Friday, 18 March 2016

फांसी चढ़े जवान, लुटेरे बने महान

जिन लोगों ने मुगलों का शासन नहीं देखा वो एक बार यजीदियों पर हो रहे आइ.एस.आइ.एस के आतंकियों  के द्वारा जुल्म देख लें, शायद फिर से इतिहास की समीक्षा करने का मन कर आये और पता चले इस देश के जवान महान थे या बाहरी लुटेरे! बाबर भी एक ऐसा ही लुटेरा था जो 1400 लुटेरों का  झुण्ड लेकर भारत की सीमा में घुसा था, जिसका नतीजा एक हजार साल की धर्मिक और सामाजिक दासता की जकडन यहाँ के निवासियों को भुगतनी पड़ी थी| वो तो भला हो महान माताओं का जिन्होंने अपनी कोख से इस देश की मिट्टी को वो लाल दिए जो उन देश धर्म के दुश्मनों से लड़ते,लड़ते अपने प्राण भारत माता के लिए न्योछावर कर गये|

हमारे हिन्दुस्तान के कुछ चाटुकार वामपंथी इतिहासकारों ने मुगल शासनकाल में भारतीय राष्ट्रीयता की के स्वरूप को मनमाने ढंग से प्रस्तुत किया है। इन्होंने मुगल शासनकाल को भारत का 'शानदार युग' तथा मुगल शासकों को 'महान' बताया है।  इन्होंने मुगल शासक अकबर, औरंगजेब आदि खलनायकों को पहली श्रेणी में तथा महाराणा प्रताप, शिवाजी जैसे नायकों को दूसरी श्रेणी में रखा। यह लोग इतिहास कुछ इस तरह लिखते है जैसे अंग्रेजो ने भारत को मुगलों से छिना हो जबकि ब्रिटिश इतिहासकारों तथा प्रशासकों ने माना है कि अंग्रेजों ने भारतीय सत्ता मुगलों से नहीं बल्कि मराठों तथा सिखों से छीनी थी। अंतिम मुगल शासक बहादुरशाह जफर तो नाममात्र का शासक था, जो दिल्ली के लाल किले तक सीमित था। किन्तु फिर भी यदि हम मुग़ल और अंग्रेज शासन की तुलना करे कोई भी कह सकता है कि ब्रिटिश शासन मुगलों से बेहतर था। हो सकता है अकबर ने अपने शासनकाल में कुछ सुधार किए हो । परन्तु केवल इस कारण ही उसके राज्य को 'राष्ट्रीय राज्य' या उसे 'राष्ट्रीय शासक' नहीं कहा जा सकता। कुछ आधुनिक मुस्लिम इतिहासकारों के एक वर्ग ने सत्य को छिपाते हुए मुगल साम्राज्य की सफलताओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया, परन्तु साथ ही उन्होंने मुगल शासकों की असफलताओं तथा कमियों को बिल्कुल भुला दिया या छिपाया। खेर
विचारणीय गंभीर प्रश्न यह है कि भारतीय राष्ट्रीयता का प्रतीक साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षी अकबर है या देशाभिमान पर शहीद होने वाली रानी दुर्गावती, भारतीय स्वतंत्रता के लिए मर मिटने वाले सुभाष चन्द्र बोस, करतार सिंह सराभा, भगत सिंह, राजगुरु,सुखदेव महान थे या वो मुस्लिम शासक जो नंग्न ओरतों के स्तन पकड़कर सीढियाँ चढ़ते थे? मुगलों से आजादी के लिए जंगलों में भटकने वाले महाराणा प्रताप महान थे या  वो अकबर है जो छल-कपट तथा दूसरों पर आक्रमण कर उसे जीत लेने के पागलपन से युक्त था| मीना बाजार से अय्याशी के लिए महिलाओं को उठवाने वाला अकबर महान था या शत्रु द्वारा पकड़े जाने अपमानित होने की आशंका के स्वयं छुरा घोंप कर बलिदान देने वाली रानी? क्या राष्ट्र का प्रेरक चित्तौड़ में 30,000 हिन्दुओं का नरसंहार करने वाला अकबर है या महाराणा प्रताप का संघर्षमय जीवन, जिन्होंने मुगलों की अजेय सेनाओं को नष्ट कर दिया था।

