो पहले ही कहा था दलितों को शोषण हो रहा है.

हर बार की तरह दलित समाज के लोगों ने अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए धर्मपरिवर्तन का पुराना रास्ता अपनाया है. दलित समाज के अनेक लोगों द्वारा शासन और प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए देवी-देवताओं के चित्रों और प्रतिमाओं का विसर्जन बड़ी नहर में कर नये धर्म सिद्धांत की तलाश की जा रही है. मुझे नहीं पता इसमें वह कितने सफल होंगे कितने नहीं पर किसी भी सिद्धांत को परखने की कसौटी उसका व्यवहार है. जब-जब “जय श्री राम” का नारा लगाया जाता है, कोई न कोई दलित चिंतक शंबूक की कहानी लेकर बैठ जाता है. वही शूद्र शंबूक, जो था तो ऋषि लेकिन उसे अपनी जान राम के आदेश पर गंवाना पड़ी थी, क्योंकि वह जाति से शूद्र था. सामाजिक वर्णक्रम पर आधारित जाति-व्यवस्था और उसकी दीवारों को मजबूत करने की राजनीति भी इन पौराणिक कथाओं के आधार बखूबी हो रही है. इसमें लोग एक बात भूल जाते है कि धर्म बदलने से केवल रीति-रिवाजों में परिवर्तन आता है. सामाजिक स्तर पर कोई खास बदलाव नहीं आता है.

समाज में जातीय शोषण नकारा नहीं जा सकता दलित समाज समेत अनेक लोग इसका शिकार है सहारनपुर में हुई हिंसा के मामले में भीम आर्मी और दलित समाज के लोगों के खिलाफ जो कार्रवाई हो रही है, उससे वह काफी निराश हैं. मायावती समेत अनेक जातीय राजनीति करने वाले दल इस हिंसा को “दलित गरिमा” और “दलित अस्मिता’ के ऊपर हमले का सवाल बना देना चाहते हैं. मायावती ख़ुद इस घटना को एक बड़े राजनीतिक अभियान में बदल देना चाहती हैं. जिसका इशारा इस और है कि राजनीतिक सत्ता के माध्यम से ही दुसरे वर्ग का शोषण किया जाये. पर क्या शोषण ही सत्ता का मुख्य काम रह गया?  क्यों न सरकार और समाज मिलकर कोई ऐसा समाधान निकाले कि जातीय शोषण उत्पीडन की यह व्यवस्था ही धरासाई हो जाये.
जब आजादी की लहर उठी तो उसमें देश के हर वर्ग का व्यक्ति जूझने लगा था. दलित बहुजन समुदाय गरीब था, शोषित था, और पीड़ित था. वह भी मुक्ति चाहता था आर्थिक असमानता से. वह मुक्ति चाहता था सामाजिक विषमता से. वह मुक्ति चाहता था धार्मिक शोषण की जंजीरों से. इसलिए वह मरे मन से नहीं, अपितु उत्साहित मन से इस स्वतंत्राता संग्राम में कूद पड़ा जिसमें बलिदान देने वाले तिलका मांझी, उदईया, मातादीन भंगी, महाबीरी देवी वाल्मीकि, वीरांगना झलकारी बाई, ऊदादेवी पासी, चेतराम जाटव और बल्लू मेहतर समेत अनेक वीर क्रन्तिकारी योद्धा मौजूद थे. परिणाम यह रहा कि अंग्रेज शाशन, जन आक्रोश से समक्ष अंततः हिल उठा. शोषक समझ गया कि जिस देश का गरीब भी जाग गया हो अब अधिक दिन भारत को गुलाम नहीं बनाये रक्खा जा सकता. आखिरकार देश आजाद हो गया. खुशी, चारों और खुशी मनायी गयी लेकिन अंग्रेजी शासन के आकाश से गिरने वाली स्वतंत्राता कहां आकर रुक गयी? उन्ही जातीय लडाइयों में जिनके कारण यह देश हजारों साल गुलाम रहा!!