आज फिर विद्वानों द्वारा किसी भी शासक का मूल्यांकन राष्ट्र के जीवन मूल्यों के लिए किए गए उसके प्रयत्नों के रूप में आंका जाना चाहिए| जहांगीर तथा शाहजहां-दोनों ही अत्यधिक मतान्ध तथा विलासी थे। दोनों सुरा के साथ सुन्दरी के भी भूखे थे। अकबर के बिगड़ैल पुत्र जहांगीर ने स्वयं लिखा कि वह प्रतिदिन बीस प्याले शराब पीता था। दोनों ने हिन्दू, जैन तथा सिख गुरुओं को बहुत कष्ट दिए थे। शाहजहां की ही मजहबी कट्टरता तथा असहिष्णुता ने औरंगजेब की प्रतिक्रियावादी शासन पद्धति को जन्म दिया था। उसने भारत को दारुल हरब से दरुल इस्लाम बनाने के सभी घिनौने प्रयत्न किए। उसके ही शासन काल में गुरु तेग बहादुर का बलिदान हुआ, गुरु गोविन्द के चारों पुत्रों का बलिदान हुआ था। इसके बावजूद कुछ चाटुकार तथा वामपंथी इतिहासकारों ने उसे 'जिंदा पीर' का भी खिताब दिया है।
आज इतिहास फिर वहीं प्रश्न हाथ में लिए खड़ा है कि औरंगजेब भारत का राष्ट्रीय शासक था अथवा शिवाजी तथा गुरु गोविन्द सिंह राष्ट्रीय महापुरुष थे? वामपंथी इतिहासकार औरंगजेब की तुलना में शिवाजी को राष्ट्रीय मानने को तैयार नहीं हैं। गुरु गोविन्द सिंह जी का व्यक्तित्व भारतीय इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ है। किन्तु इन इतिहासकारों को उनके संघर्ष को देश के साथ जोड़ने में लज्जा आती है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मुगल शासक विदेशी, साम्राज्यवादी, क्रूर, लुटेरे तथा मतान्ध थे। उन्हें न भारत भूमि से कोई लगाव था और न ही भारतीयों से। अभारतीयों को राष्ट्रीय शासक कहना सर्वथा अनुचित है तथा देशघातक है। इसके विपरीत राणा प्रताप, शिवाजी, गुरु गोविन्द सिंह, राणा सांगा, हेमचन्द्र विक्रमादित्य, रानी दुर्गवती विदेशी  शासकों को खदेड़ने वाले भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अमर सेनानी थे, जिन्होंने भारत में सांस्कृतिक जीवन मूल्यों की पुन:स्थापना के लिए अपने जीवन का सर्वस्व बलिदान दिया।...लेखक राजीव चौधरी 


क्या ठाकुर का कुआँ अभी भी है ?

एक बार फिर यह घटना शिक्षित समाज के मुंह पर कालिख जैसी ही है कि एक तरफ तो हम लोग विश्व गुरु बनने का सपना देखते है और दूसरी तरफ अभी भी सेंकडो साल पुरानी अवधारणाओं को लिए बैठे है| मंगलवार को फिर मध्य प्रदेश के दमोह जिले में जात-पात के भेद ने एक मासूम की बलि ले ली। घटना जिले के तेंदूखेड़ा के खमरिया कलां गांव की है। यहां गांव के प्राथमिक स्कूल में पढ़ने वाले कक्षा तीसरी के छात्र को स्कूल के हैंडपंप पर पानी पीने से रोका गया तो वह अन्य छात्रों की तरह मंगलवार दोपहर माध्यान्ह भोजन के बाद पानी पीने स्कूल के हैंडपंप पर गया। लेकिन उसे हमेशा की तरह दुत्कार मिली। इस पर मासूम अपनी बोटल लेकर कुएं से पानी निकालने पहुंचा। बॉटल से रस्सी बांधकर पानी निकाल ही रहा था कि उसका संतुलन बिगड़ गया और नीचे जा गिरा। परिजनों के मुताबिक स्कूल में दलित बच्चों के साथ भेदभाव किया जाता है। इसकी शिकायत बच्चों ने उनसे कई बार की। भेदभाव के कारण बच्चे भी स्कूल आने से मना करते हैं। इसी स्कूल में 5वीं में पढ़ने वाले वीरन के भाई सेवक ने बताया कि उन्हें हर दिन इसी तरह कुएं से पानी लाकर पीना पड़ता है, क्योंकि स्कूल के हैंडपंप से शिक्षक पानी नहीं भरने देते।
बहुत पहले मुंशी प्रेमचंद की कहानी ठाकुर का कुआँ पढ़ी थी जो कल फिर जेहन में जिन्दा हो गयी जिसमें कहानी की नायिका गंगी गांव के ठाकुरों के डर से अपने बीमार पति को स्वच्छ पानी तक नहीं पिला पाती है। इसी विवशता को आज भी हम अपने अंतस में महसूस करते है, कितना दुर्भाग्य की बात है कि अभी भी यह कुप्रथा स्वतंत्रा भारत के हजारों गांवों में बदस्तूर जारी है। हमारे देश में वंचित और दलित लोगों का वर्ग है जिसको लोकतंत्र में पूरा अधिकार है कि वो इस देश के संसाधनों का इतना ही इस्तेमाल कर सकता है जितना कि इस देश का राष्ट्रपति किन्तु दुखद यह है कि उसको यह अधिकार देश का सविंधान तो देता है किन्तु सामाजिक जातिगत सविंधान के सामने वो आज भी लाचार खड़ा दिखाई देता है|
कुछ भी हो इन सब में दोष केवल जातिवादी लोगों का भी नहीं है दोष आज के उन दलितवादी चिंतको का भी है जो जातिप्रथा पर हमला तो करते है किन्तु कहीं ना कहीं जातिप्रथा का संरक्षण करने में भी लगे है कुछ समय पहले तक ब्राह्मणवादियों को लगता था कि जातिप्रथा उनके लिए लाभकारी व्यवस्था है ठीक वैसे ही अब दलित चिंतको, विचारको और राजनेताओं को को लग रहा है कि यह जातिप्रथा इनके लिए अति लाभकारी व्यवस्था बनती जा रही है इसके कारण ही इनकी राजनैतिक दुकान चल रही है अब यह खुद नहीं चाहते की उनका यह कारोबार बंद हो
किन्तु फिर भी जब से इस देश में जातिवाद का जन्म हुआ तबसे हमारा देश दुनिया को राह दिखाने वाले दर्जे से निकलकर सिर्फ दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदार और भिखारी देश बनकर रह गया है| जबकि इन अवधारणाओं से निकलकर पश्चिमी दुनिया के देश तरक्की कर गये| इसी जात-पात की प्रथा के चलते न सिर्फ हमने सदियों तक गुलामी को सहा है बल्कि मातृभूमि  के खूनी और दर्दनाक बंटवारे को भी सहा है| लेकिन शायद सिर्फ कुछ ही लोगों को मालूम हो कि मोहम्मद अली जिन्ना के परदादा, पुरखे हिन्दू ही थे जो किन्ही बेवकूफाना कारणों की वज़ह से ही मुसलमान बनने के लिए मजबूर हुए थे. हमारे जातिवाद के हिसाब से तो हिन्दू धर्मी किसी म्लेछ: के साथ सिर्फ खाना खाने से ही  म्लेछ हो जाता था और उसके पास अपने सत्य सनातन हिन्दू धर्म में वापस लौटने का कोई भी रास्ता  इन नीच, पापी पंडों ने नहीं छोड़ा था.

बाद के समय में जब स्वामी दयानंद सरस्वती और स्वामी श्रद्धानंद ने शुद्धि आन्दोलन शुरू किया और स्वातंत्र्य वीर सावरकर ने शुद्धि आन्दोलन को खुले तौर पर समर्थन दिया तब इन मौकापरस्त धर्म के ठेकेदारों को दुःख तो बहुत हुआ लेकिन इन्हें वैदिक धर्म के दरवाजे अपने भाइयों के लिए खोलने पड़े| लेकिन फिर भी ये मौकापरस्त धर्म को बेचने वाले अपनी नापाक हरकतों से बाज़ नहीं आये और अपने बिछुड़े भाइयों को तथाकथित छोटी जाति में जगह दी|  अब समय आ गया है बुद्धिमान लोगो को तो इन जातिवादियों से ये सवाल करना चाहिए की ये सब बताएं की बड़ी जाति में पैदा होकर इन्हें कौनसा महान और दैवीय ज्ञान भगवान से तोहफे में मिला था यहीं कि गरीब का सामाजिक शोषण करो? इन्होने कौन सी महत्वपूर्ण खोज भारत देश और समाज की दी है| इन जात-पात के लम्पट ठेकेदारों ने देश की सब विश्वप्रसिद्द संस्थानों की महान वैदिक वैज्ञानिक परंपरा का स्तर मिटटी में मिलाकर अपने घटिया किस्म की हथकंडे, तिकड़मबाज़ी और चालबाजी से इन्हें अपनी दक्षिणा का अड्डा बनाकर छोड़ दिया है कोई महान योगदान देने के बजाय उल्टा इस देश को जीरो बनाकर रख दिया..लेखक राजीव चौधरी  

Saturday, 12 March 2016

राजनैतिक जातिवाद के बीज ...