किसी हिंसा लड़ाई या सामाजिक स्तर पर यदि किसी कारण एक कमजोर या पिछड़े वर्ग की किसी की जान चली जाति है तो मीडियाकर्मियों, तथाकथित बुद्धिजीवियों और राजनेताओं द्वारा इसे एक नया रूप दिया है कि जैसे पीड़ित पूरा कथित छोटा वर्ग हो और शोषित कथित ऊँचा वर्ग. इस कारण फैला यह जहर आज जातीय नफरत का बड़ा कुंड बन चूका है. शायद सहारनपुर हिंसा इस तरह के प्रचार का ही नतीजा है. महाराणा प्रताप और अम्बेडकर में कौन बड़ा कौन छोटा विवाद आखिरकार इस हिंसा का कारण बन गया. जबकि महाराणा प्रताप और अम्बेडकर दोनों ही इस देश के सच्चे सपूत थे एक ने देश को स्वाभिमान दिया तो दुसरे ने देश को संविधान तो फिर फालतू की रार क्यों? जागरूकता के आन्दोलन होने चाहिए स्वतंत्र समाज हर किसी को इसकी आजादी बशर्ते आंदोलन का उद्देश्य हिंसक न हो, एक ऐसे समाज की स्थापना हो जिसमें सामाजिक-आर्थिक विषमता न हो, जो ऊँच-नीच की अवधारणा से रहित हो और जो सामाजिक समानता पर आधारित हो. सामाजिक शोषण, उत्पीडन अब मुक्त समाज का दरकार है पर समाज के लोगों के सामने यह प्रश्न बार बार उठता है कि आखिर इस मुक्ति का आंदोलन के नेतृत्व कौन करेगा. प्रश्न इतना ही नहीं है कि नेतृत्व कौन करेगा? बल्कि प्रश्न सच्चे नेतृत्व का है?
विनय आर्य 

गाय के प्रभावशाली अतीत के खिलाफ साजिश

गाय के नाम पर धर्म या धर्मनिरपेक्षता में से कुछ बचे या न बचे, मूर्खता बची रहना पक्का है.  भारत सरकार ने पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम की एक धारा में बदलाव किया है. जिसमें जिन मवेशियों की मवेशी बाजार से ख़रीद होती है उनको मारा नहीं जा सकता है. इस नियम का दक्षिण भारत के कई इलाकों में विरोध कर बीफ पार्टियां तक आयोजित की गईं. खाने-पीने की स्वतंत्रता की मांग करना एक अलग बात है लेकिन कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा केरल में केंद्र सरकार के फैसले के विरोध में सरेआम एक गाय को काटकर अपना विरोध जताना बहुत ही भद्दी और असंवेदनशील गिरी हुई हरकत है. पशुओं के अधिकारों पर बात करने वाले, जो लोग बैलों के लिए जल्लीकट्टू को बर्बर बता रहे थे. वो लोग आज केरल में हुई इस घटना पर बिल्कुल चुप हैं

गाय भारत का पशु ही नहीं बल्कि इसे आस्था की नजर देखे तो माता का दर्जा प्राप्त है लेकिन दुखद बात यह कि भारतीय राजनेता आज इसी माता पर अपनी राजनीति कर इसे सरेआम कत्ल कर रहे है. एक प्रभावशाली अतीत को समेटे इस वर्तमान भारत में जो चल रहा है वह काफी दुखद है. आज वर्तमान भारत में राजनेता अपने मूल्यों को भूलते जा रहे है. जिसका ये परिणाम ये प्राप्त हुआ की हमारे प्राण हमारे आदर्श महापुरुष और माँ तुल्य गाय उन दो कौड़ी के विदेशी लुटेरो के लिए गन्दी राजनीति का हिस्सा बनकर रह गये