सत्ता के लिए भारत में जिस प्रकार से जातिवाद का बीज बोकर समाज में बिखराव का जो खेल खेला, जा रहा है निसंदेह वह पूरी तरह से देश को बर्बाद करने की नीति का हिस्सा ही कहा जाएगा। जिस भारत की एकता की पूरे विश्व में प्रशंसा की जाती है, वर्तमान में वही भारत देश आज संकीर्णता के दायरे में दिखाई दे रहा है। हमारे देश में विविधताओं के होने के बाद भी सांस्कृतिक और सामाजिक एकता का जो ताना बाना है, उसे विश्व के कई देश अजूबा ही मानते हैं। इस कारण विश्व के कई देश हमारे देश की संस्कृति को अपनाने की ओर आकर्षित हो रहे हैं। देश के सांस्कृतिक दर्शन की अवधारणा हमारे मूल वैदिक धर्म, हमारी विविधता में एकता की संस्कृति पर टिकी हुई है। किन्तु तेजी से प्रग्रतिशील समाज को आज जातियों में बांट देने का काम हमारी सरकारों द्वारा बखूबी किया जा रहा है वास्तव में भारत में जितने भी धर्म या संप्रदाय हैं, उनमें से आज जितना हमारे मूल धर्म में बिखराव दिखाई देता है, उतना संभवत: किसी और संप्रदाय में दिखाई नहीं देता। नेताओं ने कभी भी मुसलमान और ईसाई संप्रदाय को जातियों में विभाजित करने का कुचक्र नहीं रचा। ऐसा करने की हिम्मत ये नेता लोग कर भी नहीं सकते। क्योंकि इन संप्रदाओं के लोग अपने संप्रदाय की रक्षा करना जानते हैं।
हैदराबाद में एक छात्र की आत्महत्या के बाद राजनेताओं ने जिस तरह पुरे देश के सामाजिक ताने बाने को बिखेर कर खड़ा कर दिया क्या यह लोग इसे वापिस समेट पाएंगे? अब सवाल यह आता है कि जातिवाद का जहर घोलने का काम करने के लिए उन्हें कौन प्रेरित कर रहा है। इसमें अगर राष्ट्रीय दृष्टिकोण से सोचा जाए तो यह कहना तर्कसंगत होगा कि ऐसे मामलों पर राजनीति कभी नहीं की जानी चाहिए, बल्कि ऐसे प्रकरण घटित न हों इसके लिए देश में राजनीति करने वाले सभी दलों को व्यापकता के साथ विचार विमर्श करना चाहिए। हमारे देश में सर्व धर्म समभाव की बात की जाती रही है, लेकिन क्या ऐसे विरोध प्रदर्शन के चलते इस समभाव की कल्पना की जा सकती है। कदापि नहीं। जो लोग इस आत्महत्या पर विरोध करते रहे हैं, वह किसी न किसी प्रकार से भारत की सांस्कृतिक अवधारणा को मिटाने का ही कुचक्र कर रहे हैं। जातिवाद के आधार पर देश में जो विद्वेष बढ़ रहा है, ऐसे मामले आग में घी डालने के समान है। ऐसे मामलों पर देशवासियों को अत्यंत सावधानी बरतना चाहिए।

आज हमारे राजनेताओं को अपनी दृष्टि व्यापक करनी होगी और यह समझना होगा कि राजनीति राष्ट्रनिर्माण का काम है। आज हरेक राजनीतिक दल को वोट चाहिए और उसके लिए सही तरीका यह है कि  वे अपने दल के लिए वोट जुटाने में विचारधारा और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण यानि विकास की योजना का प्रचार-प्रसार करें। जनमत बनाना प्रत्येक राजनीतिक दल का कर्तव्य है लेकिन जाति आधारित राजनीति समाज गठन में बाधक है। यह बात सभी राजनीतिक दलों को समझना होगा। आखिर ऐसे में सवाल उठता है कि आधुनिक लोकतंत्र में जाति व्यवस्था को मजबूत करने का अपकर्म किसके द्वारा किया जा रहा है? क्या जातिवादी दल या नेता ही मरणासन्न जाति व्यवस्था को बार-बार पुनर्जीवित नहीं कर रहे हैं ? चिंता इस बात की है कि ये जातीय आंकड़े जातिवादी जहर को भारत की नस-नस में फैला देंगे। व्यक्ति की अपनी पहचान नष्ट हो जाएगी। वह मवेशियों की तरह अपने जातीय झुंड के नाम से पहचाना जाएगा। यदि भारत को महान और शक्तिशाली राष्ट्र बनाना है तो इसका आधार जातिवाद कभी नहीं हो सकता। ? इस पर जनता और तंत्र में बैठे सभी को गहन विचार करने की जरूरत है। अन्यथा जनतंत्र खतरे में पड़ जायेगा।  

महंगाई, बेरोजगारी,  देश का अन्नदाता और राष्ट्रविरोधी तत्वों व् आम लोगों से जुड़े सवालों के जगह अगर नेताओं को जातीयता की दुकान अधिक भा रही है तो इसे जनता को ही समझना होगा कि वह इनके स्वार्थरुपी चंगूल से कैसे मुक्ति पाएं। यह तभी संभव है जब जनता इनके कारगुजारियों को समझे और इनके मंसूबों को त्याग कर देशहित में सोचे कि कैसे गरीबी व महंगाई दूर होगी| और यह सोचना आप सभी को है कि क्या चाहिए समर्द्ध देश या जातिवाद ? राजीव चौधरी 