हम मानते है सरकार और विपक्ष की बहुत सारे मुद्दों पर आम राय नहीं होती विरोध करना विपक्ष द्वारा राजनीति का एक हिस्सा होता है. सरकार से सवाल और आलोचना सरकार को सही राह दिखाती है. लेकिन सरकार के फैसले का विरोध जिस तरीके से केरल में किया गया यह भारतीय राजनीति का एक अशोभनीय चेहरा कहा जा सकता है. क्या आज विपक्ष यह समझ बैठा कि गाय के प्रति आस्था सिर्फ सत्ताधारी दल की बपोती है? नहीं गाय माता देश के लिए यहाँ के सांस्कृतिक धार्मिक मूल्यों के लिए उतना ही आस्थावान है जितना अन्य राष्ट्रीय मूल्य. आखिर क्यों आज सत्ता के लिए गाय को निवाला बनाया जा रहा है?

जब से बीफ पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग उठ रही है तभी से दक्षिण भारत में छात्रों का एक बड़ा सम्मूह ऐसा भी है जो इसका विरोध करता आ रहा है. हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में कई बार विरोध स्वरुप बीफ के फेस्टिवल का आयोजन किया है. जब इस फेस्टिवल को ज्यादा तरजीह नहीं दी गयी तब अचानक राजनीति बदलते हुए खान-पान की मांग को आगे करते हुए अलग देश द्रविड़नाडू की मांग होने लगी पहले ये मांग सिर्फ तमिलभाषी क्षेत्रों के लिए थी. लेकिन बाद में द्रविडनाडु में आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, ओडिशा और तमिलनाडु को भी शामिल करने की बात कही गई. यानी मांग ये थी कि दक्षिण भारत के राज्यों को मिलाकर एक नया मुल्क बनाया जाए, द्रविडनाडु.

ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं हो रहा है. ऐसा समय आया था जब क्यूबा के तत्कालीन राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो ने भी इसी तरह का क़ानून लागू किया था और गौवंश की ह्त्या पर प्रतिबन्ध लगाया था. लेकिन भारत में देखा जाये तो इसका उल्टा काम हो रहा है. राजनीति में तर्क का तर्क से और विचारधारा का विचारधारा से मुकाबला होते देखा था लेकिन पहली बार लोग नाजायज और क्रूर मांग लेकर आगे बढ़ रहे कोई इंसानों की हत्या कर गाय को बचाने की बात कर रहा है तो कोई गाय की हत्या कर अपना विरोध जता रहा है. सामाजिक चेतना, जीवों के प्रति दया, सहिष्णुता, उदारता आज कहीं दिखाई नहीं दे रही है. क्या ऐसा नहीं हो सकता गौवध बिना प्रतिबंध और तथाकथित गौरक्षा के हिंसक टोले की बजाय सिर्फ हमारे पुराने सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक चेतना से बच जाये?

केरल में युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने 28 मई को विरोध स्वरूप जिस कार्य को अंजाम दिया वो नैतिकता की दृष्टि से अस्वीकार्य हैं. दरअसल, इस फैसले के जरिए सरकार जिस तरह के राजनीतिक फायदे की अपेक्षा कर रही होगी, युवा कांग्रेस के उस कृत्य से उसे उद्देश्यपूर्ति में लाभ ही मिलेगा. कुल मिलाकर समाज दो भागों में बंटता दिख रहा है. एक तरफ संवैधानिक अधिकारों और व्यापारिक हितों का हवाला देकर आदेश का विरोध कर रहे लोग और दूसरी तरफ गौ प्रेम में मनुष्यों की हत्या से भी बाज न आने वाले गौभक्त. गायों को मां कहा जाता है लेकिन उसकी देखभाल मां की तरह नहीं की जाती. गायों को बचाने के लिए उन पर ध्यान देना जरूरी है. शेरों के लिए करोड़ों खर्च करने वाली सरकार गाय के लिए खर्च नहीं करती. वजह ये है कि गाय की बात सांप्रदायिक हो जाती है.

दिक्कत ये है कि जब इतिहास या धार्मिक पुस्तक पढ़ने की बारी आती है तो राजनितिक दल उनका मजाक उड़ाते हैं. फिर जब राजनीति करनी होती है तो इतिहास और वेद आदि की अनाप शनाप व्याख्याएं करने लगते हैं. मौजूदा समय में राष्ट्रवाद का राजनीतिक इस्तेमाल राष्ट्रवाद की कोई नई समझ पैदा कर रहा है या जो पहले कई बार हो चुका है उसी का बेतुका संस्करण है. यह खतरनाक प्रवृत्ति है या लोग क्या सरकार और समाज ऐसे खतरों से निपटने में सक्षम हैं? क्योंकि अब या तो  देश को बांटने का षडयंत्र हो रहा है या फिर गौवंश के प्रभावशाली अतीत के खिलाफ साजिश सी होती दिखाई दे रही है.
 राजीव चौधरी 



Tuesday, 6 June 2017

मनुस्मृति और नारी जाति

डॉ विवेक आर्य

भारतीय समाज में एक नया प्रचलन देखने को मिल रहा है। इस प्रचलन को बढ़ावा देने वाले सोशल मीडिया में अपने आपको बहुत बड़े बुद्धिजीवी के रूप में दर्शाते है। सत्य यह है कि वे होते है कॉपी पेस्टिया शूरवीर। अब एक ऐसी ही शूरवीर ने कल लिख दिया मनु ने नारी जाति का अपमान किया है। मनुस्मृति में नारी के विषय में बहुत सारी अनर्गल बातें लिखी है। मैंने पूछा आपने कभी मनुस्मृति पुस्तक रूप में देखी है। वह इस प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर एक नया कॉपी पेस्ट उठा लाया। उसने लिखा-
"ढोल, गंवार , शूद्र ,पशु ,नारी सकल ताड़ना के अधिकारी।"
मेरी जोर के हंसी निकल गई। मुझे मालूम था कॉपी पेस्टिया शूरवीर ने कभी मनुस्मृति को देखा तक नहीं है। मैंने उससे पूछा अच्छा यह बताओ। मनुस्मृति कौनसी भाषा में है? वह बोला ब्राह्मणों की मृत भाषा संस्कृत। मैंने पूछा अच्छा अब यह बताओ कि यह जो आपने लिखा यह किस भाषा में है।  वह फिर चुप हो गया। फिर मैंने लिखा यह तुलसीदास की चौपाई है। जो संस्कृत भाषा में नहीं अपितु अवधी भाषा में है। इसका मनुस्मृति से कोई सम्बन्ध नहीं है। मगर कॉपी पेस्टिया शूरवीर मानने को तैयार नहीं था। फिर मैंने मनुस्मृति में नारी जाति के सम्बन्ध में जो प्रमाण दिए गए है, उन्हें लिखा। पाठकों के लिए वही प्रमाण लिख रहा हूँ। आपको भी कोई कॉपी पेस्टिया शूरवीर मिले तो उसका आप ज्ञान वर्धन अवश्य करना।
 मनुस्मृति में नारी जाति
यत्र नार्य्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रऽफलाः क्रियाः। मनुस्मृति 3/56
अर्थात जिस समाज या परिवार में स्त्रियों का सम्मान होता है, वहां देवता अर्थात् दिव्यगुण और सुख़- समृद्धि निवास करते हैं और जहां इनका सम्मान नहीं होता, वहां अनादर करने वालों के सभी काम निष्फल हो जाते हैं।
पिता, भाई, पति या देवर को अपनी कन्या, बहन, स्त्री या भाभी को हमेशा यथायोग्य मधुर-भाषण, भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से प्रसन्न रखना चाहिए और उन्हें किसी भी प्रकार का क्लेश नहीं पहुंचने देना चाहिए। -मनुस्मृति 3/55