'खतरा मुसलमानों से नहीं, ब्राह्मणों से है' हंसानन्द

भारत को आजाद हुए चाहे 68  साल बीत चुके हैं लेकिन अभी भी यह देश जातिवाद जैसी सामाजिक बुराइओं से जूझ रहा है। पंजाब के शहर फगवाड़ा में तो इस जातिवाद का जहर मरने के बाद भी लोगों का पीछा नहीं छोड़ता। फगवाड़ा के क्षेत्र हदिआबाद में अलग अलग जातिओ के लिए अलग अलग शमशान घाट बनाये गए हैं। इस शमशान घाटो के सेवादारो का कहना है कि बरसों से इस इलाके में यही प्रथा चली आ रही है। एक साल पहले हरियाणा के हिसार जनपद के भगाना गाँव में जिस तरह से वहाँ दलित समाज को किसी भी स्तर पर आशानुरूप सामाजिक न्याय नहीं मिल पा रहा था जिस कारण पहले उन्होंने घर छोड़ने के बाद अब अपना धर्म छोड़ने तक का सफर भी तय करना पड़ा दिल्ली में जंतर मंतर पर धरने में ही लगभग सौ दलित परिवारों ने हिन्दू धर्म छोड़ते हुए पूरे रीति रिवाज से इस्लाम धर्म को अपना लिया है जिसके बाद समाज की उस क्रूर मानसिकता और हज़ारों वर्षों से भारतीय समाज में व्याप्त जाति व्यवस्था का यह विद्रूप चहेरा भी सामने आया है इस सबके बीच सबसे चिंता की बात यह है कि देश के किसी भी राजनैतिक दल की ओर से इन दलितों और प्रताड़ित किये गए वंचितों के प्रति कोई चिंता या संवेदनशीलता दिखाई नहीं दी! यह कोई अकेली घटना नही है बल्कि सामाजिक स्तर पर रोजाना ऐसी घटना हो रही है| जिसमें ब्राह्मण वाद कहीं सीधे तौर पर तो कहीं उसके द्वारा खड़ी की गयी सामाजिक जाति व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगता दिखाई देता है|
 यही नहीं यदि हम सरहद पार करे तो वहाँ का भी हाल यही है| जगजीत सिंह पाकिस्तान के उन दलित हिंदुओं में से हैं जो भेदभाव से तंग आकर अपना धर्म बदलने पर मजबूर हुए हैं। जगजीत अपने परिवार के साथ सिंध प्रांत के रेगिस्तानी जिले थरपारकर के मुख्यालय मट्ठी में रहते हैं। 2005 तक जगजीत का नाम हसानंद था, लेकिन फिर उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अपना धर्म छोड़ कर सिख धर्म अपना लिया। वो कहते हैं, "मैं इस इलाके को छोड़कर नहीं जाना चाहता हूं और यहां बगावत की एक मिसाल के तौर पर रहना चाहता हूं।"जगजीत यहां तक दावा करते हैं कि पांच साल पहले ब्राह्मण हिंदुओं ने उन पर क़ातिलाना हमला भी किया था। वो कहते हैं कि धर्म परिवर्तन करने से उन्हें मन की शांति मिली है। अब उनका बेटा दलित नहीं सरदार का बेटा कहलाया जायेगा| 'पाकिस्तान हिंदू पंचायत' संगठन के महासचिव रवि दावानी कहते हैं, "दलित समुदाय को हिंदुओं में गिना जाए तो समस्या नहीं होनी चाहिए। पाकिस्तान में हिन्दू अल्पसंख्यक अधिकारों की बात करना ऐसे ही लोगों की बात करने के बराबर है।"लेकिन पाकिस्तान में दलित समुदाय के अधिकारियों के लिए काम करने वाले और राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता डॉक्टर सोनू खनगरियानी तस्वीर का दूसरा रुख दिखाते हुए कहते हैं कि हिंदू अल्पसंख्यकों को मिलने वाले अधिकार तो ब्राह्मण ले जाते हैं।