जिस कुल में स्त्रियां अपने पति के गलत आचरण, अत्याचार या व्यभिचार आदि दोषों से पीड़ित रहती हैं। वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है और जिस कुल में स्त्री-जन पुरुषों के उत्तम आचरणों से प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता है। -मनुस्मृति 3/57
जो पुरुष, अपनी पत्नी को प्रसन्न नहीं रखता, उसका पूरा परिवार ही अप्रसन्न और शोकग्रस्त रहता है और यदि पत्नी प्रसन्न है तो सारा परिवार प्रसन्न रहता है। - मनुस्मृति 3/62
पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के बिना अपूर्ण हैं, अत: साधारण से साधारण धर्मकार्य का अनुष्ठान भी पति-पत्नी दोनों को मिलकर करना चाहिए।-मनुस्मृति 9/96
ऐश्वर्य की कामना करने हारे मनुष्यों को योग्य है कि सत्कार और उत्सव के समयों में भूषण वस्त्र और भोजनादि से स्त्रियों का नित्यप्रति सत्कार करें। मनुस्मृति
पुत्र-पुत्री एक समान। आजकल यह तथ्य हमें बहुत सुनने को मिलता है।  मनु सबसे पहले वह संविधान निर्माता है जिन्होंने  जिन्होंने पुत्र-पुत्री की समानता को घोषित करके उसे वैधानिक रुप दिया है- ‘‘पुत्रेण दुहिता समा’’ (मनुस्मृति 9/130) अर्थात्-पुत्री पुत्र के समान होती है।
पुत्र-पुत्री को पैतृक सम्पत्ति में समान अधिकार मनु ने माना है।  मनु के अनुसार पुत्री भी पुत्र के समान पैतृक संपत्ति में भागी है। यह प्रकरण मनुस्मृति के 9/130 9/192 में वर्णित है।
आज समाज में बलात्कार, छेड़खानी आदि घटनाएं बहुत बढ़ गई है।  मनु नारियों के प्रति किये अपराधों जैसे हत्या, अपहरण , बलात्कार आदि के लिए कठोर दंड, मृत्युदंड एवं देश निकाला आदि का प्रावधान करते है। सन्दर्भ मनुस्मृति  8/323,9/232,8/342
नारियों के जीवन में आनेवाली प्रत्येक छोटी-बडी कठिनाई का ध्यान रखते हुए मनु ने उनके निराकरण हेतु स्पष्ट निर्देश दिये है।
पुरुषों को निर्देश है कि वे माता, पत्नी और पुत्री के साथ झगडा न करें।  मनुस्मृति 4/180  इन पर मिथ्या दोषारोपण करनेवालों, इनको निर्दोष होते हुए त्यागनेवालों, पत्नी के प्रति वैवाहिक दायित्व न निभानेवालों के लिए दण्ड का विधान है।  मनुस्मृति 8/274, 389,9/4
मनु की एक विशेषता और है, वह यह कि वे नारी की असुरक्षित तथा अमर्यादित स्वतन्त्रता के पक्षधर नहीं हैं और न उन बातों का समर्थन करते हैं जो परिणाम में अहितकर हैं। इसीलिए उन्होंने स्त्रियों को चेतावनी देते हुए सचेत किया है कि वे स्वयं को पिता, पति, पुत्र आदि की सुरक्षा से अलग न करें, क्योंकि एकाकी रहने से दो कुलों की निन्दा होने की आशंका रहती है। मनुस्मृति 5/149, 9/5- 6 इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मनु स्त्रियों की स्वतन्त्रता के विरोधी है| इसका निहितार्थ यह है कि नारी की सर्वप्रथम सामाजिक आवश्यकता है -सुरक्षा की।  वह सुरक्षा उसे, चाहे शासन-कानून प्रदान करे अथवा कोई पुरुष या स्वयं का सामर्थ्य।

पर्युक्त विश्‍लेषण से हमें यह स्पष्ट होता है कि मनुस्मृति की व्यवस्थाएं स्त्री विरोधी नहीं हैं।  वे न्यायपूर्ण और पक्षपातरहित हैं।  मनु ने कुछ भी ऐसा नहीं कहा जो निन्दा अथवा आपत्ति के योग्य हो।