वो कहते हैं, "इसमें कोई दो राय नहीं कि हमें इस देश में मुसलमानों से कोई खतरा नहीं, बल्कि खतरा ब्राह्मणों से है| यह छुआछूत अकेले पाकिस्तान की बीमारी नहीं है बल्कि इससे भी बुरा हाल हिंदुस्तान का है| वीर सावरकर की प्रसिद्ध पुस्तक “मोपला” में जो मालाबार में हुए दंगो का सच दिखाती है कि किस तरह केरल के अन्दर ब्राह्मणवाद के कारण ही इतना बड़ा अत्याचार हुआ ब्राह्मण-वाद की बतौलत हमेशा से ही मूलवासी दलितों का शोषण होते आया है। और जब मूलवासी आदिवासी इससे बचे रहे तब ब्राह्मण-वाद ने अपने हित के लिए आदिवासियों को भी अपने जाल में फँसाया और प्रकृति-पूजकों को जाति व्यवस्था में शुद्र का दर्जा देने की कोशिश की। जिस कारण आज पूर्वी भारत में ईसाइयत और इस्लाम का प्रभाव बढ़ा| 11वीं सदी ईस्वी में भारत पर पहला मुस्लिम आक्रमण हुआ  यूरोपीय देशो ने भारत पर 17वीं-18वीं शताब्दियों में कब्जा करना शुरू किया किन्तु उससे पहले तो यहाँ जातिवाद और पाखंड के कारण लाखों लोग बोद्ध और जैन मत स्वीकार कर चुके थे इससे यह स्पष्ट है कि जाति प्रथा और धर्मपरिवर्तन के लिए विदेशी हमलावरों को दोषी ठहराने से पहले हमे खुद के सामाजिक भेदभाव का अवलोकन भी कर लेना चाहिए|
बहरहाल आज सवाल यह नहीं है कि समाज जीवित है या मर गया? सवाल यह है किस स्तर पर जीवित है| हम अक्सर कहीं भी होते धर्म परिवर्तन पर सीधे तौर पर दुसरे सम्प्रदायों,मतो पर आरोप लगाते है किन्तु उस व्यवस्था पर कभी प्रश्नचिन्ह खड़े नहीं करते जिसके कारण यह सब होता है, हमारे देश के नेता हमेशा जाति सुधार की बात करते किन्तु उस नजरिये के सुधार की बात नहीं करते जिसके कारण यह सब समस्याएं खड़ी होती है जिसके कारण मनुष्य जातिगत शब्दों से हीन समझा जाता है बहुत सी जगह आज भी दलितों को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है आस्था प्रार्थना तक में जातिगत शब्दों से तिरस्कार होता है किन्तु जब वो बहिस्कृत लोग धर्मपरिवर्तन कर लेते है तब धर्म के लोप का रोना रोया जाता है| सोचो आखिर जातिवाद क्या है इससे हमने अभी तक क्या पाया?   भारत को आजाद हुए चाहे 68  साल बीत चुके हैं लेकिन अभी भी यह देश जातिवाद जैसी सामाजिक बुराइओं से जूझ रहा है। पंजाब के शहर फगवाड़ा में तो इस जातिवाद का जहर मरने के बाद भी लोगों का पीछा नहीं छोड़ता। फगवाड़ा के क्षेत्र हदिआबाद में अलग अलग जातिओ के लिए अलग अलग शमशान घाट बनाये गए हैं। इस शमशान घाटो के सेवादारो का कहना है कि बरसों से इस इलाके में यही प्रथा चली आ रही है। एक साल पहले हरियाणा के हिसार जनपद के भगाना गाँव में जिस तरह से वहाँ दलित समाज को किसी भी स्तर पर आशानुरूप सामाजिक न्याय नहीं मिल पा रहा था जिस कारण पहले उन्होंने घर छोड़ने के बाद अब अपना धर्म छोड़ने तक का सफर भी तय करना पड़ा दिल्ली में जंतर मंतर पर धरने में ही लगभग सौ दलित परिवारों ने हिन्दू धर्म छोड़ते हुए पूरे रीति रिवाज से इस्लाम धर्म को अपना लिया है जिसके बाद समाज की उस क्रूर मानसिकता और हज़ारों वर्षों से भारतीय समाज में व्याप्त जाति व्यवस्था का यह विद्रूप चहेरा भी सामने आया है इस सबके बीच सबसे चिंता की बात यह है कि देश के किसी भी राजनैतिक दल की ओर से इन दलितों और प्रताड़ित किये गए वंचितों के प्रति कोई चिंता या संवेदनशीलता दिखाई नहीं दी! यह कोई अकेली घटना नही है बल्कि सामाजिक स्तर पर रोजाना ऐसी घटना हो रही है| जिसमें ब्राह्मण वाद कहीं सीधे तौर पर तो कहीं उसके द्वारा खड़ी की गयी सामाजिक जाति व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगता दिखाई देता है|
 यही नहीं यदि हम सरहद पार करे तो वहाँ का भी हाल यही है| जगजीत सिंह पाकिस्तान के उन दलित हिंदुओं में से हैं जो भेदभाव से तंग आकर अपना धर्म बदलने पर मजबूर हुए हैं। जगजीत अपने परिवार के साथ सिंध प्रांत के रेगिस्तानी जिले थरपारकर के मुख्यालय मट्ठी में रहते हैं। 2005 तक जगजीत का नाम हसानंद था, लेकिन फिर उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अपना धर्म छोड़ कर सिख धर्म अपना लिया। वो कहते हैं, "मैं इस इलाके को छोड़कर नहीं जाना चाहता हूं और यहां बगावत की एक मिसाल के तौर पर रहना चाहता हूं।"जगजीत यहां तक दावा करते हैं कि पांच साल पहले ब्राह्मण हिंदुओं ने उन पर क़ातिलाना हमला भी किया था। वो कहते हैं कि धर्म परिवर्तन करने से उन्हें मन की शांति मिली है। अब उनका बेटा दलित नहीं सरदार का बेटा कहलाया जायेगा| 'पाकिस्तान हिंदू पंचायत' संगठन के महासचिव रवि दावानी कहते हैं, "दलित समुदाय को हिंदुओं में गिना जाए तो समस्या नहीं होनी चाहिए। पाकिस्तान में हिन्दू अल्पसंख्यक अधिकारों की बात करना ऐसे ही लोगों की बात करने के बराबर है।"लेकिन पाकिस्तान में दलित समुदाय के अधिकारियों के लिए काम करने वाले और राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता डॉक्टर सोनू खनगरियानी तस्वीर का दूसरा रुख दिखाते हुए कहते हैं कि हिंदू अल्पसंख्यकों को मिलने वाले अधिकार तो ब्राह्मण ले जाते हैं।वो कहते हैं, "इसमें कोई दो राय नहीं कि हमें इस देश में मुसलमानों से कोई खतरा नहीं, बल्कि खतरा ब्राह्मणों से है| यह छुआछूत अकेले पाकिस्तान की बीमारी नहीं है बल्कि इससे भी बुरा हाल हिंदुस्तान का है| वीर सावरकर की प्रसिद्ध पुस्तक “मोपला” में जो मालाबार में हुए दंगो का सच दिखाती है कि किस तरह केरल के अन्दर ब्राह्मणवाद के कारण ही इतना बड़ा अत्याचार हुआ ब्राह्मण-वाद की बतौलत हमेशा से ही मूलवासी दलितों का शोषण होते आया है। और जब मूलवासी आदिवासी इससे बचे रहे तब ब्राह्मण-वाद ने अपने हित के लिए आदिवासियों को भी अपने जाल में फँसाया और प्रकृति-पूजकों को जाति व्यवस्था में शुद्र का दर्जा देने की कोशिश की। जिस कारण आज पूर्वी भारत में ईसाइयत और इस्लाम का प्रभाव बढ़ा| 11वीं सदी ईस्वी में भारत पर पहला मुस्लिम आक्रमण हुआ  यूरोपीय देशो ने भारत पर 17वीं-18वीं शताब्दियों में कब्जा करना शुरू किया किन्तु उससे पहले तो यहाँ जातिवाद और पाखंड के कारण लाखों लोग बोद्ध और जैन मत स्वीकार कर चुके थे इससे यह स्पष्ट है कि जाति प्रथा और धर्मपरिवर्तन के लिए विदेशी हमलावरों को दोषी ठहराने से पहले हमे खुद के सामाजिक भेदभाव का अवलोकन भी कर लेना चाहिए|
बहरहाल आज सवाल यह नहीं है कि समाज जीवित है या मर गया? सवाल यह है किस स्तर पर जीवित है| हम अक्सर कहीं भी होते धर्म परिवर्तन पर सीधे तौर पर दुसरे सम्प्रदायों,मतो पर आरोप लगाते है किन्तु उस व्यवस्था पर कभी प्रश्नचिन्ह खड़े नहीं करते जिसके कारण यह सब होता है, हमारे देश के नेता हमेशा जाति सुधार की बात करते किन्तु उस नजरिये के सुधार की बात नहीं करते जिसके कारण यह सब समस्याएं खड़ी होती है जिसके कारण मनुष्य जातिगत शब्दों से हीन समझा जाता है बहुत सी जगह आज भी दलितों को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है आस्था प्रार्थना तक में जातिगत शब्दों से तिरस्कार होता है किन्तु जब वो बहिस्कृत लोग धर्मपरिवर्तन कर लेते है तब धर्म के लोप का रोना रोया जाता है| सोचो आखिर जातिवाद क्या है इससे हमने अभी तक क्या पाया?   

Friday, 26 February 2016

आरक्षण, व्यवस्था है,या अधिकार?

हमारे देश में प्रतिवर्ष लाखो करोड़ों की सम्पत्ति तो मात्र इस वजह आग के हवाले कर दी जाती है कि सरकार द्वारा हमारी मांगे मान ली जाये| पिछले वर्ष गुजरात के पाटीदार आन्दोलन में लगभग दो सौ करोड़ की संपत्ति जलने की राख अभी ठंडी ही हुई थी कि अब हरियाणा सुलग उठा| जिस तरह देश में आरक्षण का अधिकार पाने को हर रोज राजनीति का बिगुल बजता है उसे देखकर लगता आने वाले दिनों में आरक्षण बजाय एक व्यवस्था के एक अधिकार बन जायेगा| क्या वर्तमान आरक्षण की मांग को देखते हुए मूलरूप में सविंधान के निर्माताओ के द्वारा आरक्षण की आवश्यकता और प्रासंगिकता पर विचार किया जाए,
भारतीय समाज में प्राचीन काल से ही असमानता रही है और इस असमानता के कारण कुछ वर्गों को नुकसान उठाना पड़ा है. लंबे समय तक असमानता का दंश झेलते और समाज में हासिए पर धकेल दिए गए वर्गों के बीच उम्मीद की किरण उस समय जगी, जब अंग्रेजी शासन का खात्मा हुआ और लोकतांत्रिक सरकार का गठन हुआ. राष्ट्र को चलाने के लिए संविधान का निर्माण किया गया और संविधान निर्माताओं को यह महसूस हुआ कि भारत में असमानता का स्तर इतना अधिक है| कि इसे दूर करने के लिए कुछ वर्गों को विशेष सुविधाएं दी जानी चाहिए, जिसके कारण भारतीय संविधान में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष उपबंध करने की बात कही गई| चूंकि भारत में असमानता का आधार जाति थी, इसके कारण सबसे पहले अनुसूचित जातियों(दलितों) तथा अनुसूचित जनजातियों(आदिवासियों) को आरक्षण दिया गया और बाद में पिछड़े वर्ग का निर्धारण कर उन्हें भी सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया गया सीधे शब्दों में कहें तो यह व्यवस्था उन लोगों के लिए की गयी थी| जिन्हें समाज में निर्बल, अछूत, और सामाजिक द्रष्टि से हेय समझा जाता था| 
आरक्षण के संदर्भ में यह बात शुरू से ही उठती रही है कि आखिर आरक्षण की आवश्यकता क्या है| क्या पिछड़े लोगों को सुविधाएं देकर उन्हें मुख्य धारा में नहीं लाया जा सकता है| यह सवाल जायज हो सकता है, लेकिन ऐसे सवाल करने वालों को पहले यह जानना होगा कि आरक्षण दिया क्यों गया है! दरअसल आरक्षण दिए जाने के पीछे न्याय का सिद्धांत काम करता है, यानी राजा का कर्तव्य है कि वह सभी लोगों के साथ न्याय करे, न्याय को दो अर्थों में देखा जा सकता है| पहला कानून के स्तर पर और दूसरा समाज के स्तर पर, कानून के स्तर पर न्याय दिलाने के लिए न्यायपालिका का गठन किया गया, जिसमें खामियां हो सकती है, लेकिन उन खामियों को सुधारा जा सकता है, जिससे सभी को मौका न्याय मिल सके| दूसरा समाज के स्तर पर भारत में सदियों से सामाजिक अन्याय होता रहा है और कुछ जगह तो अभी भी जारी है. भारत में सामाजिक अन्याय का सबसे बड़ा कारण जातिय व्यवस्था रही और इसके कारण सामाजिक प्रतिष्ठा कर्म के आधार पर नहीं, बल्कि जाति के आधार पर मिली. जाति के आधार पर कुछ वर्गों ने आर्थिक संसाधनों पर कब्जा किया और कुछ को आर्थिक संसाधनो से वंचित रखा गया| आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण योग्यता प्रभावित हुई और योग्यता के अभाव में पिछड़ापन आया और असमानता कम होने के बजाय बढ़ता ही गया| इसी असमानता को कम करने के लिए विकल्प की तलाश की गई, इस असानता को कम करने के लिए तीन विकल्प मौजूद थे, पहला विकल्प सुविधाओं का था यानी शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण आदि की सुविधाएं उन वर्गों को  दी जाएं जिसे अभी तक उपलब्ध नहीं हुई है

जो लोग आज आरक्षण को ख़ारिज करते हैं, वो तो हमेशा से सामाजिक न्याय के सवाल को भी ख़ारिज करते रहे हैं, ध्यान रहे कि किसी भी समाज में भिन्नताओं को स्वीकार करना उस समाज की एकता को बढ़ावा देता है न कि विघटन करता है|  उदहारण के तौर पर अमरीकी समाज ने जबतक अश्वेत और श्वेत के सवाल को स्वीकार नहीं किया, तब तक वहाँ विद्रोह की स्थिति थी और जब इसे सरकारी तौर पर स्वीकार कर लिया गया, तब से स्थितियाँ बहुत सुधर गई हैं| अगर पिछले 50 साल के सामाजिक भेदभाव को देखे तो एक बात ज़रूर देखे कि आरक्षण की व्यवस्था एक बहुत ही सफल प्रयोग रहा है, जिसमे समाज के हाशियाग्रस्त लोगों को एक सामाजिक आधार मिला किन्तु इसके बाद राजनैतिक स्वार्थ वश इस व्यवस्था का जिस तरीके से दुरपयोग हुआ वह इसका दुखद पहलू रहा| यदि अब सामाजिक आर्थिक रूप से संपन्न तबके भी इस व्यवस्था का उपयोग चाहेंगे तो सोचो भारत का भविष्य क्या होगा? राजीव चौधरी